घर-घर जाकर पेपर डिलीवरी करने वाले शख्स ने एक साधारण आइडिया से बना लिया 100 करोड़ का एम्पायर

आज से लगभग 45 वर्ष पहले गुजरात के भावनगर से 100 किमी दूर परावड़ी नामक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार दो वक़्त की रोटी के लिए जूझ रहा था। 5 बच्चों से भरे इस परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा सिर्फ एक व्यक्ति के कंधे पर था। 40-50 रुपये महीने की तनख्वाह से किसी तरह जीवन-यापन हो रहा था। तब किसी को मालूम नहीं था कि इन्हीं पांच बच्चों में एक बच्चे के अंदर ऐसी विलक्षण क्षमता है जो कि आने वाले वक़्त में वह केवल उनके परिवार की बल्कि इस देश के लाखों लोगों की किस्मत बदल सकता है। 

जी हाँ, वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि गुजरात के एक सफल कारोबारी दिनेश भानुशंकर पंड्या हैं जिन्होंने चुनैतियों को भी सर झुका के पीछे हटे पर मजबूर कर दिया। इन्होंने स्वयं परिस्थियों के अनुकूल नहीं बनते हुए परिस्थितियों को ही अपने अनुकूल बना लिया। महज़ 2 रुपये से मसाला-आलू बेचने वाला ये शख्स आज 100 करोड़ के बिज़नेस एम्पायर का सामी है और उनकी कहानी हम सबके लिए बेहद प्रेरणादायक है।

शुरूआती संघर्ष 

दिनेश जब तिर्तीय कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्हें एक बार भावनगर जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने एक महिला को आलू मसाले बेचता देखा, तभी उनके दिमाग में इस काम को शुरू करने की मंशा बनी। दिनेश इस कारोबार से अपनी बचपन की छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करना चाहते थे। भावनगर में हीरा कारखानों की वजह से आस-पास के गाँव के लोग रोजगार के लिए आया करते थे। दिनेश जिन बच्चों के साथ खेला करते थे, उनमें से अधिकतर अच्छे परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन उन बच्चों की तरह दिनेश को घर से पैसे मिल पाना उस दरिद्रता के दौर में संभव नहीं था। 

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उन्होंने अपनी मां की सहायता से मसाला-आलू की रेहड़ी लगानी शुरू किया। इससे उन्हें थोड़ी-बहुत कमाई हो जाया करती थी जो उनके टॉफी-खिलौनों के लिए काफी था। स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने इस कारोबार को 4 वर्षों तक जारी रखा। उसके बाद उन्होंने इस काम को छोड़ पेपर डिलीवरी के कार्य को गले लगा लिया। इससे उन्हें 35-50 रुपये महीने की कमाई हो जाया करती थी। 

परिस्थितियां उन्हें भले ही ये सब करा रही थी लेकिन उनके भीतर हमेशा से कुछ बड़ा करने की लालसा थी। उन्होंने गरीबी को जितनी करीब से देखा था, वह नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ी उस पीड़ा गुज़रे।

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में दिनेश ने एक दिलचस्प वाकये का जिक्र करते हुए बताया कि एक दिन वह पड़ोस के घर में टीवी देखने गए थे। इंटरवल के बाद पड़ोसी ने दरवाज़े बंद कर लिए और उन्हें टीवी देखने नहीं दिया। उनके बाल-मन पर ठेस पहुंची और वे रोने लगे तो उनके दादाजी ने समझाया और बोला कि किसी दूसरे को किसी तीसरे के घर में देखने जाने की बजाय कुछ ऐसा करो कि एक दिन दुनिया तुम्हें देखने को लालायित हो जाए। यह वाक्य उनकी ज़िन्दगी के लिए प्रेरणा बन गया।

कठिन दिनों में अक्सर लोग कमज़ोर पड़ने लगते हैं, ये मानने लगते हैं कि उनकी दशा में बहुत ज़्यादा बदलाव की गुंजाइश कम ही है पर दिनेश में हमेशा से ही एक आग दहकती थी। उन्होंने भरपूर मेहनत की और 12वीं में नब्बे फीसदी अंक प्राप्त किए जो कि उस दौर में किसी मिसाल से कम नहीं था। घर की माली हालात को देखते हुए उन्होंने पढ़ाई छोड़ कुछ बिज़नेस करने का ही मन बनाया। दोस्तों से 50-100 रुपये कर्ज लेकर पान का गल्ला लगाया लेकिन उनके दिल ने इस काम के लिए ज़्यादा समय तक हामी नहीं भरी। वे कुछ बड़ा करना चाहते थे। फिर उन्होंने एक हीरा फैक्ट्री में काम करने की शुरुआत की और साथ ही वे सरकारी नौकरी के लिए आवेदन-फॉर्म भरने लगे। तभी सौभाग्य से उनका सिलेक्शन सौराष्ट्र स्टेट बैंक में बतौर कैशियर हो गया। जिस व्यक्ति के कभी 1 हज़ार रुपये एक साथ नहीं देखे थे उनके लिए 7 हज़ार महीने की यह नौकरी एक नई शुरुआत थी।

बड़े सपने पर नौकरी छोटी

7 हज़ार महीने की तनख्वाह से घर तो चल रहा था पर महँगी गाड़ियों और बंगले के सपने बैंक के हवाले पूरे नहीं होंगे, ये वह जान चुके थे। धीरे-उनकी अधीरता बढ़ती गयी और एक दिन उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिस से वे ठिठक पड़े। वे अखबार में इश्तिहार पढ़ा करते थे और एक दिन किसी मार्केटिंग कंपनी द्वारा दिए गए विज्ञापन ने उन्हें आकर्षित किया। जब वे इस विषय में बात करने ऑफिस पहुँचने तो उन्हें यह कहकर भगा दिया कि भला सरकारी नौकरी छोड़कर कौन पागल घर-घर सामान बेचना चाहेगा। लेकिन ये उनका अपने सुनहरे भविष्य को लेकर पागलपन ही तो था कि उन्होंने इस काम को अपना सब कुछ देने की ज़िद पकड़ ली।

दिनेश की दूरदर्शिता इस मार्केटिंग के काम की अपार संभावनाओं को पहचान चुकी थी। पहले कुछ ही दिनों में उन्होंने इसकी बारीकियों को सीख लिया और नौकरी को अलविदा कहने का निश्चय किया। लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि सरकारी नौकरी बड़ी मेहनत से मिलती है और इसे छोड़ना मुर्खतापूर्ण फैसला होगा लेकिन दिनेश अपने फैसले ले चुके थे।

मेरे इस फैसले के बारे में घर पर किसी को भनक तक नहीं थी। मुझे बस हर महीने 5 हज़ार रुपये घर भेजने होते थे। अब मेरे पास इस रुपये को कमाने के लिए भी एक दबाव बन गया था।

19 वर्ष की उम्र में मार्केटिंग जगत में कदम रखते हुए उन्होंने इससे जुड़ी तमाम चीज़ो को सीखा और छह महीने के भीतर ही अपने प्रदर्शन से सबका दिल जीत लिया। उन्हें पदोन्नति मिली और 48 हज़ार रुपये बोनस भी। बोनस की इस राशि के साथ जब वे घर पहुंचे तो पूरे परिवार में खुशियाँ भर आईं। उस दौर में ये काफ़ी मोटी रकम होती थी। दो साल में प्रबंधक बनने के बाद उन्होंने अपना खुद का कारोबार शुरू करने का निश्चय किया।

 एक हादसे ने दृष्टिहीन बना दिया

साल 1994 में किराये के एक मकान में उनकी कम्पनी एड शॉप प्रोमोशन्स लिमिटेड की स्थापना हुई। शुरुआत में पैसे बचाने के लिए वे खुद माल खरीदने राजकोट से अहमदाबाद जाया करते थे। उन्होंने बताया कि वे रात 10 बजे निकलते और 2 AM में अहमदाबाद पहुँचते, फिर माल खरीदकर वापस सुबह 7 बजे राजकोट पहुँच जाते। नींद और आराम की परवाह किये बगैर दिनेश 10 बजे ऑफिस पहुंचकर सेल्स बॉयज़ को माल दे कर उस दिन की मार्केटिंग के लिए विदा करते थे। ऐसा लगभग छह महीनों तक चला और उनकी मेहनत रंग लाई। एक के बाद एक देश में उनके नब्बे से ज्यादा ब्रान्चेस खुल गए। ज़रा सोचिये कि ये किसी भी इंसान लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है कि उनके भारत में 90 ऑफिसेस हों।

सब कुछ अच्छे से चल रहा था, तभी साल 1998 में उनकी जिंदगी में एक हादसा हुआ। इस हादसे में डॉक्टर की लापरवाही ने उनकी देखने की क्षमता छीन ली। चार महीनों तक वे कारोबार से दूर अपनी आँखों की रौशनी वापस लाने की नाकाम कोशिश में लगे रहे। तब न इतने फ़ोन थे न ही किसी को ये जानकारी देना सम्भव था जिसकी वजह से बॉस की नामौजूदगी में उनके साथ काम कर रहे सारे लोग चले गए। एक बार फिर वक़्त ने उन्हें शून्य पर ला खड़ा कर दिया था। 

ज़ीरो से 100 तक की फिर नई शुरुआत 

इस कठिन परिस्थिति में उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें मज़बूती प्रदान की और फिर दोनों ने मिलकर घर-घर फिनाइल बेचने शुरू कर दिए। उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी कंधे पर बोतलें ले कर आगे-आगे चलती थी और मैं पीछे-पीछे। दुकान पर पहुंचकर मैं प्रोडक्ट की खूबियों के बारे में बताता।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चला। फिर उन्होंने हॉलसेल मार्केटिंग में कदम रखने का निश्चय किया। अब वे घर-घर बेचने की बजाय सीधे डीलरों से संपर्क करने लगे। देखते-ही-देखते पूरे गुजरात में उनका जाल फैल गया। फिर उन्होंने एक शुभचिंतक की मदद से फार्मा इंडस्ट्री में भी कदम रखा। अब उनकी कमाई लाखों में हो रही थी। और फिर एक दिन उनके ही एक ग्राहक ने उन्हें किसानों के लिए भी कुछ करने की गुहार लगाई।

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फिर दिनेश भाई ने "विषमुक्त खेती और समृद्ध किसान" नामक एक अभियान के बैनर तले किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया। उनकी इस मुहिम से पांच लाख से ज्यादा किसान जुड़े। जैविक खेती में किसानों के सामने गोबर की कमी एक बड़ी समस्या बनाकर सामने आ रही थी। दिनेश भाई ने इसके समाधान के लिए 18 तत्वों के मिश्रण से एक अनोखा प्रोडक्ट तैयार किया। वे इसकी फैक्ट्री लगाना चाहते थे लेकिन उनके पास पर्याप्त धनराशी नहीं थी। साल 2014 में 25 लाख के बैंक लोन की सहायता से उन्होंने इंडस्ट्री खोला और पिछले वर्ष इसका टर्नओवर करीब 6.5 करोड़ था।

आज उनका कारोबार 25 राज्यों में फैला हुआ है।  उनके 90 से ज्यादा प्रोडक्ट्स लगभग 35 हज़ार जगहों पर उपलब्ध हैं। वे आज 100 करोड़ के साम्राज्य के मालिक हैं। उन्होंने जब अपनी कंपनी का आईपीओ निकाला तो वह 1.5 गुणा सब्सक्राइब किए गए। समाज में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें 150 से ज्यादा अवार्ड भी मिल चुके हैं।

दिनेश पंड्या का मानना है कि जीवन में सफल होने के लिए दृष्टि नहीं बल्कि दृष्टिकोण चाहिए। इस दुनिया में कोई भी इतना अमीर नहीं होता जो अपने बीते हुए कल को खरीद सके और उतना कोई गरीब नहीं होता कि अपने भविष्य को बदल नहीं सके। गरीब पैदा होना आपके हाथ में नहीं है लेकिन अमीर मरना आपके हाथ में है। 

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