Sandeep Kapoor

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अभिनेता अक्षय कुमार और निर्माता-निर्देशक आर.बाल्की की फिल्म ‘पैडमैन’ को दर्शकों के साथ ही आलोचकों से भी सराहना मिली। फिल्म एक व्यक्ति विशेष तमिलनाडु के कोयंबटूर के रहने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथम की जीवन से प्रेरित था जो कम लागत में महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड बनाता है। ‘पैडमैन’ ने शर्मिदगी से जुड़ी चीज समझी जाने वाली माहवारी पर न केवल लोगों को खुलकर बात करने को प्रेरित किया, बल्कि महिलाओं को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने में अपनी भूमिका निभाई। फिल्म का उद्देश्य महिलाओं की माहवारी और उससे जुड़ी स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना था।इस फ़िल्म का असर कुछ यूं हुआ कि कुछ ऐसे लोग भी सामने आए जो समाज में जमीनी स्तर पर बदलाव लाना चाहते हैं।

आज हम आपको एक 8वीं कक्षा की एक ऐसी छात्रा के बारे में बतानें जा रहे हैं जिसनें इस फिल्म से प्रेरित होकर एक अनोखी पहल करने की ठानी और कुछ ऐसा काम शुरू किया जो इस फिल्म से तो प्रेरित है ही साथ ही दूसरी मदद करने की भावना से भी जुड़ा है।

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इनका नाम है रीवा तुलपुले। 13 साल की रीवा अभी महज 8वीं कक्षा में पढ़ती हैं। यूँ तो रीवा दुबई में रहती हैं पर मूलतः उनका परिवार महाराष्ट्र से ताल्लुक रखता है। इस छोटी से लड़की नें अपनी सोच और साहस से वह कर दिखाया है जो बड़े बड़े नहीं कर पाते। रीवा नें ग्रामीण महाराष्ट्र से 250 लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन बांटे हैं। मूलरूप से पुणे के रहने वाले रिवा के पिता राहुल तुलपुले का दुबई में उनका व्यवसाय है। 13 साल पहले ही वे परिवार के साथ वहां बस गए थे। रिवा दुबई में ही पली बढ़ी। लेकिन सामाजिक समस्याओं को लेकर वह हमेशा जागरूक रहती है। रीवा नेजब पैडमैन फिल्म देखी तो ग्रामीण इलाके की लड़कियों को जागरूक करने और उनकी मदद करने की ठान ली।

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उसने इस काम के लिए पिछले कुछ महीनों में दुबई में राशि एकत्रित की। रिवा ने लोगों से मदद के लिए फेसबुक पर ‘वी केयर बाई रिवा तुलपुले’ फेसबुक पेज बनाया है। दीपावली के दौरान होने वाली पार्टियों में भी रिवा ने लोगों से मदद मांगी। लोगों ने भी दिल खोलकर समर्थन दिया। एक बच्ची के लिए सालभर का सैनेटरी नैपकीन देने के लिए 20 दिरहम की मदद ली जाती थी। इसके द्वारा अब तक 500 लड़कियों को मदद देने भर की राशि जमा हो गई है। मदद के लिए और लोग आगे आ रहे हैं। वह दिसंबर में रीवा भारत आई और साहापुर तालुका के स्कूलों में लड़कियों को करीब एक साल का सैनिटरी पैड का स्टॉक बांटा।

रीवा का कहना है कि उन्होंने कुछ महीने पहले पैडमैन फिल्म देखी थी और मुझे मासिक धर्म के दौरान लड़कियों के सामने आने वाली समस्याओं का पता चला। इसके बाद रीवा नें फौरन भारत खासकर महाराष्ट्र के गांवों में रहने वाली लड़कियों के लिए कुछ करने का मन बना लिया। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली रीवा ने कहा कि उन्होंने यह विचार कोंकण स्नातक क्षेत्र से विधान परिषद के सदस्य निरंजन देवखरे के साथ उस समय साझा किया, जब वह दुबई आए थे। देवखरे ने रीवा को इस काम के लिए दिल से प्रोत्साहित किया।

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यह कोई पहली बार नहीं है जब रिवा ने सामाजिक उत्तर दायित्व को समझते हुए कोई काम किया है। इससे पहले इस छोटी सी उम्र में ही वह दुबई में वह ईवेस्ट मैनेजमेंट को लेकर मुहिम चलाकर 4.5 टन ई कचरा जमा कर उसका वैज्ञानिक पद्धति से निपटान करा चुकी है। दरअसल रिवा को जानकारी मिली कि खराब मोबाइल, लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रानिक सामान का अगर सही तरीके से निपटारा नहीं हुआ तो पर्यावरण को ख़तरा हो सकता है। इसके बाद उन्होंने ई-वेस्ट की रीसाइक्लिंग के लिए जागरूकता मुहिम चलाई थी, जो सफल रही।  

अपने आसपास पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतल या प्लास्टिक के अन्य सामान देखकर आप भी फिक्रमंद होते होंगे। जल और मिट्टी के साथ पूरे वातावरण को प्रदूषित करने में प्लास्टिक के इन कचरे का बड़ा योगदान है।  प्लास्टिक पदार्थों को जलाना भी बहुत हानिकारक है क्योंकि इसके कारण कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और डाइऑक्सिन जैसी ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन होता है। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि एक किलो प्लास्टिक कचरा जलाने पर तीन किलो कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा कारण है।

शहर या गांव में कचरा इकट्ठा करने और इससे निपटाने की जिम्मेदारी नगरपालिकाओं या स्थानीय शहरी निकायों की होती है। प्लास्टिक कचरों का समुचित प्रबंध स्थानीय निकायों के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में से एक है। कचरा उठाया तो जाता है पर फिर उसे दूसरी जगह डंप कर दिया जाता है, जिससे यह प्लास्टिक इसी पर्यावरण में मौजूद रहे जाती है। और इसपर जनता के करोड़ों रूपये खर्च भी किये जाते हैं। पर आज हम आपको एक ग्राम पंचायत के ऐसे पहल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे न सिर्फ वे वातावरण को इस प्लास्टिक कचरे से मुक्त कर रहे हैं बल्कि लाखों की कमाई भी कर रहे हैं।

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यह है केरल के इडुक्की जिले का एक ग्राम पंचायत नेदुमगंडम। राज्य सरकार की एक पहल के अंतर्गत नेदुमगंडम ग्राम पंचायत ने क्लीन केरल कंपनी को 4136.83 किलो प्लास्टिक अपशिष्ट 62472 रुपये में पुनर्नवीनीकरण यानी रीसाइक्लिंग के लिए बेचा है। पंचायत के पास अभी भी 10000 किलो प्लास्टिक अपशिष्ट और 3000 किलो कार्बनिक उर्वरक बेचने के लिए उपलब्ध है। इसे सफल बनने के लिए राज्य सरकार की कुदुम्बश्री योजना के माध्यम से कार्यरत महिला कर्मचारी, प्रत्येक स्कूल, अस्पताल और घरों में जाकर प्लास्टिक अपशिष्ट और गैर जैव अवक्रमणीय अपशिष्ट एकत्रित करती हैं। स्थानीय पंचायत इस प्लास्टिक अपशिष्ट का पुनर्नवीनीकरण के लिए क्लीन केरल कंपनी को बेच देती है।

यह कंपनी इसका रीसाइकिलिंग कर सार्वजानिक कार्य विभाग और निजी कंपनियों को उचित मूल्यों पर बेच देती है। अब ब्लॉक पंचायत इस प्रक्रिया को और अधिक मजबूत करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। राज्य सरकार ने ग्राम पंचायत को अपशिष्ट प्रसंस्करण सयंत्र यानी वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट और बायोगैस प्लांट स्थापित करने की अनुमति दे दी है। जिससे स्थानीय लोगों के लिए बिजली और खाना पकाने की गैस उत्पन्न की जा सके।यह बायोगैस सयंत्र करीब 300 किलो अपशिष्ट को गैस में बदलेगा।जिससे 15-20 घरों के लिए खाना पकाने की गैस का निर्माण होगा। इसके अलावा इस संयंत्र से आसपास के घरों को बिजली भी मिलेगी। इस कार्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य सरकार ग्राम पंचायत को 10 लाख की धनराशि भी देने वाली है। यह परियोजना केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की गोवेर्धन पहल और केरल सरकार के सुचित्वा मिशन के तहत कार्य करेगी।

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जाहिर है हमारे देश में प्रतिदिन 15000 टन प्लास्टिक अपशिष्ट निकलता है, जिसकी मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पूरे विश्व में इतना प्लास्टिक हो गया है कि इस प्लास्टिक से पृथ्वी को पांच बार लपेटा जा सकता है।समुद्र में करीब 80 लाख टन प्लास्टिक बहा दिया जाता है, जिसका अर्थ है कि प्रति मिनट एक ट्रक कचरा समुद्र में डाला जा रहा है। यह स्थिति पृथ्वी के वातावरण के लिए बेहद हानिकारक हो सकती है क्योंकि प्लास्टिक को अपघटित होने में 450 से 1000 वर्ष लग जाते हैं। ऐसे में ग्राम पंचायत नेदुमगंडम की यह पहल वाकई क़ाबिले तारीफ है। हर नगर पालिका और राज्य सरकारों को इस तरह के पहल को अपनाने की जरूरत है।

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इस स्तंभ के अब कई प्रकार जैसे प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, डिजिटल मीडिया व सोशल मीडिया हमारे सामने मौजूद हैं। पर प्रिंट मीडिया सबसे पुराना और बेहतरीन साधन है। अखबार हमें न सिर्फ ख़बरें देता है बल्कि हर खबर की समीक्षा व रोजमर्रा से जुड़ी जरूरी जानकारी भी देता है। अखबार पढ़कर हम देश-दुनिया में होने वाली हर हलचल से परिचित रहते हैं। हम यह भी चाहते हैं कि हमारे बच्चे भी अखबार पढ़ें और दुनिया भर की खबरों से रूबरू हो, पर कैसे?

क्योंकि आजकल अखबारों में खबरों का स्तर गिरता जा रहा है।खबरों में भी सिर्फ क्राइम और नकारात्मक से संबंधित खबरें ही नजर आती हैं। जिस कारण कई बार सुबह-सुबह न्यूज़ चैनल और अखबार देखने का भी मन नहीं करता, न जाने कितनी क्राइम की ख़बरें होंगी? पहले खून-खराबा नहीं दिखाया जाता था लेकिन आज कई अखबारों में आप ऐसी खून-ख़राबे, बलात्कार, चोरी से भरी हुई विचलित कर देने वाली ख़बरें और तस्वीरें से भरी रहती हैं। जिन्हें आप अपने बच्चों को तो बिल्कुल नहीं दिखाना चाहेंगे।

इसी समस्या का हल ढूंढा एक माँ ने जिन्होंने अपनें बेटे को दुनिया भर की जरूरी खबरों के अबगत कराने के लिए चालू किया बच्चों का अखबार।

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इनका नाम है निधि अरोड़ा। हरियाणा के गुरुग्राम की रहने वाली निधि एक आईआईएम ग्रेजुएट हैं और एक कंसल्टिंग फर्म की डायरेक्टर हैं। निधि अरोड़ा चाहती थीं कि उनका 11 वर्षीय बेटा रोजाना अख़बार पढ़ने की आदत डाले। पर ऐसा कोई अखबार नहीं था जिससे उनके बेटे पर गलत असर ना पड़े। फिर उन्होने अपने बेटे के लिए 2017 में एक बच्चों का दैनिक अखबार, द चिल्ड्रन पोस्ट शुरू किया। इसके पीछे उनका सीधा और सरल मकसद था कि हमारी ही तरह, बच्चों के लिए देश और दुनिया की ख़बरों के बारे में जानकारी रखना काफ़ी ज़रूरी है। ज़िन्दगी के बारे में उनके नज़रिए को सही सांचे में ढालने के लिए भी देश और दुनिया की ख़बर रखना अनिवार्य है। बच्चों के दिमाग़ में कई प्रश्न आते हैं और दुनिया की समस्याओं से उनका सरोकार रखना, वर्तमान और भविष्य की मांग है। ऐसे में देश दुनिया की खबरों से उनका अवगत होना बहुत जरूरी है।

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उन्होंने जून 2017 में अपने अपने घर पर ही 4 पन्नों का सैंपल अख़बार तैयार किया।इनमें उनका साथ दिया उनकी कुछ दोस्तों और साथियों नें। इस तरह हुई द चिल्ड्रेन पोस्ट की शुरुआत। धीरे-धीरे इस अखबार के बारे में अन्य अभिवावकों  को भी पता चलने लगा और इसकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। इसकी पहुँच बढ़ाने के लिए इसका इलेक्ट्रॉनिक वर्जन शुरू किया गया। अब 4 पन्ने का ये ई-अखबार कई घरों, शिक्षण संस्थानों और स्वयं सेवी संस्थाओं तक तक पहुँचता है। जिसे बच्चों के लिए इसे प्रिंट किया जा सकता है, कभी भी और कहीं भी। गाज़ियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल में ये अख़बार बाल चिकित्सा वार्ड और बच्चों की ओपीडी में बांटा जाता है। इससे अस्पताल में भर्ती बच्चे वहां बैठे-बैठे ही देश दुनिया की हलचल से वाक़िफ़ होते रहते हैं। इसके साथ ही यह अखबार बिना किसी शुल्क के बच्चों के लिए काम करने वाले स्वयं सेवी संस्थाओं को उपलब्ध कराई जाती है।

यूँ तो यह अख़बार 8 से 13 उम्र के बच्चों के लिए है लेकिन यह इतना रोचक और ज्ञानवर्धक होता है कि इससे ज़्यादा उम्र के बच्चे भी इस अख़बार को पढ़ते हैं और इसे पसंद करते हैं। क्योंकि इस अख़बार में जरूरी जानकारी रखने लायक हर  विषय की खबरों को जोड़ा गया है। जैसे अन्तर्राष्ट्रीय खबर, अर्थशास्त्र, इंटरनेट सिक्योरिटी, वातावरण, इतिहास, तकनीक, भारतीय प्रजातंत्र,खेल इत्यादि। साथ ही इस बच्चों के अखबार में क्विज़, कविताएं, लघु कथाओं को भी शामिल किया जाता है ताकि बच्चों को अखबार बोरिंग ना लगने लगे। जिससे बच्चों के अखबार द चिल्ड्रेन्स पोस्ट में जानकारियों के साथ साथ रचनात्मक कंटेंट भी भरपूर रहते हैं।

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खबर को पूरा बनने में औसतन एक दिन में बहुत सारे पेपरवर्क होते हैं जो उनकी टीम पूरा करती है। निधि के अलावा उनकी एडिटोरियल टीम में कुल 6 और माँ जुड़ी हुई हैं। इस टीम में निधि के साथ दीप्ति छबरा, एकता एक्लेस्टन, नेहा जैन, हरिंदर कौर, शिवानी गिलोत्रा नारंग और प्रदीपथी विस्समेटी शामिल हैं।

पूरी टीम मिलकर इस अखबार की ख़बरें सेलेक्ट करती हैं और उसे तैयार करती हैं। इसके लिए उन्हें कम से कम 4-5 समाचार पत्र स्कैन करना पड़ता है। वे बच्चों के लिए सबसे उपयुक्त समाचार चुननें, उन्हें बच्चों के अनुकूल बनाने, पृष्ठों को डिज़ाइन करने, पहेलियों, कार्टून इत्यादि बनने में अपना पूरा जोर लगाती हैं। इसके बाद इसे www.thechildrenspost.com पर अपलोड कर दिया जाता है। आज इस अखबार का लाभ सैकड़ों बच्चों को मिल रहा है।

आजकल हमारे के लिए बिजली, इंटरनेट और मोबाइल आम जरूरत है।इसके बिना लोगों का गुजारा नहीं होता। हर छोटी से छोटी चीज के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। लेकिन दुनिया में कुछ ऐसी जगह भी है जहां बिजली, मोबाइल और इंटरनेट तो छोड़िए लोगों के पास पहनने के लिए हमारे जैसे कपड़े भी नहीं है। जांगलों और टापुओं पर रहने वाले इस समुदाय को हम जनजाति या आदिवासी के रुप में जानते हैं। 

विविध जांगलों और सुदूर क्षेत्रों मे निवास करनें के कारण ये जनजातीय समुदाय आज भी अशिक्षित एवं तथाकथित सभ्यता से दूर है। इनकी अपनी सामान्य संसकृति है जो उन्हें अन्य समाजों से अलग पहचान दिलाती है। विविध जंगलों, पर्वतों एवं पठारों में निवास करने के कारण ये जनजातियां आज भी समाज के एक बड़े हिस्से से कटी हुई है और भौतिक सुख-सुविधाओं से बिल्कुल अनजान हैं। आज भी ये या तो पत्तियों से व खालों से बनीं पोशाक पहनते हैं या फिर नंगे ही रहते हैं। उनकी भाषा भी बिल्कुल अलग होती है इसलिए आम इंसानों से उनका संपर्क व विचारों का आदान प्रदान लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी ही एक जनजाति इंडियन ओशन के नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड में रहती है, जिसे बहुत आक्रामक माना जाता है। लोगों का वहाँ जान तक प्रतिबंधित है। पर आज हम आपको उस पहली महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने उनसे पहली बार संपर्क किया था।

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इनका नाम है डॉ मधुमाला चट्टोपाध्याय। करीब 27 वर्ष पहले एक युवा महिला शोधकर्ता को अंडमान और निकोबार के सेंटिनिलीज आदिवासियों ने अपने द्वीप के तट पर पांव रखने की अनुमति दी थी। डॉ मधुमाला चट्टोपाध्याय को यह दुर्लभ उपलब्धि मिली थी कि वह पहली शख्स बनीं जो दुनिया से कटे पड़े सेंटिनल द्वीप के आदिवासियों से रूबरू हो सकी। युवा शोधकर्ता के रूप में मधुमाला जनवरी-फरवरी 1991 में अपने सहयोगियों के साथ इस अनजान द्वीप के रहस्यमय जनजाति से मिलने गयी थीं। दल में नाविकों सहित कुल 13 लोग थे। यह शोधकर्ता दल अपनी जान जोखिम में डाल कर सेंटिनलीज लोगों के बारे में अध्ययन करना चाहता था। द्वीप की ओर पहली यात्रा में आदिवासियों ने उनपर बाण चलाये लेकिन दूसरी बार मधुमाला का स्वागत किया गया और उन्हें तट पर आने दिया गया।

उस दिन जब वह अपने दल के साथ द्वीप पर पहुंची तो सुबह के 8 बज रहे थे। जब उन्होंने वहां धुंआ देखा तो वह उसी दिशा में चल दिए। कुछ ही देर बाद वहां सेंटिनल भी आ गए। उनमें अधिकतर पुरुष थे और चार लोग ऐसे थे जिनके पास तीर-कमान थे। उन्होंने कहा कि उनके दल के लोगों ने नारियल पानी में फेंक दिए और सेंटिनल नारियल लेकर चले गए। जब उनका दल दोबारा नारियल लेकर लौटा तो सेंटिनल अपनी भाषा में जोर जोर से कहने लगे 'नरियाली जाबा जाबा' यानी और नारियल आये हैं। उस समय कई सेंटिनल युवक नाव तक आए और नारियल ले गए। वहीं एक अन्य सेंटिनल युवक नदी के पास खड़ा था और वह तीर कमान लेकर उनके दल पर  निशाना साधने लगा। उतने ही वहां खड़ी सेंटिनल महिला ने उस पुरुष को धक्का दे दिया। ऐसा लगा कि वह उसे निशाना लगाने से रोक रही हो। इसके बाद अब नारियल पानी में नहीं फेके गए बल्कि उनके हाथ में दिए जाने लगे।

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इसके बाद हमले की परवाह नहीं करते हुए मधुमाला नाव से पानी में कूद गयीं और सेंटिनलीज लोगों के एकदम पास पहुँच गयीं। वह अपने हाथ से आदिम दोस्तों को नारियल देने लगीं। दुनिया के नृवंश अध्ययन इतिहास में वह एक नयी इबारत लिख रही थी। शायद टीम में एक महिला के होने से सेंटिलीज लोगों को यह भरोसा हो गया कि ये लोग उन्हें नुकसान पहुंचाने नहीं आये हैं। इतना सब होते हुए भी सेंटिनलीज लोगों ने टीम के सदस्यों को तट पर नहीं आने दिया। लेकिन मधुमाला 21 फरवरी को फिर वहां पहुंचीं। सेंटिनलीज ने उन्हें पहचान लिया और इस बार उनका व्यवहार दोस्ताना था। वे उनकी नाव के पास आ गए। कुछ तो नाव पर चढ़ गए। इसबार मधुमाला को तट पर पांव रखने की अनुमति मिल गयी।

अपनें लोगों को सुरक्षित रखने के प्रति जागरूक सेंटिनलीज लोगों ने ऐसे सभी घुसपैठियों का प्रतिकार बहुत ही आक्रमण ढंग से धनुष-बाण से करते हैं। हाल ही में अंडमान द्वीप पर रहने वाले सेंटिनल जनजाति के लोगों ने अमेरिकी नागरिक 26 वर्षीय जॉन एसन चाऊ की हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद से एक बार फिर सेंटिनल का मुद्दा पूरी दुनिया में उठ गया। लोगों के मन में इस जनजाति के प्रति काफी डर आ गया। दुनिया की नजर में ये छवि बन गई कि जनजाति के सामने यदि कोई आ जाए तो ये लोग उसे मार सकते हैं। लेकिन इसी सेंटिलीज लोगों के साथ सर्वप्रथम आत्मीय संपर्क कायम करने का श्रेय मधुमाला चट्टोपाध्याय को ही मिला। मधुमाला उस समय केंद्र सरकार के सामजिक कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं। अभी मधुमाला सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय में जॉइंट डायरेक्टर के रूप में कार्यरत हैं।

मधुमाला ने अंडमान के आदिम लोगों पर दशकों तक अध्ययन किया है और इस विषय पर एक पुस्तक ‘ट्राइब्स ऑफ़ कार निकोबार’ (कार निकोबार की जनजातियों) लिखी है।

हमारे देश में ज्यादातर किसानों की हालत बहुत ही दयनीय है। अक्सर किसान आर्थिक हालातों के आगे मजबूर होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं। लेकिन इन सब से अलग समाज में कुछ किसान ऐसे भी हैं जो अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर सफलता के एक मुकाम तक पहुंच चुके हैं। ऐसे ही एक किसान उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में हैं। उन्होंने अपनी सोच और काबिलियत के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई। आठवीं फेल होने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को सपनों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि हकीकत में भी उतारा। आज वह केले व टमाटर की खेती से लाखों का मुनाफ़ा कमा रहे हैं।

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इनका नाम है रामशरण वर्मा। उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जनपद के ग्राम दौलतपुर के मामूली पढ़े-लिखे रामशरण वर्मा ने वह कर दिखाया जो बड़े बड़े शूरमा नहीं कर पाते। जिन्होंने अपने छोटे से गाव में रहकर वह कामयाबी हासिल की है। लखनऊ से सटे 30 किलोमीटर दूर बाराबंकी जनपद में खेतों से उगता है हरा सोना और ये सोना जमीन से उगाने वाला यह मामूली इंसान आज करोड़पति हैं। हाईस्कूल फेल होने के बावजूद उन्होंने आज वह सब करके दिखा दिया। जिसे बड़ी-बड़ी डिग्री लेने के बाद भी लोग हासिल नहीं कर पाते। इतनी कम पढ़ाई करके मेहनत और लगन से जिंदगी में वो सब हासिल कर लिया, जिससे आज उत्तर-प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश में भी उसका नाम प्रसिद्द हो चुका है। उन दिनों में जब किसान खेती छोड़कर अधिक लाभ के लोभ में शहरों की तरफ पलायन कर रहे थे, तो ऐसे समय में रामशरण वर्मा खेतों से हरा सोना पैदा करने का सपना देख रहे थे।
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रामशरण सिर्फ हरा केला नहीं उगाते लाल केला भी उगाते हैं। जी सही सुना अपने यह केला आम नहीं बल्कि बहुत खास है क्योंकि अभी तक आपने हरे और पीले रंग के केले के बारे में सुना होगा और इसका स्वाद भी लिया है लेकिन लाल रंग के केले के बारे में आप कम ही जानते होंगे। लाल रंग का केला ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, वेस्टइंडीज, मेक्सिको जैसे देश के साथ ही भारत में सिर्फ तमिलनाडु राज्य के कुछ हिस्सों में पैदा किया जाता है। आसपास के गाँवों से लेकर दूसरे जिलों से किसान उनके खेत पर केले की खेती देखने पहुंच रहे हैं किसानों के साथ-साथ रामशरण वर्मा से हाईटेक खेती सीखने तमाम वीआईपी हस्थिया भी उनके फार्म हाउस पर पहुंचती हैं। रामशरण वर्मा “टिशूकल्चर पद्धति से केले की खेती” करते हैं और आज केले की पैदावार में रामशरण वर्मा सबसे आगे निकल चुके हैं। रामशरण वर्मा एक एकड़ केले की फसल में 2.5 – 3 लाख तक फायदा उठाते हैं। इसके अलावा रामशरण वर्मा अपने खेतों में अलावा टमाटर और आलू की भी खेती करते हैं।

उन्नत किसान रामशरण वर्मा हाईटेक एग्रीकल्चर एवं कंसल्टेशन के माध्यम से पहले खुद खेतों में पौधों से सीखते हैं उसके बाद किसानों को खेती के नए नए गुर सिखाते हैं। रामशरण वर्मा ने खेती में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए जो रास्ता चुना, उसमें कामयाबी भी हासिल की। पर उन्हें यह नहीं पता था कि प्रदेश के हजारों किसान उन्हीं की राह चल पड़ेंगे। उनका अनुसरण करने वाले हजारों किसान प्रदेश के बहुत से जिलों में रामशरण मॉडल पर खेती कर रहे हैं और सफल हैं। मजदूरी से जीवन यापन करने वाले किसानों ने कभी सोचा न था कि वे अपने खेत के एक टुकड़े से ही समृद्ध किसान बन जाएंगे। हाईटेक खेती के गुर से रामशरन वर्मा ने प्रदेश में पांच हजार से अधिक गरीब मजदूरों को प्रगतिशील किसान बना दिया। 

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद एक हेक्टेयर खेत पर पारम्परिक खेती छोड़, वर्ष 1990 में हाईटेक खेती शुरू की थी। नित नया करने की जिज्ञासा से दूसरे वर्ष ही टमाटर और केला की खेती अपने छह हेक्टेयर खेतों पर उन्होंने की। उत्पादन को बाजार तक पहुंचाने के साथ रामशरन का नित नए प्रयोग करना ही छोटे किसानों के लिए वरदान बन गया और आज वह करोड़ों रुपए केला और टमाटर से कमा रहे हैं।

रामशरण वर्मा जी की इसी मेहनत का नतीजा है कि उन्हें साल 2007 और 2010 में राष्ट्रीय कृषि पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। राष्ट्रीय कृषि पुरस्कार को देश के सबसे बड़े कृषि सम्मान के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही साल 2014 में रामशरण वर्मा को बागवानी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपको बता दें कि रामशरण वर्मा को कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल सम्मानित कर चुके हैं। साल 2012 में पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तो रामशरण वर्मा को खेती का जादूगर होने का खिताब देते हुए सम्मानित किया था।

 

इतिहास हमे अपने अस्तित्व से अवगत कराता है ये बात 100 प्रतिशत सही है। कुछ बाते हमे गौरवशाली होने का एहसास कराती है तो भारतीय इतिहास की कुछ दुखद घटनाएं हमारी आँखे नम कर जाती है । इतिहास में हमने क्या खोया और साथ ही ये एहसास कराती है आने वाले भविष्य में हम ये गलतियां दुबारा न दोहराये। हमारे देश नें इतिहास का ऐसा ही काला दिन देखा था 3 दिसम्बर 1984 को जब भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से मिथाइल आइसो साइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसमें कई हजार लोगों की मौत हो गई थी। हजारों लोग शारीरिक अपंगता और अंधेपन का शिकार हुए थे। भारतीय इतिहास ने ऐसा दर्दनाक मंज़र नहीं देखा था। लोग इसे भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते हैं। पर इस भयावह कांड में एक ऐसा शख्स भी था जिन्होंने अपनी व अपने परिवार की जान की परवाह किये बिना सैकड़ों की जान बचाई। जिसे भोपाल गैस त्रासदि का हीरो कहा जाए तो कम नहीं होगा।

इनका नाम है गुलाम दस्तगीर। गुलाम उस वक़्त भोपाल के डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट थे। जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के उस भयानक रात को लाखों लोगों की ज़िन्दगी बचाई थी। उन्होंने अपने एक फैसले से सैकड़ों की जान बचाई ओर न बचा पाया तो अपने 3 बेटे और पत्नी को। भोपाल गैस कांड को 34 साल पूरे हो गए हैं, 3 दिसंबर 1984 की उस रात की यादें आज भी लोगों के जहन में जिंदा हैं जब भोपाल में हजारों लोग सोए तो थे लेकिन अगली सुबह लोग जागे ही नहीं। इस काली रात की आज तक सुबह नहीं हो सकी है। आज भी वह मंजर लोगों के दिलो को कचोट जाता है। यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली गैस ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था।यूनियन काबाईड से जहरीली गैस रिसने का सबसे ज्यादा असर रेलवे पर हुआ। यहां 10 हजार कर्मचारियों की आबादी में 130 मौतें रिकार्ड हुईं। 1 घंटे के अंदर 21 व्यक्तियों की मौत हुई और 300 व्यक्ति बेहोश हुए। 

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उस रात डिप्टी स्टेशनअधीक्षक गुलाम दस्तगीर कुछ लंबित कागजी कार्य पूरा करने के लिए अपने कार्यालय में ही बैठे थे। इस काम ने उन्हें रात में 1 बजे तक अपने ऑफिस में ही बैठाये रखा। इसी बीच गोरखपुर मुंबई एक्सप्रेस के आने का समय हो गया जैसे ही वह बाहर निकले उनकी आंखों में जलन शुरू हो गई। उन्होंने अपने गले में खुजली महसूस की। उन्हें नहीं पता था कि यूनियन कार्बाइड की कीटनाशक कारखाने से लीक जहरीले धुएं रेलवे स्टेशन पर भी फैल चुकी थी। अब तक स्टेशन अधीक्षक हरीश धूर्वे समेत उनके तीन रेल सहयोगियों की मृत्यु हो चुकी थी। वह पूरी तरह से समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। इसके बाद भी उन्होंने तुरंत कार्य करने का फैसला किया। जब स्टेशन मास्टर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने भोपाल को सभी ट्रेन यातायात को निलंबित करने के लिए विदिशा और इटारसी जैसे पास के स्टेशनों के वरिष्ठ कर्मचारियों को सतर्क कर दिया।

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सवारियों से भरी गोरखपुर-कानपुर एक्सप्रेस पहले से ही एक प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी और इसका जाने का समय 20 मिनट देरी का था। मगर अपने मन की बात सुनते हुए गुलाम दास्तागीर ने कर्मचारियों को बुलाया और ट्रेन को तुरंत प्लेटफॉर्म से रवाना करने लिए कहा। जब सभी ने पूछा कि क्या उन्हें तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक कि ऐसा करने का आदेश प्रधान कार्यालय से नहीं आए, तो गुलाम दास्तागीर ने जवाब दिया कि वह ट्रेन के शुरुआती प्रस्थान के लिए पूरी जिम्मेदारी लेंगे।सभी नियमों को तोड़कर और किसी से अनुमति लेने के बिना, वह और उनके बहादुर कर्मचारियों ने व्यक्तिगत रूप से ट्रेन को आगे जाने के संकेत दे दिए। ये उन्हीं का दिमाग था जिसने कितने ही लोगों की जान बचा ली थी।

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पीड़ित लोगों की भीड़ से घिरा हुआ स्टेशन जल्द ही एक बड़े अस्पताल सा दिखाई देने लगा। दस्तगीर स्टेशन पर रहे, दृढ़ता से अपना कर्तव्य कर रहे थे। उन्होंने इस बात की भी फिक्र नहीं की कि उनका परिवार भी शहर के बीचो-बीच बसा हुआ है। गुलम दस्तगीर के इस काम नें सैकड़ों लोगों का जीवन बचाया। हालांकि, इस आपदा का शिकार उनके घर वाले भी बनें। त्रासदी की रात को उनके बेटों में से एक की मृत्यु हो गई और दूसरे ने आजीवन के लिए स्किन इंन्फेक्शन हो गया। खुद दस्तगीर ने अपने 19 वर्ष अस्पताल में बिताएं। जहरीले धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने के कारण उनके गले में संक्रमण हो गया। 2003 में जब वह अपनी लम्बी बीमारी से हार गए और दम तोड़ दिया। उनके मृत्यु प्रमाण पत्र से इस बात का खुलासा हुआ कि वह एमआईसी (मेथिल इस्साइनेट) गैस ही उनकी बीमारी और मौत का कारण बनी। सचमुच वह किसी हीरो से कम नहीं थे जिन्होंने अपने परिवार और खुद के जान को गवां कर सैकड़ों की जान बचाई।

#भोपाल गैस त्रासदी

आज भारत उन देशों में है जहाँ गरीबी और भुखमरी सर्व व्याप्त है। दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है और भूखे लोगों की करीब 23 फीसदी आबादी भारत में रहती है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या लगभग 19.07 करोड़ है, जो कि विश्व भर में सबसे अधिक है। वहीं दूसरी तरफ आज अपना देश खाने की बर्बादी की समस्या से भी जुझ रहा है। अपने देश की पूरी आबादी को खाना प्राप्त हो सके इसके लिए सरकार, वैज्ञानिक एवं किसान दिन-रात जी तोड़ मेहनत करते हैं। कम समय में कम भूमि पर अच्छी फसल की पैदावार हो इसकी नई-नई खोज होती रहती हैं। सभी धर्म अन्न देवता की पूजा करने का संदेश देते हैं चाहे इसे माने या माने यह हम पर निर्भर करता है।

पर आज समाज में भोजन की जूठन छोड़ने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, खास कर शादी विवाह की पार्टियों में बहुत बड़ी मात्रा में खाना नालियों में जाता है। ऐसा कर हम भगवान की नजर में पाप के भागीदार बन रहे हैं। भोजन की इसी वेस्टेज को रोकने आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए एक शख्स नें शुरू की अनोखी मुहिम। जो आज सैकड़ों भूखे व गरीब का पेट भर रही है।

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इनका नाम है भुवन भास्कर खेमका। हरियाणा के शहर सिरसा के निवासी भुवन पेशे से एडवोकेट हैं। भोजन की इसी वेस्टेज को रोकने आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए वे श्री राम भोजन बचाओ संस्था चलाते है। संस्था का श्लोगन है "इतना ही लो थाली में ताकि व्यर्थ जाए नाली में" इसी विचार के साथ भुवन ने श्री राम भोजन बचाओ नामक संस्था की शुरूआत की थी। इस योजना के तहत उनके संस्था में युवाओं की एक टीम तैयार है। और जब भी किसी विवाह-पार्टी आदि में भोजन बचने की सूचना आती है तो यह टीम तुरंत मौके पर जाकर उस भोजन को वहां से उठाकर जरूरतमंद तक पहुंचाती है। इसके अलावा ये लोग घरों के बचे हुए भोजन को एकत्रित किया जाता है। बचा हुआ खाना एकत्रित करने के बाद अनाथ आश्रम, वृद्ध आश्रम और झुग्गी झोपडिय़ों में जाकर बांटा जाता है।

दरअसल इसकी शुरुआत साल 2010 में हुई थी। खेमका अपने शहर में ही एक निजी पैलेस में आयोजित शादी समारोह में गए थे। शादी में आए लोग प्लेट भरकर पकवान ले रहे थे। इसके बाद आधे पकवान प्लेट में बचे होने के बाद भी डस्टबिन में डाल रहे थे। शादी से लौटने के बाद ऐसे समारोहों में होने वाली भोजन की बर्बादी की घटना ने उन्हें रातभर सोने नहीं दिया। इसके बाद लोगों को जागरूक करने का फैसला लिया। यह साल 2010 की बात है। खेमका ने वर्ष 2010 में श्रीराम भोजन बचाओ संस्था का गठन किया गया। इस संस्था में लोगोंं को सदस्य बनाया गया। सदस्यों से प्रतिमाह 5 रुपये एकत्रित किए गये। जिसे संस्था द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए खर्च किया जाता रहा। फिर राशि बढ़ाकर सदस्यों से 50, 100, 200, 500 व 1000 रुपये प्रतिमाह एकत्रित करने लगे। उनकी संस्था मैरिज पैलेस में विवाह समारोह से फेंके गए खाने के को कॉल प्राप्त होने पर उठाने लगी। उन्होंने उसके लिए संपर्क नम्बर जारी किए हुए हैं।

कई बार ऐसा भी होता है कि उन्हें भोजन नहीं मिल पाता या कोई कॉल नहीं आती। ऐसे में पदाधिकारी अपने खर्च पर ब्रेड खरीद कर उसे बांटते हैं। संस्था के 250 मासिक सदस्य हैं जो हर महीने दान देते हैं। इसी से संस्था के सदस्य भोजन सामग्री खरीदते हैं। संस्था के सदस्य शहर से 25 किलोमीटर दूर तक भोजन एकत्रित करने पहुंच जाते हैं और लाकर बांटते हैं। उनके इस पहल से सैकडों गरीबों का पेट भर रहा है। उनकी संस्था के प्रयासों से भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है। क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्योहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखे लोगों द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की कमी जहां मानवीय त्रासदी है, वहीं भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडंबना है।

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शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। 1-1 शादी में 100-100 तरह के आइटम परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नए-नए पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती है। इस भोजन की बर्बादी के लिए केवल भुवन भास्कर खेमका की सामाजिक संगठन ही नहीं बल्कि सरकार भी चिंतित है। 

 

हमारे देश में मानव तस्करी और सेक्स रैकेट की समस्या काफी तेज़ी से बढ़ती जा रही है। अक्सर गुमशुदा और अनाथालय की लड़कियों इसका शिकार बनाया जाता है। आज ऐसी असहाय बच्चियों के साथ आए दिन यौन शोषण, छेड़खानी और रेप की घटनाएं बढ़ती जा रहीं हैं। जोकी समाज और देश के लिये चिंता का विषय हैं। समाज में बाल यौन शोषण की घटनाओं का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। चाइल्ड सेक्स अब्यूजमेंट पर किये गये एक अध्ययन के मुताबिक भारत में यौन शोषण का शिकार बच्चों की संख्या विश्व में सर्वाधिक हैं। भारत में प्रत्येक 10 बच्चों में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। चाहे पिता द्वारा अपनी ही बेटी से दुष्कर्म की घटना हो या फिर कभी शिक्षक द्वारा विद्यार्थी के साथ यौन उत्पीड़न का मामला आये दिन इस तरह की घटनाएं पूरे समाज को शर्मसार करती हैं। फिर प्रश्न ये उठता है कि हमारे देश की बेटियाँ सुरक्षित कहाँ है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश और बिहार के अनाथालयों में लड़कियों के यौन शोषण की खबरें मीडिया में बेहद चर्चित रही थीं। ऐसे ही एक मामले का खुलासा तमिलनाडु के एक जिलाधिकारी नें किया है।जिनके प्रयासों की वजह से आज एक मिशनरी होम से 50 मासूम लड़कियों को छुड़ाया जा सका है।

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इनका नाम है केएस कंडासामी। आईएएस अधिकारी केएस कंडासामी तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई के जिलाधिकारी हैं। उन्होंने एक मिशनरी होम से 50 लड़कियों को छुड़ाया है। यहां लड़कियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। जिलाधिकारी कंडासामी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए मिशनरी होम पर छापा मारा और वहां से लड़कियों को मुक्त कराया। इस शेल्टर होम में लड़कियों को बेहद ही अमानवीय तरीके से रखा जाता था, 5 से 22 उम्रवर्ग की इन लड़कियों के बाथरूम में दरवाजे तक नहीं थे। उन्हें एक संयुक्त कमरे में ही कपड़े बदलने पड़ते थे। महिला स्टॉफ की जगह वहां केवल एक पुरुष सुरक्षा गार्ड ही मौजूद था। शिकायत करने पर लड़कियों को बुरी तरह से मारा-पीटा जाता था।

जिस शेल्टर होम से लड़कियों को मुक्त कराया गया वहां की दास्तान सुनकर किसी की भी आंखें भर आएंगी। लड़कियों को इस हद तक प्रताड़ित किया जा रहा था कि इसे शब्दों में बयां करना भी आसान नहीं है। दरअसल जिलाधिकारी केएस कंडासामी को मर्सी अदाइकालापुरम मिशनरी होम की शिकायत मिली थी। जिसके बाद उन्होंने मिशनरी होम पर छापा मारा था। जहां उन्होंने जांच की तो पाया घर का मालिक 65 वर्षीय लुबान कुमार अपने परिवार के साथ वहीं रहता था।इतना ही नहीं, लुबान ने गलत नीयत से लड़कियों के बाथरूम के दरवाजे हटवा दिए थे। उसका कमरा लड़कियों के कमरे से जुड़ा हुआ था, जहां से वह लड़कियों के बाथरूम में तांकझांक करता था। उसने लड़कियों के कपड़े बदलने के स्थान पर सीसीटीवी कैमरे भी लगाए हुए थे।

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जब भी लड़कियां हिम्मत करके इस कृत्य की शिकायत करने पहुंचती थीं तो लुबान का भाई लड़कियों को बुरी तरह से पीटता था। जिलाधिकारी के अनुसार वो रात में लड़कियों को अपने कमरे में मसाज देने के लिए भी बुलाता था। फिलहाल लुबान कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। उस पर पोस्को एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मिशनरी होम को सील कर लड़कियों को सरकारी अनाथालय में पहुंचा दिया गया है।केएस कंडासामी की पहल से अब इन लड़कियों की शिक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

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आईएएस अधिकारी कंडासामी इसके अलावा भी अपने उत्कृष्ट कार्यों के लिए चर्चा में रहे हैं। उन्होंने एक 17 साल की किशोरी को जबरन शादी करने से बचाया था। दरअसल कंडासामी को सूचना मिली थी कि एक किशोरी पी विद्या की शादी एक 25 साल के युवक से कराई जा रही है। जिसके बाद उन्होंने वहां पहुँचकर लड़की की शादी रुकवाई। इतना ही नहीं, कंडासामी ने विद्या की मां को मनाकर उसके नाम 3 लाख रुपये भी जमा करवाए, जिससे विद्या नर्सिंग होम करने में इस्तेमाल करेगी।

आज के समय में देश विदेश की सबसे बड़ी समस्या के बारे में अगर पुछा जाये, तो बच्चा बच्चा भी यही बोलेगा आतंकवाद। आतंकवाद ने हमारे समाज को इस तरह जकड रखा है कि लाख कोशिशों के बाद भी ये जड़ से अलग नहीं हो रहा है। आतंकवाद विश्वभर में फैला है, अभी कुछ दशकों में, उसने नए आयाम हासिल किए हैं। जिस तरह से यह पिछले कुछ सालों से बढ़ रहा है, यह सीमाओं से परे है, हम सभी के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है। फलस्वरूप, आज दुनिया दिन प्रतिदिन असुरक्षित, खतरनाक और भयभीत जगह बनती जा रही है। ऐसे में हमारी रक्षा करते हैं हमारे देश के वीर सैनिक।

एक सेना का जवान जब भारत माँ की रक्षा के लिए प्रण लेता है कि जबतक शरीर में प्राण रहेंगे तब तक दुश्मनों से लड़ता रहूँगा और अपने देश की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर भी कर दूंगा। आज हम आपको एक ऐसे ही जवान के बारे में बताने जा रहे हैं जो कभी आतंकवादी था। पर आज उसने देश के लिए लड़ते लड़ते अपनी प्राण भी न्योछावर कर दिए।

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इनका नाम है लांस नायक नजीर अहमद वानी। रविवार को साउथ कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में छह आतंकियों को ढेर किया। इस एनकाउंटर में सेना के जवान लांस नायक नजीर अहमद वानी भी शहीद हो गए।  कभी खुद आतंकी रहे लांस नायक नजीर अहमद वानी का सोमवार को अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंतिम संस्कार के दौरान वानी के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया और 21 बंदूकों की सलामी दी गई। वानी को बाटागुंडा में मुठभेड़ के दौरान गोलियां लगी थी। जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल मे भर्ती कराया गया था। जहां उनकी इलाज के दौरान मौत हो गई।शहीद हुए लांस नायक नजीर अहमद वानी सेना में भर्ती होने से पहले एक आतंकी थे। लेकिन उन्होंने आत्म समर्पण कर दिया था। वहीं आर्मी ऑफिसर ने वानी को सच्चा सैनिक बताया है।

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कुलगाम के रहने वाले वानी को सोमवार से नम आंखों से श्रद्धांजलि दी गई। लांस नायक वानी को जिस समय श्रद्धांजलि दी जा रही थी, इंडियन आर्मी के कई ऑफिसर उनके परिवार को सांत्‍वना देने के लिए मौजूद थे। लेकिन एक तस्‍वीर ऐसी है जो आपको भारतीय सेना के अलग पहलू से रूबरू करवाती है। इस दौरान सेना के एक सर्विंग ऑफिसर जब वानी के रोते हुए पिता को गले लगा रहे थे, तो उनकी आंखों से भी आंसू निकल रहे थे। वह खुद को इस मौके पर नियंत्रित नहीं कर पाए और वानी के परिवार के गम का हिस्‍सा बन गए।उनके बूढे़ पिता के आंसू नहीं थम रहे थे, तभी एक सैन्‍य अफसर उन्हें गले लगा लिया और सांत्वना दी। इसी लम्हे की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।
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इंडियन आर्मी ने इस फोटो को ट्वीट भी किया। जिसे अबतक हजारों लाइक मिल चुके हैं। कुछ ट्विटर यूजर्स ने लिखा है, ‘इस फोटो की संवेदनशीलता को शब्‍दों में बयां नहीं किया जा सकता।’ गौरतलब है कि रविवार को ऑपरेशन ऑलआउट में सुरक्षाबलों ने 6 आतंकी मार गिराए। इसी ऑपरेशन में राष्‍ट्रीय रायफल्‍स के लांसनायक नजीर अहमद वानी शहीद हो गए। वर्ष 2004 में सेना में शामिल होने वाले लांसनायक वानी को साल 2007 में सेना मेडल दिया गया। इसके बाद इसी वर्ष अगस्‍त में भी स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर भी उन्‍हें सेना मेडल से सम्‍मानित किया गया। वह कुलगाम तहसील के चेकी अश्‍मूजी गांव के रहने वाले थे। बता दें, दक्षिण कश्‍मीर में स्थित कुलगाम जिला आतंकवादियों का गढ़ माना जाता है। सेना के प्रवक्‍ता ने बताया कि लांस नायक नजीर अहमद वानी के परिवार में उनकी पत्‍नी और दो बच्‍चे हैं।

उन्‍हें हमेशा उनकी बहादुरी और उनके जज्‍बे के लिए याद रखेंगे जिसकी वजह से उन्‍होंने कई ऑपरेशंस को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और देश की रक्षा में अपना योगदान दिया।

"पति करे बाहर का काम और पत्नी करे घर का काम" यह कहानी अब बीते जमाने की बात हो गई है। कहा जाता रहा है कि कुछ काम केवल पुरुष ही कर सकते हैं पर अब ऐसा नहीं है। क्योंकि महिलाएं जहां पुरुषों के साथ पाताल की गहराईयां नाप रही हैं वहीं अंतरिक्ष की ऊंचाई भी छूने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। महिला सशक्तिकरण का यह उदाहरण केवल शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों तक भी पहुंच गया है। हाथों में बेलन पकड़ने वाली महिलाएं आज कुदाल और फावड़ा लेकर खेतों में जाने से भी नहीं कतराती। पुरुषवादी समाज में कृषि क्षेत्र में भी महिला किसान न केवल आत्मनिर्भर बन रही हैं,बल्कि महिला सशक्तिकरण के नए सोपान भी गढ़ रही हैं।

आज हम आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने ऑर्गेनिक खेती की बदौलत ना केवल दुनिया भर में नाम कमाया बल्कि अवार्ड भी हासिल किया।

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इनका नाम है ललिता मुकाती। मध्य प्रदेश के धार के मानवाड़ तहसील में सिरसाला के छोटे गांव में पैदा हुई ललिता नें आज जैविक खेती में वह मुकाम हासिल किया है जो बड़े बड़े नहीं कर पाते। आज जब अधिकांश किसान रासायनिक खाद का प्रयोग कर अधिक से अधिक उपज लेने के लिए तत्पर रहते हैं, ऐसे में बड़वानी की महिला किसान ललिता मुकाती ने 36 एकड़ में चीकू, सीताफल और कपास उगा कर जैविक खेती से रिकॉर्ड उत्पादन कर अपने साथ-साथ छोटे से गांव बोरलाय को दिल्ली तक पहचान दिलाने जा रही हैं। यदि सबकुछ ठीक रहा तो एक साल बाद वे अपने खेत में उगाए इन फलों को सीधे विदेशों में निर्यात कर पाएंगी। यही नहीं वे गांव की महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित भी कर रही हैं।

ललिता के माता-पिता पेशे से किसान तो थे, लेकिन वे बेटी को किसानी कराने की बजाय हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करते रहे। महज 19 साल की उम्र में जब ललिता की शादी सुरेश चंद्र मुकाती से हुई तो वूमेन एजुकेशन के हिमायती उनके सुसर ने भी ललिता को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। इसी प्रेरणा के दम पर ललिता ने ओपेन यूनिवर्सिटी के जरिये बी.ए. की डिग्री हासिल की। आर्ट ग्रेजुएट की डिग्री एग्रीकल्चर में बहुत काम नहीं आ सकती है, पर ललिता ने इसे झूठा साबित कर दिखाया। आज वह न केवल एक अवॉर्ड विनर ऑर्गेनिक फार्मर हैं, बल्कि 21 महिलाओं का एक एसोसिएशन बनाकर पेस्टिसाइड्स फ्री फार्मिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसी क्रम में उन्होंने बरवानी जिले के बोर्लाई गांव की अपनी 36 एकड़ एग्रीकल्चर लैंड को पेस्टिसाइड्स फ्री कर दिया है, जहाँ वे ऑर्गेनिक फसल उगाती हैं।

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ललिता ने ऑर्गेनिक खेती में कदम अपने पति 50 वर्षीय सुरेंशचंद्र मुकाती की मदद के लिए उठाया था। ललिता के पति ने एग्रीकल्चर में एमएससी किया था और उन्हें ट्रेनिंग एवं अन्य कारणों से अक्सर बाहर जाना पड़ता था। ऐसे में खेती पर ध्यान नहीं दे पाने के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ता था, दौरान खेतों में मजदूरों को देखने वाला कोई नहीं था, इसलिए उन्होंने निर्णय किया कि वे खुद खेतों में जाएंगी और कृषि कार्य में पति का हाथ बंटाएंगी।इसलिए ललिता ने बच्चों के बड़े हो जाने के बाद साल 2010 में पति से ही खेती के गुर सीखने लगी। घर से खेतों तक पहुंचने के लिए उन्होंने पहले स्कूटी चलाना सीखी और धीरे-धीरे सारे खेती उपकरण चलाना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने ट्रैक्टर चलाना भी सीखा।

ललिता के आठ साल के लगातार प्रयासों का रिजल्ट यह रहा कि मध्य प्रदेश स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी से उनके खेत को ऑर्गेनिक स्कोप सर्टिफिकेट मिल गया है। ललिता अपने खेत में अर्थवर्म्स पालती हैं, जो खेत के अपशिष्ट को वर्मीकंपोस्ट में बदल देता है। सर्वश्रेष्ठ जिला किसान पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फार्म महिला अवॉर्ड से सम्मानित ललिता को मुख्यमंत्री किसान विदेश अध्ययन योजना के तहत चुना गया था। जहां 2014 में ललिता और उनके पति को साथ में उन्हें जर्मनी और इटली जैसे देशों में घूमने का मौका मिला। खेती के नए, कम लागत वाले और बेहतर उपज के तरीके जानने के लिए उन्हें जर्मनी और इटली के हाई-टेक ऑर्गेनिक खेतों में जाने का अवसर मिला। इसी के साथ केंद्र सरकार ने भी उन्हें देश की उन 114 महिला फार्मर्स में शामिल किया है, जिन्होंने भारतीय कृषि में बेहतरीन योगदान दिया है। उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा अवार्ड से सम्मानित किया गया।

फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया 

प्लास्टिक कचरे की समस्या से आज समूचा विश्व जूझ रहा है। इससे मानव ही नहीं बल्कि समूचा जीव-जन्तु एवं पक्षी जगत प्रभावित है। आधुनिक समाज में प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है और यही आज प्लास्टिक मानव एवं पशुओं के शत्रु के रूप में उभर रहा है। समाज में फैले आतंकवाद से तो छुटकारा पाया जा सकता है, किंतु प्लास्टिक से छुटकारा पाना अत्यंत कठिन है, क्योंकि अपनी विविध विशेषताओं के कारण प्लास्टिक आधुनिक युग का अत्यंत महत्वपूर्ण पदार्थ बन गया है।

सबसे बड़ी चौंकाने वाली और खतरनाक बात यह है कि यह यह हमारे पर्यावरण के साथ साथ यह समुद्री नमक में भी जहर घोल रहा है। कारणवश समुद्री जीव-जन्तु, मछलियाँ और पक्षी भी इससे अपनी जान गँवाने को विवश हैं।आर्कटिक सागर के बारे में किये गए शोध, अध्ययन और चौंकाने वाले हैं। इस शोध के अनुसार 2050 में इस सागर में मछलियाँ कम होंगी और प्लास्टिक सबसे ज्यादा। आर्कटिक के बहते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है जो तरह-तरह की धाराओं के जरिये समुद्र में जमा हो रहा है। प्लास्टिक के यह छोटे-बड़े टुकड़े सागर के जल में ही नहीं पाये गए हैं बल्कि यह मछलियों के शरीर में भी बहुतायत में पाये गए हैं। यदि इस पर शीघ्र अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में स्थिति और विकराल हो जायेगी और तब उसका मुकाबला कर पाना टेड़ी खीर होगा।
इससे निजाद दिलाने में बड़े से बड़े लोग अपने हाथ खड़े कर दे रहे हैं। पर आज हम आपको महज 12 साल के एक ऐसे छात्र के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके अविष्कार को समुद्री पर्यावरण को बचाने के लिए अहम माना जा रहा है।

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इनका नाम है हाजिक काज़ी। 12 साल के हाजिक अपने ग्रह को बचाने के समर्पित मिशन पर है। पुणे स्थित इंडस इंटरनेशनल स्कूल के छात्र हाजिक काज़ी ने इस छोटी-सी उम्र में सुमद्री जीवों के बारे में शोध किया। वास्तव में वह एक अनोखे अविष्कार का विचार लेकर आया है। यदि उसे लागू किया गया तो हमारे जलीय और पारिस्थितिकी तंत्र को नया जीवन मिलेगा।हालाँकि इस छोटे-से  लड़के  का मानना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए हम इससे पहले बहुत कुछ कर सकते थे। काज़ी का मानना है कि 2050 तक समुद्र में हमारे पास समुद्र जीवों जितनी या उससे भी ज्यादा प्लास्टिक होगा। अगर हम समुद्र का सारा प्लास्टिक जमा करेंगे तो हमें उसे फेंकने के लिए चन्द्रमा जैसे दो बड़े ग्रहों की जरूरत पड़ेंगी। इसलिए काजी ने यह अविष्कार किया है।

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इस अविष्कार का नाम है एर्विस(ERVIS)। यह काजी का पहला अविष्कार हैं जो एक समुद्री जहाज जैसा है। यह समुद्र की सतह से आसानी से कचरा खींच सकता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि बड़े डिब्बे के साथ एक वैकुम क्लीनर जो कचरे को संसाधित कर, उसका अपशिष्ट एकत्र करता है।  साथ ही विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक का विश्लेषण कर उसे अलग भी कर सकता है। इससे पहले काजी ने जो अविष्कार बनाया था वह सिर्फ 7 सेकंड तक ही काम कर सका। लेकिन फिर भी काजी ने हार नहीं मानी और एक लम्बा सफर तय किया। बहुत से शोध और बार-बार के परीक्षण के बाद इस 12 वर्षीय छात्र ने 3D डिज़ाइन के साथ नया अाविष्कार किया और उसे एक मूर्त रूप दे दिया।

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आपको याद होगा जुलाई 2013 को उत्तरी निदरलैंड में एक युवा व्हेल मृत अवस्था में पायी गयी थी। उस व्हेल के पेट में असमान्य रूप से सूजन आयी हुई थी। जब उसके पेट को खोला गया तो उसमें  दो पाइप, नौ मीटर की रस्सी और 16 किलो प्लास्टिक मिली। इस प्लास्टिक की वजह से व्हेल के आंतो में अवरोध पैदा हो गया और उसकी मौत हो गयी। इससे हमें अंदाज़ मिल जाना चाहिए कि यह समस्या कितनी बड़ी है और आने वाले समय में इसे रोका नहीं गया तो हश्र क्या होगा।

कचरा जमा करने में अविष्कार के अलावा यह 12 साल हाजिक काज़ी अपशिष्ट को दूसरे मार्ग से निपटाने के तरीके की भी खोज कर रहा है। साथ ही वह उन युवाओं की सूचि में भी शामिल है जो दिसंबर में टेड-एक्स गेटवे टॉक (TED x Gateway Talk) में अपनी बात रखेगा। उम्मीद है कि काज़ी का यह अविष्कार सफल रहेगा और पूरे विश्व को उससे लाभ होगा। अन्य लोगों को भी इस छोटे से लड़के में जज्बे और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता से सीख लेने की जरूरत है।


कानून और नियम सबके लिए बराबर होने चाहिये। चाहे वह नेता हो, अभिनेता हो या देश का प्रधानमंत्री ही क्यों ना हो। लेकिन सामान्यतः ऐसा देखने को नहीं मिलता। कई बार नियमों को ताख पर रखकर नेता, मंत्रियों को वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है।। चाहे वह कोई नेता हो या अफसर, एक बार ऊंचे पदों पर जाने के बाद वह उन लोगो को ही भूल जाता है जिनके बीच से वह खुद आया है। वह खुद को खास और दूसरों को आम समझनें लगता है। इसमें दोष सिर्फ उनका नहीं है बल्कि उस सिस्टम का भी है जो उन्हें ऐसा करने को ना सिर्फ इजाजत देता है बल्कि साथ भी देता है।

पर आज हम आपको एक ऐसे आईपीएस ऑफिसर के बारे में बताने जा रहे हैं जसनें नियम के सामने एक केंद्रीय मंत्री के रसूख को भी नहीं दी तरजीह। और मंत्री के निजी वाहन को भगवान अयप्पा के मंदिर परिसर में जाने से रोका।

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इनका नाम है यतीश चंद्रा। 32 साल के यतीश एक 2011 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उनको वहां 'दंबंग' ऑफिसर के नाम से जाना जाता है। फिलहाल यतीश केरल के त्रिशूर जिले में एसपी के पद पर कार्यरत हैं। कुछ दिनों पहले भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय मंत्री राधाकृष्णन अपने काफिले के साथ सबरीमाला मंदिर जा रहे थे। पर मंत्री के निजी वाहनों के काफिले को आईपीएस यतीश चंद्र ने रोक दिया था। इस दौरान दोनों के बीच जमकर बहस हुई थी।मंत्री के निजी वाहन के प्रवेश पर रोक लगाने पर मंत्री, उनके समर्थकों और आईपीएस के बीच जमकर बहस हुई। इसका विडियो वायरल हो रहा है। इसमें दबंग आईपीएस स्पष्ट शब्दों में मंत्री को कह रहे हैं कि उनके निजी वाहन को परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

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दरअसल राधाकृष्णन विपक्षी यूडीएफ गठबंधन के विधायकों और बीजेपी सांसदों के दौरे के एक दिन बाद श्रद्धालुओं को दी जाने वाली सुविधाओं का जायजा लेने के लिए पहुंचे थे। सुविधाओं की समीक्षा के बाद मंत्री ने आईपीएस अधिकारी से पूछा कि केवल केएआरटीसी के वाहनों को ही पंबा तक आने की इजाजत क्यों दी गई है? उन्होंने निजी वाहनों की आवाजाही की इजाजत देने की भी मांग की। इसपर आईपीएस चंद्रा ने कहा कि पंबा का पार्किंग एरिया अगस्त में आई बाढ़ में बह गया था। राज्य परिवहन सेवा की बसें पंबा में नहीं रुकेंगी और वह तीर्थयात्रियों को ले कर लौट जाएंगी। लेकिन अगर नजी बसों को आने की इजाज़त दी जाएगी तो उनसे यातायात जाम होगा और श्रद्धालुओं को दिक्कत होगी।

 बाबजूद इसके मंत्री उनपर वाहन अंदर ले जाने की अनुमति देने की मांग करते रहे। इसपर आईपीएस यतीश ने कहा कि वहां पर पार्किंग की समस्या है। सरकारी वाहन वहां वीआईपी को उतारकर वापस आ जाते हैं। अगर एक निजी वाहन जाने दिया जाएगा तो अन्य लोग भी वहां जाने का प्रयास करेंगे। अगर वहां ट्रैफिक की व्यवस्था खराब होती है तो क्या आप जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?' पर मंत्री नें किसी भी तरह की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया और आईपीएस पर उनके निजी वाहन को अंदर जाने देने के लिए दबाव बनाने लगे। आईपीएस ने कहा, 'आप मुझे लिखकर दे दीजिए तो मैं आपके निजी वाहन को जाने की अनुमति दे दूंगा। बहुत दबाब के बाद भी आईपीएस चंद्रा नें नियमों के सामने मंत्री की एक नहीं चलने दी। अंत में मंत्री को सरकारी वाहन से ही मंदिर जाना पड़ा।

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आपको बता दें कि यतीश चंद्र बचपन से ही प्रतिभाशाली हैं। उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद बापू जी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में दाखिला लिया। बीटेक की डिग्री प्यूडी करने के बाद उन्हें कैंपस प्लेसमेंट में कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी में साफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर सलेक्ट कर लिया गया था। इसके बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयार शरू की और सिविल सर्विसेज परीक्षा 2010 में सफलता भी हासिल की। उन्हे देश भर में 211वां रैंक मिला था। उनकी छवि को एक दबंग पुलिस अधिकारी की थी ही। पर जाहिर है इस घटना के बाद वो हिरो बन गए हैं।

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