कभी फुटपाथ पर रात बिताने वाली शकीला आज कला के दम पर है देश-विदेश में मशहूर

बुरा वक्त हर किसी का आता है। कई बार हम पैदा ही बुरी परिस्थितियों में होते हैं तो कई बार हम हालात हमारे लिए विपरीत हो जाते हैं। पर ऐसा क्यों होता है कि कठिन परिस्थितियों में कुछ लोग बिलकुल टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं। जबकि इन्ही परिस्थितियों का कुछ लोग न सिर्फ दृढ़ता से सामना करते हैं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में वो और भी ज्यादा निखर जाते हैं। दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं जिसके जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां नहीं आतीं, परंतु कुछ लोग बुरी से बुरी परिस्थिति से सफलतापूर्वक लड़कर कठिन से कठिन परिस्थिति से बाहर आ जाने की क्षमता रखते हैं। यदि आप भी अपनी मानसिक, शारीरिक, कलात्मक क्षमताओं को कुछ इसी तरह से विकसित करें तो सफलता ज्यादा दूर नहीं है। ऐसा ही एक उदाहरण पेश किया एक महिला नें जो पहले अपनी माँ के साथ सब्जी बेच करती थी। आज है एक अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाली कलाकार।

इनका नाम है शकीला शेख। 45 वर्षीय  शकीला ने गरीबी के सबसे बुरे दिनों को देखा है। शकीला का जन्म 1973 में बंगाल के दक्षिण परगना 24 जिले के मोगराघाट गांव में हुआ था। जो कि कोलकाता से करीब 30 किमी दूर स्थित है। शकीला अपने छः भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। वह महज़ 1 वर्ष की रही होगी जब उसके पिता सबकुछ छोड़ कर बांग्लादेश चले गए। उनकी माँ ज़ेहरण बीवी नें बच्चों को पालने-पोसने के लिए सब्जी बेचना शुरू किया। गाँव में सब्जियों की कीमत कम थी इसलिए वे मोगराघाट से 40 कलोमीटर दूर कोलकाता अपनी सब्जियां बेचने जाया करती थीं। जिद करने पर कभी कभी वे अपनी छोटी बेटी शकीला को भी साथ ले जाया करती थी।

शकीला कहती हैं-
"माँ ने मुझे काम करने की इजाज़त नहीं दी लेकिन मुझे घुमाने के लिए शहर ले जाती थी। मुझे सड़कों पर चलने वाले ट्राम और बसों को देखना पसंद था। कई बार जब माँ काम कर रही होती तो में अपनी नींद फुटपाथ पर ही पूरी कर लेती थी। "

शकीला की जिंदगी तब बदली जब वे बलदेव राज पनेसर नाम के एक आदमी से मिली। बलदेव राज पनेसर एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी थे और एक चित्रकार भी थे। वे सब्जियां खरीदने के लिए हर दिन बाजार आते थे और शकीला की माँ से सब्जियां खरीदते थे। वे सिर्फ एक कलाकार ही नहीं बल्कि एक समाजसेवी भी थे। वे हर रोज चॉकलेट, अंडे, पेंसिल और पत्रिकाओं वितरण गरीब बच्चों के बीच किया करते थे। बच्चे प्यार से उन्हें "डिंबबाबू" बुलाते थे और उनके पीछे भागते थे। डिंब का मतलब बंगाली में अंडा होता है।

पनेसर की अपनी हस्ताक्षर शैली थी। वह कुर्ता पायजामा पहनते थे, एक कपास का झोला रखते थे और एक छतरी को लाठी की तरह इस्तेमाल करते थे। एक दिन वे बच्चों को चॉकलेट और अंडे वितरित कर रहे था और उन्होंने शकीला यह भी चॉकलेट व अंडे दिए लेकिन शकीला ने लेने से इनकार कर दिया। इससे पनेसर बहुत प्रभावित हुए और शकीला को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। उन्होंने शकील और उसके परिवार की हर संभव मदद की। शकीला उन्हें प्यार से बाबा बुलाती थी। जिसका बंगाली में मतलब होता है दादा।

पर 1987 में उनकी शादी अकबर शेख से हो गयी। जो उससे 15 साल बड़े थे और पहले से ही एक शादी कर चुके थे। जिसके बाद शकीला सुरजापुर गांव आ गयी। परिवार के भरण पोषण के लिए उन्होंने ठोंगा बनना शुरू किया जिससे उनको रोजाना 20-30 रुपये की कमाई हो जाती थी। बलदेव राज पनेसर नें 1989 में शकीला और उनके पति अकबर को उनकी एक प्रदर्शनी में आमंत्रित किया। प्रदर्शनी के बाद, शकीला के अंदर एक अलग ही उत्साह पैदा हो गया। उन्होंने अपने पति से कहकर कार्डबॉर्ड और पेंट मंगवाए और अपने पहले कोलाज पर काम करना शुरू किया। उन्होंने सब्जियों और फलों के चित्र बनाये जो न केवल अकबर बल्कि बाबा और उनके साथी कलाकारों को भी बहुत पसंद आये।

1 साल खुद को मांझने के बाद 1990 में, शकीला ने कोलकाता में अपनी पहली एकल प्रदर्शनी आयोजित की। जहां उन्होंने अपनी पेंटिंग से 70,000 रुपये कमाए। यह उन दिनों में एक बड़ी राशि थी। जिसके बाद शकीला नें कभी मुड़ कर नहीं देखा। वे अब अपने गांव में एक छोटे लेकिन आरामदायक घर मे अपने तीन बच्चे के साथ रहती है। उन्हें गर्व है कि उनके 22 वर्षीय बेटे बाप्पा शेख कभी-कभी कोलाज भी बनाते हैं।

उनके बाबा यानी बलदेव पनेसर ने उन्हें कोलकाता में सीआईएमए (इंटरनेशनल मॉडर्न आर्ट सेंटर) कला गैलरी से जोड़ा। जहां अब वे भारत और विदेशों में अपने कोलाज बेच रही हैं। आज वे फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और अमेरिका जैसे देशों में अपनी कला बेच रही हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल में अकादमी ऑफ डांस से म्यूजिक एंड विजुअल आर्ट अवार्ड , 2003 में ललित कला अकादमी अवार्ड, चारुकला पुरस्कार समेत विभिन्न पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे पूरी तरह अपनी सफलता का श्रेय अपनी बाबा यानी बलदेव राज पनेसर को देती है, जो 2014 में इस दुनिया को छोड़ गए।

उनकी कहानी इस बात का सशक्त सबूत है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है, बशर्ते अपने सपनों के प्रति आपका जुनून और ईमानदारी पक्की हो।

(यह आर्टिकल संदीप कपूर द्वारा लिखा गया है)

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