होटल में जूठन धोने से लेकर भारत के डोसा किंग बनने तक का सफ़र

एक बेहद ही गरीब परिवार में पैदा लिए इस बच्चे ने बचपन से ही अभावों को करीब से देखा। एक ऐसे गांव में पैदा लिया जहाँ कोई बस स्टॉप भी नहीं हुआ करती थी। फिर भी किसी तरह आधे पेट खाकर सातवीं तक की पढाई गांव के ही एक सरकारी स्कूल से प्राप्त की। घर की माली हालात अत्यंत बुरी होने की वजह से इसने पढाई छोड़ किसी धंधे की तलाश में शहर का रुख करने का फैसला लिया। दो जून की रोटी और रहने के लिए छत की खातिर इसने एक रेस्तरां में जूठन उठाने और टेबल साफ़ करने के धंधे को गले लगाया और फर्श पर सोते हुए अपने जिंदगी की शुरुआत की।

कुछ दिन रेस्टोरेंट में काम करते हुए इसने चाय बनानी सीखी और फिर उन्होंने एक किराने की दूकान में काम करने शुरू कर दिए। कुछ दिनों तक काम करते के बाद उनके मन में अपना ख़ुद का एक दूकान खोलने का आईडिया आया लेकिन पैसे का अभाव इसके लिए सबसे बड़ी अरचन थी। फिर पिता और भाई की आर्थिक मदद की बदौलत इन्होनें चेन्नई के के.के.नगर इलाके में एक छोटी सी दूकान खोली। कुछ दिनों बाद इन्होनें अपने इस दूकान को एक चाय पीने वाली जगह में तब्दील कर दिया और फिर एक छोटे से होटल के रूप में।

साल 1979 तक यह एक ग्रोसरी की ही दूकान थी और उस इलाके में बड़ा होटल तो दूर कोई छोटा होटल भी नहीं था। इसी का फायदा उठाते हुए इन्होनें होटल खोलने का निश्चय किया और फिर “सरवण भवन” का जन्म हुआ। यह लड़का और कोइ नहीं बल्कि मशहूर होटल श्रृंखला सरवण भवन के मालिक पी. राजागोपाल हैं जिन्होनें एक किराने की दूकान से दुनिया के एक मशहूर होटल श्रृंखला का निर्माण किया।

उस समय देश में काफी कम होटल हुआ करते थे। चेन्नई में भी कुछ ऐसा ही माहौल था, इसी माहौल को भापते हुए राजागोपाल ने होटल बिज़नेस की दुनिया में कदम रखने का फैसला लिया। शुरूआती दिनों में इन्होनें खाने की गुणवत्ता और उसके मूल्य पर विशेष ध्यान रखा। कम मूल्य में अच्छी गुणवत्ता वाला खाना मुहैया कराने से इन्हें करीबन दस हज़ार रूपये हर महीने में नुकसान हुआ लेकिन लोगों के दिलों में जगह बनाने में कामयाब हो गए। 

ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होने के फलस्वरूप उन्हें ज्यादा आर्डर आने शुरू हो गए और होटल प्रोफिट करनी शुरू कर दी। साल 1992 में राजागोपाल ने अपने सिंगापुर भ्रमण के दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय फ़ूड चैन के बिज़नेस मॉडल की बारीकियां सीख सरवाना भवन को एक देशी फ़ूड चैन के रूप में पेश करने का फैसला लिया।

सरवण भवन की सफलता की कुंजी न केवल अच्छी गुणवत्ता का भोजन परोसना ही नहीं बल्कि अपने कर्मचारियों का ख्यालरखना भी है। धीरे-धीरे सरवण भवन ने चेन्नई के आस-पास के शहरों में अपनी शाखाएं खोलनी शुरू कर दी और आज पूरे विश्व में लगभग 56 रेस्टोरेंट की श्रृंखलाओं के साथ कई अरबों से ज्यादा का टर्न ओवर कर रही है।

इतना ही नहीं राजागोपाल की ख़ुद की सम्पति 50 अरब से ज्यादा की है। साल 2009 में सरवण भवन की ब्रांड वैल्यू को उस वक़्त ठेस पहुंची, जब राजागोपाल को अपने होटल के एक कर्मचारी की हत्या के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी।

हालांकि सरवण भवन आज भी देश की एक जानी-मानी रेस्टोरेंट श्रृंखला है जिसकी कई देशों में शाखाएं हैं।

 

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