कभी छोटे स्टॉल पर करते थे पिता की मदद, आज हैं बिलियन डॉलर की कंपनी के मालिक

मेहनत व लगन से आपके लिए अपनी मंजिल पाना खासा आसान हो जाता है। पर इस मंजिल को पाने के दौरान आपको बहुत संघर्ष से होकर गुजरना पड़ता है। पर यही संघर्ष जीवन को निखारती है, संवारती है, तराशती है और गढ़कर ऐसा बना देते हैं, जिसकी प्रशंसा करते लोगों की जबान नहीं थकती। साथ में अगर प्लानिंग व टाइम मैनेजमेंट भी हो, तो आप कुछ भी कर सकते हैं।  आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात करने जा रहे हैं जो अपने काम के प्रति इतना दृढ़ थे कि जहाँ अगर सामान्यतः लोग 8 घण्टे काम करते हैं वहाँ वह 16 घंटे काम करते हैं। जिन्हें पूरे अफ्रीका के एक बड़े बिजनेसमैन के रूप में जाना जाता है।

इनका नाम है मणिलाल प्रेमचंद चंदारिया। पर लोग इन्हें मनु चंदारिया के नाम से भी जानते हैं। मनु चंदारिया को केन्या के सबसे सफल बिजनेसमैन के रूप में जाना जाता है। उनकी कंपनी कॉमक्राफ्ट ग्रुप एक बिलियन डॉलर की कंपनी है, जिसका बिजनेस विश्व के 40 देशों में फैला हुआ है। वह कई प्रमुख अफ्रीकी कंपनियों के बोर्डों में सदस्य भी है। अपनें उद्यमशील प्रयासों के कारण उन्होंने पूर्वी अफ्रीका में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कई पुरस्कार जीते हैं। साथ ही उनके द्वारा किए जा रहे जनकल्याणकारी कामों के लिए लोगों में उनके प्रति श्रद्धा है। उन्होंने इसके लिए चंदारिया फाउंडेशन के नाम से एक संस्था भी बना रखी है। जिसके माध्यम से वे तमाम परोपकारी कार्य करते हैं। आज 89 वर्ष के उम्र में भी वे रोजाना 16 घंटा काम करते हैं।

मणिलाल का जन्म 1 मार्च 1929 को केन्या के नैरोबी में हुआ था। दरअसल उनके पिता प्रेमचंद चंदारिया मूलतः भारत में स्थित सौराष्ट्र यानी गुजरात राज्य के रहने वाले थे। वे एक वयापारी थे लेकिन भारत में उनका बिजनेस कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। अच्छे भविष्य की तलाश में उन्होंने केन्या का रुख किया। वे 1915 में केन्या चले गए थे। मनु चंदारिया के पिता बहुत ज्यादा पड़े लिखे नहीं थे,यहाँ तक कि वे अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं बोल पाते थे। उस वक़्त केन्या स्थित नैरोबी एक छोटा शहर हुआ करता था। इसलिए उनके पिता बियसहारा स्ट्रीट पर एक छोटी सी स्टॉल किराए पर लेनें में सफल रहे। जहाँ वे अपनी एक छोटी सी दुकान लगते थे। उन्होंने नैरोबी के निचले इलाके नगरा में एक घर किराए पर ले रखा था जहाँ कुल 3 परिवार रहते थे। मनु जा जन्म भी वहीं हुआ और बचपन भी वहीं बिता। मनु भी जब छोटे थे तो अपने पिता का हाथ बटाया करते थे।

मनु चंदारिया के पिता भले ही ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे पर उनकी इक्षा थी कि उनका बेटा खूब पढ़े। मनु की शुरुआती पढ़ाई नैरोबी और मोम्बासा शहर के स्कूलों में हुई। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने भारत का रुख किया। उन्होंने जामनगर यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की है। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे यूके चले गए। जहाँ उन्होंने ओखलोम यूनिवर्सिटी से अपनी बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग और मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त। 1951 में अपनी पढ़ाई पूरी करनें के बाद वे केन्या वापस चले आये। वापस आने के बाद उन्होंने कोई सरकारी नौकरी करने के बजाय पिता के कारोबार को बढ़ाने का सोचा। मनु चंदारिया नें धीरे-धीरे प्रोपर्टी खरीदनी शुरू की जिसके बाद उन्होंने मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज में कदम रखा।

उन्होंने स्टील और अलुमिनियम के प्लांट्स स्थापित किये। उसका नाम था कालुवर्क्स जिसमें कुल 40 कर्मचारी थे और मनु उसमें सेकंड इंजीनियर थे। उनके कठिन मेहनत और अच्छी क्वालिटी के बदौलत मात्र 5 साल के अंदर ही उनकी कंपनी का बोलबाला हो गया। उन्होंने अपने बड़े प्रतिद्वंदी केन्या अलुमिनियम को भी खरीद लिया। देखते ही देखते उनके कंपनी में 800 से अधिक इम्प्लॉय हो गए थे। उसके बाद उन्होंने इंडिया, नाइजीरिया,कांगो,इथोपिया, ज़ाम्बिया आदि देशों तक अपना वयापार फैला लिया। आज के समय में उनकी कंपनी विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही है। उनका व्यापार 40 देशों तक फैला हुआ है। और उनकी कंपनी में कुल लगभग 50 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं। आज मनु चंदारिया कालुवर्क्स,मवाती रोलिंग मिल्स,बाती लिमिटेड,अलुमिनियम अफ्रीका जैसे ब्रांड के मालिक हैं।

इतने अमीर बिजनेसमैन होने के वाबजूद मनु चंदारिया बहुत ही साधारण जीवन जीते हैं। जहां बड़े बन जाने के बाद लोग अपना कल भूल जाते हैं, वहीं मनु चंदारिया नें कभी अपनी जमीन को नहीं भुला। वेलोगों के लिए हर संभव काम करते हैं। चंदारिया फाउंडेशन के तहत उन्होंने कई अस्पताल, बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल व कॉलेज साथ ही तमाम तरह के जनकल्याण हेतु कदम उठाए। वे अबतक 18 हज़ार बेसहारा बच्चो को आश्रय दे चुके हैं। वे महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को बहुत मानते हैं।

उनका कहना है कि "भारत में टाटा,अमेरिका में रॉकफेलर और फोर्ड जैसे लोग हैं। जिनके पास दूसरों की तरह ही दो हाथ, दो पैर और दो आंख हैं। फिर भी उन्होंने अपने देश के लिए दूसरों से 100 गुना अधिक किया है। वे सब मेरे लिए एक प्रेरणा है।"

मनु चंदारिया के कुछ शब्द बहुत लोकप्रिय हैं उनका कहना है कि "ज़ीरो को ज़ीरो से गुना किया जाए तो ज़ीरो ही आता है। इस लिए अगर आप सिर्फ घर में बैठे रहेंगे कुछ नहीं करेंगे तो कल सुबह परिणाम ज़ीरो ही रहेगा। लेकिन अगर आप थोड़ा भी प्रयास करेंगे तो एक तक तो पहुंचेंगे। फिर यह 1 कभी तो 2 में और फिर 4 में भी तब्दील होगा।"

2003 में चंदरिया को रानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर (ओबीई) से सम्मानित किया गया था। उसी वर्ष दिसंबर में उन्हें पूर्व राष्ट्रपति मवाई किबाकी द्वारा "एल्डर ऑफ द बर्निंग स्पेयर" से सम्मानित किया गया था, जो केन्या में सर्वोच्च नागरिक का सम्मान है।

मनु चंदारिया की पत्नी अरुणा चंदारिया और उनके पुत्र निल चंदारिया में उनके साथ बिजनेस और परोपकारी कामों में सहियोग करते हैं। वे एक बिजनेस टायकून के साथ साथ एक बेहतरीन इंसान भी हैं। उनकी सोच से दूसरे बिजनेसमैन को भी प्रेरणा लेने की जरूरत है जो बड़े बनने के बाद सबको भूल जाते हैं।

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