ट्रेनी से सीईओ तक का सफर तय करने वाले इस शख्स को जाता है ITC की सफलता का श्रेय

भारत जैसे देश में जहाँ परिवार के स्वामित्व के आधार पर कारोबार की बागडोर दूसरी पीढ़ी के कन्धों पर सौंपी जाती है और अक्सर यह जन्म लेते ही तय हो जाता है। लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी काबिलियत के दम पर इस मुकाम तक पहुँच पाते हैं और ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे योगेश चंद्र देवेश्वर। कॉरपोरेट भारत में संस्थागत स्वामित्व का चेहरा माने जाने वाले देवेश्वर साल 1996 में आईटीसी के सीईओ और चेयरमैन पद के लिए नियुक्त किए गए थे और तब से वह देश में सबसे लंबे समय तक सीईओ रहने वाले व्यक्ति हैं। एक सिगरेट कंपनी से दुनिया की जानी-मानी कंपनियों की फेहरिस्त में आईटीसी को शामिल करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान सच में अद्वितीय है।

dugrxpan9edu458jpdvfnwwfyuhqewse.jpg

4 फरवरी 1947 को लाहौर में पैदा लिए देवेश्वर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली, से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी. टेक की डिग्री साल 1968 में प्राप्त की और बतौर ट्रेनी इंजीनियर आईटीसी में कदम रखा। तब किसी को पता नहीं था कि आने वाले समय में यही बच्चा कंपनी का भविष्य तय करेगा। कुछ वर्षों तक काम करने के बाद उनके प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें वर्ष 1972 में कोलकाता में कंपनी मुख्यालय का सलाहकार बनाया गया। यह वह दौर था जब कंपनी अपने कारोबार में डाइवर्सिफिकेशन लाने की कोशिश कर रही थी पर इस दिशा में किये गए लगभग सारे प्रयोग विफल हो चुके थे। इससे साख के साथ-साथ कंपनी को पैसे का भी काफी नुकसान हुआ था। लेकिन देवेश्वर की दूरदर्शिता में उसे अपना उज्जवल भविष्य दिख रहा था।

वर्ष 1984 में उन्हें आईटीसी में एक निदेशक बनाया गया और 1996 के बाद से वह मुख्य कार्यकारी अधिकारी और आईटीसी फूड्स लिमिटेड के अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने साल 2000 में ई-चौपाल नामक एक मुहीम की शुरुआत की, जिससे कंपनी की पहुंच किसानों तक और बढ़ गई और सस्ते में कंपनी को अपने प्रोडक्ट बनाने के लिए कच्चा माल मिलने लगा। यह मॉडल कंपनी के लिए बेहद क्रांतिकारी साबित हुआ और मॉडल को बाद में हावर्ड बिजनेस स्कूल में केस स्टडी के तौर पर भी शामिल किया गया।

कंपनी को नए पायदान पर लाने के लिए योगेश्वर ने 55 लोगों की मजबूत रिसर्च और डेवलपमेंट टीम बनाई। फिर संयुक्त प्रयासों की बदौलत नए-नए प्रोडक्ट्स लांच किये। साल 2001 में लांच सन फीस्ट बिस्कट कंपनी के लिए बेहद सफल उत्पाद रहा। इसके बाद साल 2002 में कंपनी लाइफस्टाइल और प्रीमियम नोटबुक के कारोबार में कदम रखी। 2003 में स्टूडेंट्स के लिए 'क्लासमेट' नाम से नोटबुक रेंज उतारी गई। फिएमा-डि-विलिस, विवेल जैसे ब्रांड के साथ पर्सनल केयर, 'बिंगो' के साथ ब्रांडेड स्नैक्स, इंस्टैंट नूडल्स ब्रांड 'येप्पी' हर क्षेत्र  ने अपना दबदबा बनाया। आज आईटीसी लिमिटेड एक ऐसा नाम जिससे भारत की तकरीबन पूरी आबादी जुड़ी हुई है। 

वर्षों तक देवेश्वर की कड़ी मेहनत के बाद आईटीसी की आय 5,000 करोड़ से बढ़कर 51,582 करोड़ रुपए हो गई। वहीं, उनके कार्यकाल के दौरान कंपनी के मुनाफे में 33 गुना की बढ़त आई है। मुनाफा 452 करोड़ रुपए से बढ़कर 14958 करोड़ रुपए हो गया। 

uqhl9nrqzgrdvama8typljvpuumk5qiw.jpg

देवेश्वर के लिए आईटीसी एक राष्ट्रीय संपत्ति और सरकारी व निजी साझेदारी का एक आदर्श उदाहरण था जो भारतीय राजनीति की क्षणिक और अस्थिर प्रकृति का सामना कर सकता था। और यही वज़ह रही कि अलग-अलग विचारधाराओं की सरकार से भी उन्हें भरपूर समर्थन मिला और आईटीसी एक सफल संस्थान के रूप में वैश्विक पटल पर उभरा।

उन्हें साल 2011 में भारत सरकार द्वारा देश के तीसरे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। आज वे हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी नेतृत्व गुणवत्ता, जोखिम लेने की क्षमता और तेजी से निर्णय लेने का कौशल हमेशा युवा उद्यमियों के लिए एक प्रेरणा होगा।

Share This Article
1008