इस महिला नें बच्चों की पढ़ाई के लिए शुरू किया बकरी पालन, आज पूरा गाँव कर रहा है उनका अनुशरण

बेरोजगारी हमारे देश की एक प्रमुख समस्या में से एक है जो देश की प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरुद्‌ध करती है। बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है। अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। यूँ तो हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं, पर एक जो सबसे बड़ा कारण है उसके बारे में कोई बात नहीं करता। वह है किसी भी काम को छोटा या बड़ा समझना और समाज के अनुसार गधों की दौड़ में शामिल हो जाना। आजकल के लोग बहुत बड़ी गलतफैमी में रहते है और वह है ओहदे की। लोग चाहकर भी वह काम नहीं करते जो उन्हें छोटा लगता है या जो काम उनके स्टेटस को शोभा नहीं देता।

आदमी का रुतबा कितना भी बड़ा हो पर बुरे दौर में अगर वो किसी काम को छोटा समझ कर करने के लिए तैयार नही होता तो एक न एक दिन उसे हाशिये पर आना ही है। वह इंसान उस छोटे काम को भी पूरी ईमानदारी से करे तो वह काम उसे बड़ा जरूर बनाता है। एक बात सोचो अगर किसान आज अपने काम को छोटा समझ कर खेती नहीं करते तो क्या होता? क्या हम भूखे पेट जिंदा रह पाते। फिर हमें खेती करने से क्यों गुरेज़ है ? इसीलिए कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता।

आज यह बात महिलाएं भी जान गई हैं और महिलाएं आज सभी क्षेत्र में सफलता का परचम लहरा रही हैं। आज हम एक ऐसी महिला की बात करनें जा रहे हैं, जो ना केवल बकरी पालन जैसे काम कर महिलाएं आर्थिक रूप से सबल बनीं हैं। बल्कि अपनी लगन और मेहनत से अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनने का काम किया है।

इनका नाम है श्रीमती भानु कलिता। भानु असम के कामरूप से नाहीरा गाँव की रहनें वाली हैं। असाम की रहने वाली भानु नें एक साधारण गृहणी से आज एक स्वनियोजित महिला तक का सफर तय किया है। एक गरीब घर की पत्नी जो अच्छी तरह से शिक्षित भी नहीं है। उनके पति गुरुदेव कलिता की आय उनके परिवार और बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं थी। घर चलाना मुश्किल हो रहा था, बच्चों की फीस इकठ्ठा नहीं हो पाती थी, इस वजह से उनकी पढ़ाई भी बाधित होती थी।फिर वक़्त बदला और भानु कलिता नें स्वरोजगार करने का निर्णाय लिया और दिमाग में विचार आया बकरी पालन का। चूँकि भानु ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी उनके कोई दूसरा काम नहीं आता था। पर बकरी पालन का काम तो वह कर ही सकती थीं। उन्होंने इसकी शुरुआत 5 बकरियों के साथ की। अपने काम के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी की वजह से भानु सफलता की राह पर अग्रसर हो गयी और फिर इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

भानु नें बकरियों का अर्ध-गहन प्रबंधन प्रणाली के तहत पालन पोषण किया। जैसे सुबह में भानु उन बकरियों को खुले खेतों में चराई के लिए भेज देती थीं और शाम को जब बकरियाँ वापस आती थी तो उन्हें खेत का ताज़ा घास और चार खिलाया जाता था। इसके अलावा भानु अपने रसोई से फल सब्जीयों के छिलके भी उनके खिलाया करती थीं। जिससे बकरियों को फल सब्जियों के छिलके में मौजूद पौष्टिक पोषक तत्व भी प्राप्त हो जाते थे। जिससे बकरियों में तेज़ी से विकास हुआ और बकरियों की गुणवत्ता बहुत अच्छी हुई। बकरी को गरीबों की गाय माना जाता है क्योंकि वे उन्हें अपना दूध, मांस, खाल से लेकर बाल सबकुछ दे देती हैं।

इसके अलावा भानु नें बकरियों के लिए अलग से हवादार शेड्स बनवाये हैं। भानु नें बकरी पालन के लिये कई तरह के पारंपरिक उपाय भी आजमाए। मसलन नीम और तंबाकू के पत्तों के साथ बकरी को नहलाना। इससे बकरियों में त्वचा रोग और एक्टोपारासाइट्स रोग होने का खतरा कम हो जाता है। साथ ही उन्होंने बकरियों के बेहतर प्रजनन के लिए व्यवस्था की।

भानु द्वारा पारंपरिक तौर तरीके अपनानें के कारण उनकी बकरियों में कम मृत्यु दर और बढ़ती जनसंख्या के साथ स्वस्थ और वजन भी बहुत अच्छा रहा। भानु कालिता आज गांव में एक उदाहरण के रूप में उभरीं हैं। उनकी इक्षाशक्ति और आत्मविश्वास ने क्षेत्र में बकरी पालन को बढ़ावा दिया और गाँव में उनसे प्रेरणा लेकर बकरी पालन की छोटी इकाईयां भी शुरू हुई है। 2016 में भानु नें 53 बकरियां बेचीं थी और उन्हें 80,430 रुपये की कमाई हुई थी। वर्ष 2017 में उनकी कमाई बढ़कर लाखों में पहुंच गई।

भानु नें साबित कर दिया कि बकरी पालन निश्चित रूप से महिलाओं की कमाई में वृद्धि और उनके लिए स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर सकता है। उनको आजीविका मिलेगी जो उनके आत्मविश्वास को बढ़ावा देगी। गरीब महिलाएं बकरी पालन कर दूध और बकरियाँ बेचकर अपने बच्चों की शिक्षा के साथ परिवार की बुनियादी आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम हो सकती हैं और इससे गरीबी निश्चित रूप से कम हो सकती है।

(यह आर्टिकल संदीप कपूर द्वारा लिखा गया है)

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