अद्भुत: जानिए कैसे 1 कप कॉफी किसी को 7,000 करोड़ का मालिक बना सकती है

कॉफी दुनियाभर में पिए जाने वाले सबसे पसंदीदा पेय पदार्थ में से एक है। एक कप गरमा-गरम कॉफी हमें जिस ताज़गी का अहसास कराती है उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। यूँ तो भारत में कॉफी का प्रचलन पश्चिमी देशों से प्रभावित होकर शुरू हुआ, लेकिन आज हमारे देश में चाय के बाद सबसे ज्यादा पिए जाने वाले पेय पदार्थों में कॉफी का विशिष्ठ स्थान है। ख़ासकर युवाओं के बीच कॉपी की लोकप्रियता को काफी है। और जब दोस्तों के साथ टाइमपास की बात आती है तो युवाओं के दिमाग में एक नाम जरूर आता है और वह है "कैफ़े कॉफ़ी डे"।

एक छोटे से साइबर कैफ़े के रूप में शुरू होकर दुनिया की सबसे नामचीन कैफ़े चेन में शुमार करने वाले इस आइडिया के पीछे एक साधारण सोच थी। सालाना 1.8 बिलियन कप कॉफी की बिक्री कर 7,000 करोड़ का साम्राज्य स्थापित करने वाले वी.जी सिद्धार्थ की कहानी बेहद प्रेरणादायक है।

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कर्नाटक के चिक्कमंगलुरु जिले में जन्में सिद्धार्थ का परिवार शुरू से ही कॉफ़ी की खेती से जुड़ा था। करीब 140 वर्षों से उनका परिवार 350 एकड़ की भूमि पर कॉफी का उत्पादन करता था। इसी वजह से कॉफी की सुगंध उनके रोम-रोम में बसी हुई थी। कर्नाटक के मैंगलोर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद उनके सामने पारिवारिक कारोबार को आगे बढ़ाने का शानदार विकल्प था, लेकिन अपने दम पर कुछ करने और खुद की एक अलग पहचान बनाने के उद्देश्य से उन्होंने मुंबई का रुख किया। 

पिता से 5 लाख रुपये कर्ज लेकर उन्होंने कुछ पैसे जमीन खरीदने में निवेश किया और बाकी के पैसों के साथ आँखों में सपने लिए मायानगरी पहुँच गए। मुंबई पहुंचे के बाद वे जे.एम फाइनेंसियल कंपनी के मुखिया महेंद्र कामपानी से मिलना चाहते थे। उस दौर को याद करते हुए वे बताते हैं कि उनसे मुलाकात करने के लिए वे सीधे उनके ऑफिस पहुँच गए, वो भी बिना किसी अपॉइंटमेंट के। जब वे उनके आँफिस पहुँचे तो 6वीं मंजिल तक एलीवेटर की जगह सीढ़ियों से गए। क्योंकि उन्होंने एलीवेटर पहली बार देखा था और उन्हें पता ही नहीं था की यह काम कैसे करता है। थके-हारे हुए वे उनके आफिस पहुंचे और सौभाग्य से उनकी मुलाकात उनसे हुई। बस तब से उनकी एक नए सफर की शुरुआत हुई। महेंद्र कामपानी के साथ काम करके सिद्धार्थ को ट्रेडिंग और स्टॉक मार्केट का बहुत ज्ञान मिला।

2 साल वहां काम करने के बाद सिद्धार्थ वापस बंगलुरू लौट आये। नए सपने और जुनून के साथ अपने बचत किये गए 2 लाख रुपये से उन्होंने खुद का फाइनेंसियल फर्म खोलने का सोचा। वह ऐसा समय था जब स्टॉक मार्केट काफी नीचे गिर रहा था। हालाँकि उन्हें इसमें एक बड़ा अवसर नज़र आया और उन्होंने 30 हज़ार रुपये स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिए। इसी दौरान एक बार वे जर्मनी के एक बहुत बड़े कॉफ़ी ब्रांड के मालिक से एक डील के सिलसिले में बात कर रहे थे। उनकी बातों से वे इतने प्रभावित हुए की उन्हें कॉफी का भी एक बहुत बाजार नज़र आया। 

प्रेरित होकर साल 1993 में उन्होंने अमलगमेटेड बीन कंपनी (एबीसी) के नाम से कॉफ़ी निर्यात की कंपनी शुरू की। ये कंपनी सालाना 28,000 टन कॉफ़ी निर्यात करती थी। उनकी स्थानीय बिक्री लगभग 2,000 टन थी जिससे तीन करोड़ पचास लाख रुपयों की प्राप्ति होती थी। उनकी कॉफ़ी उत्पादन व निर्यात कंपनी अमलगमेटेड बीन कंपनी (एबीसी) की सालाना बिक्री 25 अरब रूपये की थी। एबीसी भारत में हरी कॉफी का आज सबसे बड़ा निर्यातक है। साथ-ही-साथ सिद्धार्थ कुछ अलग और अनोखा करने के लिए हमेशा रिसर्च करते रहते थे।

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उस दौर में इंटरनेट भी नया नया था और लोगों के लिए एक हौवा भी। सिद्धार्थ एक ऐसा इंटरनेट कैफ़े खोलने का सोच जहां लोगों के बैठने की अच्छी जगह और साथ में वे वहां कॉफी का भी लुफ्त उठा सकें। इसी सोच के साथ उन्होंने 1996 में बेंगलुरु और चेन्नई में कैफ़े कॉफी डे खोला। यह बंगलुरू का पहला इंटरनेट साइबर कैफ़े था। धीरे-धीरे युवाओं में इसका क्रेज़ बढ़ता गया और कैफ़े कॉफी डे एक कैफ़े श्रृंखला में तब्दील हो गया। आज कैफे कॉफी डे के देश भर में 1600 से ज्यादा आउटलेट्स हैं। साथ ही यहां कुल 6000 से अधिक कर्मचारी भी काम करते हैं। कैफ़े कॉफी डे भारत के अलावा मलेशिया, इजिप्ट, ऑस्ट्रिया, सिजक जैसे देशों में भी फैला हुआ है। कंपनी का विस्तार करने के लिए जून 2010 में, उन्होंने चेक रिपब्लिक के एक कैफे चेन कैफे एम्पोरियो का अधिग्रहण किया। चेक गणराज्य में कैफ़े एम्पोरियो के 11 कैफ़े हैं।

इसके अलावा सिद्धार्थ ने 2000 में ग्लोबल टेक्नॉलजी वेंचर्स लिमिटेड के भी संस्थापक हैं। यह अग्रणी तकनीकों में लगी भारतीय कंपनियों को पहचान कर, निवेश तथा परामर्श देती है। वर्तमान में वे जीटीवी, माइंडट्री, लिक्विड क्रिस्टल, वे2वेल्थ तथा इट्टीयम जैसी कंपनियों के बोर्ड के सदस्य भी हैं।

आज 7000 करोड़ की निजी सम्पत्ति के साथ सिद्धार्थ की गिनती दुनिया के सबसे सफल बिजनेसमैन में होती है। उनकी सफलता से हमें काफी कुछ सीखने को मिलती है, पहली बात यह कि कोई भी आइडिया बड़ा या छोटा नहीं होता। हमारे आस-पास की चीजों में ही मिलियन डॉलर आइडिया छिपा होता है, बस उसे परखने की काबिलियत हमें हमारे भीतर उत्पन्न करनी होगी।

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