17 सालों से यह पत्रकार हाथों से लिखता है अख़बार, लोगों की समस्या को निर्भीक तरीके से उठा रहा है

पत्रकारिता का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में न्यूज़ चैनल और अखबारों के पन्ने घूमने लग जाता है। दूर से हमें यह एक नाम, शोहरत और पैसे वाला कैरियर नज़र आता है। पर इसके पीछे एक पत्रकार की मेहनत हमें नज़र नहीं आती।

बगैर जज्बे के पत्रकारिता मुमकिन नहीं है। पत्रकार होना केवल नौकरी नहीं बल्कि यह एक जुनून होता है। पत्रकारिता में मानसिक संतुलन के साथ समाजिक नैतिकता होना जरूरी है।जरूरी है कि पत्रकार अपने धर्म को समझे और निभायें। पर आज कल यह चीजें काम ही देखने को मिलती है। दिनों दिन पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा है। दरअसल चंद खराब लोगों की वजह से पत्रकारिता का मूल मकसद की छिन्न-भिन्न होने लग गया है। आलम तो यह हो गया है कि जिस समाज के लिए पत्रकारिता का जन्म हुआ है, उसी का विश्वास उसपर से उठता जा रहा है। आज पत्रकारिता भी गुटों में बटी नज़र आती है, कोई विशेष मीडिया समूह किसी विशेष का पक्षधर या विरोधी प्रतीत होता है। पैसे और टीआरपी के खेल बीच कोई मर रहा है तो वह है पत्रकारिता।
पर गनीमत है कि आज भी कुछ ऐसे पत्रकार जीवित है जिन्होंने अपनें साथ-साथ असली पत्रकारिता को भी जिंदा रखा हुआ है। आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात करने जा रहे है जो पत्रकारिता पैसों से लिये नहीं अपनें जुनून के लिए करता है।

इस स्वतंत्र पत्रकार का नाम है दिनेश कुमार। उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के गाँधी कॉलोनी में रहने वाले दिनेश पत्रकारिता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। 53 साल के दिनेश के पास ना तो कोई का दफ्तर है, ना मशीन और ना ही कोई कर्मचारी। बावजूद इसके बस उनका जुनून ही है जो पिछले 17 सालों से एक अख़बार चला रहे हैं। इस अखबार का नाम है " विद्या दर्शन"। दिनेश के इस अख़बार ख़ासियत यह है कि यह पूरा अखबार वे अपने हाथों से लिखते हैं। उनका काम है हाथ से लिखना और एक हस्तलिखित कॉपी की फ़ोटोकॉपीयां करवाकर अकेले लोगों तक पहुंचाना। इस काम में उनका एक मात्र साथी है उनका साइकिल, जिसकी मदद से वो जगह-जगह जा कर अपना अख़बार सार्वजनिक स्थान पर चिपकाते हैं।

दिनेश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आजीविका के लिये वो बच्चों को आइसक्रीम, चॉकलेट और खाने की बाकी चीज़ें बेचते हैं। वो शुरुआत से ही समाज के लिये कुछ करना चाहते थे। उनका सपना था वकालत करने का, लेकिन घर के माली हालात कुछ ठीक न होने के कारण वो सिर्फ 8वीं कक्षा तक ही पढ़ पाए। इसके बाद उनके ऊपर पारिवारिक बोझ आ गया। परिवार चलाने के लिये उन्होंने मेहनत मज़दूरी करना शुरू कर दिया और उनके सपने कहीं पीछे छूट गए।
पर उन्होंने अपने जुनून को मारने नहीं दिया। सुबह से शाम तक आजीविका के लिये हार्डवर्क करने वाले दिनेश को अख़बार चलाने के लिये किसी भी प्रकार की सरकारी अथवा गैर सरकारी वित्त सहायता प्राप्त नहीं नहीं है। अपने गैर विज्ञापनी अख़बार से दिनेश किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं कर पाते है। फिर भी अपने हौसले और जूनून से दिनेश निरंतर सामाजिक परिवर्तन के लिये नियमित रुप से अख़बार निकाल रहे है। दिनेश हर सुबह 10 बजे जिलाधिकारी कार्यालय जाते हैं और 3 घंटे में अपनी ख़बर लिखते हैं, उसके बाद अपने काम पर निकल जाते हैं।

मात्र कोरे कागज़ के पन्ने और काला स्केच पेन ही उनके पत्रकारिता का शस्त्र है। तमाम शहर की दूरी वे अपनी साईकिल से तय कर लेते हैं। हर रोज अपनी रोजी रोटी चलाने के अलावा दिनेश पिछले सत्रह वर्षों से अपने हस्तलिखित अख़बार “विद्या दर्शन” को चला रहा है यह बात काबिले तारीफ है। प्रतिदिन अपने अख़बार को लिखने में दिनेश को ढाई-तीन घंटे लग जाते हैं, उसके बाद उन्हें आने आजिविका के काम पर भी निकलना पड़ता है। पर दिनेश ने ना तो कभी हौसला हारा ना ही कभी पत्रकारिता छोड़ने का सोचा।

हर दिन दिनेश अपने अख़बार में किसी न किसी विशेष घटना अथवा मुद्दे को उठाते है और उस पर वे अपनी निर्भीक राय रखते हुए खबर लिखते हैं। पूरा अख़बार उनकी सुन्दर लिखावट से तो सजा ही होता है साथ ही उसमें समाज की प्रमुख समस्याओं और उनके निवारण पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है।

दिनेश के द्वारा मुज़ज्फ्फर नगर की गांधी कालोनी और उसके आस-पास फ़ोटोकॉपी किये हुए कुछ अख़बार नुमा कागज़ दीवारों पर चस्पा किये हुए मिल जाएंगे। इनमें दिनेश देश और समाज से जुड़ी समस्याओं को उठाते हैं और अपनी निर्भीक राय प्रस्तुत करते हैं। वो रोज़ाना अपने हाथ से किसी एक समस्या पर ख़बरें लिखते हैं और फिर उसकी फ़ोटोकॉपी लेकर साइकिल पर निकल जाते हैं मुज़फ्फरनगर की गलियों में। इन्हें वो ख़ुद अपने हाथों से पेड़ों, दीवारों, बस स्टॉप पर चिपकाते हैं जहां लोगों का ध्यान आसानी से जा सके। उनकी इन ख़बरों में सभी समस्याओं के उल्लेख के साथ उचित हल भी बताया जाता है। अपनें अखबार की एक प्रति वो फ़ैक्स के द्वारा संबंधित राज्य के सीएम और देश के प्रधानमंत्री तक भी भेजते हैं।

दिनेश वाकई अन्य पत्रकारों के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं। अगर हर पत्रकार दिनेश से कुछ प्रेरणा ले तो सामज का मीडिया पर से घटता विश्वास दोबारा लौट सकता है।

(यह कहानी संदीप कपूर द्वारा सबमिट किया गया है)

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