भारतीय सुपरकम्प्युटिंग के जनक पद्मश्री भटकर जिन्होंने देश में कंप्यूटर क्रांति को एक नई दिशा दी

जी रहे हैं जिस कला का नाम लेकर, जानते भी हैं वह किसने रची है

आधुनिकता की जिस अटारी पर खड़े है, वह अटारी विजय के सुपरकंप्यूटर ने रची है।

हमारा देश आज विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभर रहा है इस बात में कोई शक नहीं है लेकिन यह शक्ति हमें इतनी आसानी से हासिल नहीं हुई है। इसके पीछे छुपी है बरसों की मेहनत, दृढ़ निश्चय और अपने आप को साबित करने का जज़्बा। हमारी आज की कहानी एक ऐसे रियल लाइफ हीरो की है जिस पर पूरे देश को गर्व है।

विडंबना यह है कि इतने महान व्यक्तित्व को हमारी आबादी के कुछ फीसदी लोग ही जानते होंगे। हम बात कर रहे हैं डॉ विजय पांडुरंग भटकर की, जिनके प्रयासों से देश को प्रथम सुपर कंप्यूटर ‘परम’ प्राप्त हुआ। भटकर को सुपर कॉम्प्युटिंग में भारत की राष्ट्रीय पहल के शिल्पकार के रूप में जाना जाता है जहां उन्होंने परम सुपर कंप्यूटर के विकास का नेतृत्व किया था।

विजय भटकर का का जन्म 11 अक्टूबर 1946 को महाराष्ट्र के अरोड़ा जिले के मुरांबा में हुआ था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने साल 1965 में विस्वेस्वराया नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद साल 1972 में उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से इंजीनियरिंग में पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। अपने शिक्षा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए साल 2011 में विजय भटकर ने डी वाई पाटिल विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। उसके बाद साल 2014 में उन्हें गुजरात टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से एक मानद पीएचडी और डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया गया।

इन सभी उपाधियों से विभूषित होते हुए ही डॉ विजय ने 1991 में पहले भारतीय सुपर कंप्यूटर पैरा 8000, और 1998 में परम 10000 को विकसित किया।

आपको बता दें की परम श्रृंखला के सुपर कंप्यूटर के आधार पर ही राष्ट्रीय परम सुपरकंप्यूटिंग सुविधा (एनपीएसएफ़) का निर्माण किया जिसे वर्तमान में ग्रिड कंप्यूटर सुविधा के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है जो कि राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (एनकेएन) पर गरुड़ ग्रिड उच्च निष्पादन कम्प्यूटिंग (एचपीसी) अवसंरचना के लिए देश भर में अपना विशेष स्थान रखता है।

अपनी उपलब्धियों में एक और उपलब्धि जोड़ते हुए विजय भटकर वर्तमान में राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क क्षमता और बुनियादी सुविधाओं के माध्यम से एक्स स्केल सुपर कंप्यूटर प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं। भटकर ने कई राष्ट्रीय संस्थानों और अनुसंधान केंद्रों की स्थापना और कार्य प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसमें सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग (सी-डीएसी), इलेक्ट्रानिक्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर (ईआर और डीसी) तिरुवनंतपुरम, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन संस्थान केरल (आईआईआईटीएम), ईटीएच रिसर्च लैबोरेटरी और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फोर्मेशन टैक्नोलॉजी (आई 2 आईटी) पुणे, महाराष्ट्र ज्ञान निगम (एमकेसीएल) और भारत इंटरनेशनल मल्टीवर्सिटी संस्थान शामिल हैं।

इसी के साथ भटकर भारत सरकार की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दें चुके हैं। अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विजय भटकर को महाराष्ट्र भूषण, पद्म श्री (2017), रामानुज ट्रस्ट अवार्ड (2007), फिक्की पुरस्कार (1983) पीटर्सबर्ग पुरस्कार (2004) प्रियदर्शनी पुरस्कार (2000) राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (एनआरडीसी) पुरस्कार, भारतीय जियो-तकनीकी सोसायटी का स्वर्ण पदक पुरस्कार, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन ऑफ़ द इयर  जैसे कई अवार्ड से सम्मानित किया जा सका है।

मानवता की सेवा में विज्ञान और आध्यात्मिकता के संश्लेषण को बढ़ावा देने के लिए उन्हें विश्व शांति केंद्र से 2010 में संत ज्ञानेश्वर विश्व शांति पुरस्कार प्राप्त किया। इतना ही नही भारतीय कम्प्यूटर मैगज़ीन डाटाक्वेस्ट ने उन्हें कंप्यूटर क्रांति के स्टार अग्रदूतों में शामिल किया है जिन्होंने भारत के आईटी उद्योग को नया आकार दिया।

डॉ विजय भटकर की पहचान केवल पहले सुपरकंप्यूटर परम के निर्माता और देश में सुपर कंप्यूटर की शुरुआत से जुड़े सी-डेक के संस्थापक कार्यकारी निदेशक के तौर पर ही नहीं है बल्कि वर्तमान में वे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। नालंदा विश्वविद्यालय किसी परिचय का मोहताज नही है यह एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जिसकी स्थापना नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम 2010 के तहत हुई है। नालंदा में विजय भटकर का कार्यकाल 25 जनवरी, 2017 से तीन वर्षों के लिए सुनिश्चित है।

विजय भटकर को पूरा विश्व भारत में आईटी लीडर के नाम से जानता है। उन्होंने अपने कार्य से एक नहीं कई बार देश को गौरव के क्षण प्रदान किये हैं जिस पर प्रत्येक भारतीय उन्हें सलाम करता है।

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