बदहाली ने 13 वर्ष की उम्र में ही नौकरी करने को किया मजबूर, मेहनत से बन गए दिग्गज उद्योगपति

हमारे देश के हज़ारों युवा आपनें आंखों में सपनें संजोये दूसरे देशों का रुख करते हैं। अपने बेहतर भविष्य की खातिर वे हर भौगोलिक बंधनों को लांघ जाते हैं। उनमें से कुछ अपनी मंज़िल को पाने में सफल होते हैं और अपनें साथ-साथ अपनें देश का भी नाम रौशन करते हैं। पर असल मायनें में आपकी सफलता तभी मानी जा सकती है। जब आप खुद के अलावा दूसरों के हित के बारे में भी, समाज के उत्थान हेतु प्रयास करें। पर आज के दौर इस तरह के लोग बहुत कम ही मिल पाते हैं। लोग स्वयं के सुख एवं परिवार के लियर धन इकट्ठा करनें में इतने मसगुल हैं कि उन्हें सड़क किनारे भूख से मार रहे भिखारी की कोई परवाह भी नहीं होगी। पर आज हम जिस शख्स की बात करनें जा रहे हैं उन्होंने विदेश जाकर ना केवल करोड़ों का साम्राज्य स्थापित किया बल्कि जनकल्याण हेतु सैकड़ों काम भी किये हैं।

इनका नाम है असा सिंह जोहल। जोहल कनाडा के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं और शायद सबसे बुजुर्ग भी। वे कनाडा में स्थित कंपनी टर्मिनल ग्रुप में मालिक हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जोहल की उम्र 95 वर्ष की है और अगले महीने अगस्त में वे 96 के हो जाएंगे। पर उम्र के इस पड़ाव में भी असा सिंह जोहल सिर्फ शारीरिक व मानशिक ही नहीं सामाजिक रूप से भी सक्रिय रहते हैं। उनके इस ऊर्जा से देख बहुत लोग उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं। दरअसल असा सिंह जोहल का जन्म 1922 में पंजाब के जालंधर जिले के जांदीयला में हुआ था। जब वह महज़ डेढ़ वर्ष के थे तब अपनें पिता के साथ कनाडा आये थे।

उनके पिता पहली बार सन 1905 में पहली बार कनाडा आये थे।  उन्होंने कई साल ओंटारियो लंबर सॉ मिल्स में काम किया। 1919 में वे अपने देश भारत वापस आ गए और यहां उनकी शादी हो गयी। कुछ वर्षों तक वे अपने परिवार के साथ भारत में ही रहे लेकिन भविष्य ही तलाश में उन्हें एक बार कनाडा के रुख करना पड़ा। 1924 में वे अपनी पत्नी और डेढ़ साल के पुत्र यानी असा सिंह के साथ कनाडा आ गए। वे कनाडा के शहर वैंकुवर के निकट ओक स्ट्रीट ब्रिज के इलाके में रहने लगे। उनके पिता ने वापस सॉ मील में काम करना शुरू कर दिया और कुछ साल बाद असा भी स्कूल जाने लगे। लाइफ धीरे-धीरे पटरी पर आनी शुरू हो गयी थी।

1928 में उनके परिवार को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा। दो सालों के अंदर उनकी सारी सेविंग्स खत्म हो गयी और उन्हें नार्थ वैंकुवर शिफ्ट होना पड़ा। असा को अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी, तब वे ग्रेड 6 में पढ़ रहे थे। उन्हें पढ़ाई छूटने के बहुत गम था लेकिन उनके पास कोई और चारा भी नहीं था। मजह 13 साल की छोटी से उम्र में ही वे भी लंबर सॉ मिल्स में काम करने लगे। उन्हें प्रति घंटे 25 सेंट मिलते थे जो कि दूसरों से 10 सेंट कम थी और वह इसलिए क्योंकि वे अंडर एज थे। असा धीरे-धीरे वहां लकड़ी का काम सीखते गए और साथ ही कुछ पैसों की बचत भी की। 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना खुद का बिजनेस करने का फैसला लिया। उन्होंने एक पार्टनर से साथ जलावन की लकड़ी घरों तक पहुंचाने का काम शुरू किया।

उस वक़्त फायर वुड यानी जलावन की लकड़ियों की खासी मांग थी। क्योंकि उस वक़्त गैस और बिजली उपलब्ध नहीं थी, लोग लकड़ियों का इस्तेमाल अपने घरों को गर्म करने के लिए किया करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने इस बिजनेस को बढ़ना शुरू किया और इस दौरान वे कभी कभी सॉ मिल भी जाया करते थे। यह एक छोटी शुरुआत थी लेकिन समय गुजरने के साथ इसे बड़ा बनने में देर नहीं लगी। 1948 में असा सिंह नें शादी करने का फैसला किया और लड़की ढूंढने के लिए वतन वापस लौट आये। बचपन के बाद वह पहली बार भारत वापस आ रहे थे। जालंधर जिले में स्थित एक गाँव की लकड़ी कश्मीर कौर से शादी की। 1949 में वे अपनी पत्नी के साथ वैंकुवर वापस आ गए।

इस दौरान वे अपने बिजनेस पार्टनर के साथ लकड़ियों का बिजनेस कर रहे थे। जिसमें वे फायर वुड सप्लाई करने के साथ साथ निजी जंगलों से लड़की काटने और सप्लाई करने का काम कर रहे थे। 1955 में उनकी ज़िंदगी में एक टर्निंग पॉइंट आया जहां उन्होंने एक छोटी सी सॉ मिल स्थापित की। इस दौरान दोनों बिजनेस पार्टनर्स ने बटबार कर लिया। जोहल नें सॉ मिल रख ली और उनके पार्टनर नें बाकी लकड़ी सप्लाई का बिजनेस। जोहल के लिए यह लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। 9 कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ यह बिजनेस बहुत तेजी से गति पकड़ रहा था। 1962 में जोहल नें इसका नाम टर्मिनल रख दिया। 1973 तक उन्होंने दो और बड़ी सॉ मिल खरीद ली, जिसमें कुल 125 वर्कर काम करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने मैनुफेक्चरिंग बिजनेस में भी कदम रखा और वासिंगटन सिटी में एक मैनुफैक्चरिंग यूनिट भी स्थापित की।

आज उनकी कंपनी का बिलियनस ऑफ डॉलर का टर्नओवर है। उनके अंदर कुल 500 इम्प्लॉय काम करते हैं। टर्मिनल फॉरेस्ट इंडस्ट्रीज आज सबसे बड़ी प्राइवेट ओन कंपनी है। जिसके पास स्क्विमिस और सनसाइन कॉस्ट पर अपने जंगल हैं। इतना बड़ा अंपायर खड़ा करने वाले असा सिंह जोहल दिल के भी बहुत नेक हैं। वे जरूरतमंदों की मदद के लिए बहुत तरह के काम करते हैं। वे इंडियन कल्चर सेंटर ऑफ कनाडा गुरुनानक निवास के चेयरमैन हैं। जहाँ उन्होंने जनकल्याण हेतु करोड़ों का दान दिया है। उसके अलावा उन्होंने लड़कियों की शिक्षा, बेसहारा बच्चों के रहने व पढ़ाई के लिए और कैंसर मरीजों के इलाज के लिए भी अरबों का दान दिया है। अपनें देश के लिए भी वे हर संभव काम करते हैं। उन्होंने अपने गाँव जंदीयाला में 1लाख 65 हज़ार डॉलर की लागत से लड़कियों के लिए एक भव्य स्कूल बनवाया है। जिसमें आसपास के 18 किलोमीटर के इलाके की कुल 750 बच्चियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।

असा सिंह जोहल की कहानी सच में बहुत प्रेरणादायक है। एक ओर जहां उन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। वहीं दूसरी को सफलता मिलने पर भी अपनें पैर को जमीन पर टिकाए रखा। जमीन से जुड़कर उन्होंने लोगों की सेवा की और इस उम्र में भी कर रहे हैं। आज के युवाओं को उनसे कुछ सीखने की जरूरत है।

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