शहर की चकाचौंध छोड़ जैविक खेती के जरिये सफलता हासिल करने वाले दंपति की कहानी

आज के आधुनिक युग में जहाँ लोग आरामदायक और सुख-सुविधाओं भारी ज़िन्दगी जीने के लिए लालायित रहते हैं। ज्यादातर पति -पत्नी की चाहती होती है कि वे एक आधुनिक जीवन जीयें, जहां उन्हें सब कुछ उंगलियों के इशारे पर मिल जाये। शायद ही कुछ लोग होंगे जो अब भी गांव के जीवन को पसंद करते हैं और पारंपरिक जीवन बिताने की कल्पना करते हैं। गांव के पारंपरिक जीवन में जो शांति और सुद्धता है वह शहरों के भाग-दौड़ और प्रदूषण भारी ज़िन्दगी में कभी प्राप्त नहीं हो सकता है।

पर धीरे-धीरे कुछ युवाओं में शौकिया खेती की का क्रेज अब बढ़ने लगा है। लोग अब गांव के परिवेश में रहनें व प्राकृतिक जीवन जीने की पहल कर रहे हैं। बहुत सारे लोग हैं जो शहर के अव्यवस्था से तंग आकर , प्रकृति के करीब, ग्रामीण इलाको मेकन रहने के लिए इच्छुक हैं। और इस तरह के प्रयासों से दूसरों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश हो रहा है।

आज हम एक ऐसे युगल की बात करने जा रहे हैं जिन्होंने शहरों की चकाचौंध भारी जिंदगी को अलविदा कह दिया और गांव में रहनें की ठानी है। इनका नाम है अंजलि रुद्राराजु करियप्पा और कबीर करीपप्पा। इन दोनों नें अपनें शहर के जीवन को छोड़ गांव में रहनें व वहां रहकर ऑर्गेनिक व पारंपरिक खेती कर प्राकृतिक रूप से जीवन जीने की एक पहल शुरू की। दोनों मिलकर फिलहाल कर्नाटका के मैसूर शहर के निकट कोटे तालुका के हलासुरु गाँव में एक बहुत बड़े फार्म को स्थापित किया है। इस फार्म का नाम है "यररोवे फार्म"। एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने सर्फ एक फार्म नहीं अपनें सपनों का एक पूरा प्राकृतिक संसार ही बस डाला है। यहीं से उपजने वाले शुद्ध अनाज न सब्जियों का वे सेवन करते हैं और अपना पूरा जीवन उन्होंने उस फार्म के लिए ही समर्पित कर दिया है।

अगर हम कबीर की बात करें तो, कबीर का बचपन खेतों में ही गुजर है। वे खतों में ही बड़े हुए। कबीर को हम दूसरी पीढ़ी का किसान कहें तो गलत नहीं होगा। उनके माता-पिता, जुली करियप्पा और विवेक करियप्पा करीब तीन दशकों से आर्गेनिक खेती का अभ्यास कर रहे थे। वहीं अपने माता-पिता द्वारा कबीर को भी घर में ही शिक्षा मिली। कबीर ने बचपन से ही सिर्फ ओर्गानिक खेती को ही देखा और उन्हें किसी दूसरे खेती के बारे में कभी पता भी नहीं चला।

दूसरी तरफ अगर अंजली की बात जी जाए तो अंजली शुरू से ही शहरी परिवेश में रहीं। उन्होनें हैदराबाद से प्रवंधन में ग्रेजुएशन किया और उसके बाद न्यूआर्क से मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। इसके अलावा वे न्यूआर्क में ही करीब एक दसक तक फाइनासियल सर्विस के क्षेत्र में काम भी कर चुकी हैं। पर धीरे-धीरे उनका प्रकृति की ओर रुझान बढ़ता गया और कारपोरेट क्षेत्र को उन्होनें अलविदा कहने का मन बना लिया। 2010 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और देश वापस लौट आयीं। उन्होनें अपने परिवार के साथ एक छोटे पैमाने पर जैविक खेती की शुरुआत की। अंजली के लिए शुरूआत में यह कठिन था क्योंकि उन्हें इसका कोई अनुभव नहीं था। अंजलि पूरे भारत में  विशेष रूप से भारत के कई 'ग्रामीण' भागों में गई। वहां उन्होनें खुदको बहुत सहज व प्रसन्न महसूस किया।

उसके बाद दोनों नें मिलकर इस फार्म की स्थापना की। एक शहर की तुलना में यहाँ रहने के लिए सुरक्षित व सम्पन्न वातावरण है। यहाँ उन्होनें गांव से लोगों को ओर्गानिक फार्मिंग सिखाई व ग्रामीणों को काम पर भी रखा। कबीर और अंजली ने लगभग सात अन्य लोगों की मदद से 50 एकड़ खेत का प्रबंधन किया है।यहाँ वे हर यह चीज़ विकसित करने की कोशिश करते हैं जो उन्हें चाहिए और रोजमर्रा के जीवन में वे उपभोग करते हैं। साथ ही वे कुछ ऐसे चीजें का भी उत्पादन करते हैं जिसकी बाजार में अच्छी डिमांड ही। ये सारे फसल सब्जियां वे पूर्ण रूप से प्राकृतिक वातावरण वे व आर्गेनिक तरिके से उगते हैं। जिसकी गुणवत्ता का कोई जवाब नहीं होता।

खेत में उगाई गई फसलों की में मुख्यरूप से गन्ना, कपास, तेल जिसमे सरसों, तिल,सूरजमुखी और मूंगफली शामिल हैं, इसके अलावा रागी, बाजरा, ज्वार, फोक्साटेल, चावल और गेहूं जैसे अनाज शामिल हैं। दालों में सभी प्रकार के दाल मूंग,मसूर,अरहर इत्यादि व मसालों में  हल्दी, अदरक, मिर्च, धनिया, मेथी, और सरसों जैसे मसाले शामिल हैं। इसके अलावा उनके फार्म में एक से एक ताजी व ऑर्गेनिक फलों-सब्जियों का उत्पादन होता है।

उन्हें अपनें फार्म से सारी चीजें मुहैया हो जाती है जिसकी उन्हें जरूरत होती है। उन्हें बाजार से मात्र नमक, पास्ता, सर्फ-साबुन व ईंधन ही खरीदना पड़ता है। इसके अलावा उनके यररोवे फार्म से हर सप्ताह ताजी फल सब्जियों को पास के शहर मैसूर व बंगलुरु के बाज़ारों में भेजा जाता है।

 

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1980