स्‍मारक पर होने वाले खर्च को व्यर्थ मानने वाले इस शख्स ने शहीदों की याद में बनाया 'क्रांतिवन'

हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के दिन देश का हर एक नागरिक स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए वीर सपूतों को याद करता है और अपने तरीके से श्रद्धांजलि अर्पित करता। देश के कई शहरों में आपको ऐसे संग्रहालय मिल जायेंगे, जो इन वीर सपूतों के नाम समर्पित है। इतना ही नहीं चौक-चौराहों से लेकर सरकारी भवनों में इनके प्रतिमाओं की झलक आपने देखी ही होगी। इन सब के बीच महाराष्‍ट्र के एक किसान ने स्‍वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए अनूठा तरीका अपनाया है और उसकी भरपूर सराहना की जा रही है।

महाराष्ट्र के सांगली जिले के एक छोटे से गाँव बालबाड़ी से ताल्लुक रखने वाले किसान संपतराव पवार ने शहीदों के नाम एक अनूठे वन की आधारशिला रखी है। उन्होंने इस वन में 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भाग लेने वाले सेनानियों के नाम एक-एक पेड़ लगाया है। क्रांतिवन नाम से प्रसिद्ध इस वन में कुल 700 पेड़ लगे हुए हैं, जिनका नामकरण मंगल पांडे से लेकर चंद्रशेखर आजाद और बिरसा मुंडा तक को ध्यान में रखकर किया गया है।

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फोटो साभार: थिंकस्टॉक

77 वर्षीय संपतराव का कहना है कि, ' यह क्रांतिवन शहीदों के लिए जीवंत स्‍मारक है। शहीद कभी नहीं मरते।' शहीदों की याद में स्‍मारक बनवाने पर होने वाले खर्च व्यर्थ ही जाता। पेड़-पौधे लगाकर ही शहीदों को सच्‍ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।

गौरतलब है कि साल 1992 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती मनाने के उद्देश्य से एक वन बनाने का निश्चय किया था। उनके पास खुद की कोई उपजाऊ जमीन नहीं थी, इसलिए उन्होंने ग्रामवासियों से अपील की। लेकिन लोगों ने उनकी बातों में दिलचस्पी नहीं दिखाई। फिर क्या था, उन्होंने एक बंजर जमीन का टुकरा चुना, उसपर मिट्टियाँ डाली और जुट गए अपने काम में। एक-एक उन्होंने शहीदों के नाम पेड़ लगाना शुरू किया और आज वह बंजर जमीन का टुकरा एक शानदार वन में परिवर्तित हो चुका है।

हालांकि उनकी इस अनोखी पहल को गाँव के ज्यादातर लोग पागलपन करार दे रहे हैं लेकिन संपतराव लोगों की बातों को दरकिनार कर अपनी मुहिम में जुटे हैं। सबसे ख़ास बात यह है कि वह प्रतिदिन आस-पास के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को 'क्रांतिवन' में एक-एक उस पेड़ से परिच‍ित कराते हैं, जिनके नाम शहीदों पर रखे गए हैं। उनका मानना है कि देश की युवा पीढ़ियों को इन सब के बारे में जानना बेहद जरूरी है।

कायदे से देखें तो सच में संपतराव की यह पहल न सिर्फ लोगों को प्रेरित करती बल्कि मूर्तियों में करोड़ों रुपये झोकने वाली सरकारों के लिए भी एक मिसाल है। हम उनके इस अभियान के लिए उन्हें शुभकामनाएं देते हैं। 

 

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