KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

Headquartered in New Delhi, our publishing wing is aimed at instilling hope and motivation in individuals while our community of changemakers and influencers works for a common goal - to cause change and make this a better society for all.

Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

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यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे बचपन से ही अत्यंत गरीबी का सामना करना पड़ा। आर्थिक तंगी के चलते इस शख्स ने सब्जी बेचकर व कई जगह मजदूरी करके काफी मुश्किल से रुपए जुटाए। जिंदगी में गरीबी और अभाव से ही प्रेरणा लेते हुए इस शख्स ने अपने अंदर कुछ बड़ा करने की चाह पैदा की और अपने पढ़ाई को जारी रखा। इनकी मेहनत सफल हुई और आज ये 500 करोड़ रूपये की सलाना टर्न ओवर करने वाली कंपनी के मालिक हैं।

गुजरात के अहमद नगर जिले के एक छोटे से गांव अकोला में एक बेहद ही गरीब परिवार में पैदा लिए नितिन गोडसे की कारोबारी सफ़लता बेहद प्रेरणादायक है। नितिन के पिता एक प्राइवेट कंपनी में सेल्समैन थे और उनकी मासिक आय काफी कम थी। किसी तरह घर का दाना-पानी चल रहा था।

bspdgmah3zuxrg2nhgfjuv9m5yrswt7i.jpgतीन भाई-बहन में सबसे बड़े होने की वजह से परिवार पर हो रहे आर्थिक दबाव को कम करने के लिए इन्होनें एक स्थानीय दुकान पर सेल्समैन के रूप में काम करना शुरू कर दिया। साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखा।

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, उनकी वित्तीय स्थिति ने उन्हें इंजीनियरिंग का अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी, तो अंत में उन्होंने बीएससी करने का फैसला किया और 1992 में पुणे विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। ग्रेजुएशन करने के बाद उन्हें एक कंपनी में सुपरवाइजर की नौकरी मिली।

हालांकि, कुछ दिन काम करने के बाद नितिन ने आगे के विकास के लिए एक अच्छी शिक्षा की जरूरत महसूस की। समय की एक छोटी सी अवधि में शीर्ष प्रबंधकीय पद को प्राप्त करने के उद्येश्य से उन्होंने एमबीए करने का फैसला किया। एमबीए के बाद उन्हें एक एग्रो बेस्ड कंपनी में जॉब मिली। यह कंपनी ताजी सब्जियों को साफ-सुथरे ढंग से पैक करके बाजार में बेचती थी। एक किसान परिवार से आने वाले नितिन इस तरह के व्यापार के प्रति आकर्षित हुए और अंत में ख़ुद का एक ऐसा ही कारोबार शुरू करने का निर्णय लिया।

एक दोस्त से 5 लाख रुपये उधार लेकर नितिन ने सब्जियों का बिजनेस शुरू किया।नितिन प्रतिदिन सुबह 3.30 बजे उठ जाते और सब्जियों से भरे ठेले को बाज़ार ले जाकर बेचा करते। लेकिन इस व्यवसाय से उन्हें कुछ खास लाभ नहीं प्राप्त हो सके और मजबूरन इसे बंद करना पड़ा। उसके बाद ख़ुद के पेट भरने के लिए एक गैस कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर की नौकरी करने लगे।

फिर नितिन ने तीन साल काम करके फंड इकट्ठा किया और 1996 में गैस हैंडलिंग सिस्टम, सिलेंडर ट्रॉली, गैस कैबिनेट बनाने की कंपनी शुरू की। अपने इस भावी प्रोजेक्ट को नितिन ने नाम दिया “एक्सेल गैस और उपकरण प्राइवेट लिमिटेड”।

यूँ कहे तो नाममात्र के निवेश से शुरू की गई यह कंपनी आज लगभग 500 करोड़ रुपये का सलाना टर्न ओवर कर रही है। इतना ही नहीं आज इस कंपनी में करीब 150 से ज्यादा स्थायी कर्मचारी है, जबकि बार्क, सिपला, आईआईएसआर व रिलायंस जैसी कंपनियां इनकी ग्राहक हैं।

दिल से एक किसान नितिन ने जिंदगी में तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने अंदर मानव मूल्यों और तेजी से विकास होने की एक स्थिर गति को बनाए रखा। फलस्वरूप उन्हें इतनी शानदार कामयाबी मिली। 

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यह कहानी वास्तव में एक शिक्षक की है लेकिन अतिरिक्त खर्चों से निपटने के लिए उन्होंने व्यापार का विकल्प चुना। और कारोबारी जगत में घुसते हुए इन्होंने अजंता, ऑरपेट और ओरेवा जैसी नामचीन ब्रांडों की आधारशिला रखते हुए आज की युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श बन कर खड़े हैं। एक दिन इस शख्स की पत्नी ने इन्हें ताने देते हुए कहा कि आप अपने बचे समय में कुछ कारोबार क्यूँ नहीं करते? यदि मैं पुरुष होती तो अपने भाई के साथ मिलकर कोई कारोबार करती और पूरे शहर में प्रसिद्ध हो गई होती। यह बात इनके दिमाग में खटक गई और फिर इन्होंने कारोबारी जगत में कदम रखते हुए हमेशा के लिए अपना नाम बना लिए।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं ऑरपेट, अजंता और ओरेवा जैसे ब्रांडों के निर्माता ओधावजी पटेल की सफलता के बारे में। आज शायद ही कोई घर होगा जहाँ इनके द्वारा बनाया गया सामान नहीं पहुँचा हो। ओधावजी मूल रूप से एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। किसान परिवार से आने के बावजूद इन्होंने विज्ञान में स्नातक करने के बाद बी.एड की डिग्री हासिल की। इसके बाद इन्होंने वी सी स्कूल में विज्ञान और गणित के शिक्षक के रूप में तीस साल तक काम किया। इन्हें 150 रूपये प्रति महीने की पगार मिलती थी। किसी तरह पूरे परिवार का भरण-पोषण हो पाता था। लेकिन जब इनके बच्चे बड़े हुए तो परिवार पर आर्थिक दबाव बनने शुरू हो गये।

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फिर अतिरिक्त आय के लिए इन्होंने कुछ व्यापार शुरू करने के बारे में सोचा। इनकी पत्नी ने भी इस काम के लिए इन्हें काफी प्रोत्साहित किया। काफी सोच-विचार करने के बाद इन्होंने मोरबी में एक कपड़े की दुकान खोली जो साल 1970 तक जारी रहा। इसी दौरान वर्ष 1960 के दौरान पानी की तीव्र कमी थी। यद्यपि प्रत्येक गांव में कुएं थे, लेकिन पानी खींचने के लिए एक आवश्यक तेल इंजन की आवश्यकता थी। ओधावजी ने इस क्षेत्र में बिज़नेस संभावना देखी और वसंत इंजीनियरिंग वर्क्स के बैनर तले तेल इंजन बनाने शुरू किये। इन्होंने तेल इंजन का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘जयश्री’ रखा।

यह यूनिट पांच साल तक जारी रहा। एक दिन लोगों के एक समूह ने इनके पास ट्रांजिस्टर घड़ी परियोजना से संबंधित आइडिया लेकर आए।ओधावजी को यह आइडिया अच्छा लगा और उन्होंने 1,65,000 की लागत से घड़ी बनाने के कारखाने को एक किराए के घर में 600 रुपये प्रति माह के किराए पर स्थापित किया और अजंता के रूप अपने ब्रांड की आधारशिला रखी।

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शुरुआत में कंपनी को भारी नुकसान झेलना पड़ा लेकिन ओधावजी ने हार नहीं मानी और डटे रहे। बाज़ार में लोगों ने इनके उत्पाद में विश्वास दिखाने शुरू कर दिए और देखते-ही-देखते अजंता बाज़ार की सबसे लोकप्रिय और विश्वसनीय घड़ी ब्रांड बन गई। फिर उन्होंने समय के साथ अन्य क्षेत्रों में भी पैठ ज़माने के लिए ऑरपेट और ओरेवा जैसी दो नामचीन ब्रांड की पेशकश की।

करीबन डेढ़ लाख रूपये की लागत से शुरू हुई कंपनी आज 1000 करोड़ के क्लब में शामिल है। इससे शानदार कारोबारी सफलता और क्या हो सकती।

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Nature has given us ample resources to use for our benefit and some of those precious gems are hidden as materials we often consider total waste. It takes special talent to recognize and utilize even the discarded, waste material and turn them into gold and entrepreneurs Mahima Mehra and Vijendra Shekhawat have done just that.

Starting with a loan of Rs 15,000, they chose elephant dung as their raw material and built a business whose turnover now runs into crores of rupees. Yes, you read it right. The beginning goes back to 2003 when the duo went to Jaipur where they stumbled upon hordes of fibrous dung near Jaipur’s Amber Fort. For decades people overlooked it considering total waste but they saw immense potential in it and decided to make paper out of it.

Taking one look at the products from their brand Haathi Chaap will change the way you look at dung. They make everything from notebooks, photo albums, frames, bags, gift tags, stationery to tea coasters with their price ranging from Rs 10 to Rs 500.

Unlike many businesses who first establish themselves in India and then begin exporting, Mahima started exporting their paper to Germany and did it for four years before launching her products in the Indian market. Their products have also found a market in United Kingdom. The cleaning of the dung is one of the most important processes. The dung is washed thoroughly with water in large water tanks. The water of the dung is used as fertilizers in the field, and the dung is dried up and used to manufacture paper.

Shekhawat says, “My mother went ballistic at the idea of bringing dung into the house. She claimed no one would ever marry me because of my occupation.”

Mahima preferred an eco-friendly way of living ever since she was little. This attitude helped her identify elephant dung as a useful resource. Haathi Chaap has a small team of villagers who help them with processing the dung and making paper out of it. Elephants apparently have a bad digestive system, which makes their dung highly fibrous, resulting in good quality paper.

Their products have an edge of having too much novelty which cannot be ignored and can market itself. Their initiative is green, chemical-free and gives us brilliant products.

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हर व्यक्ति की यही चाह होती है कि वो अपनी जिंदगी में ऊँचे पायदान पर पहुँचने में सफल हो। अपने स्तर से हर कोई भरपूर कोशिश करता लेकिन कुछ भाग्यशाली लोग ही जिंदगी की राह में सफल हो पाते। ऐसे लोग न सिर्फ सफल होते बल्कि इनकी सफलता औरों के लिए मिसाल बन जाती है। लेकिन सबसे खास बात यह है कि सफल होने वाले व्यक्ति में जयादातर वो होते जिन्होंने अपनी जिंदगी की राह में कभी हार नहीं माने और परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया।

आज हम ऐसे ही एक भारतीय की कहानी लेकर आए हैं जिन्हें एक वक़्त पर जॉब के लिए काफी मशक्कत का सामना करना पड़ा था लेकिन बाद में वे दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी लेने वाले अधिकारी बनें।

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दुनिया में सबसे अधिक सैलरी उठाने वाले बैंकरों में शुमार निकेश अरोरा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। गाजियाबाद में एक भारतीय वायुसेना अधिकारी के घर पैदा लिए, अरोड़ा ने साल 1989 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बीएचयू से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल किया। महज 21 वर्ष की आयु में आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने अमेरिका का रुख किया और नार्थईस्टर्न विश्वविद्यालय से सफलतापूर्वक एमबीए की पढ़ाई की। लेकिन अच्छी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद भी निकेश का शुरूआती सफ़र बिलकुल भी अच्छा नहीं था। एक साक्षात्कार में, अरोड़ा इस बात के बारे में बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें अनेकों जॉब के लिए ख़ारिज कर दिया जाता था और जिंदगी जीने के लिए उनके पास पिता द्वारा दिए 200 डॉलर ही एकमात्र सहारा था। 

साल 1992 उनके लिए अच्छा रहा और उन्हें फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स में जॉब मिल गई। यहाँ उन्होंने शीर्ष वित्त और प्रौद्योगिकी प्रबंधन पोर्टफोलियो आयोजित किए। बाद में उनके काम को देखते हुए उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया गया। कुछ वर्षों तक यहाँ काम करने के बाद उन्होंने टेलीकॉम सेक्टर में घुसने का फैसला किया और साल 2001 में टी-मोबाइल इंटरनेशनल डिवीजन के मुख्य विपणन अधिकारी के रूप में कार्य किया। 

साल 2004 में उन्होंने गूगल जॉइन किया और इसके यूरोपियन ऑपरेशंस की अगुवाई की। गूगल ज्वाइन करने का उनका इरादा बेहद क्रांतिकारी साबित हुआ और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों तक यहाँ काम करने के बाद साल 2011 में उन्हें कंपनी के चीफ बिजनस ऑफिसर के तौर पर पदोन्नति मिली और वे गूगल में सबसे ज्यादा सैलरी लेने वाले अधिकारी बन गये। अरोड़ा गूगल में काम करते हुए नए विज्ञापन बाज़ार खोलने और कंपनी के विज्ञापन राजस्व में वृद्धि को लेकर कई कदम उठाये। उन्होंने प्रदर्शन विज्ञापनों से और अधिक राजस्व प्राप्त करने और गूगल की यूट्यूब वीडियो साइट के लिए अधिक विज्ञापनदाताओं को प्राप्त करने में भी प्रमुख भूमिका निभाई।

अक्टूबर 2014 में अरोड़ा ने गूगल के वाइस चेयरमैन का पद छोड़कर सॉफ्टग्रुप को ज्वाइन कर लिया। अक्टूबर 2014 में ही अरोड़ा की अगुवाई में सॉफ्टबैंक ने स्नैपडील में 62.7 करोड़ डॉलर और ओला कैब्स में 21 करोड़ डॉलर का निवेश किया था। नवंबर 2014 में सॉफ्टबैंक ने रियल एस्टेट वेबसाइट हाउसिंग में 9 करोड़ डॉलर लगाए थे। इतना ही नहीं अगस्त-नवंबर 2015 में सॉफ्टबैंक ने अरोड़ा की कमान में डिलीवरी स्टार्टअप ग्रोफर्स में भी निवेश किया था। 

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निकेश अरोड़ा को फाइनैंशल ईयर 2015-16 में 73 करोड़ डॉलर यानी करीब 500 करोड़ रुपये का सैलरी पैकेज मिला था। इस वेतन पैकेज ने उन्हें दुनिया का तीसरा उच्चतम-भुगतान अधिकारी बना दिया था। 

जून 2016 में अरोरा ने सॉफ्टबैंक समूह से इस्तीफा दे दिया था। अरोड़ा अपनी सफलता में तीन महत्वपूर्ण कारकों को श्रेय देते हैं — भाग्य, कड़ी मेहनत और किसी भी स्थिति के अनुकूल होने की क्षमता।

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हमारे समाज में आज महिलाएं हर क्षेत्र में कामयाबी की अनोखी मिसाल पेश कर रहीं हैं। चाहे बिज़नेस का क्षेत्र हो या राजनीति का, या फिर समाजसेवा से लेकर प्रतियोगिता परीक्षा हर जगह महिलाओं ने बाज़ी मारी है।

ये कहानी एक ऐसी ही महिला व्यक्तित्व के बारे में है जिन्होंने समाज व देश के सेवा की खातिर अमेरिका में अपनी अच्छी-खासी नौकरी को अलविदा कर स्वदेश लौटने का फैसला लिया और फिर महज़ 25 साल की उम्र में सरपंच बन अपने गांव की तरक्की में दिलोजान से लगी हैं। भारत की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक, इस युवा लड़की की जीवन-यात्रा सच में बेहद प्रेरणादायक है।

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जी हाँ, हम बात कर रहें हैं मध्य प्रदेश के भोपाल में रहने वाली भक्ति शर्मा की, जिन्होने अपने गांव को विकास के हर मामले में अव्वल बना दिया है। भक्ति शर्मा देश की एक जानी-मानी सरपंच हैं, जिन्होंने युवा वर्गों के भीतर अपने देश व समाज की खातिर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा भरती हैं। राजनीति शास्त्र में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद साल 2012 में भक्ति ने अमेरिका का रुख किया। दरअसल, उसके परिवार के बहुत सारे लोग वहां रहते थे इसलिए भक्ति ने भी पढ़ाई पूरी कर सुनहरे भविष्य का सपना पाले अमेरिका के टैक्सस शहर पहुंची।

भक्ति के पिता हमेशा से चाहते थे कि भक्ति पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत में रहे और यहां रहकर समाज में महिलाओं के विकास के लिए काम करें। उनके पिता अपनी बेटी की कामयाबी विदेश में नहीं, अपने गांव में देखना चाहते थे। उन्होंने भक्ति को अनगिनत बार समझाया और अंत में काफी सोचने के बाद भक्ति को पिता की राय बेहद अच्छी लगी। साल 2013 में भक्ति अपनी अच्छी-खासी नौकरी को अलविदा कर स्वदेश लौटने का फैसला किया।

स्वदेश लौटने के बाद भक्ति अपने पिता के साथ मिलकर एक स्वंय सेवी संस्था बनाने के बारे में सोचा, जिसके माध्यम से उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों की उन महिलाओं को सहायता प्रदान की जाती, जो घरेलू हिंसा की शिकार थीं। लेकिन इसी बीच गांव में सरपंच के चुनाव की घोषणा हो गई। चुनाव में दिलचस्पी दिखाते हुए भक्ति ने अपने पिता से चुनाव लड़ने की इजाजत मांगी। घर वालों से लेकर गांव वालों तक सब ने भक्ति के फैसले का समर्थन किया।

भक्ति बतातीं है कि जब मैं चुनाव लड़ने का फैसला कर ही रही थी उसी वक्त हमारे गांव के कुछ लोगों ने कहा कि वो भी चाहते हैं कि इस बार सरपंच के चुनाव में मैं उम्मीदवारी बनूं। क्योंकि गांव वाले चाहते थे कि चुनाव को कोई पढ़ी लिखी जीते। ताकि गांव का सही विकास हो।

चुनाव परिणाम आते ही भक्ति मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 13 किलोमीटर दूर बसे बरखेड़ी गांव की पहली महिला सरपंच बनीं। चुनाव जीतने के पहले दिन से ही भक्ति में सारे रुके हुए कामों की समीक्षा की और युद्ध-स्तर पर काम शुरू कर दिया। आपको यकीन नहीं होगा दस महीने के अंदर गांव में सवा करोड़ रुपए खर्च करके नई सड़कें बनवाईं, शौचालयों का निर्माण कराया।

x96wbzptjrmyxlzgrxetvp6zarjyq3zv.jpgभक्ति अपने कार्यकाल में हर दिन कुछ न कुछ अनोखा काम करती रहीं। अगले चुनाव में इनके खिलाफ गांव की कई अन्य महिलाएं चुनाव में खड़ी हो गई, लेकिन लोगों ने एक बार फिर भक्ति को ही चुना। सरपंच पद को एक राजनितिक पद से ज्यादा एक सामाजिक जिम्मेदारी से पूर्ण पद के रूप में देखने वाली भक्ति ने ‘सरपंच मानदेय’ नाम से एक अनोखी स्कीम की शुरुआत की।

इस स्कीम के तहत उस महिला को सम्मानित किया जाता, जिसके घर बेटी पैदा होती है। इसके तहत बरखेड़ी, अब्दुल्ला पंचायत के जिस घर में लड़की पैदा होती है, उसकी मां को वे अपनी 2 महीने की तनख्वाह यानी 4 हजार रुपए देती हैं। साथ ही उस बेटी के नाम से गांव में एक पेड़ लगाया जाता है। ये कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के तहत आता है।

सड़क, शिक्षा और बिजली मुहैया कराने के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए भक्ति निरंतर प्रयासरत हैं। आने वाले समय में भक्ति पूरे गांव में मुफ्त वाई-फाई की सेवा प्रदान करना चाहतीं हैं।

देश और दुनिया से अनुभव बटोर कर एक गांव को संवारने की भक्ति की ‘भक्ति’ की जितनी तारीफ की जाए वह कम है। भक्ति की सफलता से नई पीढ़ी के युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए।

भक्ति शर्मा ने अपने गांव की दशा और दिखा को बदल कर यह साबित कर दिया कि ‘भक्ति’ में सबसे बड़ी ताकत होती है।

इन महिलाओं ने न सिर्फ सफलता हासिल की है बल्कि पुरे समाज व देश के सामने एक प्रेणादायक व्यक्तित्व के रूप में खुद को पेश किया है। जैसे किसी परिवार की तरक्की के लिए एक पढ़ी-लिखी और तेज-तर्रार महिला की आवश्यकता होती है वैसे ही किसी समाज व देश की भलाई के लिए भी ऐसी ही मजबूत महिला प्रतिनिधि की आवश्यकता होती। 

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पिता की मृत्यु के बाद इस सत्रह वर्षीय लड़के के लिए जीने का ही प्रश्न उठ खड़ा हो गया था। उनके पास केवल उनकी माता की मौजूदगी का मानसिक संबल ही था और ऊपर थी बड़ी जिम्मेदारी। दो वक्त का खाना और घर के किराये के लिए उन्हें अपने हाई स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। उनकी शुरुआत शून्य से हुई और आज उनकी कंपनी का वार्षिक टर्न-ओवर 32 करोड़ रूपये का है। आज वे बीएमडब्यू गाड़ियों में बैठते हैं और आलीशान बंगले में रहते हैं। यह उस व्यक्ति की अविश्वसनीय कहानी है जिन्होंने अपना करियर मात्र चालीस रूपये प्रति महीने की पगार से शुरू किया और अपने कभी हार न मानने वाले रवैये की वजह से धीरे-धीरे सफलता की सीढ़ी चढ़ने लगे। 

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चेन्नई के कृष्ण कुमार ने बहुत ही छोटी सी नौकरी से शुरुआत करने के बाद बहुत सारी अलग-अलग छोटी-छोटी नौकरियां भी की। उन्हें 40 रुपये महीने की तनख्वाह वाली एक पार्ट-टाइम टाइपिस्ट की नौकरी मिली पर यह उनके घर के किराये के लिए भी पर्याप्त नहीं था। उस नौकरी को उन्होंने जल्द ही छोड़ दिया। बिना कॉलेज डिग्री के उन्हें आगे का जीवन कठिन लगने लगा। अपनी माता के साथ घर चलाने के लिए उन्होंने एक अकॉउंटेंट की नौकरी की और साथ ही साथ एक हॉस्पिटल में पार्ट टाइम नौकरी भी करने लगे। 

साल 2017 में केनफ़ोलिओज़ को दिए एक साक्षात्कार के दौरान कृष्ण कुमार ने बताया था कि; “एक नौकरी में मंगलवार को छुट्टी मिलती थी और दूसरी में रविवार को। इसलिए मैं वास्तव में बिना किसी छुट्टी के हफ्ते और महीने काम करता रहता था।”

घर का खर्च उठाने के लिए वे एक लेदर एक्सपोर्ट कंपनी में 300 रुपये की तनख्वाह पर काम करने लगे और इसके साथ हॉस्पिटल में भी काम कर रहे थे। उसके बाद उन्होंने चार साल तक भारतीय रेलवे में काम किया और फिर एक कोल्ड ड्रिंक कंपनी में भी। अंत में उन्होंने ब्लू-डार्ट में 900 रूपये की तनख्वाह पर भी काम किया और यहीं से उन्हें लॉजिस्टिक बिज़नेस के गुर सीखने के मौके मिले।

कृष्ण कुमार ने कंपनी के लिए सब कुछ किया और 1990 में उन्हें नौकरी के एक साल बाद ही सेल्स मैनेजर के रूप में पदोन्नति मिल गई। शादी और बच्चों के बाद उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई। कड़ी मेहनत और बिज़नेस स्किल की बदौलत अपनी सारी पूंजी लगा कर इन्होंने अपनी खुद की कंपनी खोल ली। परन्तु उनके भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया और हर्षद मेहता स्कैम के कारण सारा मार्केट क्रैश हो गया। उनकी स्थिति और भी ख़राब हो गई। एक बार वे कॉफ़ी पीने एक रेस्टोरेंट गए, वहाँ उन्हें एक कप कॉफ़ी के लिए छह रूपये अदा करनी थी। और उनके पास देने के लिए सिर्फ पांच ही रूपये थे। असफलताओं के एक के बाद एक झटकों के बावजूद भी उन्होंने अपने जज़्बे को टूटने नहीं दिया।

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अपने बचत के 8,000 रुपये से उन्होंने एक लॉजिस्टिक कंपनी खोली जिसका नाम एवन सोलूशन्स एंड लॉजिस्टिक प्राइवेट लिमिटेड रखा। ब्लू स्टार के एमडी ने जब कृष्ण कुमार के बारे में सुना तब उन्होंने कुमार को दो कॉन्ट्रैक्ट दिया। सिर्फ चार कर्मचारी के साथ मिलकर कुमार ने शून्य से यह बिज़नेस खड़ा किया। चेन्नई में उनका बिज़नेस चारों तरफ फ़ैल चुका था। आज उनके कर्मचारियों की संख्या 1000 से अधिक है और उनकी कंपनी का वार्षिक टर्न-ओवर लगभग 32 करोड़ रूपये का है। उनका मानना है कि ऑटोमेशन और टेक्नोलॉजी के द्वारा उनके बिज़नेस को बढ़ावा मिला है और उनकी कंपनी को प्रतिष्ठा। वे आज बीएमडब्लू में घूमते हैं, उनके पास बहुत सारी लक्ज़री कारें हैं और चेन्नई में बहुत सारे आलीशान घर भी।

बरसों पहले उनका सपना एक रूम का घर ख़रीद लेने की उपलब्धि पर जाकर ही ख़त्म हो जाता था। परन्तु अपने अथक श्रम और संघर्ष के चलते उन्होंने अपने लिए एक स्वप्न का सा वैभव पूर्ण संसार रच लिया। 

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सफलता प्राप्त करना हर किसी का सपना होता है, परन्तु असफलता के डर से लोग सीमाओं पर पहुंच कर किनारा कर लेते हैं। असफलता का डर अपने लक्ष्य तक पहुंचने के बीच में सबसे बड़ा रोड़ा होता है। यह लोगों को उनके कम्फर्ट जोन में सिमटे रह जाने का कारण बनता है और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने से रोकता है। यह समझने में कठिनाई नहीं होगी कि क्यों लोग असफलता से घबराते हैं। असफलता की कल्पना और कठिन परिश्रम लोगों को डराते हैं और इस प्रकार वे खुद को औसत दर्जे की तसल्ली के आराम में फंसा लेते हैं। परन्तु असफलता के सोपानों पर पांव रखते हुए ही सफलता की मंज़िल का रास्ता जाता है। विफलता से परिचय के बगैर जीवन में कुछ भी सार्थक हासिल नहीं किया जा सकता।

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यह एक अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन यह सच है कि सफलता पाने के लिए विफलता जरूरी होती है। यहाँ विफलता को साफ तौर पर समझने के लिए कुछ मुख्य बिंदु बताये गए हैं।

1. हम सब कभी न कभी असफल हुए हैं।

विफलता को रोका नहीं जा सकता, उस पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। असल में हमें सफलता का लक्ष्य निर्धारित करते समय असफलता के लिए मील का पत्थर सेट करने के लिए तैयार रहना चाहिए। जीवन में सफलता और असफलता दोनों साथ-साथ मौजूद होते हैं और यह हमारे लक्ष्य की दिशा में खट्टी-मीठी यात्रा का अनुभव कराते हैं। कोई भी सफलता का स्वाद तब तक नहीं चख सकता जब तक उसने कई बार विफलता का अनुभव नहीं किया हो।  

2. असफलता अपनी कमजोरियों को पहचानने में हमारी मदद करता है।

अपनी कमजोरियों को पहचान कर हमें उन पर काम करने की जरूरत होती है और उसे अपनी ताकत में बदलना होता है। हम इन बाधाओं से बचते हुए अपने लक्ष्य तक अपनी यात्रा आसान बना सकते हैं, बशर्तें हम उन्हें पहचान लें। इससे हमें और कुशलता से काम करने में मदद मिलती है। और हमें बेहतर परिणाम भी मिलते हैं।

3. असफलता हमें मजबूत बनाती है।

बार-बार असफलता का अनुभव करने से जीवन यात्रा निराशा से भर जाती है। लेकिन आशावादी और विजेता खुद को लक्ष्य के पास पहुंचना देखते हैं। क्या काम करने से हमारा वक्त और प्रयास बचेगा यह भी हमें विफलता की मदद से ही पता चल पाता है। यह कई क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए शक्तिशाली और अधिक कुशल बनाता है। अगर हमने महसूस कर लिया कि हम किन कारणों से असफल हुए हैं तो इसकी वजह से हममें परिपक्व तरीके से काम करने की क्षमता आ जाती है।

4. असफलता से अनुभव प्राप्त होता है।

अनुभव केवल बाल सफ़ेद करने से नहीं आती, यह आती है असफलता का तमगा लेने से। अनुभव से हममें परिपक्वता आती है और हमें अपनी योजना पर काम करना आसान हो जाता है। जोखिम लेने की हमारी रणनीति में सुधार होता है और हम जो काम कर रहे हैं उसमें निपुण हो जाते हैं। यह अनुभव हमें सफलता प्राप्त करने के लिए सहायक की भूमिका निभाता है और विफलता से निपटना सिखाता है।

5. विफलता हमें जोखिम लेना सिखाता है।

विफलता, सफलता की माँ होती है। यह हमारे सामने ढ़ेर सारे विकल्प खोल देता है। एक भूलभुलैया में मंजिल एक ही होती है परन्तु ढ़ेर सारे रास्ते होते हैं आप अपनी रचनात्मकता और उत्साह के द्वारा चुनौतियों को पार कर अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं। असफलता से आप एक कदम पीछे तो हो जाते हैं परन्तु उसके बाद आप एक नई रणनीति सोच कर सही रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। इसमें बुद्धि और भावनाओं का एक संतुलन होना चाहिए।

6. विफलता हमें बेहतर बनाने में मदद करता है।

सुधार की जरूरत हमें न केवल असफल होने पर जरूरी है बल्कि सफल होने के लिए भी जरूरी है। अपने लक्ष्य तक पहुंचना ही हमारा एक मात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए बल्कि अपने प्रयासों से हर कदम पर सीखने की कोशिश करनी चाहिए। विफलता साक्षात एक गुरू है वह आपके सारे इन्द्रियाँ खोल देता है और आप उन संकेतों के द्वारा कार्य करते हैं। अगर आप फोकस होते हैं तब सारे विकल्प आसानी से खुल जाते हैं।

7. विफलता नए रास्ते की खोज करने में मदद करता है।

जीवन क्षणों का एक संकलन है। आपको क्या ख़ुशी मिलेगी अगर आप एक तय रास्ते चलेंगे वो भी बिना जोखिम उठाये? किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। हमारे सामने पूरी दुनिया खुली पड़ी है और हमारी सोच की क्षितिज को विस्तार देता है। इससे हमें हमारे विषय के बारे में ज्यादा जानकारी मिलेगी और हम अपने लक्ष्य को बेहतर समझ पाएंगे।

8. विफलता खुद को पहचानने में हमारी मदद करती है।

सफलता और विफलता जीवन के सिक्के के दो पहलू हैं। अगर आप सिक्का उछालते हैं तो 50 फीसदी सम्भावना है आप जीते या हारे। जीत हमारी यात्रा एक अंत है। परन्तु विफलता हमारे सामने ढेरों संभावनाएं खोल देती है और जीवन को और बेहतर बनाने में मदद करती है। अगर आप ज्यादा बार विफल हुए हैं तब आप अपने आप को और जीवन को और बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। जीवन का अंत हमेशा जीत कर नहीं होता। बेहतर मार्ग लेने के लिए हमें अलग रास्ते पर चलना पड़ेगा।

9. विफलता हमारी सोच को ज्यादा सूक्ष्म बनाता है।

जब हमारा सामना विफलता से होता है तो वह हमारी पूरी दुनिया ही हिला कर रख देता है। परन्तु अगर बार-बार विफलता का दोहराव हो रहा है तब यह आपका शिक्षक बन जाता है और आपको बेहतर रास्ता चुनने की सीख देता है। जीतने वाले को भी विफलता स्वीकार करने में वक्त लगता है। अफ्रीकन कहावत है “शांत समुद्र में खेवते रहने से कभी नाविक कुशल नहीं बन सकता।” विफलता एक बाध्यता है जब जीतने से यात्रा का अंत हो जाता है तो क्यों न असफल होकर नयी तकनीक और रणनीतियों के साथ आप एक और नए यात्रा की शुरुआत करना पसंद करेंगे!

10. सफलता बहुत जल्दी झूठा आत्मविश्वास देती है।

क्यों यह कहा जाता है कि कुछ लोग सफलता को ठीक से हैंडल नहीं कर पाते? उत्तर यही हो सकता है कि उन्होंने बहुत जल्द ही सफलता का स्वाद चख लिया हो। आत्मविश्वास और अति आत्मविश्वास के बीच एक बारीक़ रेखा होती है। आकाश में ऊँची उड़ान में होने के बाद ज़मीन पर पांव ठिकाना भी सीखना होता है। इस रवैये से गलत विश्वास से बचा जा सकता है और विजेता को हमेशा अपने यात्रा में आगे बढ़ना सिखाता है।

11. विफलता हमें सफलता का आनंद लेना सिखाता है।

विफलता हमें जीवन का अंधेरा पक्ष भी दिखाती है। जब बिजली चली जाती है तब हम टॉर्च या लैंप जलाते हैं। उसी तरह जब जीवन में हम बार-बार विफल होते हैं तब हमें सफलता के स्वाद का लालच रहता है। और तब हम पसीने की एक-एक बूँद सफलता की उपलब्धि में निवेश करते हैं। हमें पता चलता है कि सफलता हमें कठिन परिश्रम से मिलती है। जैसे पूरे दिन भूखा रहने के बाद खाली पेट में भोजन का पहला निवाला।

सैमुअल बेकेट के शब्दों में “कभी कोशिश की, कभी नाकामयाब हुए, कोई बात नहीं; फिर कोशिश करें, फिर असफल भले हों पर यह असफलता पहले से अलग और बेहतर ज़रूर होनी चाहिए !“

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“If you have an idea, run with it. Don’t think twice, just go with it like I did,” says a very successful woman to all those who are looking to start their own business. Meet Barbara Bradley and Patricia R. Miller, founders of Vera Bradley, a popular American luggage and handbag design company. 

Barbara and Patricia are one of America’s most successful self-made women, according to Forbes. Their success story of superhit brand Vera Bradley comes with interesting back stories and the most unexpected beginning.

In 1982, Barbara Bradley Baekgaard and her close friend and neighbour Patricia Miller were catching a flight from Atlanta. At the airport, they noticed how uninteresting women’s travel bags looked. Both were disappointed at the lack of feminine-looking luggage at airports and that’s where they decided to create their own range.

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Stay-at-home mothers Barbara and Patricia did not have money to fund their company so they borrowed $250 (Rs 16,000 now) each from their husbands and bought some floral, quilted cotton fabric to make the colourful bags. The duo started working at Barbara’s basement. After a few days, they had put an ad in the newspaper for people who wanted to take up sewing work from their homes. They would cut fabric out on a Ping-Pong table, put it with a zipper and other elements in a bag, and pass it on to the women who would take them home to sew.

Barbara’s mother, who was a former model, was a major source of inspiration for these ladies so, they decided to name the company Vera Bradley after her.

There was a time when the duo needed funds to take their work forward. A friend who believed in the idea gave them a check for $2,500 (Rs 1.6 lakh). He said if they were successful, it was a loan. If they weren’t, it was a gift. That check was a huge help for them. In the first year, they sold products for $10,000 (Rs 6.44 lakh), and by the end of third year, they did $1 million-revenue.

In 1984, they rented a space for their sewing work so they could concentrate on marketing and sales. Initially, they didn’t know how to price things or do cost analysis. So the duo got in touch with SCORE (Service Corp of Retired Executives), a non-profit that provides free business mentoring to entrepreneurs, and a volunteer was assigned to help them. They started calling up stores, showing their bags, causing their sales to skyrocket.

Barbara and Patricia opened their first retail store in 2007. Their customers range from 8 years to 80 years of age. They launched a huge range of baby bags, student backpacks, and accessories. Inspired by English and French designs, according to the designers, the designs were created keeping in mind the American taste.

The business grew with the help of their friends and family. Barbara still remembers what her father said to her that, “In business, you sell yourself first, your company second, and the product third. Business is all about forming relationships and having a company that reflects your values.”

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In the early 1990s, the duo lost a dear friend to breast cancer. Barbara and co-founder Patricia then established the Vera Bradley Foundation For Breast Cancer, which has donated more than $10 million to the Indiana University Cancer Centre.

From stay-at-home mothers to founders of a brand that does annual sales over $550 million, Barbara Bradley and Patricia Miller have become one of the notable people in the American fashion industry. Their friendship has always been the cornerstone of the success of Vera Bradley. Today, the label is known for colourful prints and high-quilted cotton bags. The brand has become one of the favourites among various other American brands. Recently the brand had expanded their product offerings from just handbags to clothing, fragrance, jewellery, eyewear.

Started with a ping pong table as a work space and a bright idea in 1982 is now a global success. The journey of Barbara and Patricia is truly inspirational.

कहते हैं कि अगर व्यक्ति सच्चे मन से कुछ भी करने की ठान ले तो दुनिया की कोई भी ताकत उसे अपनी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। आज हम एक ऐसे ही सफल व्यक्ति की कहानी लेकर आए हैं जिन्होंने देश के एक ऐसे राज्य से शुरुआत कर पूरी दुनिया में अपनी कामयाबी का डंका बजाया, जहाँ उस दौर में शिक्षा जैसी कई मूलभूत व्यवस्थाओं का अभाव था। एक किसान परिवार में जन्में इस व्यक्ति ने बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना देखा था लेकिन गरीबी और अभावों की वजह से इन्हें अपने सपने का त्याग करना पड़ा। पटना में एक छोटे से दवाई की दुकान से शुरुआत कर 30 से ज्यादा देशों में अपना कारोबार फैलाते हुए इस व्यक्ति की गिनती देश के दिग्गज उद्योगपति के रुप में हमेशा के लिए अमर हो गयी। 

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संप्रदा सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी सफलता पीढ़ी-दर-पीढ़ी लिए प्रेरणा रहेगी। एल्केम लेबोरेटरीज नाम की एक बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी की आधारशिला रखने वाले संप्रदा सिंह की गिनती देश के सबसे प्रभावशाली फार्मास्युटिकल उद्यमी के रूप में होती है। हममें से ज्यादातर लोग उन्हें भले ही नहीं जानते होंगे लेकिन आपकी जानकारी के लिए बताना चाहते हैं कि इनके अभूतपूर्व सफलता की खातिर इन्हें फार्मा उद्योग के आॅस्कर के समकक्ष एक्सप्रेस फार्मा एक्सीलेंस अवाॅर्ड से भी नवाजा गया है।

बिहार के जहांनाबाद जिले के छोटे से गांव ओकरी के एक किसान परिवार में जन्मे संप्रदा सिंह डाॅक्टर बनना चाहते थे। घर की आर्थिक हालात दयनीय होने के बावजूद पिता ने तैयारी करने के लिए इन्हें पटना भेजा। काफी मेहनत करने के बाद भी प्रवेश परीक्षा में इन्हें सफलता नहीं मिल पाई। जब यहाँ निराशा हाथ लगी तो इन्होंने रोजगार के अवसर तलाशने शुरू कर दिए। इसी कड़ी में उन्होंने साल 1953 में पटना में एक छोटे से दवा दुकान की शुरुआत की। महज कुछ हज़ार रुपये से शुरू कर उन्होंने मेहनत व मिलनसारिता से कुछ ही वर्षों में अच्छी कमाई कर ली। साल 1960 में उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करने के उद्देश्य से “मगध फार्मा” नाम से एक फार्मास्युटिकल्स डिस्ट्रिब्यूशन फर्म की शुरुआत की। जल्द ही वे कई बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूटर बन गए। 

लेकिन हमेशा ऊँची सोच रखने वाले संप्रदा सिंह ने सोचा कि जब शून्य से शुरुआत कर एक सफल डिस्ट्रिब्यूशन फर्म बनाई जा सकती है तो फिर क्यों न हम अपनी ही एक फार्मा ब्रांड बाजार में उतारें। इसी सोच के साथ एक दवा निर्माता बनने का संकल्प लेकर उन्होंने मुंबई का रुख किया। मुंबई पहुँच साल 1973 में उन्होंने ‘एल्केम लेबोरेटरीज’ नाम से खुद की दवा बनाने वाली कंपनी खोली। शुरूआती पूंजी कम होने की वजह से प्रारंभिक पांच साल उन्हें बेहद संघर्ष करना पड़ा। साल 1989 में टर्निंग पाइंट आया, जब एल्केम लैब ने एक एंटी बायोटिक कंफोटेक्सिम का जेनेरिक वर्जन टैक्सिम बनाने में सफलता हासिल की।

दरअसल इसकी इन्वेंटर कंपनी मेरिओन रूसेल (अब सेनोफी एवेंटिस) ने एल्केम को बहुत छोटा प्रतिस्पर्धी मानकर गंभीरता से नहीं लिया था। फ्रेंच बहुराष्ट्रीय कंपनी से यह सबसे बड़ी चूक हुई और किफायती मूल्य के कारण टैक्सिम ने मार्केट में वर्चस्व कायम कर लिया। इस वर्चस्व ने फार्मा क्षेत्र में एल्केम लेबोरेटरीज को एक नई पहचान दिलाई।

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एल्केम लेबोरेटरीज आज फार्मास्युटिकल्स और न्यूट्रास्युटिकल्स बनाती है। 30 देशों में अपने कारोबार का विस्तार करते हुए आज विश्व के फार्मा सेक्टर में इसकी पहचान है। साल 2017 में फोर्ब्स इंडिया ने 100 टॉप भारतीय धनकुबेरों की सूची में संप्रदा सिंह को 52वां क्रम प्रदान किया था। इतना ही नहीं 2.8 बिलियन डाॅलर (करीबन ₹19,000 करोड़) निजी संपदा के धनी संप्रदा सिंह यह दर्जा हासिल करने वाले पहले बिहारी उद्यमी हैं।

साल 2019 में सम्प्रदा सिंह हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उन्होंने सफलता का जो साम्राज्य फैलाया वह वाक़ई में प्रेरणा से भरे हैं। वर्तमान में अल्केम की बागडोर उनके भाई और बेटे के हाथों में है। 

संप्रदा सिंह की सफलता से यह सीख मिलती है कि जज़्बे के सामने उम्र को भी झुकना पड़ता है। यदि दृढ़-इच्छाशक्ति और मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ें तो सफलता एक-न-एक दिन अवश्य दस्तक देगी।

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राष्ट्रकवि दिनकर की एक प्रसिद्ध पंक्ति है ‘मानव जब जोड़ लगाता है पत्थर पानी बन जाता है।’ कहीं ना कहीं इस पंक्ति को चरितार्थ कर दिखाया है महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव के रहने वाले इस चूड़ी बेचनेवाले बालक ने। 10 साल की उम्र तक मां के साथ चूड़ी बेचने वाले इस बच्चे ने वाकई कमाल कर दिखाया। आज इस बालक की पहचान देश के एक शीर्ष IAS अधिकारी के रूप में है लेकिन इनके यहाँ तक पहुँचने का सफ़र संघर्षों से भरा है।

माँ-बेटे पूरे दिन चूड़ियाँ बेचते, जो कमाई होती उसे पिता शराब में उड़ा देते। दो जून की रोटी के लिए ललायित इस बालक ने अपना संघर्ष जारी रखा।

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महाराष्ट्र के सोलापुर जिला के वारसी तहसील स्थित एक छोटे से गांव महागांव में जन्मे रमेश घोलप आज भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक जाना-माना चेहरा हैं। रमेश का बचपन अभावों और संघर्षों में बीता। दो जून की रोटी के लिए माँ-बेटे दिनभर चूड़ी बेचते लेकिन इससे जो पैसे इकट्ठे होते उससे इनके पिता शराब पी जाते। पिता की एक छोटी सी साइकिल रिपेयर की दूकान थी, मुश्किल से एक समय का खाना मिल पाता था। न खाने के लिए खाना, न रहने के लिए घर और न पढ़ने के लिए पैसे, इससे अधिक संघर्ष की और क्या दास्तान हो सकती? 

रमेश अपने माँ संग मौसी के इंदिरा आवास में ही रहते थे। संघर्ष का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। मैट्रिक परीक्षा से एक माह पूर्व उनके पिता का निधन हो गया। इस सदमे ने रमेश को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया, लेकिन हार ना मानते हुए इन हालातों में भी उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा दी और 88.50% अंक हासिल किया। माँ ने भी बेटे की पढ़ाई को जारी रखने के लिए सरकारी ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के उद्देश से 18 हज़ार रुपये ऋण लिया। 

माँ से कुछ पैसे लेकर रमेश IAS बनने के सपने संजोए पुणे पहुंचे। यहाँ उन्होंने कड़ी मेहनत शुरू की। दिन-भर काम करते, उससे पैसे जुटाते और फिर रात-भर पढ़ाई करते। पैसे जुटाने के लिए वो दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं, दुकानों का प्रचार, शादी की पेंटिंग इत्यादि किया करते। पहले प्रयास में उन्हें बिफलता हाथ लगी, पर वे डटे रहे। साल 2011 में पुन: यूपीएससी की परीक्षा दी और 287वां स्थान प्राप्त किये। इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सर्विस की परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त किया। 

उन्होंने प्रतिज्ञा की थी वो गांव तभी जायेंगे जब उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफलता मिलेगी।

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4 मई 2012 को अफसर बनकर पहली बार जब उन्होंने उन्ही गलियों में कदम रखा जहाँ कभी चूड़ियाँ बेचा करते थे, गांववासियों ने उनका जोरदार स्वागत किया। पिछले साल उन्होंने सफलतापूर्वक अपना प्रशिक्षण एसडीओ बेरमो के रूप में प्राप्त किया। हाल ही में उनकी नियुक्ति झारखण्ड के ऊर्जा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में हुई है।

रमेश अपने बुरे वक्तों को याद करते हुए बताते हैं कि जब कभी भी आज वो किसी निःसहाय की मदद करते तो उन्हें अपनी माँ के उस स्थिति की याद आती जब वो अपने पेंशन के लिए अधिकारीयों के दरवाज़े पर गिरगिराती रहती। अपने बुरे वक़्तों को कभी ना भूलते हुए रमेश हमेशा जरूरतमंदों की सेवा में तत्पर रहते। इतना ही नहीं रमेश अबतक 300 से ज्यादा सेमीनार कर युवाओं को प्रशासनिक परीक्षाओं में सफल होने के टिप्स भी दे चुके हैं।

रमेश की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक मज़बूत प्रेरणा बन सकती है जो सिविल सर्विसेज में भर्ती होकर देश और समाज की सेवा करना चाहते हैं।

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बॉलीवुड की चमक-दमक से भरी दुनियाँ में वही पहुंच पाते हैं जिनके या तो माता-पिता फ़िल्मी स्टार हों या वे जो बहुत ही संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते और या फिर वे जिनमें विलक्षण प्रतिभा होती है। किन्तु केवल प्रतिभा के बल पर यहाँ का सफर काफी लम्बा होता है। बिहार के एक छोटे से गाँव में जब एक 17 वर्ष का लड़का चिलचिलाती धूप में खेतों में काम किया करता था तो उसके जेहन में एक ही सपना था कि किसी दिन वह अपने आप को फिल्मी परदे पर देखेगा।

आज वह लड़का भारतीय फिल्म-जगत का एक जाना-माना चेहरा है। उन्होंने अपने अभिनय और संवाद अदायगी से फिल्म “गैंग्स ऑफ वासेपुर” में एक निर्दयी चरित्र की भूमिका में, “निल बट्टे सन्नाटा” में एक कठोर प्रिंसिपल व गणित के अध्यापक की भूमिका में, “फुकरे” में पंडितजी की भूमिका में एवं अन्य कई किरदार में करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बनाया। जी हाँ, यह शख्स और कोई नहीं बल्कि हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अदाकारों में से एक हैं पंकज त्रिपाठी

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मुंबई एक ऐसा शहर है जहाँ रोज़ बॉलीवुड में कितने ही सपने बनते और बिगड़ते रहते हैं। देश के हर कोने से लोग यहाँ किस्मत आज़माने चले आते हैं। जो अपने सपनों का पीछा जुनून के साथ करते हैं और असाधारण काम करते हैं; केवल वही यहाँ टिक पाते हैं। पंकज त्रिपाठी ऐसे ही व्यक्ति हैं जिन्होंने इस इंडस्ट्री में अपनी छाप छोड़ी है।

बिहार के गोपालगंज के एक छोटे से गांव बेलसंड में एक साधारण किसान परिवार में जन्में पंकज त्रिपाठी का बचपन बिना किसी चमक-दमक और बेहद ही साधारण माहौल में बीता। दसवीं कक्षा तक उन्हें फिल्मों के बारे में कुछ भी नहीं पता था। उनके गांव से 20 किलोमीटर दूर सिनेमा घर था। ग्यारहवीं में आते-आते वे खेतों में अपने पिता का हाथ बंटाने शुरू कर दिए।

गांव में मनोरंजन के लिए केवल त्यौहारों के समय कुछ नाटक हुआ करते थे। बचपन में पंकज ने छठ पूजा के समय लड़की बनकर नाटक में भाग लिया करते और उन्हें वाहवाही मिला करती थी। वे अभिनय करना पसंद करते थे और लोगों की प्रशंसा से उन्हें बेहद प्यार था।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मेडिकल की पढ़ाई के लिए पटना आ गए किन्तु उन्हें इस इसमें बिलकुल भी रूचि नहीं थी। अपने माता-पिता के दबाव में उन्होंने कुछ महीने होटल मैनेजमेंट का कोर्स करते हुए पटना में बिताये। आलू, प्याज और अंडे छीलने के साथ-साथ उन्होंने थिएटर करना शुरू कर दिया। जब उन्होंने यह तय कर लिया कि उन्हें अभिनय ही करना है तब उन्होंने साहस इकट्ठी कर अपने माता-पिता को यह बात बताई। पिता ने केवल इतना पूछा कि क्या इससे उसका गुज़ारा हो जायेगा।

पिता को आश्वस्त कर अपने सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया। यहाँ उन्होंने अभिनय से संबंधित चीजों के तकनीकी पहलुओं को सीखा। एक समय ऐसा आया कि इन्हें लगा कि इनका सपना टूट जायेगा क्योंकि वे अंग्रेजी में बात कर सकने में असमर्थ थे और आसपास सारे लोग बहुत अच्छी अंग्रेजी बोल लेते थे। हालांकि, उनके अभिनय कौशल की अत्यधिक सराहना की गई और उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहन मिला। पंकज का हमेशा से यह मानना है कि स्थिरता और कड़ी मेहनत के साथ हर चुनौती को पार किया जा सकता है। 

पंकज जब पटना में थिएटर कर रहे थे, तो उन्होंने अपना खर्च उठाने के लिए होटल मोर्या में रसोई पर्यवेक्षक की नौकरी की थी। वो याद करते हैं कि होटल मैनेजर अक्सर उन्हें लापरवाह होने के लिए डांटते थे। होटल छोड़ने से पहले पंकज ने मैनेजर से कहा था कि एक दिन वह इस होटल में अतिथि के रूप में आएंगे और सब उनकी मेहमान नवाजी करेंगे, जो कुछ साल बाद एक वास्तविकता बन गई।

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पंकज ने गैंग्स ऑफ वासेपुर, मांझी, रन, नील बट्टे सन्नाटा, ओमकारा, मसान, फुकरे, गुंडे और अनारकली आरावाली जैसी कई प्रशंसित फिल्मों में काम किया है और आज बॉलीवुड के जाने-पहचाने चेहरे बन गए हैं। उनका अभिनय वास्तविकता के इतना क़रीब और इतना स्वाभाविक होता है कि उन्हें उनके नाम से न पहचानने वाला दर्शक भी उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक हो जाता है।

पंकज अपने परिवार के और शायद पूरे इलाके के ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अभिनय को अपना करियर बनाया और वास्तव में उनका संघर्ष बहुत लंबा रहा है। वे छोटे-छोटे रोल करते हुए आगे बढ़े और अपने अभिनय की छाप दर्शकों पर छोड़ते रहे और आज बॉलीवुड के सफलतम कलाकारों के बीच अपने आप को स्थापित किया है। आपकी जड़ें आपको आपकी ज़मीन से बाँध नहीं रखतीं, सिर्फ जोड़े रखती है। और आप दूरियों के परे कहीं पर अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ सकते हैं; बशर्तें आप में, आप जो चाहते हैं, उसके लिए जुनून और स्वयं पर अटूट विश्वास हो। पंकज त्रिपाठी इसके जीते-जागते उदाहरण हैं।

पंकज त्रिपाठी की इस अद्भुत यात्रा को शेयर अवश्य करें और हर किसी को अपने जुनून के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। 

 

Swimming against the current makes you stand out from the crowd. When everyone is treading cautiously it takes extraordinary belief in self to be experimenting and taking leaps. Such madness finds it’s way in Raunak Chandak who is distributing organic milk to lakhs of people.

Born in Kolkata and brought up in the steel city of Durgapur, Raunak chose to study mechanical engineering from Bangalore Institute of Technology after school.

Ever since his college days, Raunak was motivated to start his own business. He was inspired by potential of a small idea that came from a sentence in one of his engineering books that said, “Cryogenic treatment of steel is a sub-zero treatment where in the wear life of steel increases to extent of even double. Increase in life if HSS (High Speed Steel) tools in some cases are even 300 percent.”

Raunak ventured in the field of cryogenic treatment of cutting tools, a process that involves sub-zero processing of metals to enhance properties. He started this endeavour right after college taking that one line as his inspiration.

The concept was a new one in India as this technology was being used only in places like IISC, Bangalore, on a laboratory scale but doing it commercially was a challenge. He thought that if he could make the tooling used by his customers perform better, they would save a lot of money; a business potential right there!

Raunak formed his company Sintlcryos in 2009 at an age of 24 in Durgapur, West Bengal, and started chasing his dream. But soon, he found out that putting forward a new concept in the manufacturing industry was not easy. Initial setup for the cryogenic processing was a difficult prospect and getting people to believe in the technology was even harder. The cost and risk involved were too high and there was no consultancy available readily. But he did not lose hope.

With the help of Prof SK Sarangi of IIT Kharagpur, and financial help of Rs 5 lakh from his businessman father, Raunak built his first cryo-processing unit. Gradually, he started getting a few clients. But problems kept coming up one after another as there was no defined way to go about this business. Things were so unruly that at one point he decided to let go of his dreams and join his family business. His morale was down as people in the Industry were not ready to innovate. However, luck took a turn when his company and concept got featured on NDTV profit channel on the show “IBM Presents Smarter Enterprise.”

This gave him a boost to him and his company and propelled him to make a tie up with a USA company (300 Below Inc.) which is the number one company in the world in the field of cryogenic treatment of metals. With new enthusiasm and technology support business started flowing in. Many automotive companies are now his clients and his business is growing day by day.

In 2015, inspired by PM’s white revolution he also invested in the dairy business with three friends (Aloke Garodia, Anil Khemka, and Apurva Jalan) and their milk brand Masst Milk, which is now one of the fastest growing dairy brands in West Bengal.

Consolidated turnover of all his businesses today is more than Rs 35 crores and his businesses employ more than 80 people directly and indirectly.

For him hard work has no substitute and dreaming is the most important thing to succeed as an entrepreneur. Never say die attitude and crisis management are the real weapons of an entrepreneur. Ups and downs are a part of an entrepreneur’s journey. The thrill to win is the biggest addiction. He believes it is most important to stay grounded and focus on your work.

 

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