स्कूल नहीं आते थे बच्चे तो इस प्रिंसिपल नें स्कूल को ही घरों तक पहुंचा दिया

महात्मा गांधी ने कहा था कि शिक्षा एक ऐसा साधन है जो राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में एक जीवंत भूमिका निभा सकता है।

किसी भी प्रकार के विकास एवं उन्नति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण शास्त्र है। शिक्षा के अभाव में कुछ भी पूर्णरूप से हांसिल नहीं किया जा सकता। यह लोगों के जीवन स्तर में सुधार तथा उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु क्षमताओं का निर्माण कर तथा बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साक्षरता के स्तर में वृद्धि से उच्च उत्पादकता बढ़ती है तथा अवसरों के सृजन से स्वास्थ्य में सुधार, सामाजिक विकास और उचित निष्पपक्षता को प्रोत्साहन मिलता है। पर हमारे देश में आज भी शिक्षा का अभाव है या यूं कहें लोगों में शिक्षा के प्रति जागृति की कमी है।

आज हमारे आस पास ना जाने कितने ऐसे लोग हैं जो शिक्षा व बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं। कहीं न कहीं इसका एक मूल कारण करीबी भी है, जो चाह मर भी एक गरीब के बच्चे को स्कूल जाने से रोकती है। एक समृद्ध परिवार के बच्चे के मुकाबले एक गरीब परिवार के बच्चे के लिए परिस्थितियां ज्यादा कठिन हो जाती है। इसी वजह से कई बच्चे या तो स्कूल में दाखिला नहीं ले पाते या तो बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं। इसी दर्द को समझा एक प्रिंसिपल नें जिन्होंने ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए अनोखी पहल शुरू की।

इनका नाम है गोपाल कृष्ण पटेल। गोपाल गुजरात के गोधरा में नव नादिसर प्राइमरी स्कूल के प्रिंसिपल हैं। गुजरात का यह शिक्षक शिक्षा की ज्योत जलाने के लिए एक अनूठी पहल के साथ आया है। गोपालकृष्ण को एक वक्त अहसास हुआ कि जिले में स्कूल में आने वाले बच्चों की संख्या में गिरावट आ रही है। स्कूल न जाने वाले अधिकतर बच्चे सामाजिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि से होते हैं। जिन्हें लगता है कि पढ़ाई-लिखाई पर पैसे खर्च करना बेकार है। छोटी उम्र में बच्चों को काम पर लगा दिया जाता था। तभी गोपाल के दिमाग में एक बात आई कि अगर बच्चे स्कूल नहीं आ पाते तो क्यों ना स्कूल को ही बच्चों के घरों तक पहूंचाया जाय। तभी उन्होंने "मोहल्ला प्रार्थना सभा" की नींव रखी।

इसके तहत इस गांव के जो बच्चे स्कूल में प्रवेश नहीं लेते थे या मध्य सत्र छोड़ देते थे, तो स्कूल के प्रिंसिपल गोपाल ने इज सुनिश्चित किया कि स्कूल उनके इलाके में पहुंचे और उन्हें पढ़ाया जाय। अपनी 'मोहल्ला प्रार्थना सभा' के माध्यम से उन्होंने सोचा कि आसपास के इलाकों में अगर बच्चों के घर के आसपास ही पढ़ाने की सुविधा दी जाय तो वे शिक्षा की ओर जरूर आकर्षित होंगे। इसके तहत वे हफ्ते में एक बार अपने स्कूल के बच्चों को लेकर गांव में जाते हैं और वहीं पर क्लास लगाते हैं। इससे गांव के दूसरे बच्चे जो स्कूल नहीं जा पाते उनका भी मन पढ़ाई को ओर आकर्षित होता है। इस खुली असेंबली में आसपड़ोस के सारे बच्चे आकर पढ़ाई कर सकते हैं, इसमें किसी तरह की कोई मनाही नहीं है। इतना ही नहीं बच्चों के अभिभावक भी यहां आकर देख सकते हैं कि उनके बच्चे कैसी पढ़ाई कर रहे हैं।

लगभग पांच साल पहले गोपाल नें अपनी असेंबली उन क्षेत्रों में लेने का फैसला किया जहां से छात्र प्रवेश या उपस्थिति कम थी। परिणाम स्वरूप स्कूल के 30 से 35 छात्र स्कूल आने लगे। साथ ही गांव के बहुत सारे गरीब छात्र भी इस ओपन असम्बली को जॉइन करते हैं। केंद्र सरकार और यूनिसेफ द्वारा प्रिंसिपल गोपाल कृष्ण के इस प्रयासों और पहल को पहचाना। साल 2017 में उनके स्कूल के एक शिक्षक राकेश पटेल को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए शिक्षकों के राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया था।

यह स्कूल लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा कर रहा है। जो कि सबसे महत्वपूर्ण है। इस तरह के अनूठे प्रयासों से देश की शिक्षा जगत में बहुत बड़ा बदलाब आ सकता है। 

 

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