76 साल की पद्मश्री अम्मा ने अपनी युद्ध कौशल से साबित कर दिखाया कि उम्र तो बस एक नंबर है

2017 के देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री की सूची में वह ‘गुमनाम नायिका’ भी शामिल थी, जो परंपरागत कला को बढ़ावा देने के लिए कई दशकों से कड़ी मेहनत कर रही हैं और निस्वार्थ भाव से लोगो की भलाई के लिए प्रचार कर रही हैं। 76 वर्षीय मीनाक्षी अम्मा, भारत के सबसे पुराने कलारीपयट्टू युद्ध कौशल की अग्रदूत प्रतिनिधी हैं। प्राचीन गाथा गीत ‘वड़क्कन पट्टकल’ में उल्लेखित प्रसिद्ध पौराणिक योद्धा और नायिका ‘उन्नीयार्चा’, ‘पद्मश्री मीनाक्षी’ और ‘ग्रैनी विद ए स्वॉर्ड’ जैसे कई नामों से उन्हें बुलाया जाता है। परंतु वह कहती हैं, “मेरा वजूद आज भी वही है और मुझे आज भी खुद को मीनाक्षी अम्मा या अम्मा माँ कहलाना ही ज्यादा पसंद है।”

उम्र के इस पड़ाव में भी पूरी तरह से फिट मीनाक्षी अम्मा लाठी, तलवार और भाला थामे मैदान में डटी हुई हैं और अच्छे-अच्छों को चित्‍त करने का ज़ज़्बा रखती हैं। केरल के वाटकरा की रहने वाली मीनाक्षी अम्मा पारंपरिक युद्ध कला कलारीपयट्टू की विशेषज्ञ हैं और पिछले छह दशकों से इस कला का अभ्यास कर रही हैं। मीनाक्षी अम्मा और उनके हुनर को सबसे पहले पहचान उस समय मिली जब कलारीपयट्टू के खेल में अपने से करीब आधी उम्र के एक पुरुष के साथ लोहा लेते और उस पर भारी पड़ते उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। उनके इस वीडियो ने कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया और इस वीडियो को ढेरों लाइक्स और कमेंट्स मिले थे।

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कलारीपयट्टू विश्व की पुरानी युद्ध कलाओं में से एक है। मार्शल आर्ट्स से मिलते-जुलते इस कला में लाठी, तलवार और भाले की सहायता से प्रदर्शन किया जाता है। भारत में केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक से लेकर विदेशों में श्रीलंका और मलेशिया तक इस युद्ध कला का प्रदर्शन होता है। कलारीपयट्टू दो शब्दों से मिलकर बना है, पहला कलारी जिसका मतलब स्कूल या व्यायामशाला है। वहीं दूसरे शब्द पयट्टू का मतलब होता है युद्ध या व्यायाम के लिए “कड़ी मेहनत करना”। कलारीपयट्टू का मूल उद्देश्य आत्मरक्षा है। इस युद्ध कला में काफी समर्पण, अनुशासन और प्रतिबद्धता की आवश्‍यकता होती है। प्राचीन कहानियों के अनुसार इस युद्ध कला की शुरुआत परशुराम ने की थी। इस कला में मनुष्य को शरीर और मन दोनों से मजबूत किया जाता है।

मीनाक्षी अम्मा बताती हैं, “किवदंतियों के अनुसार कुंगफू और अन्य मार्शल आर्ट्स की उत्पत्ति कलारीपयट्टू से हुई है। यह भले ही मात्र एक किंवदंती हो, लेकिन मेरी नजर में यह विधा केवल वार करने की ही कला नहीं है, बल्कि इसमें आप लड़ने के साथ ही खुद को बचाने और इसमें चोटिल होने पर अपना इलाज करना भी सीखते हैं।”

मीनाक्षी अम्मा ने ऐसे समय में कलरीपायट्टू को सीखना शुरु किया जब लड़कियों को इस कला को सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था। 7 साल की उम्र से उन्होंने गुरु राघवन से की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। बाद में 17 साल की उम्र में उन्होंने गुरु राघवन से शादी की। राघवन भी कलारीपयट्टू के विशेषज्ञ माने जाते थे। दोनों ने मिलकर इस युद्धकला के लिए बहुत काम किया है। गुरु राघव अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके सपनों को आज भी मीनाक्षी अम्मा साकार कर रही हैं। केरल के कालीकट के पास वड़करा में स्थित उनके कलारीपयट्टू स्कूल ‘कदनाथन कलारी संगम’ में कई छात्र इस विधा को सीखते हैं जिसमें से एक तिहाई से ज्यादा लड़कियां हैं। आजकल कोई भी कला सीखने के लिए जहाँ हजारों रूपये देने पड़ते हैं वहीं मीनाक्षी अम्मा कलारीपयट्टू सीखाने के लिए कोई फीस नहीं लेती। छात्र गुरुदक्षिणा के रूप में अपनी क्षमता और इच्छानुसार कुछ भी दे सकते हैं। मीनाक्षी अम्मा बताती हैं कि 1949 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है।

मीनाक्षी अम्मा मानती हैं कि आज के दौर में लड़कियों के लिए मार्शल आर्ट और भी ज्यादा जरूरी हो गया है। उनका कहना है कि आज के दौर में जब लड़कियों के देर रात घर से बाहर निकलने को सुरक्षित नहीं समझा जाता और इस पर सौ सवाल खड़े किए जाते हैं तो एेसे में कलारीपयट्टू ने उनमें इतना आत्मविश्वास पैदा कर दिया है कि उन्हें देर रात भी घर से बाहर निकलने में किसी प्रकार की झिझक या डर महसूस नहीं होता।

वह कहती हैं, “मार्शल आर्ट से लड़कियों में आत्मविश्वास पैदा होता है। हर सुबह इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने से केवल आत्मविश्वास और शारीरिक मजबूती ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की मुश्किलों से लड़ने के लिए मानसिक बल भी मिलता है।”

पद्मश्री मिलने के सवाल पर मीनाक्षी अम्मा कहती हैं, “मैं यह नहीं कह सकती कि पद्मश्री पुरस्कार जीतना मेरा सपना पूरे होने जैसा है, क्योंकि कभी भी मेरे दिल या दिमाग में ऐसा कोई पुरस्कार जीतने का कोई ख्याल नहीं आया।” वह इसका श्रेय अपने दिवंगत पति गुरु राघवन को देती हैं, जिन्होंने उन्हें कलारीपयट्टू सिखाया।

मीनाक्षी अम्मा कहती हैं कि कलारीपयट्टू ने उनकी जिंदगी को हर प्रकार से प्रभावित किया है और अब जब वह करीब 76 साल की होने जा रही हैं, इस उम्र में भी वह इसका निरंतर अभ्यास करती हैं। कलारीपयट्टू की एक शिष्या और फिर एक प्रशिक्षक की भूमिका से लेकर इस मार्शल आर्ट विधा के लिए पद्मश्री हासिल करने तक की उनकी यह यात्रा आसान नहीं रही, लेकिन परिवार के साथ और मेरे छात्रों ने मेरी इस यात्रा को यादगार बना दिया है।

भारत में कई पारंपरिक विधाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में उम्र के इस मुकाम पर भी पौराणिक कला की अस्मिता बनाए रखने हेतु मीनाक्षी अम्मा का यह योगदान अतुलनीय है। भारत सरकार द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाना उनके प्रयासों का एक बड़ा प्रोत्साहन है। अपनी परंपरा और सभ्यता के प्रति हम सभी देशवासियों का एक कर्तव्य है जिसका पालना करना चाहिए। इसकी प्रेरणा के लिए मीनाक्षी अम्मा एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।

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