एक अनोखा स्कूल जहाँ दृष्टिहीन बच्चियों को ना सिर्फ पढ़ाया जाता है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाता है

आंखों के रुप में ईश्वर ने हम सभी को एक अनमोल उपहार दिया है। वो उपहार जिसकी मदद से खूबसूरत प्रकृति और लोगों को देख सकते हैं, सामान्य तौर पर पढ़ सकते हैं। पर दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो नेत्रहीन हैं। जो इसकी खूबसूरती को ध्वनि और स्पर्श के एहसास के माध्यम से देखते हैं।

भारत जैसे देश में दिव्यांग लड़कियों की तो छोड़ें यहाँ सामान्य लड़कियों को आगे बढ़ने नहीं दिया जाता, उनकी शिक्षा तक रोक दी जाती है। अक्सर लड़कियों को पढ़ाई पर यह बोल दिया जाता है कि लड़किया पढ़ लिख कर क्या करेंगी, शादी के बाद उन्हें दूसरों के घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना हैं। अगर गलती से कोई लड़की दिव्यांग हो, तो उसके लिए हालात और अधिक विपरीत हो जाती है। पर आज हम आपको एक ऐसे स्कूल के बारे में बताने जा रहे हैं जहां ना सिर्फ लड़कियों को पढ़ाया जाता है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया जाता है। भले ही यहाँ की बच्चियों की आँखों की रोशनी नहीं है लेकिन दीवाली पर इनके द्वारा बनाये गए दीये दूसरों के घरों को रोशन करती है।

इस अनोखे स्कूल का नाम है “अंध कन्या प्रकाश गृह"। यह संस्था गुजरात के अहमदाबाद के मेमनगर स्थित है। यह अनोखा स्कूल दृष्टिहीन लोगों की जिंदगी में खुशियों के रंग भरने और उनके जीवन को प्रकाशित करने का काम कर रही है। इस स्कूल को 1954 में खोला गया था, जिसका मकसद विकलांग लड़कियों को शिक्षा देने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाना है। स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां पढ़ाई के साथ-साथ चिक्की, दिवाली के दीये और दूसरे हाथ से बने हथकरघा प्रोडक्ट भी बनाती हैं। जिन्हें मार्केट में काफी पसंद किया जाता है और उनके ठीक-ठाक पैसे भी मिल जाते हैं। अबतक इस संस्था की बच्चियों  द्वारा बनाये गए कुल 1.75 लाख दियों को बाजार में बेचा जा चुका है। इस काम को करने के लिए दिव्यांग बच्चियों के साथ साथ वोलेंटियर भी होते हैं जो उनको इस काम में मदद करते हैं। यहां विभिन्न प्रकार की हाथों से बनी डेकोरेटिव लैम्प्स और रंग-बिरंगे दिये बनाये जाते हैं।

यहाँ ना सिर्फ लड़कियों को पढ़ाया जाता है बल्कि पढ़ाई के बाद उनकी शादी का भी ख्याल रखा जाता है। जी बिल्कुल सही सुना आपने, शिक्षा पूरा होने के बाद अंध कन्या प्रकाश गृह ही इनके योग्य कोई लड़का ढूढ़कर इनकी शादी भी कराती हैं। बताते चलें कि विकलांग लड़कियों की खराब शिक्षा को लेकर 1954 में नीलकांत राय छत्रपति ने 10 हजार रुपए फंड के साथ इस स्कूल को शुरू किया था। शुरुआत में यहां पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या केवल चार थी। लेकिन समय के साथ इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी होती गई। यह आज एक बड़े आवासीय विद्यालय के रूप में दुनिया के सामने है। आज यहां लड़कियों की काफी संख्या है जो कुछ करने का जुनून लेकर पढ़ रही हैं। यहां पढ़ाई करने वाली लड़कियों का टैलेंट देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। ये लड़कियां अंग्रेजी फर्राटेदार बोलती हैं। इसके साथ ही वह खुद को आम लड़कियों की तरह ही हर कॉम्पिटिशन के लिए खुद को तैयार करती हैं।

आज की तारीख में यह संस्थान शारीरिक रूप से विकलांग लड़कियों को क्वालिटी एजुकेशन देने के साथ ही उन्हें जीवन के प्रति आत्मनिर्भर बनाने के लिए जाना जाता है। निश्चित ही यह अन्य परंपरागत स्कूलों से बिल्कुल अलग है। यहां के छात्रों को धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते सुनना या दीये आदि बनाते देख किसी का चौकना भले लाजिमी हो लेकिन ये विकलांग छात्र पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के मामले में किसी भी सामान्य छात्र से बिल्कुल कम नहीं हैं।

 

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