सरकारी नौकरी छोड़ खेती के ज़रिये आदिवासियों की बदल रहे हैं जिंदगी

जंगल और नक्सल से प्रभावित छत्तीसगढ़ का आदिवासी जिला बस्तर अब हर्बल खेती और जड़ी-बुटियों के लिए इतिहास बनाने जा रहा है। बस्तर जैसे इलाके में जहाँ सरकार सलवा जुडुम जैसे कार्यक्रमो से अादिवासियों के पुर्नावास और मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयास की आलोचना हो रही है वहीं राजाराम त्रिपाठी यहाँ के आदिवासियों के साथ मिल कर सोना उगा रहे हैं। कई एकड़ में फैले उनके इस संसार में प्रबंधक, सुपरवाईजर और कामगार सभी आदिवासी है और जिनमें अधिकतर महिलाएँ है। अब यहाँ के अादिवासी परिवारों की जिन्दगीं बदल रही है।

डाॅ. राजाराम त्रिपाठी(51) जब स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया में 1989 प्रोवेश्नरी आॅफिसर थे और उससे पुर्व काॅलेज में प्रोफेसर रहे। मूलरुप से उत्तर प्रदेश प्रतापगढ़ निवासी राजाराम सात भाईयों में से हैं। जब उन्होनें नौकरी छोड़कर कृषि से जुड़ने रा निर्णय किया तो कोई इनके इस बात से खुश न हुआ। परंतु राजाराम त्रिपाठी ने निर्णय कर लिया था। 1995 में उन्होने "माँ दाँतेश्वरी हर्बल ग्रुप" की स्थापना बस्तर में की। बस्तर में उनके बाबा आकर बस गये थे जिन्हें यहाँ के राजा ने खेती की जानकारी के लिए बुलाया तब उनके बाबा ने आम की कलमी लगई थी। राजाराम खेति के विभिन्न तरिकों को जानने के लिए 22 देशों के विभिन्न सेमिनारों में भाग लिया। औषधीय पौधों के बाजार का अध्ययन किया। जहाँ गेहूँ, चावल, दलहन आदि कके अधिकतम मूल्य 100 रुपये तक जाते हैं वहीं औषधीय उपज के मूल्य न्यूनतम ही 100 रुपये से शुरु होते हैं।

शुरुआत के दौर में राजाराम बताते हैं कि उन्होनें विदेशी सब्जीयाँ उपजाने से प्रारंभ किया जो बड़े बड़े होटल रेस्त्राँ में मिलती है। पर उचित रख रखाव के आभाव में भारी नुरसान उठाना पड़ा। फिर राजाराम में अपनी सोंच को बदला और औषधीय खेती पर फोकस किया। प्रारंभ में उन्होनें 25 एकड़ भूमि पर सफेद मूसली लगा कर किया। बाजार में 1300 रुपये किलों बिकने वाली सफेद मूसली से इन्हें काफी लाभ हुआ। फिर आगे खेती का विस्तार करते हुए उन्होंनें स्टीविया, अश्वगंधा, लेमन ग्रास, कालाहारी और सर्पगंधा की खेती शुरु की। आज 1100 एकड़ में खेती करनेवाली कम्पनी माँ दाँतेश्वरी हर्बल ग्रुप 350 परिवारों के 22,000 लोगों के आजीविका साधन है। 

राजाराम अपने खेंतों में किसी भी प्रकार का रासायनिक उर्वरा खाद का इस्तेमाल नहीं करते हैं। खेंतों की उर्वाराशक्ति बनाए रखने के लिए वे जैविक खाद के रुप में मवेशियों के मल-मूत्र का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए इन्होनें अपने फार्म में लगभग 300 गाय-बैल पाल रखें हैं। माँ दाँतेश्वरी हर्बल ग्रुप अब छत्तीसगढ़ के बस्तर अलावे प्रतापगढ़ में भी खेती का विस्तार करने जा रहा है। तमिलनाडू, आँन्ध्रा प्देश, पंजाब, असम, गुजरात और कई राज्यों के किसान हर्बल खेती के गुर सीखने आ रहें हैं। राजराम 70 किस्म की औषधीयों के खेती के साथ ही साथ कई तरह के सप्पलीमेंट भी बनाते हैं। राजाराम की कम्पनी की औषधीयाँ और उत्पाद देश के साथ साथ विदेशों जैसे जर्मनी, नीदरलैण्ड्स, अमेरिरा, इथोपिया और कई खाड़ी देशों में बिकते हैं। हाल ही में दक्षिण अफ्रिका ने अपने यहाँ हर्बल खेती के लिए डाॅ. राजाराम त्रिपाठी के साथ एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किए हैं।

बी, एस सी. और कार्पोरेट लाॅ में एल.एल.बी. राजाराम अर्थशास्त्र, हिन्दी और इतिहास से मास्टर डिग्री प्राप्त है। इन्हें कई राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रिय सम्मान और अवार्ड भी इनके विशिष्ट कार्य हेतू मिले हैं। कृषि रत्न अवार्ड 2017, राष्ट्रिय कृषि भूषण 2016, राष्ट्रिय भारत निर्माण 2015, राॅयल बैंक आॅफ स्काॅटलैण्ड द अर्थ हिरो अवार्ड 2012 उन असंख्य सम्मान और अवार्ड में से कुछ नाम हैं। पिछले 20 वर्षो से पर्यावरण और धरती की संपदा को सुरक्षित रखते हुए देश विदेश में बस्तर के कोण्डागाँव जैसे जटिल क्षेत्र मे औषधीय खेती करके ख्याती प्राप्त करने वाले डाॅ. राजाराम त्रिपाठी अपनी मेंहनत लगन और बुद्धिमत्ता के बदौलत आज हर्बल और जैविक खेती कर 400 करोड़ का टर्नओवर कर रहें हैें। 

अगर प्रकृति के साथ तालमेल बैठा कर खेती की जाए तो पेड़ पर भी पैसे उग सकते हैं। ऐसा ही साबित कर दिया है राजाराम त्रिपाठी और उनके आदिवासी सहयोगीयों ने। बस्तर के कोण्डागाँव जैसे दुर्गम और सिमित संसाधनो वाले क्षेत्र में अपनी काबिलियत के बदौलत हजारों आदिवासियों के रोजगार का जरिया बनकर करोड़ो का व्यपार संगठन बना कर देश विदेश से करोड़ो का व्यपार सृजन कपने वाले डाॅक्टर राजाराम त्रिपाठी प्रेरणा हैं उन लाखों युवाओ के नौकरी जैसे सिमित सीमा में अपना करियर तलाश करते है। स्वरोजगार के साथ दूसरों के लिए भी असिमित रोजगार के साथ साथ किसान और अादिवासियों के हितों की भी रक्षा का एक सशक्त माध्यम प्रदान करता है कृषि का क्षेत्र।

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