हज़ार रुपये की अनुदान राशि से करोड़ों लोगों को अंधकार से उजाले की ओर ले जाने वाले मसीहा

जहाँ बिज़नेस का अर्थ अमीरों की जेब से कैश निकाल लेना माना जाता रहा है, वहीँ इस एक व्यक्ति ने इस मिथक को तोड़ दिया कि  ग़रीब न तो टेक्नोलॉजी में रूचि रखता है और न ही टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उसके बूते की बात होती है l    

रमन मैग्सेसे अवार्ड जीतने वाले हरीश हांडे ने अपने सोलर इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी, जो सेलको के नाम से जानी जाती है, के द्वारा गरीबी से त्रस्त लोगों के लिए सोलर-पावर की लाइट की व्यवस्था करते हैं l 49 वर्षीय हांडे आज के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन गए हैंl वे चाहते हैं कि और भी बहुत सारे लोग उनसे जुड़ें ताकि वे समाज के सभी वर्गों को विकास की छतरी के  नीचे ला सकें l 

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हरीश कहते हैं कि अपने जीवन का सबसे खूबसूरत पाठ उन्होंने एक खोमचे वाले से सीखा और वह यह कि 300 रूपये महीना भारी लगता है किन्तु 10 रूपये प्रतिदिन तो कमाया जा सकता हैl  

1995 में स्थापित बैंगलोर स्थित सेलको कंपनी देश के सबसे बड़े आविष्कार-उन्मुख कंपनियों में से एक है l उनकी एक सबसे बड़ी परियोजना “लाइट फॉर एजुकेशन” में कर्नाटक के लगभग 30,000 बच्चों शामिल किये गए हैं l यह कंपनी सोलर पेनल्स को स्कूल के अहाते में इनस्टॉल करते हैं और बैटरी को, जिसका वजन एक टिफ़िन डब्बे के बराबर है, बच्चों को दिया जाता l बच्चे जब स्कूल आते तब वे बैटरीज को चार्ज करते l अगर वे स्कूल नहीं आते तो उनके घर उस दिन अँधेरा होता l 

“हमने यह आईडिया स्कूल के मध्यान भोजन से चुराया है l चुराया और उसे नए रूप में दुनिया के सामने लेकर आये l”

इनकी टीम ने सोलर-फायर्ड हेडलैंप बनाया है जिसका उपयोग दाई का काम करने वाली, फूल तोड़ने वाले और रेशम के कीड़े पालने वाले गांव के लोग करते हैं l और इन्होंने सोलर-लिट् सिलाई मशीन का भी ईजाद किया है l उन्होंने ऐसे और भी बहुत से नए प्रयोग किये हैं l सेलको लाखों लोगों तक पहुंच कर 1,50,000 घरों, माइक्रो-इंटरप्राइसेस और सामुदायिक सुविधाओं के लिए सोलर लाइट इनस्टॉल कर रहे हैं l विनम्रता से भरे हुए हांडे सफलता के लिए अपने कर्मचारियों को जिम्मेदार मानते हैं l 

“हमारी फिलॉसॉफी एक ओपन सोर्स संगठन बनाने की है और हम आशा करते हैं कि दूसरे युवाओं के लिए यह एक मिसाल बने और वे उसे दोहराएं l न केवल दोहराएं बल्कि और भी बेहतर करें l”

आईआईटी खड़गपुर से एनर्जी इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद हांडे अपनी मास्टर डिग्री के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेसाचुसेट्स गए और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन में डॉक्टरेट किया l इस शिक्षा के बल पर वे अमेरिका में ही बेहद शानदार और आराम से अपना जीवन बिता सकते थे पर उन्होंने भारत लौट कर ज़मीनी स्तर पर काम करने का का निश्चय किया l

“ग़रीबों की सोच बेहद ज़मीनी होती है, यह बड़े दुःख की बात है कि उन्हें हितग्राही माना जाता रहा है बजाय इसके कि  उन्हें भागीदार की तरह देखा जाए" 

170 कर्मचारियों के साथ सेलको ने गांव के परिवार के उत्थान के लिए बहुत कुछ किया है l गांव के लोग महीने में 2000-3000 रूपये कमाते हैं और अपने घरों को रोशन करने के लिए 100-150 रूपये केरोसिन और कैंडल पर खर्च कर जाते हैं l सेलको उनके लिए सोलर लाइट, वाटर हीटर और कुकिंग स्टोव किश्तों में दिलाते हैं और उनकी किश्तें ग्रामीण बैंक में जमा करते हैं l 

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“गरीब लोग हमेशा जीवन को बेहतर बनाने वाली सुविधाओं के लिए पैसे खर्च करने को हमेशा तैयार रहते हैं l”

आज के युवा और पुराने लोग चीजों के बेहतर न होने के लिए  सरकार को जिम्मेदार मानते हैं और उनकी आलोचना करते हैं l पर एक व्यक्ति  ऐसे भी हैं जिन्होंने समस्याओं के उपाय के लिए स्वयं काम किया l अपने पीएचडी ग्रांट के 1000 रूपये से शुरुआत कर उन्होंने उन असंख्य लोगों की ज़िन्दगी पर गहरा प्रभाव छोड़ा है जो 6 बजे शाम  के बाद अँधेरों में रहने को मजबूर हुआ करते थे l

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