फेसबुक के जरिए गरीब और लाचार लोगों की मदद के लिए खास मुहिम चला रही है यह लेडी कॉन्स्टेबल

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं इस बात से हम सब वाकिफ़ है एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक लेकिन इन दोनों पहलुओं में से एक का चयन करना हमारे हाथ में होता है। आजकल सोशल मीडिया में फेसबुक का चलन निरंतर बढ़ रहा है, युवाओं के जीवन का तो मानो फेसबुक अभिन्न अंग बन चुका है। साथ ही फेसबुक के नकारात्मक और सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। आज की हमारी कहानी भी सोशल मीडिया के सकारात्मक पहलू को उजागर करने वाली है। यह कहानी एक ऐसी महिला की है जिसकी पहल पर पूरे देश को उस पर नाज़ है। हम बात कर रहे हैं गरीबों की मसीहा कही जाने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस में कॉन्स्टेबल पद पर तैनात स्मिता तांडी की। स्मिता ने समाजसेवा की ऐसी मिसाल पेश की है जिससे भारतीय नारी के सशक्त और जीवनदायी स्वरूप को उजागर किया है।

कांस्टेबल स्मिता तांडी छत्तीसगढ़ पुलिस की महिला सेल में काम करती हैं। लेकिन उनकी ख़ासियत है कि पुलिस की व्यस्त नौकरी के बावजूद भी जरूरत के वक्त वो किसी की भी मदद के लिये तैयार रहती हैं। विगत तीन सालों से स्मिता आर्थिक रुप से पिछड़े सैकड़ों लोगों का इलाज करा चुकी है। स्मिता की परोपकारीता और लोगों के उन पर विश्वास का आलम यह है कि जब किसी मरीज को खून की जरूरत होती है तो वह पहले ब्लड बैंक के बजाय स्मिता तांडी से सम्पर्क करता है। समय पर लोगों को सहायता मिल सके इसके लिये स्मिता तांडी ने फेसबुक और ट्विटर पर ‘जीवनदीप‘ नाम से एक ग्रुप बनाया है। स्मिता की पहल से शुरू हुए जीवनदीप ग्रुप में आज लाखों लोग जुड़ चुके हैं।

कहते है ना समय से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है, समय व्यक्ति को सबकुछ सीखा जाता है। स्मिता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। स्मिता बताती हैं कि “बात तब की है जब मैं साल 2011 जनवरी में पुलिस में नौकरी शुरू की थी और उसके दो साल बाद 2013 में मैं एक प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा ले रही थी। उस दौरान मेरे पिता शिव कुमार टांडी की तबीयत अचानक काफी खराब हो गई और मेरे पास अपने पिता का इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। नतीजा यह हुआ की अच्छा इलाज ना मिल पाने से मेरे पिता की मौत हो गई। मेरे लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था।“

उस घटना के बाद स्मिता ने संकल्प किया कि वे जरूरतमंदों की मदद के लिए हर संभव प्रयास करेंगी। जिससे किसी की भी आवश्यक मदद करके उनके जीवन को बचाया जा सकें। इसी कार्य के अंतर्गत साल 2014 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया और अब जब भी उन्हें ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में पता चलता है जिसे सहायता की आवश्यकता है तो वे मदद के लिए स्मिता को अपने साथ पाते हैं। अपने पिता की मौत से सबक लेते हुए स्मिता ने गरीब और अभाव ग्रस्त लोगों की मदद करने की ठानी और इस मिशन में जुट गई क्योंकि उन्होने महसूस किया कि देश में हजारों लोग पैसों के अभाव में जान गंवा देते हैं।

अपने काम को बढ़ाने के लिए स्मिता ने रुख किया सोशल मीडिया की ओर। उन्होंने फेसबुक पर एक पेज बनाया और उन्हें उम्मीद से ज्यादा अच्छा रेस्पॉन्स मिला। आश्चर्य की बात है स्मिता ने सिर्फ डेढ़ साल पहले ही अपना फेसबुक अकाउंट शुरू किया है और वर्तमान में फेसबुक पर उनके करोड़ों फॉलोअर्स हैं।

स्मिता बहुत ही साधारण हैं उनमें न कोई दिखावा नहीं है बस उनका हुनर है कि वे जरूरतमंदों की मदद के लिए तैयार रहती है। स्मिता अपनी फेसबुक वॉल पर लोगों की तस्वीरें पोस्ट करती है और वॉल पर अपनी बातें लिख देती है। धीरे–धीरे लोगों ने उनकी बात सुनी और उन्हें आगे से आगे मदद के रास्ते मिलने लगे और जब छत्तीसगढ़ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को स्मिता के इस काम का पता चला तो उन्होंने स्मिता को सोशल मीडिया कंप्‍लेंट सेल में पोस्ट कर दिया। जहाँ स्मिता अब तक 25 से ज्यादा गरीब लोगों को ईलाज कराने में मदद कर चुकी है। स्मिता के इस परोपकारिता पूर्ण कार्य के लिए पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार 2016 से सम्मानित किया।

आज स्मिता द्वारा शुरू हुई इस पहल में नौकरी पेशा से लेकर छात्र, डॉक्टर जैसे कई वरिष्ठ अधिकारी तक शामिल हैं। ग्रुप के लोग पहले मरीज की वास्तविकता की जाँच करते हैं व उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी जुटाते हैं। इसके बाद उनकी बैंक पासबुक का एक फोटो लेते हैं। उसके बाद मदद के लिए दानदाताओं से संपर्क करते हैं और दानदाताओं से प्राप्त सहायता राशि को सीधे उस परिवार के बैंक खाते अथवा अस्पताल के बैंक खाते का नंबर पर जमा करा दिया जाता है। स्मिता और उनके ग्रुप के सदस्य दानदाताओं को मरीज की और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से अवगत कराते हैं जिससे वे उनकी यथासम्भव मदद कर सके। मरीज और दानदाता के बीच होने वाले पैसों के लेनदेन में वे लोग बीच में नहीं आते हैं।

अपने काम में आने वाली चुनौतियों के बारे में बताते हुए स्मिता कहती हैं कि “दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं कुछ अच्छे और कुछ बुरे। इस कारण कुछ लोग हमें फेसबुक और वाट्स ग्रुप में ट्रोल करते हैं। उसके लिए पहले तो मैं ऐसे लोगों को नजरअंदाज करने की कोशिश करती हूँ। लेकिन जब वो नहीं मानते हैं तब उनके कमेंट का स्क्रीनशॉट लेकर उसे फेसबुक पर अपलोड कर देती हूँ।“

आज स्मिता के इस काम में उनका परिवार और पुलिस प्रशासन भी पूरी मदद करता है। पुलिस महकमें से जुड़े कई लोग जरूरत के समय ‘जीवनदीप’ ग्रुप की आर्थिक रूप से सहायता भी करते हैं। इसके साथ ही किसी मरीज को जब स्मिता की मदद की जरूरत होती है तो उनके उच्च अधिकारी उनको कहीं भी आने जाने से नहीं रोकते। वर्तमान में स्मिता नौकरी, समाज सेवा के साथ–साथ अपनी अधूरी पढ़ाई को भी पूरा कर रही हैं। वाकई स्मिता तांडी ने साबित कर दिया की अगर दूसरे की मदद का जज़्बा मन में हो तो रास्तें अपने आप ही मिलने लगते हैं एक छोटी सी शुरुआत ही एक बड़े मिशन को पूरा करने का आधार बनती है।

Meet Aaron Who Rescues Pets Through Telepathy

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