महँगाई की मार के बीच महज 5 रुपये में हर दिन सैकड़ों लोगों का पेट भरते हैं नोएडा के अनूप

नोएडा में कभी आपको जाने का मौका मिले तो ज़रा अपनी निगाह अपने आसपास दौड़ाइएगा; एक अनोखी रसोई शायद आपको भी देखने को मिल जाए। ‘दादी की रसोई’ जहां मात्र 5 रुपए की थाली में प्रतिदिन नए मैन्‍यू के साथ भरपेट खाना मिलता है। निशुल्क भंडारे तो बहुत बार सड़कों पर देखने को मिल जाते हैं लेकिन इस महंगाई के जमाने में मात्र 5 रूपए में भोजन मिलना भी किसी भंडारे से कम नहीं है।

इस अनोखी रसोई को चलाने वाले अनूप खन्ना का मानना है कि मनुष्य की आधारभूत जरूरत भोजन को यदि सस्ते में उपलब्ध करवा दिया जाए तो भीख और चोरी-चकारी से बहुत हद तक निजात मिल सकती है। इसी तर्ज पर उन्होंने मात्र 10 रुपए में कपड़े देना भी शुरू कर दिया है। नोएडा के सेक्टर 17 एवं 29 में दादी की रसोई के काउंटर हैं जो प्रातः 10:00 से 11:30 और 12:00 से 2 बजे तक खुलते हैं।

जब अनूप ने यह अनोखी समाज सेवा शुरू की उस समय 15–16 लोग उनके साथ जुड़े लेकिन सच्ची समाज सेवा कोई आसान काम नहीं है। धीरे-धीरे लोगों का साथ छूटता चला गया। मात्र चार-पांच साथी उनके साथ बचे। इस बात से सीख कर अब अनूप उन लोगों से जो उनके इस काम से जुड़ कर अपने क्षेत्र में यह शुरू करना चाहते हैं उन्हें कहते हैं कि आप पहले एक हफ्ते हमारे साथ यहीं से जुड़कर देखिए लेकिन परिणाम यह होता है कि आधे लोग तो वापस पलट कर ही नहीं आते। आज 70-80 लोग अनूप की इस टीम से जुड़े हुए हैं जो यहां आकर विभिन्‍न रूपों में अपनी सेवाएं देते हैं या अपना जन्मदिन मनाते हैं उस दिन 5 रूपए की थाली में स्वीट डिश जैसे रसगुल्ला, आइसक्रीम, सोनपापडी इत्यादि भी परोसा जाता है।

अनूप के लिए यह गर्व का विषय है कि 5 रुपए की थाली में देने वालों की लाइन आज लेने वालों की लाइन से भी ज्यादा है। शुभ भावना से शुरू किए गए कार्य को आज अनेकों सहायक मिल चुके हैं। मात्र 5 रूपए शुल्क रखने के पीछे अनूप की यह सोच है कि जो चीज कोई पैसे दे कर लेता है वह उसके स्वाभिमान को संतुष्ट करती है जब कोई गरीब व्यक्ति 5 रुपए देकर हक के साथ अनूप से थाली मांगता है उस समय वह आत्मिक संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

अनूप इसके अलावा एक और पहल चला रहे हैं जिसके तहत गरीब और बेसहारा लोगों को कपड़े, जूते और किताबें जैसी चीजें दान की जाती है। उन्होंने नोएडा में पहली प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र की भी स्थापना की है। इस योजना के तहत किफायती दाम में गरीबों को दवाईयां उपलब्ध करवाई जाती हैं। अनूप इलाके में दवाएं की दो दुकानें संचालित करते हैं। आसपास कोई हादसा होने पर लोग सबसे पहले अनूप को ही बुलाते हैं और वे सिर्फ एक फोन करने पर फौरन जगह पर मौजूद हो जाते हैं। अनूप के पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रह चुके हैं और उन्हीं से अनूप ने समाजसेवा की प्रेरणा ली है।  

सच्ची समाज सेवा की भावना और पराकाष्ठा को बनाए रखने के लिए अनूप ने न तो दादी की रसोई को रजिस्टर्ड करवाकर कमर्शियलाइज किया और न ही आजतक होने वाले खर्चे और आने वाले पैसे का हिसाब रखा। जो भी पैसा इकट्ठा होता है उसे वह बैंक में जमा कर चैक से भुगतान करते हैं। जब कमी पड़ती है तो अपनी जेब से रुपया डाल देते हैं। अनूप में यह काम छोटे से स्तर से शुरू किया था, आज 3 साल से सफलतापूर्वक वह इस रसोई को चला पा रहे हैं। उनका मानना है कई बार भव्यता या दिखावा टाइटैनिक की तरह सादगी को भी ले डूबता है, इसलिए बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से वह अपने इस कार्य को आगे फैलाना चाहते हैं।

ऐसे काउंटर यदि हर शहर में धीरे-धीरे खुलने लगे तो रोटी और कपड़े की मूलभूत जरूरतें गरीबों की पूरी होनी शुरू हो जाएंगी। बच्चे, बड़े, और गरीब सबकी रसोई है दादी की रसोई क्योंकि यहां भोजन के साथ प्यार भी मिला होता है। बासमती चावल, देसी घी का तड़का, हाथ के बने मसाले और अंतर्मन के प्यार से बनाया खाना फूड इंस्पेक्शन पर भी खरा उतरा और फूड क्वालिटी का सर्टिफिकेट भी मिल गया।

अनूप खन्ना जैसे लोग आज के समाज ढूंढने पर भी नहीं मिलते। इनके सेवाभाव के ज़ज्बे को दिल से सलाम है।

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