माँ के द्वारा एसिड अटैक का शिकार हुई इस लड़की की कहानी मुसीबतों का मुकाबला करना सिखाती है

हम सबने तमाम ऐसे दर्दनाक किस्से सुनें हैं जहाँ किसी महिला के ऊपर तेज़ाब से हमला किया जाता है और उसके जीवन को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया जाता है। अमूमन यह भी देखा गया है कि तेज़ाब हमले के पीछे एक तरफा प्रेम, जलन की भावना या फिर दहेज की मांग न पूरी होना, होता है। यह सब हमारे समाज का एक नकारात्मक पहलू है, तेज़ाब फेंक कर न केवल महिला को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया जाता है, बल्कि इस कुकृत्य से उस महिला के मान, सम्मान और भविष्य पर भी तेज़ाब फेंका जाता है। ज्यादातर ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित महिलाएं खुद को अंधकार के गर्त में गिरा हुआ पाती हैं और स्वाभाविक है कि इसके बाद उनमें जीवन में कुछ हासिल करने की चाह हमेशा के लिए नष्ट हो जाती है।

हालाँकि उनपर हुए इस घिनौने अपराध के बाद भी कुछ महिलाएं खुद में वो हिम्मत और हौसला पैदा करने में सक्षम हो पाती हैं की वो अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना शुरू करके अपनी बिखरी जिंदगी को सफलता के नए आयाम दें। यह भी सच है कि वो ऐसा करके न केवल खुद का उद्धार करती हैं बल्कि समाज का भी भला करती हैं।

ऐसी ही कहानी है रूपा की, जिनके ऊपर उनकी खुद की सौतेली माँ द्वारा तेज़ाब फेंका गया था। हालाँकि उन्होंने उनके साथ हुए इस वीभत्स अपराध के बाद हार नहीं मानी और उन्होंने खुद के जीवन को अपने लिए एक बेहतर मुकाम हासिल करने का ज़रिया बना लिया। केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में रूपा ने अपनी कहानी को साझा किया।

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बचपन में ही खो दी थी माँ, फिर सौतेली माँ ने किया उनके साथ यह वीभत्स अपराध

रूपा, बचपन में ही माँ का साया सिर से उठ जाने का दुःख झेल रही थीं। लेकिन उनके पिता द्वारा दूसरी शादी करने के बाद उन्हें लगा था की उनके जीवन में माँ की कमी उनकी सौतेली माँ पूरा कर देंगी। हालाँकि ऐसा हुआ नहीं, उनके पिता की दूसरी शादी के ठीक बाद उनकी सौतेली माँ उनसे दुर्व्यवहार करने लगीं और उन्हें विभिन्न तरह की यातनाएं देने लगीं। रूपा ने बातचीत के दौरान बताया कि उनकी सौतेली माँ उन्हें शुरू से ही पसंद नहीं करती थीं, वो उनसे घर के काम करवाने के साथ-साथ उन्हें अक्सर ही मारती–पीटती रहती थीं। वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि उनकी सौतेली माँ उनके साथ यह अक्षम्य अपराध कर सकती हैं। रूपा पर उनकी सौतेली माँ द्वारा यह हमला 8 साल पहले 2 अगस्त 2008 को हुआ था। समय था रात के 2:30 बजे, उस वक़्त रूपा अपने कमरे में सो रही थीं। पहले से उनपर तेज़ाब डालने की तैयारी कर चुकी उनकी सौतेली माँ रूपा के कमरे में आयी और उन्होंने उनपर तेज़ाब फेंक दिया। यह करने से ठीक पहले उन्होंने रूपा के आस-पास से हर प्रकार का तरल पदार्थ भी हटा दिया, जिससे तेज़ाब का असर कम करने में रूपा को कुछ भी मदद न मिल पाए।

पीड़ा का आलम यह था कि हमले के 6 घंटे बाद तक भी रूपा का कोई इलाज नहीं हो सका। न ही पानी न ही कोई और तरल पदार्थ उनके शरीर के जले हुए हिस्सों पर लगाया जा सका। वह 6 घंटे तक लगातार तड़पती रहीं और दर्द से बिलखती रहीं। वो बताती हैं कि उनकी सौतेली माँ का इरादा उन्हें पूरी तरह से मार डालने का था लेकिन शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था।

चाचा ने दिया विशेष साथ, दी उन्हें हिम्मत

रूपा पर इस हमले के बाद सुबह 9 बजे जब उनके चाचा को इस बाबत खबर लगी तब वो वहां पहुंचे और उन्होंने रूपा को वहीँ के एक अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन उस अस्पताल में “बर्न्ट सेंटर” न होने के कारण उनका बेहतर इलाज नहीं हो पाया। इसके बाद रूपा को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहाँ वह 3 महीने तक भर्ती रहीं। आज तक उनकी 7-8 सर्जरी हो चुकी हैं जिसके लिए अबतक 8-9 लाख का खर्च उनके चाचा द्वारा किया जा चुका है। रूपा के इलाज का पूरा खर्च उनके चाचा ने ही उठाया है, उन्हें कहीं से भी कोई मदद नही मिली। उनके चाचा ही उनके इलाज से लेकर उनकी अन्य जरूरतों का भी खर्च उठा रहे हैं। उनका खुद का एक सलून है जिसकी कमाई से उनका गुजर बसर हो रहा है। उनके चाचा ने न केवल उनका इलाज करवाने में पूरी मदद की, बल्कि उन्होंने रूपा के जीवन को एक नयी दिशा देने में भी एक अहम् भूमिका निभाई।

इसके बाद रूपा ने अपने जीवन में मकसद तलाशने शुरू कर दिये। उन्होंने यह ठान लिया कि वो किसी के भी रोके रुकने वाली नहीं। उन्होंने हमसे बातचीत में यह जोर देकर बताया कि वो अपने आप को आईने में देखकर पहले बहुत अफ़सोस किया करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने यह समझ लिया की इस जीवन में उन्हें अपनी पहचान अपने कर्म से बनानी है और जो कुछ भी उनके साथ हुआ उस वजह से अपनी रफ़्तार को थमने नहीं देना है।

सपनों को दी उड़ान, आज हैं फैशन डिज़ाइनर

रूपा उस घटना के बाद असहनीय पीड़ा झेलते हुए मौत से भी बदतर जीवन जी रही थीं और उनके जीवन में निराशा के घोर बदल भी छा गए थे। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने खुद को अंधकार के उस गर्त से निकालकर अपने सपनों के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले तो ‘स्टॉप एसिड अटैक्स‘ नाम की एक संस्था का साथ मिला और वह अपने सपनों को पूरा करने के साथ-साथ समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन लाने की मुहिम में जुट गयीं।

उन्होंने बताया कि वो बचपन से ही एक फैशन डिज़ाइनर बनना चाहती थीं, उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में सिलाई–कढ़ाई सीखना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि अस्पताल और कोर्ट के चक्कर लगाते–लगाते उनका सपना काफी समय तक अधूरा ही रहा। लेकिन 2013 में ‘स्टॉप एसिड अटैक्स‘ संस्था से जुड़ने के बाद उन्होंने फैशन डिज़ाइनर बनने के सपने को पूरा करने की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे उनके कपड़े नमी फैशन शो में लगने लगे। अब वो न केवल खुद फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में नाम कमा रही हैं बल्कि तमाम एसिड अटैक से पीड़ित महिलाओं के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की एक मुहिम का हिस्सा भी बन रही हैं।  चूँकि वो खुद उस असहनीय पीड़ा से गुजरी हैं और एक समय जीवन में हिम्मत हार चुकी थीं, इसलिए उनका यह मकसद है की वो ऐसी सभी महिलाओं के अंदर वह हिम्मत पैदा करने का काम करें जिससे वो जीवन में वापस से उठकर खुदके पैरों पर खड़ी हो सकें। रूपा आज दूसरी एसिड अटैक पीड़िताओं को न्याय दिलवाने में मदद करती हैं।

बन रही है उनके जीवन पर एक फिल्म

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फैशन डिज़ाइनर के रूप में नाम कमाते हुए उन्होंने अपनी संस्था पर विशेष ध्यान दिया है और वो यह सुनिश्चित कर रही हैं कि इस समाज से एसिड अटैक जैसे कुकृत्यों को पूरी तरह से मिटाया जा सके। वो इसके लिए सरकार से सख़्त से सख़्त कानून को लाने की गुज़ारिश करती रहती हैं। उनके जीवन का यही एकमात्र मकसद है कि वो हर महिला के जीवन में फैले हुए अंधकार को मिटाते हुए उम्मीद की नयी रौशनी को जगा दें। उनकी इसी हिम्मत को सलाम करते हुए जल्द ही उनके जीवन पर आधारित एक फीचर फिल्म बनने वाली है, जिसकी शूटिंग लगभग पूरी हो गयी है। निर्माता प्रफुल्ल चौधरी व हंगरी की निर्देशिका ग्लोरिया संक्युक्त रूप से मिलकर उन पर फिल्म बना रहे हैं। केवल यही नहीं उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा ‘नारी शक्ति‘ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

रूपा के जीवन से हमे ऐसे असंख्य उदाहरण मिल सकते हैं, जिससे हम यह सीख सकते हैं कि कैसे जीवन में लगभग सबकुछ हार जाने के बाद भी व्यक्ति वापस से उठके खड़ा हो सकता है और खुद को समाज परिवर्तक के रूप में पहचान दिलवा सकता है। उनका पूरा जीवन ही अपने आप में एक उदाहरण है, इसका जीवंत प्रमाण है कि कैसे अगर ठान लिया जाए तो हमारे सपने पूरे हो सकते हैं। जब रूपा अपने जीवन में आयी इतनी विषमताओं के बाद कुछ करके दिखा सकती हैं, तो हम सब क्यों नहीं? हम उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं की हम सब भी अपने लक्ष्य की ओर उसी जुझारूपन से आगे बढ़ेंगे जिस प्रकार रूपा बढ़ पायीं।

(यह स्टोरी शालु अवस्थी के द्वारा लिखी गई है)

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2010