Atish

My Discussions
Betrayal,people do it,why I cant or I did!!I just justified and changed the label?do we all betray i…
by Atish
1
Profile Feed

"हूँ आज उठा फ़लक नापता,

दिमाग से दिमागी फ़ितरत भांपता

अचेतन-अवचेतन का संगम

दिल में ज्वाला लिए क्रांति की

खड़ा हुआ हूँ बाहर से मैं

भीतर एक शमशान हूँ

शायद मैं इंसान हूँ

हाँ शायद मैं इंसान हूँ"

राम निरंजन रैदास की लिखी निम्नलिखित पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से इंसान के टूटने की तड़प को दर्शाती हैं। और इन्हीं पंक्तियों को चर्चित करते दिखे पूर्व नक्सली कमांडर रमेश पोड़ियाम

वाक्या सोमवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके का है। यहाँ पोलिंग बूथ बने केवरामुंडा सरकारी स्कूल में नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार व हिंसक घटनाओं के बीच पूर्व नक्सल कमांडर रमेश पोड़ियाम उर्फ़ बदरन्ना अपनी पत्नी के साथ जब पोलिंग बूथ पर वोट डालने पहुँचे तो लोग उन्हें देखकर दंग रह गए। उनकी पत्नी लता भी उन्हीं की कमेटी में मैम्बर थीं।

pgmafik6ffur9vpufdaaan4vpm37fdiw.jpg

बासागुड़ा एरिया कमेटी के कमांडर रहे रमेश उर्फ़ बदरन्ना ने कहा कि "हमने ख़ुद को वोट डालने के लिए वोटिंग से पहली रात ही तैयार कर लिया था। जब नक्सली गलियारों में दाख़िल हुआ था तब मुझे वही नीतियाँ क्रांतिकारी लगती थीं। कुछ वक़्त बाद मैं जब शीर्ष पर पहुँचा तो एहसास हुआ कि किसी भी समस्या का समाधान बंदूक की नोंक पर नहीं किया जा सकता।"

वो आगे कहते हैं, "उसी वक़्त में ही मेरा विवाह लता से हो गया। फ़िर दोनों ने ही लोकतंत्र के रास्ते को अपनाया और "गन नहीं गणतंत्र" की विचारधारा के साथ सभी समस्याओं को सुलझाने की ठानी। हम दोनों ने सन् 2000 में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद मेरी पत्नी पुलिस फोर्स में तैनात हुई जो कि अभी सहायक आरक्षक के पद पर हैं। मैं सरकारी स्विमिंग पूल में हूँ। हम दोनों ने अपना वोट उसे दिया जो बस्तर में शांति लेकर आये। मैं उम्मीद करता हूँ कि भटके हुए लोग भी जल्द ही गणतंत्र को अपनाएंगे और शांति के रास्ते पर चलेंगे। बस्तर में फ़िर से एक नया सवेरा आयेगा।" 

x2fuaxb9eyjmpd3dnrx6pcfdahf3a2xu.jpg

बता दें कि समर्पण करने और लोकतंत्र का रास्ता अपनाने के पश्चात रमेश उर्फ़ बदरन्ना व उनकी पत्नी लता तब से अभी तक सभी पंचायत और लोकसभा चुनावों में अपने मत का प्रयोग करते हैं। इसी के साथ वह लोगों को इस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वह अब साधारण जीवन बिता रहे हैं और सरकारी मकान में रहते हैं। 

उन्हें आइकॉन मान कर अब तक तकरीबन सत्तर नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। बस्तर में पहली बार सरेंडर के बाद नक्सलियों के परिवार बसाने के लिए नसबंदी खोलने की शुरुआत बदरन्ना से ही हुई थी। अब समर्पण करने वाले सभी नक्सलियों को इनके बारे में ज़रूर बताया जाता है।

uew9r6rb2dgwmwyvjm9zxq4rrk5traa2.jpg

रमेश उर्फ़ बदरन्ना व उनकी पत्नी ने इस बात को समझा कि नक्सली रास्तों से कहीं बेहतर सुख शांति व लोकतंत्र का रास्ता होता है। हमें बुराई को त्याग कर अच्छाई की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। इनकी ये सच्ची कहानी हमसे बस यही कहती है कि "आप कब बदलेंगे...?"

 

"दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए,

जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए ,

यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने,

कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए।"

निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल का लिखा बेहद ख़ूबसूरत ये एक शेर इंसान को उसकी लड़ाई लड़ने के लिए बहुत सारी हिम्मत देता है, और वो बड़ा होकर इसे चर्चित भी करता है। मगर इस बार इसे चर्चित किया है उम्र की दीवार लांघ कर छोटे-छोटे बच्चों ने। खेलने कूदने वाली दस-बारह साल की उम्र में मुंबई के मुंब्रा इलाके के दो बच्चों ने अपनी सूझ-बूझ और हिम्मत से अपने भाई को अपहृत होने से बचा लिया। वाक्या शुक्रवार को उस वक़्त का है जब ठाणे के मुम्ब्रा इलाका स्थित ज़रीन अपार्टमेंट निवासी दो बच्चे अपने चचेरे भाई के साथ अपार्टमेंट के बाहर खेल रहे थे। तभी बुर्का पहने एक महिला ने वहाँ खेल रहे छोटे बच्चे से संपर्क किया और उसे अपने साथ लेकर जाने लगी। तभी वहाँ मौजूद उसके दस वर्षीय भाई ने उसे देख लिए और उसने अपने चचेरे भाई से घर पर ख़बर करने की कहते हुए उस औरत का पीछा करना चालू कर दिया। तक़रीबन आठ मिनट तक उस अज्ञात महिला का पीछा करने के बाद परिवार और लोगों की मदद से अपने भाई को बचा लिया। मगर भीड़ को इकट्ठा होते देख अपहरणकर्ता भाग निकली।

पीछा करने वाले भाई ने बताया कि "मैं उसके पीछे चल रहा था और बार-बार पूछ रहा था कि वह मेरे भाई को कहाँ लेकर जा रही है। जब मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की, तो वह मेरे भाई को लेकर तेज़ी से दौड़ पड़ी।"

arzkcgnnxask8vpimpvmjk46vksmqxvq.jpg

उन दोनों भाईयों के चाचा खुर्शीद वारसी ने बताया कि "क्षेत्र में विवाह समारोह की तैयारी की वज़ह से काफ़ी भीड़-भाड़ थी। तकरीबन 01:30 बजे, तीनों बच्चे अपने घर के बाहर खेल रहे थे। तभी महिला ने पहले मेरे छोटे भतीजे को बातचीत के नाटक में शामिल करने की कोशिश की। फ़िर उसने उसे उठा लिया और जाने लगी। इस पर जब मेरे दस वर्षीय भतीजे ने उस महिला से सवाल किया, तो उसने ज़वाब दिया कि वह उसे चॉकलेट दिलवाने के लिए ले जा रही है। वह तुरंत सावधान हो गया और अपने बारह वर्षीय चचेरे भाई के पास पहुँचा और उसे परिवार को सूचित करने के लिए कहा कि वह घर जाकर बताये कि उसके भाई को एक अज्ञात महिला अपने साथ ले जा रही है, और ख़ुद शोर मचाते हुए उसके पीछे-पीछे चल दिया।"

वारसी ने कहा कि लड़के ने अलॉर्म देना जारी रखा जब तक वह रुक नहीं गई। जल्द ही मेरे रिश्तेदार और पड़ोसी बच्चे को बचाने के लिए जगह पर पहुँचे। उसने भीड़ को देख कर ख़ुद को घिरा हुआ पाया और वह लड़के को छोड़ कर भाग गयी।"

उसके बाद स्थानीय निवासियों ने मुंब्रा पुलिस को सूचित किया और महिला की पहचान करने के लिए क्षेत्र से निजी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगाला गया। कैमरों की एक फुटेज में साफ़ दिखाई देता है कि कथित अपहरणकर्ता किस तरह से ढाई साल के बच्चे को अपने साथ लेकर जा रही है और कैसे उसका दस साल का बड़ा भाई शोर मचाते हुए उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। 
इस घटना के बाद, अपार्टमेंट के निवासी इलाके में खेलने वाले बच्चों के बारे में अधिक सतर्कता बरतने की योजनाएं बना रहे हैं। एक निवासी रिज़वान अंसारी ने बताया कि "हम बच्चों की सुरक्षा के बारे में बहुत चिंतित हैं और हम क्षेत्र में सुरक्षा की दृष्टि से बहुत जल्द सीसीटीवी कैमरों को स्थापित करेंगे।" 

मुंबई पुलिस के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक, किशोर पासलकर ने कहा कि "हमें निवासियों से बच्चे को अपहरण करने के प्रयास के सिलसिले में जानकारी मिली है। हम फ़िलहाल मामले की जाँच कर रहे हैं, लेकिन अभी परिवार ने इस घटना के बारे में आधिकारिक शिकायत दर्ज़ नहीं की है।

तो ये था दस साल के बच्चों का दिमाग और उनकी सूझ-बूझ जिसकी बदौलत उन्होंने अपने भाई को अपहृत होने से बचा लिया। यह सच्ची घटना ये बताती है कि हमें भी अपने बच्चों को इस तरह की घटनाओं के लिए तैयार करना चाहिए जिससे वक़्त आने पर वो ख़ुद अपनी लड़ाई लड़ सकें।


फ़ोटो:- प्रशांत नार्वेकर

Betrayal,people do it,why I cant or I did!!

I just justified and changed the label?

do we all betray in a way or other?

परंपरागत रूप से भारत में, व्यापारिक संचालन समाज की बेहतरी से कोई सरोकार नहीं रखता है। लाभ की एक छोटी सी राशि और वह भी अनिवार्य सीएसआर की वजह से डोनेट करने के अलावा उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता। लेकिन समय के साथ अब इस क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। सामाजिक उद्यमियों की वर्तमान लहर ने वाकई में एक नए दौर का आगाज़ किया है।

जिस प्रकार व्यापारिक उद्यमिता में नवाचारी उत्पादों या नवाचारी सेवाओं का बहुत महत्व है, उसी तरह सामाजिक उद्यमी के कार्य में सामाजिक नवाचार का बहुत महत्व है। नई पीढ़ी के युवा अब ऐसे स्मार्ट आइडियाज के साथ आगे आ रहे हैं, जो सामाजिक कल्याण को ध्यान में रखकर बनाया गया है। आज हम एक ऐसे ही स्टार्टअप की कहानी आपके सामने पेश कर रहे हैं, जो एक क्रांतिकारी ऐप के ज़रिये आपके भीतर की परोपकारिता को आपके फिटनेस के साथ जोड़ता है।

'इम्पैक्ट' नामक यह ऐप आपको टहलने या जॉग या दौड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है और आपकी यह गतिविधि फंड इकट्ठा करने वाली विभिन्न परियोजनाओं में योगदान देती है। इस ऐप के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी इशान नदकर्णी ने केनफ़ोलिओज़ के साथ ख़ास बातचीत में प्रोजेक्ट के ऊपर विस्तार से चर्चा की।

sqzh6r8y4ckaqji8sjuywb2xvgpypqbq.jpeg

कैसे हुई शुरुआत

दो साल पहले इशान नादकर्णी और निखिल खंडेलवाल ने इस प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी। दोनों पहले से ही एक क्राउडफंडिंग परियोजना पर काम कर रहे थे, जिसका उद्देश्य तकनीक के माध्यम से समाज की बेहतरी में योगदान देना था। इसी दौरान एक दिन निखिल ने इशान को एक चुनौती दी कि यदि वह जॉगिंग के लिए जाएगा तो वह उसे पैसे देंगे। खेल-खेल में दी गयी इसी चुनौती में उन्हें अपना स्टार्टअप आइडिया दिखा। 

फिर उन्होंने इस परियोजना पर काम करना शुरू किया। और जल्द ही तीन अन्य लोग इससे जुड़े। उन्होंने अगस्त, 2016 में अपना ऐप लॉन्च किया। वर्तमान में, उनके पास 12 लोगों की एक टीम है जो विभिन्न व्यावसायिक पहलुओं पर काम कर रही है। अब उनके पास 50,000 से अधिक उपयोगकर्ता भी हैं और अब तक उन्होंने ₹2.8 करोड़ से अधिक के फंड भी जुटाए हैं।

कैसे काम करता है यह ऐप

4v3w5z4bwsqwva9cccgfd92gdpl3tt3w.jpeg

ऐप डाउनलोड करने के बाद, उपयोगकर्ता को कई फंड इकट्ठा वाली परियोजनाओं में से एक को चुनने के लिए कहा जाता है। चयन करने के बाद, जब उपयोगकर्ता टहलने या जॉग या दौड़ने के लिए जाता है, तो ऐप कवर की दूरी का पता लगाता है और दूरी पूरा होते ही उस विशेष कारण पर काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों को एक निश्चित राशि हस्तांतरित की जाती है। यह पैसा कॉर्पोरेट सोशल ज़िम्मेदारी (सीएसआर) की ओर से एक फंड के रूप में विभिन्न कंपनियों से आता है।

साल 2013 में सरकार द्वारा भारत में हर बड़ी कंपनियों को सीएसआर कानून अनिवार्य कर दिया गया था। इस अधिनियम के तहत, प्रत्येक कंपनी जिसका 500 करोड़ रुपये का शुद्ध मूल्य था या 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार या ₹ 5 करोड़ का शुद्ध लाभ था, उन्हें सामुदायिक कल्याण के लिए अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा। इम्पैक्ट टीम इस कानून का उपयोग करती है और कंपनियों को इस कानूनी जिम्मेदारी में मदद करती है।

लोगों के बीच बड़ी तेजी से हो रहा है लोकप्रिय

ऐप के विपणन पर बहुत कम खर्च करने वाली टीम का मानना है कि लोगों के बीच लोकप्रिय होने का अपना तरीका है। एक प्रेरणा के रूप में दान के अलावा, ऐप में एक लीडरबोर्ड भी शामिल है जो उपयोगकर्ताओं को प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव देता है। इसके अलावा, टीम मैराथन आयोजकों के साथ भी मिलकर काम करती है। वे उन कंपनियों के लिए कर्मचारियों की मेजबानी भी करते हैं जो मौद्रिक योगदान के लिए इच्छुक होते हैं।

एक विचार जो दो दोस्तों के बीच एक मजेदार चुनौती से शुरू हुआ, अब संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, मध्य पूर्व और चीन जैसे देशों में भी अपनी पहुँच बना चुका है। बहुत से लोग पैसे या समय की कमी की वजह से सामजिक कल्याण के कार्यों में योगदान चाहते हुए भी नहीं दे पाते। यह ऐप उनके लिए एक वरदान साबित हो सकता है।

gzw5sc5krpwsrdcnukcxwnful5hgwjmj.jpeg

चीजें हमेशा एक तरह से नहीं चलती और कभी-कभी चुनौतियों का सामना भी करना होता है। यद्यपि वे अपने लक्ष्यों तक तेजी से पहुंचते हैं, लेकिन कभी-कभी इसमें समय लगता है। ऐसे मामलों में, वे जितनी जल्दी हो सके लक्ष्य को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक उपयोगकर्ताओं को प्रोत्साहित करते हैं ताकि एनजीओ समय पर भुगतान कर सकें।

इशान कहते हैं कि "मैं ऐसे समय का सपना देखता हूं जब हमारे उपयोगकर्ताओं की संख्या और उनकी सक्रियता इतनी अधिक होगी कि तुरंत ही किसी भी मुहिम के लिए फंड एकत्रित हो जाएंगे।"

इम्पैक्ट टीम वाकई में समाज में एक प्रभावकारी इम्पैक्ट लाने की दिशा में प्रयासरत है। उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस मुहिम से जुड़कर देश व समाज की बेहतरी में अपना योगदान दे सकेंगे।

यदि आप भी इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो ऐप को डाउनलोड करें:

mnpjqpqh5ujcfwt4zwm8qkasb6zcsevw.pngmjsr35xa3h9muid6vuqmabuzd6y29itq.png

Has it ever happened to you that you really worked hard and yet someone else got the job. Well, what was the first thing that crossed your mind? I am sure, at one point you must have thought yourself as not lucky enough but it is okay everyone feels that. Your misfortune in comparison to the story that you are about to read, may look miniscule. In our endeavor to make you feel a little better, here’s presenting you with an interesting, history changing story.

With the talks of Gaganyaan, India’s first manned mission to space, the memories of Rakesh Sharma, the first Indian in space comes to mind. He is a former Indian Air Force pilot who flew aboard Soyuz T-11, launched on 2 April 1984, as part of the Intercosmos programme. Did you know, if things worked out for a certain gentleman, instead of Rakesh Sharma, the whole nation would have been rallying around him? This gentleman is Air Commodore (Retd) Ravish Malhotra.

kfbhvfrrekxbjb7akc4vndhkndccsbxz.jpg

Ravish Malhotra (born 25 December 1943) was born in Lahore, British India. Though he retired as an Air Commodore of the Indian Air Force, Ravish always wanted  to join in the Navy. “For some reason, I wanted to join the navy. When I went for the selection, they said my eyesight was not good enough for the navy, but good enough for the air force. They were running short of air force cadets. So, I said alright and that’s how I joined the air force and the fighter stream,” he said in an interview with Quint.

He is considered a hero in air force circles because he fought brilliantly in the 1971 Indo-Pak war and even had a close call while attacking some tanks in Chamb-Jaurian sector in West Pakistan, he faced heavy anti-aircraft gunfire. But he managed to survive the onslaught. 

uhyuaqeesw6mmyvkdnagvbx8i7g2bvxh.jpg

In 1982, from a group of 20 pilots, he was chosen along with 3 other pilots. After the medical tests in Russia, the duo Ravish and Rakesh were selected for a training which lasted for 2 years. They were taught everything from tech to learning Russian. Russian language because from instrumentation to marking on the spacecraft, everything was in Russian. The two pilots were trained to undertake several missions in space, one which included testing the effects of yoga in space. Both successfully completed the extremely demanding training schedule with credit and distinction.

After they had completed half of the training, it was decided that Rakesh would be in the main team and Ravish would be the backup. “I was disappointed, but you accept it and move on with the mission,” said Malhotra. Thus, Malhotra served as backup for Rakesh Sharma on the Soyuz T-11 mission which launched the first Indian into space, but never went to space himself. Malhotra was then awarded the Kirti Chakra in 1984.

Picture source : Spacefacts; India times, Indian air force

The most inspiring acts of nobility are those that are done for the benefit of others. Life often puts us in situations where we might have to look at the broader perspective of the society as a whole before our personal interests. Of course, it is natural and not wrong to think of one’s own benefits, but it takes a special ‘big heart’ to work selflessly and have no vested interests. There are two prime examples in the society of such acts and they form the crux of this inspiring story – firemen and children. The innocence of children leads them to only think on the lines of the values they know is good and against what has been taught to them as bad. Similarly, fireman is a less talked about profession but these individuals dedicate their lives to saving people from fire disasters.

On Wednesday morning, August 22, 2018, the Crystal tower in Parel, Mumbai caught fire. The disaster struck on the 12th floor and it was said to be a Level-4 fire. The firemen did their best to rescue as many people as possible. While they could not save everybody, but they still protected many lives. At the same time, a 10-year-old girl showed maturity by using her school lessons to spread the basics of fire safety across the building.

gpxuh8bszaq9ced8ehmipgrgudmbk6ub.jpg

(Picture source - The Hindu)

Maturity of a grown up

Zen Gunratan Sadavarte, a 10-year-old kid, lived on the 16th floor of the building. If we even imagine waking up to our house completely burning, we would start panicking and won’t function normally to use our common sense. But this little kid showed immense composure to deal with the situation. She instructed a group of 15-16 people to cover their nose with a thick wet cloth. This would protect them from suffocating due to the thick smoke that had engulfed the building.

ixmnqwdrf3z7ziprisup8pjpndjrvhzu.jpg

(Picture source - Mumbai Live)

She said that as soon as the smoke entered their house, she opened the windows and rushed to alert her neighbours. Then, she made a purifier with cotton for each person and instructed them to inhale and exhale using that until help came.

Fire fighters bring relief

Fourteen fire engines were sent as soon as the fire department was informed. Unfortunately, the internal fire system was totally out of place. Due to timely intervention of the fire department, it could be confined to the 12th floor only. The fire team put up a 90-metre tall ladder to reach the people struck on the upper floors. Those floors were getting suffocating and heating up due to the fire below. Many people had to bravely climb down the ladder from the top floor, but the firemen insured that it was carried out smoothly.

m7p3ywcasq2vn3pkudqvpac4kbe2emuw.jpg

(Picture source - Mid Day)

It was discovered that the fire was caused by a short circuit in a 12th floor apartment. The firefighting department was lauded by Mayor Vishwanath Mahadeshwar. The doused the fire within 3 hours and took just 3 more hours to finish the cooling operations.

The police have said that the responsible people will be severely punished for such an irresponsible behaviour. The disaster could have been worse, but thanks to a combination of composure and experience, many lives were saved.

#Crisis

Over the last few weeks, witnessed an unprecedented downpour flooding 10 out of 14 districts in the state. More than 35 lives were claimed due to the calamity and more than 1 lakh people are left homeless. The flood-hit state has made numerous calls for helping the citizens and when the entire country has come together to help the situation, an inspiring gesture from a brother-sister duo came as a light of hope.

An amiable thought towards humanity

Haroon and Diya, two Kochi based kids decided to break their piggy-banks in which they were saving for two years and help out the flood victims. Born to Sidhique Mallassery and Fathima Siddique, the delightful expression of concern and thoughtfulness went viral when their mother narrated the incident on Facebook. "After seeing us donating clothes and other things to the relief camps our children came asked about giving their entire money from their 'baby bank' to the Chief Minister's Distress Relief Fund, I was so happy,” Fathima said in the Facebook post.

vamzxtnd8pgiql9c8g3jauenj34aenid.jpg

Diya, an STD 4 students, and Haroon, a UKG student both have been saving money in their piggy bank since 2016 for a study table. But when they saw the situation in the neighboring states, they decided to contribute in any way possible. “The total money amounts Rs 2210. I know it's not a huge amount but they have done their part and we have decided to donate the money to CMDRF," Fathima added.

A Facebook post that inspired millions

Haroon and Diya’s contribution to the Minister’s Relief Fund was of Rupees 2210, an amount that might seem small but their kind-hearted action won millions of hearts on social media. It also took their mother by surprise as she told how The News Minute how protective they are of their savings. "The piggy itself was handmade by Haroon during one of his summer camps. I once went to take some change from their bank as I did not have the exact amount to buy something and I nearly ran for my life when they found out." The kids thought of all the kids who lost their bags and books and that’s what they donated the money for.

zjfsusjzdvfamzl5zsclslztmlhgjjqq.jpg

The Prime Minister has announced 500 crore rupees relief for the state on 18th August after the center donated 100 crore rupees initially. The heavy spells of rain from the southwest monsoon have caused devastation on a massive scale and the state is constantly asking for aid for the suffering.

Let’s come together and join the nation to help the people in the state of Kerala. Contribute to the CM’s Kerala Relief Fund.

The CM's Disaster Relief Fund (CMDRF)

Online: www.donation.cmdrf.kerala.gov.in

CMDRF Account details:

Name of the donee: Chief Minister’s Distress Relief Funds

Account Number: 67319948232

Bank: State Bank of India

Branch: City Branch, Thiruvananthapuram

IFSC: SBIN0070028

PAN: AAAGD0584M

Account type: Savings

SWIFT Code: SBININBBT08

All contributions to the fund are 100% tax exempt.

 

अगर व्यक्ति में प्रतिभा है तो कभी ना कभी वह सामने आ ही जाती है उसे छुपाना नामुमकिन है और बात अगर हमारे देश की हो तो हमारा देश तो है ही प्रतिभाओं की खान। हमारे यहाँ लोगों में क़ाबिलियत की कमी नही है बस जरूरत है तो उस क़ाबिलियत की पहचान करने वालों की। 

देश की कुछ ऐसी ही अनदेखी प्रतिभाओं से विश्व को रूबरू कराने का संकल्प लेकर आगे आये है जाने माने बिजनेस टायकून आनंद महिंद्रा।

आनंद महिंद्रा सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहते हैं और प्रतिभाशाली लोगों के वीडियो पर ट्वीट भी करते। इतना ही नही आनंद महिंद्रा अपने ट्वीट के जरिए लोगों से भी अपील करते है कि वे भी उनकी इस मुहिम में उनका साथ दें और भारत के कोने कोने में छुपी प्रतिभाओं का पता लगाने में उनकी मदद करें।

हमेशा की तरह प्रतिभाओं की तलाश कर रहे आनंद महिंद्रा की तलाश इस बार मुंबई की सड़को पर घूमते दिखे एक बच्चा पर जाकर रुकी है जिसका नाम है रवि चोकाल्या।आनंद महिंद्रा इस बच्चे से बहुत अधिक प्रभावित हो गए जिसके चलते उन्होंने अपनी टीम से इस बच्चे का पता लगाने के लिए कहा। पूरा वाकया कुछ ऐसा है कि 2 जुलाई को एक ट्विटर यूजर ऑस्टिन स्कारिया ने आनंद महिंद्रा को ट्वीट में टैग किया जिसमें एक बच्चे की वीडियो क्लिप थी और यह बच्चा मुंबई की गलियों में पंखे बेच रहा था लेकिन इस बच्चे की खास बात यह थी कि वह 10 अलग-अलग विदेशी भाषाओं बात करते हुए पंखें बेच रहा था।

xewwcml3fvjinzbqcfj3arkmre5ybcpj.png

आनंद महिंद्रा ने एक छोटे बच्चे के इस टैलेंट को देखकर रिट्वीट करते हुआ लिखा कि "इस बच्चे में रिअल स्पार्क है मैंने अपनी टीम से कहा है कि हमें इस बच्चे का पता लगाना चाहिए और इस बात को देखना चाहिए कि क्या वह पढ़ रहा है?"

और उनकी टीम ने बच्चे की तलाश शुरू कर दी उसके कुछ समय बाद महिंद्रा ने एक अपडेट ट्वीट शेयर किया जिसमें उन्होंने लिखा कि "महिंद्रा टीम ने उस बच्चे को ढूंढ निकाला है जिसका नाम रवि चेकाल्या है और हमारी टीम उसके टैलेंट को और अधिक निखारने के लिए प्लान बना रही है।"

वाक़ई आनंद महिंद्रा और उनकी टीम के इस काम ने साबित कर दिया की हीरे की परख एक जौहरी ही कर सकता है।

 

Following
Empty
Followers
Empty