उस शख़्सियत की कहानी जिसने भारत में सहकारिता को बदल दिया एक बड़े क्रांतिकारी आंदोलन में

गोल-मटोल, पोल्का-डॉट्स की फ्रॉक पहनी उस छोटी सी अमूल-गुड़िया से हममें से लगभग हर कोई परिचित होगा। वह गुड़िया सिर्फ अमूल-बटर की मैस्कट वाली गुड़िया नहीं है। यह अमूल गुड़िया बड़े-बड़े होर्डिंग्स और साइन-बोर्ड्स में इतनी बार चस्पा हुई है कि वह शहरी रोज़मर्रा जीवन की कथाओं में रच-बस सी गयी है। सामयिक घटनाओं पर कटाक्ष करते, चुटीले वाक्यांशों के साथ, होर्डिंग्स में डटी यह अमूल-गर्ल उन तमाम समस्याओं के खिलाफ लड़ाई में खड़ी दिखाई देती है, जिनका सामना उसके मां -बाप की पूरी पीढ़ी को लगातार करना पड़ता रहा है।

यह गुजरात के छोटे दूध-उत्पादकों का एक ऐसा सहकारी आंदोलन था जिसने 1946 में पोलसन डेरी के अत्याचार के खिलाफ अपना सर उठाया और सफल जीत हासिल की। इसके पहले गुजरात के आणन्द के स्थानीय डेरी के स्वामी किसानों से बहुत ही कम कीमत में दूध खरीदकर मुम्बई बेच दिया करते थे। अमूल को वास्तव में अकेले स्वर्गीय डॉ वर्गीज कुरियन ने ही गढ़ा था। अमूल गुड़िया के निर्माण के पचासवें साल में ही डॉ वर्गीज कुरियन का देहांत हो गया यह अमूल की कहानी की एक बड़ी विडम्बना थी।

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मिल्कमैन ऑफ़ इंडिया के नाम से प्रसिद्ध कुरियन का जन्म केरल के एक छोटे से गांव कोझिकोड में 26 नवम्बर 1921 में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे वर्गीज ने लोयोला कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। गिंडी कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बंगलुरू के इम्पीरिअल इन्सीट्यूट ऑफ़ हज़बैंडरी एंड डेयरिंग में ट्रेनिंग लेने के बाद अमेरिका रवाना हो गए। अमेरिका से लौट कर आने के बाद उनके जेहन में अमूल की अवधारणा ने आकार लिया।

एक सरकारी कर्मचारी के रूप में वह 1949 में एक डेरी के प्रबंधन के लिए आंणद आये थे। किसानों की मशीनों को ठीक करके इन्होनें भारतीय डेरी उद्योग में ऑपरेशन फ्लड नामक क्रांति ला दी। यह एक ऐसा सहकारी आंदोलन था जिससे भारत को दुनिया के दो बड़े दूध-उत्पादकों में शुमार कर दिया। इस शक्स ने देश को सहकारी दुग्ध उदयोग का एक मॉडल दिया।

डॉ वर्गीज को स्वेत क्रांति का पितामह भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी सोच से छोटे डेयरी-किसानों को केंद्रीकृत मार्केटिंग और गुणवत्ता को बनाये रखने के गुर सिखा गए जिसका उस समय की डेयरी अर्थव्यवस्था में नितांत अभाव था।

कुरियन ने अपने दोस्त त्रिभुवन भाई पटेल के साथ मिलकर खेड़ा जिला सहकारी समिति का गठन किया। इस प्रकार 1973 में गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग बाजार की शुरुआत हुई। दूध और दूध के उत्पाद के लिए गुजरात के छह जिलों में सहकारी संघों को स्थापित किया गया। जब विशेषज्ञों ने कुरियन से ब्रांड का नाम चुनने के लिए कहा तब उन्होंने एक भारतीय नाम चुना। और इस प्रकार अमूल का जन्म हुआ। इसमें उन्होंने  ज्ञान और प्रबंधन पर आधारित संस्थाओं का विकास किया और 1949 में एक डेयरी की स्थापना की। जहाँ से अमूल की शुरुआत हुई।

अमूल का पूरा नाम आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड था। अमूल न केवल दूध और बटर का ही ब्रांड है बल्कि यह सभी उत्पादों का जो जीसीएमएमएफ के द्वारा बनाया जाता था उन सभी के लिए वह एक घनेरी छाँह वाला छत बन गया।

पोलसन डेयरी की बटर गर्ल के टक्कर में उतारने के लिए सिल्वेस्टर डाकुन्हा ने अपने साथी स्वर्गीय यूस्टेस फ़र्नान्डिस के साथ मिलकर अमूल गर्ल की रचना की। 1966 में अमूल के विज्ञापन की शुरुआत हुई और इसकी कमान एडवरटाइजिंग सेल्स और प्रमोशन के मैनेजिंग डॉयरेक्टर डाकुन्हा को दी गई थी। इन विज्ञापनों की शुरुआत थोड़ी बोरिंग थी लेकिन धीरे-धीरे इसने रफ़्तार पकड़ी। डाकुन्हा ने यह तय कर लिया था की इसकी बोरिंग इमेज को बदल कर रख देंगे और उन्होंने ऐसा कर दिखाया।

अमूल की अपार सफलता को देखते हुए इसे देश के हर कोने में फ़ैलाने के लिए राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड का निर्माण किया गया और उसका संचालन कुरियन के हाथों हुआ। और फिर 1970 में ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत हुई। ऑपरेशन फ्लड के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बन गया।

अमूल ब्रांड आज लगभग 50 देशों में अपनी सेवाएं दे रहा है। भारत के कोने-कोने में लगभग 7,200 अमूल पार्लर स्थित हैं। यह सब कुरियन की अलग सोच और मेहनत का नतीजा ही है कि आज अमूल ब्रांड एक ऊँचे मक़ाम पर है और घर-घर की पहचान बनी हुई है।

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