दूसरों के सामने हाथ फैलाने की बजाय ऑटो चलाकर यह महिला दे रही है गरीबी और अभावों को मात

समाज में जब भी महिला सशक्तिकरण की बात आती है, हमें यह सुनने को मिलता है कि महिलाओं को उचित मौके मिलने चाहिए। उन्हें आगे बढ़ने का प्रोत्साहन हासिल होना चाहिए और उनसे पुरुषों के समान व्यवहार किया जाना चाहिए। पर यह कम ही सुनने को मिलता है कि महिलाओं को खुद भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए आगे आना चाहिए। हमारे समाज में महिलाएं अगर स्वयं के प्रयास से आगे आएँगी तो और महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का विषय बनेंगी। हालाँकि यह जरूर सच है कि एक समाज के तौर पर हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि महिलाओं को ऐसा करने के मौके दिए जाएँ, लेकिन अगर महिलाएं खुद भी अपने अंदर उस जुनून और जीजिविषा को जन्म देंगी तो उनके लिए प्रगति का रास्ता आसान होगा। ऐसा ही कुछ हुआ हैदराबाद में, यहाँ 38 वर्षीय वेंनापूसा नरायणम्मा महिला सशक्तिकरण के आदर्श में उभर रही हैं। इनके कार्य के बारे में जानकर न केवल आप उनपर गर्व करेंगे बल्कि और महिलायें भी उनसे प्रेरणा ले सकेंगी। वो हैदराबाद में एक ऑटो चलती हैं और अकेले दम पर अपना और अपने परिवारजनों का भरण-पोषण कर रही हैं। नरायणम्मा, जिस प्रकार स्वयं आगे बढ़ते हुए समाज में एक सकारात्मक संदेश फैला रही हैं उसके बारे में चलिए पढ़ते हैं।

zztvgmwpdacjyqlrgg5ik58n9u78spfn.jpgहैदराबाद में चंद महिला ऑटो ड्राइवर में से एक

नरायणम्मा ने 26 वर्ष की उम्र से ऑटो चलाने की शुरुआत एक सोच से की थी, वह यह कि वो किसी से कम नहीं। नरायणम्मा हर रोज सुबह 7 बजे उठकर जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से ऑटो चलाने की शुरुआत करती हैं। उनके साथ बैठने में महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं और स्वयं महिला होकर ऑटो चलाने के कारण वो शहर में काफी लोकप्रिय हैं। दरअसल हैदराबाद में महिला ऑटो ड्राइवर की संख्या बेहद कम है और उन सभी का सफल नेतृत्व नरायणम्मा करती हैं।  वो अपनी जिंदगी से लोगों को प्रेरित करती हैं। उनके ऑटो में बैठने वाला हर व्यक्ति उनकी जीजिविषा से प्रेरित होता है और उन्हें महिलाओं के लिए एक आदर्श के रूप में देखता है।

समाज में रूढ़िवाद का कर रही हैं विरोध

12 वर्ष पहले जब उन्होंने ऑटो चलाना शुरू किया था तो वो इस समाज को दिखाना चाहती थी कि अगर पुरुष यह कार्य कर सकता है तो स्त्रियां क्यों नहीं? हालाँकि उनके पति एक छोटी मोटी नौकरी करते हुए आमदनी करते हैं लेकिन वो नरायणम्मा ही हैं जिनके कंधों पर परिवार चलाने का जिम्मा है। वो महीने के 40,000 कमाते हुए परिवार का खर्च चलाती हैं। उनकी बेटी एम फार्म प्रथम वर्ष की छात्रा हैं, जबकि उनका बेटा बी।टेक में चौथे वर्ष का छात्र है। नरायणम्मा कहती हैं कि महिलायें अगर किसी भी क्षेत्र में एक बार आ जाती हैं तो फिर वो कमाल करती हैं। वो आगे कहती हैं, "महिलाओं को सामाजिक दबाव के कारण अपने जुनून को छुपा कर रखना पड़ता है। हालाँकि अब वक़्त आ गया है कि महिलाएं समाज के बेड़ियाँ तोड़ते हुए पुरुष केंद्रित समाज में खुद के लिए एक जगह बनायें। 

"जब मैंने ऑटो चलाना शुरू किया तो मुझे भी तमाम तरह की बातें सुनने को मिली थी लेकिन उस नकारात्मकता को मैंने खुद के ऊपर कभी भी हावी नहीं होने दिया क्योंकि मुझे मालूम था मैं जो कुछ कर रही हूँ वो सही है और मैं इसमें सफल अवश्य हो सकूंगी।"

बचपन में देखी है गरीबी, फिर भी नहीं मानी हार

नरायणम्मा ने बचपन में अपने परिवार में बहुत गरीबी देखी जहाँ उन्हें अपनी शिक्षा के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था और अंततः वो बहुत ज्यादा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पायी। हालाँकि वो अपने बेटे और बेटी को हर जरुरी सुविधा मुहैया करा रही हैं जिससे कि वो पढ़ लिख कर अपने लिए कोई मुकाम हासिल कर पाएं। उन्हें बहुत ज्यादा न पढ़ पाने का मलाल जरूर है पर वो इसे अपने जीवन में बाधा के तौर पर नहीं देखती हैं। उन्हें लगता है कि वो जो कार्य कर रही हैं वही उनके लिए उनकी पूजा है और इससे वो औरों को प्रेरणा दे पा रही हैं। खासकर महिलाएं उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने की सीख ले पा रही हैं। वो अपने इस कार्य के बारे में खुद कहती हैं कि, "जब मैंने वर्ष 2006 में ऑटो चलाना शुरू किया, तब से लेकर आज तक मुझ में इस क्षेत्र में बने रहने का साहस बरक़रार है। मैंने दृढ़ संकल्प लिया है कि जब तक कि मेरे पास क्षमता और धैर्य है, मैं अपने परिवार का भरण-पोषण इन तीन पहियों के सहारे पर करती रहूंगी"।

वास्तव में नरायणम्मा प्रेरक व्यक्तित्व की धनि हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी हार न मानने वाला रवैया चुना जिसके चलते वो न केवल आज अपने परिवार का खर्च उठा रही हैं बल्कि अपने बच्चों की शिक्षा में भी उनकी मदद कर रही हैं। एक महिला होकर ऑटो चलाना सुनने में भले अट-पटा लगता हो लेकिन नरायणम्मा ऐसा करके प्रेरणा की मिसाल बन रही हैं और समाज में यह संदेश फैला रही हैं कि इस कार्य को वो पुरुषों से बेहतर करके दिखा सकती हैं और उन्हें इस कार्य को करने में किसी प्रकार की कोई शर्म नहीं है। हम उनके इस कार्य के लिए उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो हमारे समाज की महिलाओं को इसी प्रकार से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहेंगी।

(यह आर्टिकल स्पर्श उपाध्याय द्वारा लिखा गया है)

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