कोई माँ हादसे में किसी अपने को न खोए, इसलिए इस महिला ने संभाल ली ट्रैफिक की कमान

आज की स्वार्थपरख दुनिया में मनुष्यता की परिभाषा जहाँ एक ओर बदलने लगी है वहीं दूसरी तरफ आज भी कुछ लोग हैं जो अपना सब कुछ खोकर भी दूसरों की दुनिया आबाद करने में लगे है। हमारे देश में निरंतर बढ़ते सड़क हादसों में न जाने कितने ही घरों के चिरागों को असमय बुझा दिया। अब तो आलम यह है कि सड़क चलते रोड हादसे देखने पर भी कुछ लोग उसे सामान्य घटना समझ कर नजरअंदाज कर देते है।

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एक महिला ऐसी हैं जो खुद दर्द में रहकर भी दूसरों का जीवन सुरक्षित करने की लिए भरसक प्रयास करती है। दुर्घटना से देर भली के वाक्य को चरितार्थ करते हुए निःस्वार्थ भाव से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही है। हम बात कर रहे हैं डोरिस फ्रांसिस की जिन्होंने 9 नवम्बर 2008 को एक सड़क हादसे में अपनी बेटी निक्की को खो दिया था। लेकिन किसी और के साथ यह हादसा ना हो इसलिए बेटी की मौत के बाद से ही कैंसर से जंग लड़ते हुए डोरिस उस घटना स्थल की जगह पर ट्रैफिक व्यवस्था संभाल रही है जहां उनकी बेटी की मौत हुई थी। डोरिस की बेटी निक्की की मौत नोएडा से सटे खोड़ा कट पर हुई थी और तभी से वह यहां पर ट्रैफिक कंट्रोल करती हैं। वैसे तो हम सभी जानते हैं की यह काम तो पुलिस प्रशासन का है लेकिन लोगों का जीवन और समय बचाने के लिए डोरिस पुलिस प्रशासन की मदद करती है।

बाइबिल में कहा गया है ईश्वर अपना सबसे कठिन युद्ध अपने सबसे काबिल और बलवान योद्धा को सौंपते है। डोरिस का जीवन इस बात का साक्षात प्रमाण हैं। डोरिस का जन्म आर्थिक पैमाने की तली में खडे़ साधारण परिवार में हुआ। नौ वर्ष की छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने भाई और बहन के साथ पंजाब से दिल्ली आई थी और धीरे-धीरे दिलवालों की दिल्ली में घरेलू परिचारिका (आया,नौकरानी) के तौर पर उन्होंने अपनी आजीविका की शुरुआत की। इसी दौरान विक्टर फ्रांसिस से उनका विवाह हुआ। शादी के बाद उन्होंने दिल्ली–गाजियाबाद सीमा पर बसे खोड़ा में अपना छोटा सा आशियाना बनाया। कुछ समय बाद उन्हें माता-पिता बनने का सुख प्राप्त हुआ। डोरिस और विक्टर के तीन बच्चे हुए। लेकिन विधाता ने उनकी जिंदगी के लिए कुछ और ही सोच रखा था। 9 नवंबर, 2008 को दोपहर 11 बजे डोरिस अपने पति विक्टर और बेटी निक्की के साथ घर को लौट रही थीं। तभी खोड़ा कट के पास एक तेज गति से आती कार ने उनके ऑटो को टक्कर मार दी। इस भीषण टक्कर में डोरिस और उनके पति घायल हो गए और बेटी निक्की के फेफडे़ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। नौ महीने के खर्चीले इलाज, दारुण यंत्रणा और जीवन संघर्ष के बावजूद निक्की मौत से हार गयी। डोरिस जरूर टूट गयी थी, लेकिन एक माँ को यह हार मंजूर नहीं थी।

“मैंने फैसला किया की मेरे परिवार के साथ जो हुआ वह मैं औरों के साथ नहीं होने दूंगी।“— डोरिस

डोरिस ने सड़क यातायात को सुगम बनाने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। हर रोज सुबह सात बजे वह उसी खोड़ा चौराहे अपना कर्तव्य निभाती दिखती हैं और 11 बजे तक यातायात को नियंत्रित करती है। शुरुआत में गाड़ियों में सवार लोग उनकी सुनते नहीं थे और पुलिस को भी लगा कि यह भला कौन है? लेकिन डोरिस अपने कर्तव्य का पालन करती रही। कुछ समय में ही उधर से गुजरने वालों को डोरिस की आदत पड़ गई। वे उनके संकेतों का सम्मान करने लगे। उनके इशारों पर गाड़ियों के पहिए थमने और घूमने लगे। जाम के लिए बदनाम खोड़ा चौराहा डोरिस के प्रयासों के चलते सुगम हो गया, दुर्घटनाओं में कमी हुई।

लेकिन उनके लिए रोजाना यह मोर्चा संभालना आसान नहीं था। वह जिस वर्ग से आती हैं वहां जीने के लिए हर रोज कुआं खोदकर पानी पीना पड़ता था। लेकिन यह डोरिस की हिम्मत थी वो अपने कर्तव्यपथ पर अटल रही। उन्हें कई बार तरह–तरह के प्रदूषण का सामना करना पड़ा जिससे की उनके लीवर में संक्रमण हो गया। इसी बीच उनके अंडाशय में कैंसर हो गया। मुफलिसी के मारे लोगों को कैंसर का नाम ही मार देता है। डोरिस फिर भी डटी रहीं। पिछले नवंबर की 20 तारीख तक वह अपने छोटे से डंडे के साथ खोड़ा मोड़ पर हाजिर थीं।

धीरे-धीरे उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ी और डोरिस को 21 नवंबर को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। वह वहां दस दिन भी नहीं काट सकी क्योंकि इलाज के लिए हर रोज दो–तीन हजार रुपये की जरूरत थी। उनके परिवार में केवल उनका बेटा था जो ऑटो चलाता है। उनके पति मधुमेह के मरीज हैं और उनसे काम नहीं होता। बेटी निजी कंपनी में गार्ड की नौकरी करती है। उसे दो–तीन महीने से वेतन नहीं मिला था। लेकिन मां के इलाज के लिए बेटी ने अपनी मोटरसाइकिल तक बेच दी।

गरीबी के मारे हताश परेशान डोरिस के परिजन 30 नवंबर को उन्हें ‘एम्स’ से ‘डिस्चार्ज’ करा घर ले आये। उस दौरान ही मीडिया ने अपने सकारात्मक रूप का परिचय दिया। मीडिया में खबरें आने के बाद कुछ लोग उनकी सहायता को आगे आए हैं। प्रधानमंत्री ने उनके लिए तीन लाख रुपये की मदद की घोषणा की तो दिल्ली पुलिस ने भी ढाई लाख रूपये की मदद दी। अंततः उस समाज ने उनकी सुध तो ली जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के आठ साल लगा दिए।

आज कैंसर से जंग जीतकर डोरिस फ्रांसिस ने एक बार फिर एनएच 24 पर खोड़ा कट के पास दोबारा से ट्रैफिक व्यवस्था संभाल ली है। पूरी तरह से स्वस्थ न होने से वह छड़ी के सहारे खोड़ा कट पर पहुंचकर लोगों की राह आसान बना रही हैं। इस वर्ष महिला दिवस पर डोरिस को सम्मानित किया गया और 8 मार्च को महिला दिवस पर उन्हें नोएडा, दिल्ली व गाजियाबाद में सम्मान समारोह में जाना पड़ा तब उन्होंने देखा की खोड़ा कट पर जाम की समस्या हैं। जाम में फंसे राहगीरों को देखकर उन्हें अपनी कमी का अहसास हुआऔर अगले ही दिन सुबह आठ बजे वह खोड़ा कट पर ट्रैफिक व्यवस्था संभालने पहुंच गईं।

वाकई डोरिस फ्रांसिस किसी ऊंची पहाड़ी पर टिमटिमाते उस दीये की तरह है जो अंधेरे को पूरी तरह से दूर करने में सक्षम ना हो लेकिन उससे लड़ने का हौसला जरूर रखती हैं।

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