अपनी बेटी खोने पर 800 बेटियों की मां बनकर यह महिला समाज को दे रही है संदेश

एक ऐसा मंदिर जहां भगवान मनुष्य के रूप में बोलते हों, मनुष्यों की सेवा करते हों। कौन नहीं जाना चाहेगा और देखना चाहेगा ऐसे मंदिर को। लखनऊ में ऐसा ही एक मंदिर है ‘मनीषा मंदिर’ जहां सरोजिनी मां 800 अनाथ लड़कियों को अपने परिवार की तरह पालती हैं और उनकी सेवा करती हैं।

बच्चियों को पालने से लेकर बड़े होने तक की जिम्‍मेदारी लेती हैं सरोजिनी  

गोमती नगर लखनऊ के मनीषा मंदिर के बाहर एक बड़ी सी तख्‍ती भी टंगी है जिस पर लिखा है ‘संजीवन पालना’ इस पालने में आने वाली उन सभी लड़कियों को कानूनी तौर पर अपना लिया जाता है जिनकी उनके परिवार में जरूरत नहीं है। मनीषा मंदिर से जुड़ी गोद देने वाली एक संस्था इन लड़कियों को ऐसे मां बाप को गोद भी देती है जो उन लड़कियों को प्यार से पालना चाहते हैं। इस संस्था की जिम्मेदारी बच्ची को गोद देने पर ही खत्म नहीं होती है। एक 14 वर्ष की बच्ची को परिवार में गोद देने के बाद जब सरोजिनी जी को उसके साथ बुरा व्यवहार होने की शिकायतें मिली तो उसके बाद उन्‍होंने बड़ी लड़कियों को गोद देना बंद कर दिया। 

जो लड़कियां मनीषा मंदिर में रहती है उन्हें 18 वर्ष तक पढ़ा लिखा कर उनसे फिर पूछा जाता है कि वह अब आगे क्या करना चाहती हैं पढ़ना चाहती हैं या नौकरी करना चाहती हैं। एक उन्मुक्त पंछी की तरह हर बिटिया को उड़ान का मौका मनीषा मंदिर में सरोजिनी मां देती हैं।

गरीब बच्चियों की उच्च शिक्षा छात्रवृति योजना की व्‍यवस्‍था भी है ऐसी बच्चियां जिनके माता-पिता हैं लेकिन पढ़ाने में सक्षम नहीं है उनके लिए सरोजिनी जी मनीषा उच्च शिक्षा छात्रवृति योजना भी चलाती हैं।

मनीषा मंदिर बनने की कहानी बहुत प्रेरणादायी है

मनीषा मंदिर बनने की कहानी बड़ी ही मार्मिक लेकिन अत्यंत प्रेरणादायी है। सरोजिनी जी भगवान में अत्यंत विश्वास करने वाली महिला हैं जिनका सोचना है कि भगवान के हर कार्य में भलाई होती है। आज से 40 वर्ष पूर्व एक शाम अपनी 7 साल की बच्ची मनीषा को स्कूटी पर लेकर जाते हुए एक दर्दनाक हादसे में मनीषा की मृत्यु हो गई और सरोजिनी जी को बहुत चोट आई। जीवन के कठिनतम समय में भी सरोजिनी जी का भगवान पर से विश्वास  डगमगाया नहीं बल्कि इस घटना के पीछे छिपे संदेश को उन्होंने समझा कि एक मनीषा को खो दिया तो क्या सैकड़ों मनीषा मेरा इंतजार कर रही हैं। एक नए उद्देश्य के साथ सरोजिनी इस हादसे के बाद अस्पताल से घर आईं और मनीषा मंदिर की नींव रखी। एक मां जो अपनी बच्ची को हमेशा के लिए खो चुकी थी आज असंख्य बेटियों की मां बनने का संकल्प ले चुकी थी।

सच्‍ची आस्‍था का यह मंदिर सही मायनों में मंदिर है 

मनीषा मंदिर लखनऊ के लोगों की सच्ची आस्था का वह मंदिर है जहां लोग जानते हैं कि उनके द्वारा दिया गया दान सही कार्य में ही लगेगा। हालांकि शुरुआती वर्षों में सरोजिनी जी को लोगों का विश्वास जीतने में बहुत दिक्कत आई लेकिन उनका लक्ष्य सच्चा था वह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ती चली गईं।   81 वर्ष की उम्र में भी सरोजिनी मनीषा को भूल नहीं पाती हैं लेकिन सुकून है उन्हें अब एक नहीं 800 मनीषा उनके साथ हैं। मनीषा मंदिर की संस्थापिका सरोजिनी जी अपने इस पवित्र कार्य के द्वारा समाज को यह संदेश भी दे रही हैं कि लड़कियां परिवार, समाज, देश या माता-पिता पर बोझ नहीं होती। बेटा अगर एक कुल का दीपक होता है तो बेटियां दो कुलों को रोशनी देती हैं।

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