एमबीए करने के बावजूद चुना खेती का रास्ता, आज मिट्टी रहित खेती कर कमा रहे लाखों

वक़्त के साथ-साथ हमारे रहन सहन और विभिन्न परम्परागत कार्यशैली में भी बदलाव आ गया है। यह बदलाव स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। अगर हम वक़्त के साथ खुद को नहीं बदलते तो कहि न कहि हम पीछे छुटते जाते है। और कुछ ऐसी ही समस्या दिखती है हमारे उन किसानो के लिए जो आज भी परम्परागत रूप से खेती करते है और लाख मेहनत के बाद भी उनको इस मेहनत का फल नहीं मिलता। वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे किसान हैं जो खेती के आधुनिक तरीकों को सीख व अपना कर खेती के नए आयाम लिख रहे हैं।
हमारा कृषि विज्ञान भी इतनी तेज़ी से विकास कर रहा है कि आये दिन नई-नई तकनीकों का इज़ाद हो रहा है। और इन तकनीकों का सीधा-सीधा लाभ हमारे पढे-लिखे किसानों को मिल रहा है। आज हम एक ऐसे ही किसान की बात करने जा रहे हैं, जिन्होनें डबल एमबीए करने के बावजूद खेती के रस्ते को चुना। आज बिना मिट्टी की आधुनिक खेती कर लाखों की कमाई कर रहे हैं।

इनका नाम है अनुज नरवाल। हरियाणा के पानीपत जिले के जोशी गांव के रहने वाले अनुज नरवाल बिना मिट्टी के खेती करते हैं। आपको यह बता दें की अनुज पढाई में बहुत अच्छे थे और उन्होंने डबल एमबीए भी किया है। अनुज नें अपनी एमबीए की पढाई ऑस्ट्रेलिया से पूरी की है। पढाई के दौरान ही अनुज को इस मिट्टी रहित खेती की तकनीक के बारे में पता चला था। दरअसल आस्ट्रेलिया में जब वे पढाई कर रहे थे, तो उस समय अपना खर्चा निकालने के लिए टैक्सी चलाते थे। अनुज एक साधारण परिवार से थे उस लिए उनको अपना खर्च निकलनें के लिए यह काम करना पड़ता था। पढाई के आलावा वे कमाई के भी विभिन्न श्रोतों की तलाश में लगे रहते थे, उसी दौरान अनुज नें पहली बार बिना मिट्टी के होने वाली खेती को देखा। तभी से इसके प्रति उनके मन में जिज्ञासा जागृत हो गयी और उन्होंने इसके बारे में जमकर रिसर्च किया।

अनुज नें इस मिट्टी रहित खेती के तकनीक की पूरी जानकारी हासिल की और भविष्य में इसे अपनाने का मन बनाया। दरअसल अनुज के गाँव में भी मिटटी की ही समस्या थी, मिट्टी की गुणवत्ता ख़राब होने के कारण लोग ठीक से खेती नहीं कर पाते थे। उनके गाँव की मिट्टी में खरपतवार की बहुत अधिकता थी, इसके कारण वहां बहुत कम फसलों का ही उत्पादन होता है। इस लिए अनुज के दिमाग में आया की इस तकनीक से वे सफलतापूर्वक खेती कर सकते हैं और दूसरों को भी यह तकनीक सिखा सकते हैं।

पढाई खत्म होनें के बाद अनुज को आस्ट्रेलिया में ही अच्छी नौकरी मिल रही थी, लेकिन किसी दूसरे के लिए काम करने की बजाय उन्होंने एमबीए पूरी होने के बाद भारत वापस आकर अपनें गाँव में मिट्टी रहित तकनीक से खेती करनें का फैसला लिया। गाँव वापस आकर जब उन्होंने घर वालो को यह बात बताई तो सब आश्चर्यचकित हो गये, कुछ नें तो उन्हें अपना विचार बदलनें को भी कह दिया। पर अनुज नें फैसला कर लिया था और वर्ष 2011-12 में आस्ट्रेलिया से सीखी तकनीक के आधार पर उन्होंने अपनें गाँव में खेती करना शुरू किया। अनुज इस तकनीक को छुपाना भी नहीं चाहते बल्कि जितना हो सके वे किसानों को इसके बारे में बताते हैं। दूर-दूर से किसान उनके द्वारा की जा रही मिट्टी रहित खेती की पद्धति को सीखने आते हैं।

इस खेती में मिट्टी के स्थान पर नारियल के अवशेष का प्रयोग किया जाता है। इसे छोटे-छोटे बैगों में डालकर पॉली हाउस के अंदर सब्जी के पौधे उगाए जाते हैं। नारियल के इस अवशेष को खेती के लिए लगातार तीन साल तक प्रयोग किया जा सकता है। इस तकनीक से लगातार सात महीनों तक सब्जियों का उत्पादन होता है। अनुज हर तीन साल बाद केरल से नारियल के अवशेष मंगवाते है। इसका एक बैग लगभग 5 किलो का होता है और इसकी कीमत तीस रुपए पड़ती है।

अनुज आज अपनें 15 एकड़ से भी ज्यादा भूमि पर मिट्टी रहित जैविक खेती कर रहे हैं। अनुज के खेत में खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर, गोभी तथा मटर जैसी सब्जियों का उत्पादन होता है। आज वे सारी लागत हटा कर भी सालाना कम से कम 10 लाख रुपये से भी अधिक की कमाई कर रहे हैं।

 

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