KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

Headquartered in New Delhi, our publishing wing is aimed at instilling hope and motivation in individuals while our community of changemakers and influencers works for a common goal - to cause change and make this a better society for all.

Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

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कहते हैं अगर हौसले बुलंद हो तो शारीरिक विकलांगता भी आपके लक्ष्य के आड़े नहीं आती। बुलंद हौसले के सामने शारीरिक कमियों को नतमस्तक होना ही पड़ता है। हर किसी जिन्दगी में पग-पग पर बाधाएं हैं, संकट है। कोई मानसिक तो कोई शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं है। कोई देख नहीं पाते तो कोई बैसाखियों के सहारे जिन्दगी काटते हैं। शारीरिक विकलांगता के बावजूद हौसला, उमंग और कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें विशेष की श्रेणी में पहुंचा देता है। विकलांगता अभिशाप नहीं है। बशर्ते इंसान शारीरिक विकलांगता को मानसिक विकलांगता में परिवर्तित ना कर दे। क्योंकि शारीरिक रूप से अपंग व्यक्ति चाहे तो सबकुछ कर सकता है पर मानसिक रूप से अपंग व्यक्ति अपनी कमी को लेकर ही कुंठित होते रहता है और कभी विकास नहीं कर पाता।

  आज हम एक ऐसे शख्स की बात करने जा रहे है जिन्होनें दृष्टिहीन होने के वाबजूद अपनी विकलांगता के कारण कभी हार नहीं मानी| अपनें सपनों के प्रति उनकी ईमानदारी इतनी सच्ची थी कि दृष्टिहीनता को उन्होंनें अपनें सपनों पर कभी हावी ही नहीं  होने दिया और राजस्थान के पहले दृष्टिहीन न्यायाधीश बनकर सबको चौका दिया।।

इनका नाम है ब्रह्मानंद शर्मा। 31 वर्षीय ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोट्रास गांव के रहनें वाले हैं। ब्रह्मानंद नें अपनें जज बननें के सपनें को कठिन मेहनत और लगन से हासिल किया है। ब्रह्मानंद राजस्थान के अजमेर जिले के सरवर शहर में सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हैं। पर ब्रह्मानंद अन्य न्यायधीशों से अलग है। उनकी आँखों में रौशनी नहीं है, वे देख नहीं सकते। दरअसल 22 वर्ष की उम्र में ही ग्लेकोमा नामक बीमारी की वजह से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। आंखों की रोशनी जाने के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को बरकरार रखा और जज के पद पर नियुक्त हुए।

ब्रह्मानंद राजस्थान के पहले नेत्रहीन जज हैं, पर यह मुकाम हासिल हासिल करने के लिए उन्हें कई दिक्कतों को सामना करना पड़ा। ब्रह्मानंद ग्रामीण परिवेश से आते हैं। ब्रह्मानंद ने सरकारी स्कूल से शिक्षा ग्रहण की है। उनके परिवार में कोई जज तो दूर आजतक कोई वकील भी नहीं बना था। ब्रह्मानंद के पिताजी सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। ब्रह्मानंद बचपन से ही जज बनने का सपना संजोये हुए थे पर परिवार की आर्थिक हालात खराब होने के कारण उन्हें जो नौकरी पहले मिली उन्होंने कर ली। 1996 में ब्रह्मानंद को भीलवाड़ा में सार्वजनिक निर्माण विभाग के दफ्तर में एलडीसी के पद के नौकरी लगी। उनकी इक्षा ना होने के बावजूद उन्होंने यह नौकरी की। दफ्तर में सभी उन्हें हीनता से देखते थे। बस तभी ब्रह्मानंद नें ऊंचा पद हासिल करने की ठानी ली थी। उसके बाद वे जज बनने के अपनें सपनों में लग गए। पारिवारिक जिम्मेंवारी के कारण वे नौकरी नहीं छोड़ सकते थे। उन्होनें नौकरी के साथ ही आरजेएस (राजस्थान जुडिशल सर्विस) परीक्षा की तैयारी शुरू की।

वर्ष 2008 में उन्होनें पहली बार आरजेएस की परीक्षा दी पर उन्हें सफलता नहीं मिली। वाबजूद इसके ब्रह्मानंद नें हौसला नहीं हारा। परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होनें कोचिंग सेंटरों जॉइन करनें का सोच पर कोचिंग सेंटरों वालों ने उनका दाखिला लेनें से मना कर दिया। उसके बाद उन्होनें खुद से आरजेएस के परीक्षा की तैयारी की ठानी।
जज बनने की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उनकी पत्नी और उनके भतीजे नें उनकी खूब मदद की। परीक्षा की तैयारी के लिए वे दिनभर पत्नी और भतीजे की आवाज में किताबों को रिकॉर्ड करवाते और पूरी रात सुन कर याद करते थे। उन्होंने यह रिकॉर्डिंग अक्सर सुनने के लिए एक आदत बना ली थी। उनकी कड़ी मेहनत का फल उन्होंने 2013 में मिली जब उन्होंने राजस्थान ज्यूडिशियल सर्विसेज (आरजेएस) की परीक्षा में 83वां रैंक हासिल किया।

20 नवंबर 2013 को आरजेएस में चयनित 114 में से 112 अभ्यर्थियों को तो नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी। पर ब्रह्मानंद की नियुक्ति दृष्टिहीन होने के कारण अटक गई थी। जब ये मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इनकी नियुक्ति की सिफारिश की। इसके बाद ब्रह्मानंद देश के पहले नेत्रहीन जज बन गए। 1 साल की ट्रेनिंग के बाद जनवरी 2016 में उन्हें चित्तौड़गढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में पदभार दिया गया। और हाल ही में उनका स्थानांतरित सरवर किया गया।

उनके सुनने की शक्ति इतनी तेज है कि वो किसी भी वकील को उनकी आवाज से पहचान लेते हैं। कोर्ट में हर रोज सैकड़ों वकील आते हैं पर ब्रह्मानंद कभी धोखा नहीं खाते। वे केस की मेरिट और सबूतों के आधार पर ही फैसला देते हैं। वे हर पक्ष की बातों को सुनते हैं। इसके लिए वह एक ई-स्पीक डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं जो कि किसी भी नोट्स को पढ़कर सुनाती है। जब भी कोई वकील उनकी कोर्ट में आता है तो वे उनसे उनकी शिकायत और दस्तावेजों को पढ़ने को कहते हैं।

ब्रह्मानंद की कहानी सच में बहुत प्रेरणादायक है। कई बार हम छोटी-छोटी चीजों की वजह से खुद को हार हुआ महसूस करते हैं। पर ब्रह्मानंद के जज़्बे से हमें सीख लेने की जरूरत हैं, जिन्होनें इतनी विकट परिस्थितियों के बावजूफ कभी हार नहीं मानी। ब्रह्मानंद के इस जज्बे को केन्फोलिओस सलाम करता है।

देखन में छोटन लगे, लेकिन घाव करे गंभीर। अर्थात जरूरी नहीं जो चीज़ हमें दिखने में छोटी लगे वो असर भी कम करे। कभी कभी छोटे दिखने वाले लोग बड़े-बड़े कारनामे कर जाते हैं। किसी भी इंसान की काबिलियत हम उसके रंग-रूप और कद-काठी से नहीं आँक सकते। काबिलियत के आगे छोटा कद कभी कोई बाधा नहीं बन सकता। अगर हौसला बुलंद हो तो कोई भी मंजिल बहुत दूर नहीं होती। हमारी पर्सनालिटी को देख कर कोई हमसे पल भर के लिए तो प्रभावित हो सकता है पर हम अपने हुनर के दम पर किसी को हमेशा के लिये अपना मुरीद बना सकते हैं।

जरा सोचिए कोई इंसान कद में चाहे कितना भी छोटा हो पर ओहदे में बड़ा हो तो हर कोई उसे सलाम करता है।

आज हम एक ऐसी ही सख्शियत के बारे नें बात करने जा रहे हैं जिनके लिए छोटा कद कभी बाधक नहीं बना। और आज वे सफलता के झंडे गाड़ रही हैं।

इनका नाम है आरती डोगर। आरती राजस्थान कैडर की आईएएस अधिकारी है। आरती मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली हैं। उनका जन्म उत्तराखंड के देहरादून में हुआ था।

आरती 2006 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। उनका कद तो मात्र तीन फुट छह इंच का है पर उन्होंने अपने कार्यकाल में बड़े-बड़े काम किये हैं। हाल ही में उन्हें राजस्थान के अजमेर की नई जिलाधिकारी के तौर पर नियुक्ति मिली हैं। पहले भी वे एसडीएम अजमेर के पद पर भी पदस्थापित रही हैं। इससे पहले वे राजस्थान के बीकानेर और बूंदी जिलों में भी कलेक्टर का पदभार संभाल चुकी हैं। इसके पहले वो डिस्कॉम की मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर भी रह चुकी हैं।

बीकानेर की जिलाधिकारी के तौर पर आरती नें 'बंको बिकाणो' नामक अभियान की शुरुआत की। इसमें लोगों को खुले में शौच ना करने के लिए प्रेरित किया गया। इसके लिए प्रशासन के लोग सुुबह गांव जाकर लोगों को खुले में शौच करने से रोकते थे। गांव-गांव पक्के शौचालय बनवाए गए जिसकी मॉनीटरिंग मोबाइल सॉफ्टवेयर के जरिए की जाती थी। यह अभियान 195 ग्राम पंचायतों तक सफलता पूर्वक चलाया गया। बंको बिकाणो की सफलता के बाद आस-पास से जिलों ने भी इस पैटर्न को अपनाया। आरती डोगरा को राष्ट्रीय और राज्य स्तर के कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

आरती जोधपुर डिस्कॉम के प्रबंध निदेशक के पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला आईएएस अधिकारी रही।आरती डोगरा ने पद ग्रहण करने के बाद कहा कि जोधपुर डिस्कॉम में फिजूल खर्ची, बिजली बर्बादी पर नियंत्रण के लिए जूनियर इंजीनियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक की जिम्मेदारी तय की जाएगी। दूरदराज में जहां बिजली नहीं है वहां बिजली पहुंचाने के सभी प्रयास किये उनके द्वारा किये गए। इसके अलावा बिजली बचत को लेकर जोधपुर डिस्कॉम में एनर्जी एफिशियेंसी सर्विस लिमिटेड (ईईएसएल) द्वारा उन्होंने 3 लाख 27 हजार 819 एलईडी बल्ब का वितरण भी करवाया था। जिससे बिजली की खपत में बहुत हद तक नियंत्रित हुआ था।

उनके पिता कर्नल राजेन्द्र डोगरा सेना में अधिकारी हैं और मां कुमकुम स्कूल में प्रिसिंपल हैं। आरती के जन्म के समय डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि उनकी बच्ची सामान्य स्कूल में नहीं पढ़ पाएगी, लोग भी कह रहे थे कि बच्ची असामान्य है। पर उनके माता-पिता नें उनको सामान्य स्कूल में डाला। लोगों के कहने के वाबजूद उनके माता पिता नें किसी और बच्चे के बारे में सोच तक नहीं। उनका कहना था कि मेरी एक ही बेटी काफी है जो हमारे सपनें पूरे करेगी। आरती की स्कूलिंग देहरादून के वेल्हम गर्ल्स स्कूल में हुई थी। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए वो वापस देरहरादून चली आयीं।  यहाँ उनकी मुलाकात देहरादून की डीएम आईएएस मनीषा से हुई जिन्हीने उनकी सोच को पूरी तरह बदल किया। आरती उनके इतनी प्रेरित हुई कि उनके अंदर भी आईएएस का जुनून पैदा हो गया। उन्होंने इसके लिए जमकर मेहनत की और उम्मीद से भी बढ़कर अपने पहले ही प्रयास में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार भी पास कर लिया।

आरती नें साबित कर दिया कि दुनिया चाहे कुछ भी कहे, कुछ भी सोचे आप आने काबिलियत के दाम पर सबकी सोच बदल सकते हैं।

आपको सड़क हादसों की ना जानें कितनी ख़बरें रोजाना सुनने को मिलती होंगी। आपको भी ये आम लगता होगा पर इसके आंकड़े बहुत भयावह है। देश में हर रोज़ सिर्फ सड़क हादसे से करीब 400 से अधिक लोगों की जान चली जाती है। और इसके करीब 90 प्रतिशत जानें हेलमेट ना पहनने की वजह से होती है। आपकी एक छोटी ही लापरवाही आपकी जान तक तक ले सकती है। सरकार नें भी इसके खिलाफ बहुत सारे नियम-कानून बनाये हैं पर बावजूद इसके लोग लोग इन नियमों को तोड़ खुद की जान खतरे में डालते हैं। रोजना सड़कों पर बिना हेलमेट के दो पहिया वाहन से सफ़र करने वालों के चालन तो पुलिस काट लेती हैं पर उसके बाद भी ना लोग सुधरते हैं ना पुलिस ध्यान देती है। हर कोई बस खानापूर्ति करने में लगा है। पर एक ऐसा पुलिस कांस्टेबल भी है जो चालान तो कटता ही है पर लोगों को जागरूक करनें के लिए अपनें पैसों से हेलमेट भी बटता है।

इनका नाम है कांस्टेबल संदीप कुमार। संदीप मूल रूप से बिहार से छपरा जिले के देवपुरा गाँव के रहनें वाले हैं। संदीप अभी दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत हैं। दिल्ली आर्म्ड पुलिस की 5वीं वाहिनी में सिपाही संदीप कुमार वर्ष 2003 में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए थीं
लोग उन्हें "हेलमेट मैन" के नाम से जानते हैं। दरअसल संदीप हेलमेट के प्रति लोगो को जागरूक करनें की मुहीम चला रहे हैं। वे लोगों का चालान तो काटते ही हैं पर उसके बाद लोगों को खुद समझते हैं और हेलमेट पहनने की सलाह देते हैं। यातायात पुलिस पर अक्सर ऐसे आरोप लगते रहते हैं की वे यातायात के नियमों का ठीक से पालन नहीं करवाते और घुस लेकर लोगों को छोड़ देते हैं। वहीं दूसरी ओर संदीप पुलिस की छवि को न सिर्फ सुधार रहे हैं बल्कि सामाजिक जागरूकता लानें का काम भी कर रहे हैं।

संदीप लोगों को सिर्फ जागरूक नहीं करते बल्कि लोगों को मुफ़्त में हेलमेट भी बाटते हैं। संदीप अबतक बहुत सारे लोगों को हेलमेट बाट चुके हैं। वे किसी भी विशेष मौके खास कर भाई दूज, रक्षा बंधन आदि पर सड़कों पर निकल कर लोगों को खुद के पैसों से हेलमेट का वितरण करते हैं। यहाँ तक की वे जब कसी के फंक्शन या जन्मदिन में भी जाते हैं तो हेलमेट ही गिफ्ट करते हैं। उसके दो जुड़वाँ बच्चे यश और कीर्ति के जन्मदिवस के मौके पर उन्होंने पीतमपुरा के मधुबन चौक पर बगैर हेलमेट के बाइक पर सवार युवतियों को हेलमेट बांटे थे। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं संदीप अपनें गाँव देवपुरा में भी लोगों को हेलमेट बाट चुके हैं और जब भी जाते हैं लोगों को इसके प्रति जागरूक जरूर करते हैं।

दरअसल वर्ष 2015 में उनके गाँव का एक  परिचित 19 वर्षीय युवा रंजीत की मौत सड़क हादसे में हो गई थी। वह भी बगैर हेलमेट पहनें गाड़ी चला रहा था। इस घटना से संदीप बहुत आहत हुए थे। इसके बाद संदीप नें गाँव के हर घर में जागरूकता फैलाई और जिनके पास हेलमेट नहीं था उसे हेलमेट बाटा। संदीप का मानना है की दोपहिया चालकों की इतनी मौत का मुख्य कारण हेड इंजरी होती हैं। लोग अगर हेलमेट पहनें तो उनकी जान बच सकती है। उन्होनें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व परिवहन मंत्री को इस मामले में पत्र भी लिखा। जिसमें उन्होनें गुज़ारिश की है कि बगैर हेलमेट चालकों को चालान करनें के बजाय उन्हें हेलमेट देने भी व्यवस्था की जाये।

संदीप के ऐसी सोचा और समाज के प्रति उनका प्रेम सच में क़ाबिले तारीफ है। आज संदीप के काम को ना केवल सराहा जा रहा हैं बल्कि वे एक रोल मॉडल से रूप में आगे आये हैं।

"हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा" यानी जो शख्स हिम्मत करके किसी काम को करता है तो ऊपर वाला भी उसकी हर मदद करता है। ये पंक्ति हम बचपन से सुनते आये है और कई बार कुछ लोगो के साथ इस बात को सार्थक होते भी देखा है। दशरथ मांझी इस बात का एक सशक्त उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने हौसले और हिम्मत के बल पर 22 साल कठिन मेहनत कर, अपना पूरा जीवन खपाकर पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया।

सच ही कहा है मन के हारे हार है मन के जीते जीत अगर व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो नामुमकिन का ना हटाकर देखो वो भी मुमकिन हो जाता है कुछ ऎसे ही हौसले, हिम्मत और जूनून की दास्तां है सीताराम लोधी की।

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है जिला छतरपुर जो की एक सुखाग्रस्त जिला माना जाता है। वहां का आलम इतना विकट है कि पानी के आभाव में लोग गाँव से पलायन करने को विवश हैं। ऐसे में छतरपुर जिले के प्रतापपुर ग्राम पंचायत के छोटे से गाँव हदुआ ने रहने वाले 70 वर्षीय सीताराम लोधी ने अपने गाँव वालो को प्यास से त्रस्त देख एक संकल्प लिया कि वे अपने दम पर कुआं खोदेंगे। सीताराम के पास ना तो कोई आर्थिक सहायता थी ना ही साथ देने के लिए लोग। फिर भी बस अपने श्रमबल की बदौलत वे निकल पड़े अपनी योजना को पूरा करने के लिए। सीताराम ने अकेले ही साल 2015 में कुआँ खोदने का काम शुरू किया और साल 2017 में 33 फिट तक गहरे कुआं खोदने का काम पूरा भी कर डाला।

निःस्वार्थ भाव से लोकहित के लिए काम करने वाले सीताराम की जीवन की कहानी बड़ी ही रोचक है। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला लिया और आज तक उस फैसले पर कायम है। सीताराम हदुआ गाँव में ही अपने छोटे भाई 60 वर्षीय हलके लोधी के साथ संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए 20 एकड़ खेती की जमीन है।

आखिर सीताराम के मन में कुँआ खोदने का विचार आया कहाँ से-

इस बारे में बात करते हुए सीताराम बताते है कि " हमारे यहाँ सूखे के मौसम में पीने के लिए पानी का कोई साधन नहीं था। और ना ही हमारे पास इतने पैसे थे की कुएं या नल का इंतजाम कर सकें। इसलिए मैंने अकेले ही कुआं खोदने का फैसला किया।"

कुआं खोदना कोई आसान काम नही है इस बात को उनका परिवार अच्छे से समझता था। इसलिए परिवार वालों ने उन्हें इस काम को करने से मना भी किया। लेकिन सीताराम कुआं खोदने की प्रतिज्ञा कर चुके थे और उन्होंने किसी की बात नहीं मानी।

सीताराम के भाई हलके बताते हैं "हम कुआं खोदने के खिलाफ नहीं थे पर इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कुआं खोदने पर पानी मिलेगा भी या नहीं। एक वक्त हम सबने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।"

उसके बाद क्या था सीताराम ने अपनी खेत की जमीन पर कुआं खोदने का काम शुरू कर दिया। वे रोज तड़के सुबह कुआं खोदना को निकल जाते और अपनी प्रतिज्ञा को सफल करनें में जी जान से लगे रहते। बस वे दोपहर की धूप में कुछ देर काम बंद कर आराम करते थे। इसके बाद धूप कम होते ही वे फिर से काम पर लगते और सूरज ढलने तक लगातार फावड़ा और कुदाल चलाते रहते। यही सिलसिला 18 महीनों तक नियमित तौर पर चलत रहा। फिर एक दिन सीताराम की मेहनत रंग लाई और किस्मत ने उनका साथ दिया। उन्हें 33 फीट की गहराई पर पानी मिल ही गया।

परिवार में सभी बहुत ही खुश थे लेकिन यह खुशी कुछ ही दिनों में काफ़ूर हो गयी। सीताराम ने कुआं तो खोद दिया था, पर किसी प्रकार की आर्थिक मदद ना मिल पाने के कारण उसे पक्का नही करा पाये थे। मॉनसून में अधिक जल भराव के कारण उनके खून पसीनें से सिंचित कुआँ ढह गया। दुःख की बात यह है कि ऐसे में उन्हें कोई सरकारी सहायता भी प्राप्त नही हुई।

सीताराम कुछ निराश होकर बताते है कि " अगर उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिलती तो वे कुएं को पक्का करवा देते और उनकी मेहनत साकार हो जाती।"
वैसे तो मध्य प्रदेश की सरकार किसानों को कुआं खोदने के लिए कपिल धारा योजना के तहत 1.8  लाख रु की आर्थिक मदद देती है। पर इसके लिए बाकायदा सरकार को आवेदन देना पड़ता है।

इतना सब होने के बाद भी सीताराम के हौसले बुलन्द हैं।
वे कहते है कि " मैं अभी भी पूरी तरह फिट हूँ और सरकार अगर थोड़ी सी मदद कर दे तो फिर से कुआं खोदने की हिम्मत रखता हूँ।"
वाक़ई 70 साल की उम्र में एक नौजवान जैसे हौसले और जूनून रखने वाले सीताराम लोधी ने साबित कर दिया की नामुमकिन कुछ भी नही।

भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में आज इंसान के पास खुद के लिए वक़्त नहीं हैं। हर कोई बस पैसा,नाम, शोहरत कमानें के पीछे भाग रहा है। पर इस रेस में भागते-भागते कहीं ना कहीं हमनें अपनीं इंसानियत को ही खो दिया है। आज हम किसी जरूरतमंद को देखते हैं तो मदद करनें के वजाय मुँह फेरनें लगते हैं। कुछ लोग जो मदद करना चाहते हैं उनके पास पर्याप्त सामर्थ नहीं होता और जनके पास सामर्थ होता है वे मदद के लिए आगे नहीं आते। पर पर्याप्त साधन और सामर्थ ही सबकुछ नहीं होता, जरूरत होती हैं तो एक ईमानदार सोच और अच्छी नियत की। आज हम एक ऐसे ही व्यक्ति के बारे में आपको बतानें जा रहे हैं जिसनें दूसरों की मदद और समाज सेवा के लिए अपनी नींद तक की परवाह नहीं की।

हम बात कर रहे हैं मंजूनाथ निंगप्पा पुजारी की। मंजुनाथ कर्नाटक के बेलगाम के रहनें वाले एक साधारण ऑटो चालक हैं। वे ऑटो चला कर ही अपने पुरे परिवार का भरण पोषण करते हैं। मंजुनाथ कैब सर्विस प्रदान करनें वाली कंपनी ओला के लिए ऑटो चलते हैं। दिन में तो वे सामान्य ऑटो चालकों की तरह ऑटों चलते हैं पर रात में उनका ऑटो एक एम्बुलेंस में तब्दील हो जाता है। दरअसल मंजुनाथ जरूरतमंदों के लिए अपनें ऑटों तो एम्बुलेंस के तौर पर चलते हैं और इसके लिए कोई पैसा नहीं लेते। आमतौर पर जब बाकी ऑटो ड्राईवर अपने काम से फ्री होकर घर में आराम करते हैं, तब मंजुनाथ समाजसेवा करते हैं।

मंजुनाथ के दिमाग में यह बात तब आयी जब उनके एक परिचित की हालात गंभीर थी और उन्हें अस्पताल के जाना था। उस वक़्त कोई साधन ना मिल पाने के कारण उन्हें अस्पताल पहुचानें में 2 घंटे लग गए थे। तब मंजुनाथ में सोचा की अमीरों के लिए हर साधन मुहैया होता है पर वक़्त पड़ने पर गरीब को कोई मदद नहीं मिल पाती। पर मंजुनाथ की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी की वे एक एम्बुलेंस खरीदकर लोगों की मदद करें। तब उन्होंने अपनी माँ की मदद लेकर एक ऑटो लिया। उन्होंने देखा की दिन में लोगों को कोई ना कोई साधन मुहैया हो ही जाता है पर समस्या रात में होती हैं। तो मंजुनाथ दिन में ऑटो चला कर घर का ख़र्च निकलते और रात में लोगों की मदद के लिए एम्बुलेंस चलते।

उनके इस काम में उनकी पत्नी भी उनका पूरा साथ देती हैं। दरअसल मंजुनाथ नें अपनी ऑटों में लोगों के लिए अपना नंबर लिख रखा है ताकि जिसको जरूरत हो वो कॉल कर सके। जब मंजुनाथ ऑटो चला कर घर आते हैं, कोई काम या आराम कर रहे होते हैं तो उस दौरान जो भी फोन आता है उनकी पत्नी ही उठाती हैं। फिर वे मंजुनाथ को सारी डिटेल्स और पता दे देती हैं। और मंजूनाथ अपनी ऑटो एम्बुलेंस लेकर दिए गए पते पर मदद के लिए पहुँच जाते हैं। मंजुनाथ नें मदद के लिए अपना नंबर तो दिया ही है साथ ही साथ वे एक एक गैर सरकारी संगठन आश्रय फाउंडेशन से भी जुड़े हैं। उन्होंने उन्हें इस समस्या के बारे में बताया और कहा की अगर ऐसी कोई भी मदद के लिए कॉल आये तो उन्हें इन्फॉर्म किया जाए। अब आश्रय फाउंडेशन के पास भी आसपास के इलाके के ऐसे किसी जरूरतमंद का फ़ोन आता है तो वे मंजुनाथ को बता देते हैं।

मंजुनाथ ये काम करीब एक साल से लगातार कर रहे हैं। वे कहते हैं  इस काम से मुझे इतनी खुशी मिलती है जितना शायद मुझे किसी दूसरे काम से नहीं मिल सकती। मैं हमेशा से समाज सेवा करना चाहता था, लोगों की मदद करना चाहता था। आज जब मैं किसी जरूरतमंद को अस्पताल छोड़ता हूँ तो जो अंदर से ख़ुशी मिलती है मैं जाहिर नहीं कर सकता, लगता है मैंने किसी के बुरे वक़्त में उसका साथ दिया।

मंजुनाथ समाज को एचआईवी एड्स के प्रति जागरूक भी कर रहे हैं। उन्होंने अपने ऑटो पर ऐसे संदेश लिखवाया हुआ है जो लोगों को इस खतरनाक संक्रमण के प्रति लोगों मो जागरूक करता हैं। इसके अलावा वे अपनी कमाई का एक हिस्सा भी आश्रय फाउंडेशन में लोगों की भलाई के लिए दान देते हैं।

 

जिंदगी उतार और चढ़ाव का नाम है. जिंदगी में अगर कभी काली रात अपने साये को लेकर आती है तो कभी उजली सुबह भी अपना उजियारा फैला देती है. जरूरत है तो बस हिम्मत न हारने की और आगे बढ़ते जाने की. अगर आप जिंदगी में मुश्किलों को पार करना सीख जाते हैं तो पूरी दुनिया आपके लिए लड़ाई लड़ने को तैयार हो सकती है. जरुरत है तो बस जज्बे को बरक़रार रखते हुए अपने हौसले के साथ लड़ते जाने की फिर कारवां बनता जाता है. ऐसी ही एक महिला उद्यमी के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, जिनकी कहानी सुनने और पढ़ने में भले फ़िल्मी लगे, लेकिन है सच. यह कहानी है शिल्पा की. जो मैंगलोर में फ़ूड ट्रक चलाती हैं. उनकी जिंदगी में जितने भी दुःख आये उन्होंने उसका सकारात्मक उपयोग किया और हम सबके सामने जुझारूपन की वो मिसाल खड़ी की, जिसका लोहा महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के मालिक आनंद महिंद्रा ने भी माना और उनकी मदद को आगे आये. चलिए पढ़ते हैं उनके संघर्ष के बारे में. उन्होंने केनफोलिओस से एक्सक्लूसिव बातचीत की

महिला उद्यमी की नयी पहचान हैं शिल्पा

अपनी जीवन के बारे में बताते हुए वो कहती हैं की मुझे बचपन से खाना बनाने का शौक जरूर था लेकिन मैं इसे अपने व्यापार के रूप में कभी नहीं देखती थी. "मै फ़ूड ट्रक के व्यापार में अपनी मर्जी से नहीं बल्कि मज़बूरी में आयी". जब 2005 में अपने पति से शादी करके वो मैंगलोर आयी तो उन्हें नहीं पता था की उन्हें एकदिन इसी मैंगलोर में अकेले दम पर फ़ूड ट्रक शुरू करना पड़ेगा और जीवन और परिवार के तमाम संघर्षों से अकेले लोहा लेना होगा. आज वो मैंगलोर में एक जाना माना नाम हैं और खासतौर से महिलाओं के लिए प्रेरणा का जीता जागता उदहारण हैं. वास्तव में जिंदगी में 'हार' तबतक संभव नहीं है जब तक हमारे मन ने जीतने का पक्का निश्चय कर रक्खा हो.

9 साल पहले पति ने छोड़ दिया था, नहीं हारी हिम्मत

शिल्पा बातचीत के दौरान अपनी टूटी फूटी हिंदी से अपने संघर्ष की सच्चाई बयां करती हैं. वो बात करते हुए कभी रोती हैं तो कभी हंसती हैं और कभी भावुक होकर एकदम चुप हो जाती हैं. वो बताती हैं की, "मेरे पति मुझसे बोलकर गए की अपने व्यापार के लिए लोन लेने के सिलसिले में वो बैंगलोर जा रहे हैं, कुछ दिन में लौटेंगे. लेकिन वो कभी नहीं लौटे. वो 2008 का वर्ष था, उस वक़्त मेरे हाथ में 3 साल का बच्चा था और समाज में उसको एक पहचान दिलाने के लिए संघर्ष करने का जिम्मा अब मेरा था". उन्हें यह बिलकुल नहीं पता था की उनका फ़ूड ट्रक चल पायेगा या नहीं, लेकिन उन्होंने बस हिम्मत न हारते हुए उसी फ़ूड ट्रक पर खाना बनाना शुरू किया. धीरे धीरे लोग उनके विषय में जानने लगे. वो आगे कहती हैं,"अगर मैं तब हार मान जाती तो आज मै मेरे बेटे को सुनेहरा भविष्य देने का सोंच नहीं पाती".

संघर्ष से जूझते हुए आया फ़ूड ट्रक खोलने का विचार

वो कहती हैं की उनके पति उनके पास कुछ भी पैसे छोड़ कर नहीं गए थे लेकिन उन्होंने खुदसे कुछ पैसे जरूर इकठ्ठा किये थे, जिसे उन्होंने अपने बैंक अकाउंट में जमा किया था. वो आगे कहती हैं "वो करीब 1 लाख रूपये थे उसके अलावा मेरे पास और कुछ नहीं था, न इतने रूपये में मै कोई दुकान खरीद सकती थी न ही ज्यादा दिन किराये पर दुकान चला सकती थी. मेरे घर के ठीक सामने महिंद्रा का शोरूम था, मैंने एक दिन अचानक से सोंचा की क्यों न मै एक ट्रक ले लूँ और उसे फ़ूड ट्रक में परिवर्तित करके अपना खुद का खाने का व्यापार शुरू करूं”. उन्हें शुरुवात में लोगों ने कहा की वो सेकंड हैंड ट्रक लें, लेकिन वो उन्हें फाइनेंस पर नहीं मिल सकती थी. इसलिए उन्होंने नया ट्रक लेने का सोंचा जो उन्हें फाइनेंस पर मिल सकता था. अब मुश्किल यह थी की उनके पास केवल 1 लाख रूपये ही थे, जो उन्होंने अपने बेटे के लिए बचा रक्खे थे, लेकिन फिर उन्होंने एक कठोर फैसला लिया और उन पैसों को महिंद्रा ट्रक खरीदने के लिए इस्तेमाल करने का सोंचा. वो जब शोरूम गयी, तो उन्हें पता चला की उन्हें डाउन पेमेंट के तौर पर 1 लाख 18 हज़ार रूपये जमा करने होंगे. उस वक़्त उनके पास केवल 1 लाख रूपये ही थे. बाकि के 18 हज़ार के अलावा, खाना बनाने के सामान, गाडी को परिवर्तित करने वगैरह के खर्चे के लिए भी पैसे जुटाने थे. फिर उन्होंने सरकार की योजना, 'महिला रोजगार उद्योग योजना' के अंतर्गत लोन लिया और अपने पास बचे हुए सोने के गहने बेच कर रकम जुटाई.

शुरू मैं मिलते थे 500-1001 लेकिन अब मिलते हैं 10000

वो कहती हैं, "जब मैंने अपना फ़ूड ट्रक खोला तो मुझे दिन के 500-1000 ही मिलते थे लेकिन अब मुझे 10000 के करीब मिल जाता है. जिसे मैं अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए, अपने स्वास्थ्य, अपने माँ-पिता के स्वास्थ्य और दूसरों खर्चों पर लगाती हूँ". 

आनंद महिंद्रा के ट्वीट से मिली उम्मीद

वो कहती हैं की उन्हें सबसे ज्यादा ख़ुशी तब हुई जब महिंद्रा एन्ड महिंद्रा के मालिक आनंद महिंद्रा ने उनकी कहानी से प्रभावित होकर ट्वीट किया और उनकी हर संभव मदद का आश्वासन दिया. वो बताती हैं की जबसे आनंद महिंद्रा ने मेरे लिए ट्वीट किया तबसे मेरे ग्राहकों में खासा वृद्धि हुई है, लोग मदद के लिए भी आगे आ रहे हैं. मुझे मेरी जिंदगी में और उम्मीदें मिली हैं

शिल्पा की कहानी हम सबके लिए एक मिसाल इसलिए भी है क्यूंकि उन्होंने जिंदगी में संघर्ष करते हुए सही फैसले लिए और अपने हौसले के दम पर यह दिखा दिया की कोई भी मंजिल तबतक दूर नहीं जबतक आपके पास दूर तक चलने का जज्बा मौजूद हो. उन्होंने जिंदगी में एक वक़्त जहर खाकर खुदको खत्म करलेने का भी सोंचा था, लेकिन फिर उन्हें लगा की वो दुनिया के सामने एक कायर नहीं बनना चाहती. उन्होंने पति के छोड़ जाने के बाद अपने जीवन को एक नयी शुरुवात दी,जहाँ उन्होंने अपने स्वयं के लिए सभी मुकाम हासिल किये. वो कहती हैं की उनकी मंजिल भले अभी दूर हो, लेकिन उनका जज्बा उन्हें उस मंजिल तक एक न एक दिन जरूर पहुंचा देगा. उन्होंने कहा की मैं सभी महिलाओं को यह बताना चाहती हूँ की आप सबमे अपार शक्ति मौजूद है, आपकी खुदकी एक पहचान है, जरुरत है तो बस खुदको पहचानने की, फिर कोई भी मुकाम आपसे दूर नहीं.

 

विफलता से कभी निराश नहीं होना चाहिए। वास्तव में विफलता सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। हमारे इतिहास में जितने भी बिजनेसमेन, साइंटिस्ट या महापुरूष हुए है, जीवन में सफल होने से पहले निरंतर कई बार विफल हुए है। जब हम बहुत सारे काम कर रहे हों तो जरुरी नहीं सब सही ही होंगे। लेकिन अगर आप इस वजह से प्रयास करना छोड़ देंगें तो कभी सफल नहीं हो सकते। आज हम एक ऐसी ही शख्सियत की बात करनें जा रहे हैं जिन्होंने कई बार रिजेक्ट होने के बाद भी हार नहीं मानी। आज उन्हें एक जाने माने संस्थान नें अपनी कंपनी का सीईओ बनाया है।

इनका नाम है अंजली सूद। अंजलि  का जन्म यूएस के मिशिगन में स्थित फ्लिंट नामक शहर में हुआ था। तीन साल के उम्र में ही उन्होंने नाटककार बनने का सपना देखा और अपने भाई और बहन से नाटक किया करती थीं। वे अपने बेसमेंट में दो दर्शकों के लिए प्रदर्शन किया करती थी और वे थे उनके माता-पिता। आज अंजली वीमिओ नामक जाने-मानें वीडियो पोर्टल की सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। मात्र 34 साल की उम्र में अंजली सूद दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन ऐड फ्री वीडियो प्लेटफार्म वीमियो की सीईओ बन गयी हैं। इसके साथ ही वह किसी भी आईएसी (IAC) ब्रांड के सबसे कम उम्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बन गईं हैं। ग्लोबल मार्केटिंग के वीपी के रूप में शामिल हुईं और तीन वर्षों के बाद जुलाई 2017 मे उन्हें कंपनी का शीर्ष पद दिया गया।

पर अंजली का यह सफर इतना आसान नहीं था। एक वक्त अंजलि एक इन्वेस्टमेंट बैंकर बनने की कोशिश में लगी थी। पेंसिल्वेनिया के व्हार्टन बिजनेस स्कूल विश्वविद्यालय से पढ़ाई करनें के बाद उन्होंने इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में दर्जनों नौकरियों के लिए आवेदन भी किया। पर उन्हें किसी नें भी नौकरी नहीं दिया।

अंजली नें एक इंटरव्यू में कहा कि -
"मुझे हर एक बड़े निवेश बैंक से खारिज कर दिया गया। मुझे साक्षात्कार में जो बोला गया वह मैं आज भी नहीं भूल पाई हूँ, उन्होंने मुझे बताया कि मैं बैंकर नहीं बन सकती क्योंकि मेरा व्यक्तित्व बैंकर जैसा नहीं है।" "वह निश्चित रूप से मेरे लिए बहुत निराशा भरा दौर था।"

नकारात्मक प्रतिक्रिया के बावजूद, अंजली नें इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में नौकरी की तलाश में हार नहीं मानी। आखिरकार उसने एक छोटी फर्म, सैगेंट एडवाइजर्स के लिए एक विश्लेषक के रूप में नौकरी मिली। इस कंपनी में अंजली ने काम करने के हर एक बारीकियों को सीखा जिसनें बाद में उनके सफल होने में उनकी मदद की।

सागेंट में कुछ साल काम करने के बाद अंजली ने अन्य विकल्पों की भी तलाश शुरू कर दी। इस दौरान उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से डिग्री भी हासिल की। उसके बाद उन्होंने मशहूर शॉपिंग पोर्टल अमेज़न को जॉइन कर लिया। उन्होंने वहाँ कुछ वर्षों तक विभिन्न पदों पर काम किया। उस वक़्त लोगों नें उन्हें सलाह दिया कि वे अपना दिमाग ज्यादा विचलित ना करें और अमेज़न के साथ ही टिके रहें। अमेज़न एक बड़ी कंपनी थी इस लिहाज से लोगों के राय भी सही थे। पर अंजली सूद को एक लीडर बनना था जहां वे खुद के डिसिजन्स ले सकें। उन्हें विमिओ से ऑफर मिला और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने अमेज़न को छोड़ विमिओ जॉइन कर लिया। जहां उन्होंने गोलाबल मार्केटिंग विभाग के हेड के रूप में शुरुआत की।

इस दौरान अंजली नें विमिओ को आगे बढ़ने के लिए बहुत प्रयास किये। वे लगातार ऐसे ऐसे आईडिया दिया करती थी जिससे प्लेटफार्म को इम्प्रूव करने में बहुत फायदा हुआ। कंपनी के लिए उनकी मेहनत और लगन का कितना बड़ा इनाम उन्हें मिलने वाला है उन्होने कभी सोचा भी नहीं होगा। कंपनी के बोर्ड मेंबर्स उनकी सोच से इतने पर प्रभावित हुए कि अंजली सूद को कंपनी का सीईओ बनानें का फैसला लिया गया। जुलाई 2017 में उन्हें यह पद दिया गया। इसके बाद से अंजली लगातार विमिओ को यूजर फ्रेंडली और क्रिएटर फ्रेंडली प्लेटफार्म बनने में लगी हैं।

अंजली सूद की कहानी हमें विफलता से लड़ने का सार देती है। चाहे कितनी भी मुश्किलें आये अगर आपका हौसला बुलंद होगा तो कामियाबी आपके कदम जरूर चूमेगी।

अफसर बनने के बाद लोगों में ठाठ-बाठ बदल जाते हैं। ऐसा आपने अक्सर देखा भी होगा और सुना भी होगा। ऐसे में आज कल जमीन से जुड़े लोगों की तादाद कम ही देखने को मिलती है। चाहे वह कोई नेता हो या अफसर, एक बार ऊंचे पदों पर जाने के बाद वह उन लोगो को ही भूल जाता है जिनके बीच से वह खुद आया है। वह खुद को खास और दूसरों को आम समझनें लगता है। सफलता आपके सर पर कुछ यूं हावी हो जाती है कि आप आपनें कर्तव्यों को ही भूल जाते हैं। आमतौर पर जब ऐसे वीआईपी किसी कार्यक्रम के लिए निकलते हैं तो उनके साथ बड़े तादाद में सुरक्षा बल और स्कोर्ट होती है। जिससे सामान्य यातायात व्यवस्था को भी प्रभावित होती है। पर आज भी समय-समय पर हमारे सामने कुछ उदाहरण आते रहते हैं जो हमें इस तरह के मानसिकता से परे जाकर गर्व करने का मौका देते हैं। आज हम एक ऐसे ही अधिकारी के बारे में बताने जा रहे हैं जो बतौर चीफ गेस्ट एक कार्यक्रम में 16 किमी पैदल चलकर पहुँचे।

इनका नाम है राजीव त्रिवेदी। 56 वर्षीय राजीव तेलंगाना के होम मिनिस्ट्री डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी यानी मुख्य सचिव (गृह विभाग)  हैं।अपनी अनोखी वर्किंग स्टाइल को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले राजीव त्रिवेदी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। राजीव त्रिवेदी एक प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए रोड पर दौड़ लगाते हुए पहुंच गए। उन्हें सुचित्रा एकेडमी में स्पोर्ट्स डे के मौके पर बतौर चीफ गेस्ट हिस्सा लेना था। बता दें कि तेलंगाना सेक्रेटेरिएट से इस कार्यक्रम स्थल की दूरी 16 किमी है। उनकी यह फोटो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही है। सभी इस आईपीएस के अनोखे कार्यशैली की सराहना कर रहे है।

दरअसल 16 नवंबर को हैदराबाद स्थित सुचित्रा एकेडमी में स्‍पोर्ट्स डे का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में आईपीएस अधिकारी और तेलंगाना के गृह विभाग के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया था। आम तौर पर ये देखा गया है कि किसी खास कार्यक्रम में अगर किसी बड़े अधिकारी को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है तो अधिकारी बड़ी तैयारी से इसमें शामिल होने के लिए पहुंचते हैं। वो या तो अपनी कार से या फिर लंबे काफिले के साथ कार्यक्रम में शिरकत करते हैं। पर राजीव इस कार्यक्रम में शिरकत के लिए पहुंचे हों तो कार या फिर काफिले के साथ नहीं, बल्कि दौड़ लगाकर। दिग्गज आईपीएस अधिकारी एक या दो किलोमीटर दौड़कर कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए बल्कि 16 किमी. दौड़ लगाकर कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पहुंचे।

एलो टी शर्ट लोअर , स्पोर्ट्स सूज , सन ग्लास पहन राजीव ने दौड लगाना शुरू किया। उनके साथ -साथ सीनियर पुलिस ऑफिसर और सिक्युरिटी गार्ड भी दौड़ लगा रहे थे। वे सेक्रेटेरिएट , टैकबैंड पैराडाइज्ड, सीटीओ जंक्शन बालमराई होते हुए 16 किमी की दूरी दौड़ पूरी करते हुए कार्यक्रम स्थल तक पहुंच गए। बता दें कि राजीव त्रिवेदी अपने अनोखी वर्किंग स्टाइल को लेकर अक्सर चर्चा में बने रहते है। इससे पहले फरवरी में भी उनकी एक तस्वीर सामने आई थी जब राजीव त्रिवेदी करीब 19 किलोमीटर दौड़ लगाकर 355 आर्म्ड रिजर्व रिक्रूट कॉन्स्टेबल्स के दीक्षांत परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने के लिए पहुंचे थे। उस समय उनके बेटे प्रशांत भी उनके साथ शामिल हुए थे। बताया जाता है कि वह अधिकतर खास कार्यक्रमों में जाने के लिए ऐसा ही तरीका आजमाते हैं।

आपको बता दें राजीव त्रिवेदी ने लगभग 700 किलोमीटर की दूरी तक साइकिल सवारी करके भी रिकॉर्ड स्थापित कर चुके है। उन्होंने विशाखापटनम से हैदराबाद तक की यह दूरी आठ दिन में पूरी की थी। अपनी फिटनेस के लिए मशहूर आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी इससे पहले भी लंबी दूरी तक तैराकी के कई रिकॉर्ड स्थापित कर चुके हैं। जानकारी के मुताबिक स्वास्थ्य के प्रति वो बेहद गंभीर रहते हैं, यही वजह है कि वो दौड़ लगाकर ही कार्यक्रमों में जाना पसंद करते हैं।

 

कहते हैं कि किसी भी चीज को अंजाम तक पहुँचाने के लिए तमाम प्रकार के संसाधनों की जरूरत होती है, यह बात व्यक्ति के निजी जीवन में सपने को हासिल करने के लिए भी ठीक बैठती है। हम यह भी जानते हैं कि कई बार मेहनत और सच्ची लगन के बावजूद भी, हमे हमारे सपने संसाधनों की कमी के कारण हासिल नहीं हो पाते। पर ऐसे भी उदाहरण हमारे सामने हैं जहाँ हमने देखा है कि सच्ची लगन और कड़ी मेहनत देखकर ईश्वर भी हमारी मदद के लिए कई सारे बंद दरवाज़ों को खोल देता है, जरूरत होती है तो बस उन सभी मौक़ों के सही इस्तेमाल करने की। वास्तव में अगर समय रहते आपने उन मौक़ों का सही इस्तेमाल कर लिया, तो फिर आपको आपकी मंज़िल पाने से कोई नहीं रोक सकता है। आज की कहानी भी ऐसे ही एक शख्स की है, जिसकी मेहनत के क़िस्से सुनकर आपको हैरानी ज़रूर होगी पर इस बात पर यकीन भी आएगा कि कड़ी लगन और निष्ठा से हर मुकाम को पाया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं केरल राज्य के एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन पर कार्य करने वाले एक कुली की, जी हाँ, वही कुली जो हमेशा दूसरों का बोझ अपने कंधों पर लिए घूमता है। वह कुली जिसके पास खुद के लिए सोचने की फुर्सत भी नहीं होती। पर श्रीकांत नाम के इस कुली ने रेलवे स्टेशन पर मौजूद वाई-फाई सुविधा से पढ़ाई करते हुए केरल लोक सेवा आयोग में चयन के अपने रास्ते को लगभग प्राप्त कर लिया है और अब वो एक अफ़सर बनकर (साक्षात्कार के पश्च्यात अंतिम चयन होने की दशा में) लोगों की सेवा करेंगे।

रेलवे स्टेशन पर लगे वाई-फाई से कि गहरी दोस्ती

यूँ तो किसी भी बड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए व्यक्ति कई प्रकार की किताबों को पढता है, कोचिंग संस्थान जाता है एवं तमाम अन्य स्रोतों से जानकारियाँ जुटाता है लेकिन श्रीकांत ने केरल लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा को बिना किसी ख़ास संसाधन के ही पास कर लिया, और इसमें उनका साथ दिया उनके रेलवे स्टेशन के वाई-फाई ने। जी हाँ, यह सुनने में अकल्पनीय अवश्य लग सकता है पर है सच। श्रीकांत कहते हैं, "मैं अपनी इस सफलता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं खासकर के रेलवे मंत्रालय का शुक्रगुजार हूँ, जिन्होंने रेलवे स्टेशनों पर इंटरनेट की ऐसी सुविधा शुरू करवाई जिससे मेरे जैसे लोग अपनी सुविधा के अनुसार दुनिया भर की तमाम जानकारियाँ पा सकें और इसी के सहारे मैं अपने पहले इम्तिहान में पास हो गया हूँ।"

ईयरफ़ोन लगाकर लेते रहते थे महत्वपूर्ण टिप्स, फिर काम के बाद करते थे पढाई

पिछले 5 साल से कुली के पेशे से जुड़े श्रीकान्त इयरफोन पर अपनी शिक्षिका की बातों को ध्यान से सुनते रहते थे, जो उनको परीक्षा से जुड़ी अति महत्वपूर्ण टिप्स देती रहती थीं। वे कहते हैं कि रेलवे स्टेशन पर लगे वाईफाई अच्छी इंटरनेट स्पीड देते हैं और इसीलिए उन्हें इसका प्रयोग करने में दिक्कत नहीं आई। वो इसी के द्वारा मिलने वाले इंटरनेट की सहायता से इस परीक्षा से जुड़ी शिक्षण सामग्री भी प्राप्त किया करते थे। और फिर वो दिनभर कभी यूट्यूब से जानकारी प्राप्त करते तो कभी गूगल से तो कभी अपनी शिक्षिका से ईयरफ़ोन के जरिये टिप्स लेते रहते। दिनभर तमाम तरह के काम के बीच उन्हें पढ़ाई का ज्यादा वक़्त नहीं मिलता था और इसीलिए वो दिन-भर अपना सारा काम निपटाने के बाद रात में पढ़ते थे। श्रीकांत कहते हैं कि, "हालाँकि इससे पहले भी मैंने दो बार लिखित परीक्षा दी थी, लेकिन उसमे मैं उत्तीर्ण नहीं हो पाया, क्योंकि उस समय तक मेरी वाई-फाई तक पहुंच नहीं थी। लेकिन आखिरकार मैंने तीसरे प्रयास में बाजी मार ही ली, और इस दौरान मैंने वाई-फाई सुविधा का भरपूर इस्तेमाल किया।"

आपको बता दें कि 2016 में डिजिटल इंडिया के तहत शुरू हुई रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई की सुविधा ने एक कुली की किस्मत ही बदल कर रख दी है। ग़ौरतलब है कि वर्ष 2018 तक देश के 685 रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई की सुविधा शुरू हो गयी है और अब सरकार द्वारा मार्च 2021 तक लगभग 8500 स्टेशनों में इस सुविधा को शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसके लिए 700 करोड़ का निवेश होना तय हुआ है ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर श्रीनाथ इस परीक्षा प्रक्रिया के साक्षात्कार स्तर को उत्तीर्ण कर लेते हैं तो वह भूमि राजस्व विभाग के तहत विलेज फील्ड अस्टिटेंट के पद के लिए चयनित होंगे। वे कहते हैं कि उनके लिए नौकरी बहुत ज़रुरी है क्योंकि उनका परिवार बहुत सम्पन्न नहीं है और उन्हें आजीविका चलाने के लिए एक बेहतर नौकरी करनी ही है और इसीलिए उन्होंने काम के साथ साथ पढ़ाई जारी रखी। श्रीकांत कहते हैं कि, "दुनिया में कोई भी काम मुश्किल नहीं, हालाँकि मुझे काम के साथ साथ पढ़ाई करने में थोड़ी दिक्कत ज़रुर आती है लेकिन मैं जिंदगी में कुछ करना चाहता हूँ और यही ललक मुझे आगे बढ़ने का हौसला देती रहती है।"
श्रीकांत कि यह कहानी हमे कई मायनों में प्रेरणा के स्तर पर छूती है, और हमे अपने मौजूदा हालातों के बीच ही प्रगति करने के लिए उत्साहित करती है। हम श्रीकांत के अंतिम चयन के लिए उन्हें शुभकामनायें देते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो समाज में प्रेरणा का साथ साथ सकारात्मकता का संदेश फैलते रहेंगे। 

 

जिन्दगी में कुछ अलग करने की कोई तय उम्र नहीं होती। और समाज बदलने के लिए जरूरी नहीं कि आपको किसी और के साथ की जरूरत पड़े। इसके लिए एक अकेला इंसान भी काफी है। लेकिन हाँ, यह जरूर है कि समाज की बुराइयां मिटाने की राह की ओर अगर आप चल पड़े हैं तो आपको अपने इरादे मजबूत और इरादा फौलाद जैसा कठोर करना पड़ता है और फिर समाज में परिवर्तन देर सवेर हो ही जाता है। 

17 साल की शिवानी और 18 साल की तेजस्विनी ने इस बात को अपनी जिंदगी में सिद्ध करके दिखाया है। इन दोनों की सूझ-बूझ के कारण कई लड़कियां आज देह व्यापार में जाने से बच गयीं हैं, जिस वजह से कई मासूमों की जिंदगी बर्बाद होने से बचाई जा चुकी है। मासूम बच्चियों को देह व्यापार में धकेलने वाले दलालों को इन दोनों बेटियों ने पुलिस की मदद से गिरफ्तार करवाके, उनके व्यापार का पूर्ण रूप से खात्मा करने में एक अहम योगदान दिया है। उनके इस साहसी कार्य के लिए इन्हें इस साल गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित भी किया गया है। तेजस्विनी और शिवानी के साथ साथ देश के अन्य 25 बच्चों को भी इस मौके पर सम्मानित किया गया। 

फेसबुक के जरिये योजना बनाकर किया तस्करों से संपर्क

ये बात किसी से छिपी नहीं कि सबसे ज्यादा तस्करी का शिकार नेपाल की युवतियां होती हैं। दार्जिलिंग की इन दोनों लड़कियों ने अपनी बहादुरी से नेपाल की गरीब युवतियों को देह व्यापार में धकेलने वाले गिरोह के चंगुल से छुड़वाया। इन दोनों बेटियों ने अपनी सूझ-बूझ से और उन तस्करों को पुलिस के हवाले करने के मकसद से उनसे फेसबुक के जरिये सम्पर्क किया और उनको अपनी फ्रेंड लिस्ट में जोड़ा। सबसे पहले इन दोनों लड़कियों ने इनसे सम्पर्क बढ़ाया, उन्हें भरोसे में लिया और अंत में उन तस्करों को वो यकीन दिलवाने में कामयाब रहीं कि वो दोनो उन तस्करों के बुलावे पर घर से भागने के लिए तैयार हैं। दोनो बेटियों को इस पूरी योजना में पुलिस का पूरा साथ मिला और अंततः बेटियों की सूझ-बूझ और पुलिस की सहायता से इन तस्करों का भांडा फ़ूट ही गया। लेकिन यह सुनने में जितना आसान लग रहा है दरअसल यह कार्य को अंजाम देना उतना आसान नहीं था और इसके लिए उन बेटियों को वो हर काम करने पड़े जिससे वो उन तस्करों को उनपर भरोसा दिलाने में कामयाब रहीं। यहां तक कि तेजस्विनी और शिवानी को अपनी तस्वीरें उन तस्करों को भेजनी पड़ी जिससे तस्करों को यह भरोसा हो जाये कि वो लड़कियां उनके काम आ सकती हैं। तस्करों ने उन्हें यह बताया कि उन दोनों को सभी ग्राहकों की हर मांग को पूरा करना होगा, और उन्हें शारीरिक रूप से संतुष्ट करना पड़ेगा। तेजस्विनी और शिवानी उनकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाती रहीं। इसके लिए शिवानी और तेजस्विनी को अपने घर वालों को भी यह भरोसा दिलाना पड़ा कि वो कोई गलत काम नहीं कर रहीं बल्कि उनके प्रयासों से तमाम लड़कियों की जिन्दगी बच सकती है। 

और ऐसे फूटा रैकेट का भांडा

तमाम तरह से भरोसा दिलाने के पश्चयात आखिरकार दोनो के घरवाले भी मान गए। दोनो बेटियों ने तस्करों से फेसबुक पर बातचीत किया जिसके बाद उन दोनों को उक्त आरोपियों ने पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी बुलाया। जब वो दोनो उनके बताए स्थान पर पहुंची तो उन्हें एक महिला अपने साथ लेने आई। बस फिर क्या था, योजना के हिसाब से वहां पहले से मौजूद पुलिस ने उस महिला को अपनी गिरफ्त में लिया और उनसे बाकी तस्करों का ठिकाना पता किया। पुलिस उन सभी तस्करों तक पहुंची और सभी को गिरफ्तार किया। इस दौरान नेपाल से लापता हुई एक युवती भी पुलिस को मिली। अपने इस बहादुरी के लिए शिवानी और तेजस्विनी को गणतंत्र दिवस के दिन बहादुरी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मानित किया और आज उनकी प्रशंसा पूरे देश में हो रही है। उन्हें मेडल, सर्टिफिकेट के साथ साथ इनामी धनराशि भी मिली है। इतना ही नहीं अब सरकार इन दोनों बेटियों की आगे की पढ़ाई का खर्च भी उठाएगी। तेजस्विनी और शिवानी की सूझ बूझ से कई लड़कियां नरक की जिन्दगी में जाने से बच गयीं। यह बहादुरी का कार्य करके इन दोनों बेटियों ने समाज को यह सीख दी है कि अगर औऱ लड़कियां भी इसी तरह हिम्मत दिखाएँ तो एक दिन जड़ से इन तस्करों का व्यापार बंद हो जाएगा।

वास्तव में दोनो बेटियों की बहादुरी का यह किस्सा हमे यह प्रेरणा देता है कि अगर हम सब समाज की बुराइयों को खत्म करने के लिए खुद से बीड़ा उठाएंगे तो समाज बदल सकता है और इसमें मौजूद बुराइयां मिट सकती हैं। जरूरी है तो बस समाज को बदलने का इरादा करना और जरूरी हौसला बरकरार रखना और फिर समाज में अच्छाई का एक व्यापक संदेश फैलाया जा सकता है।

हम अक्सर यह सुनते आये हैं की किसी व्यक्ति को अपने जीवन यापन के लिए रोटी,कपडा और मकान जैसी बुनियादी चीज़ों की दरकार होती है।  इन आधारभूत चीज़ों को व्यक्ति के लिए इसलिए भी जरुरी माना जाता है क्यूंकि संभवतः इन मूलभूत जरूरतों के बगैर व्यक्ति के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।  हमारे समाज में समय समय पर तमाम ऐसी मुहीम छेड़ी गयी हैं, जिसके चलते मनुष्य को वो सभी जरूरतें मुहैय्या कराने की कोशिशें की गयी हैं।  फिर भले वो सरकार हो, या समाजसेवी संगठन।  हालाँकि हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते की हमारे समाज में आज भी लोग भूखे सोने को मजबूर हैं।  ऐसे लोगों की मदद करने के लिए कई सारे समाजसेवक एवं समाजसेवी संगठन अवश्य आगे आये हैं, उनमे से एक हैं केरल राज्य में एर्नाकुलम जिले की निवासी मीनू पॉलिन। मीनू पॉलिन एक ऐसी व्यवसायिका एवं समाजसेविका के रूप में उभरी हैं, जिन्होंने अपनी फलती फूलती नौकरी केवल इसलिए छोड़ दी जिससे वो ऐसे अभियान का नेतृत्व कर सकें जिसके अंतर्गत गरीबों को मुफ्त में भोजन मिल सके और किसी को भी भूखा न सोना पड़े।  उनके जीवन और उनके इस नेक कार्य के विषय में चलिए पढ़ते हैं।

 बैंक में नौकरी छोड़ शुरू की गरीबों को मुफ्त भोजन कराने की मुहिम

मीनू पॉलिन पूर्व में बैंक में नौकरी करती थी, लेकिन कुछ साल पहले वे रेस्त्रां के व्यवसाय से जुड़ीं और समाज में परिवर्तन की रौशनी बिखेरने कि खातिर उन्होंने एक मुहिम कि शुरुआत की। उन्होंने इस मुहिम का नाम रखा 'रेफ्रिजरेटर ऑफ लव'। यानि एक ऐसा फ्रिज जहां किसी को भी मुफ्त में भोजन मिल सकता है।  इस फ्रिज से खाना खाने के लिए व्यक्ति को पैसे की जगह थोड़ी सी दुआ देनी होगी और टिप के नाम पर थोड़ा सा प्यार। मीनू बताती हैं कि उन्होंने इस मुहिम कि शुरुवात कुछ अन्य लोगों के सहयोग से की और आज वो इसे एक सफल अभियान के तौर पर देखती हैं। वो बताती हैं कि उनकी इस मुहिम का मकसद गरीबों को मुफ्त भोजन कराना और समाज में हो रही खाने की बर्बादी को रोकना है। 28 साल की मीनू स्वयं का एक रेस्त्रां चलाती हैं और एर्नाकुलम स्थित कालूर बस स्टैंड के पास उन्होंने यह कम्युनिटी रेफ्रिजरेटर स्थापित किया है़। मीनू जी ने इस फ्रिज को अपने रेस्त्रां के ठीक बाहर एक पेड़ के नीचे रखा है, और इसको 'ननमा मारम' (पुण्य पेड़) का नाम दिया है।
 
फ्रिज वाकई में है ख़ास
'रेफ्रिजरेटर ऑफ लव' नाम से मशहूर यह फ्रिज मीनू जी के रेस्त्रां के ठीक बाहर स्थापित किया गया है। अंदर उनका स्वयं का रेस्त्रां चलता है, जहां संपन्न लोग आते हैं और पैसे देकर भोजन करते हैं और बाहर है यह 420 लीटर का कम्युनिटी रेफ्रिजरेटर जिसमें खाद्य पदार्थ हर वक़्त मुफ्त में खाने के लिए मौजूद रहता हैं। वहां के गरीब और जरूरतमंद लोगों को इस बात कि जानकारी भी है और वे अपनी जरूरत के हिसाब से इस फ्रिज से सामान निकालकर खाते हैं। जब जनवरी, 2014 में मीनू जी ने सिटी बैंक की अपनी नौकरी छोड़ कर खुदका व्यवसाय शुरू करने का सोचा था, उस वक़्त भी उनका इरादा था कि वे अपने व्यवसाय के साथ साथ गरीबों के लिए भी कुछ करना चाहती हैं। इसी कारण के चलते मीनू जी ने इस मुहिम की शुरुआत की। मीनू जी कहती हैं, "हम अक्सर रेस्त्रां जाते हैं और अधिकतर बार ऐसा होता है कि वहां खाना बच जाता है, जो अंत में रेस्त्रां द्वारा फेंक दिया जाता है। मैं खाने की इस बर्बादी को रोकना चाहती थी और इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था कि मैं बचे हुए खाने को फेंकने के बजाय गरीबों एवं जरूरतमंदों में बाँट दूँ"। उनका मानना है कि ऐसा करके खाने की बर्बादी भी रुकती है और भूखों को खाना भी मिल जाता है। मीनू कहती हैं, इस 420 लीटर के रेफ्रिजरेटर को 24 घंटे चलाने के लिए बिजली का सारा खर्चा उनका रेस्त्रां ही उठाता है़।
 
सुरक्षा-स्वच्छता की भी जांच का है इंतजाम
इस फ्रिज के पास एक सीसीटीवी कैमरा और सुरक्षा गार्ड्स भी तैनात किये गये हैं। इस फ्रिज में कोई भी अपने घर से खाने की सामग्री लाकर रख सकता है, इसके अलावा इस फ्रिज में रेस्त्रां में बचा हुआ साफ खाना भी रखा जाता है।  फ्रिज में रखे खाने को सिर्फ गरीब एवं जरूरतमंद लोग ही खा सकते हैं।  इस अभियान में मीनू जी के साथ और भी लोग जुड़े हैं जो इस मुहिम को सफल बनाने में उनकी मदद कर रहे हैं, मीनू जी की मानें तो इस रेफ्रिजरेटर में रोजाना 50 से 100 पैकेट खाना रखा जाता है। उन्होंने अलग अलग रेस्त्रां मालिकों से भी बचा हुआ खाना इस फ्रिज में लाकर रखने कि मांग कि है़। इसके अलावा स्वच्छता के लिहाज से इस फ्रिज को हर तीसरे दिन साफ किया जाता है। आज के इस दौर में मीनू जी द्वारा चलित ऐसी मुहिम काबिले तारीफ है, जिससे खाना भी बर्बाद नहीं होता और गरीबों की भूख भी मिटती है। मीनू जी की इस मुहिम को हम सलाम करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि मीनू जी की इस मुहिम में लोग उनके साथ जुड़ते जायेंगे और समाज में गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के लिए इसी प्रकर से बेहतर कार्य होता रहेगा।

 

हम यह जानते हैं कि लगन व कड़ी मेहनत के बाद अगर कोई मनचाही कामयाबी मिले तो तमाम लोग आत्मकेन्द्रित से हो जाते हैं। वे सभी अपने लिए वो सारा कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं, जो अब तक उनको असम्भव मालूम पड़ता था। हालाँकि अक्सर ही ऐसा नहीं होता क्योंंकि तमाम लोग समाज के प्रति सम्वेदनशील भी होते हैं, जो अपनी कामयाबी को, अपने निजी सपने को पूरा करने में इस्तेमाल करने के बजाय उसे अपने जैसे वंचितों में बांट देना चाहते हैं। एक ऐसा युवा जो आइआइटी मुंबई में दाखिला पाने के बाद अपना भविष्य उज्ज्वल कर सकता है, अपने घर-परिवार की रंगत बदल सकता है, बैंक बैलेंस जुटा सकता है, लेकिन वो ऐसा करने के बजाये समाज की भलाई के लिए कार्य करने का सोचता है, क्या ऐसा हो सकता है? जी हाँ, ऐसा हो सकता है और हुआ है, और आज ऐसे ही एक व्यक्ति के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के निवासी बृजेश सरोज की, जिन्होंने झुग्गी में रहने वालों का भविष्य सँवारने की बात सोची और समदर्शी फाउंडेशन नाम से एक संस्था की शुरुआत की, जहाँ आज सैकड़ों बच्चों का सुनेहरा भविष्य गढा जा रहा है। आइये उनके बारे में विस्तार से जानते हैं। 

गरीबी में बिताया बचपन, प्रतिभा रही पैसों की मोहताज़ फिर मिली लोगों से मदद

यूपी के प्रतापगढ़ जिले के बृजेश के पिता सूरत में बुनकर का काम करते हैं, पैसों के अभाव के कारण छोटी उम्र में ही बृजेश को काम करना पड़ा। उन्होंने कभी  होटल में काम किया तो कभी टेंट लगाकर पैसे कमाए, लेकिन हार नहीं मानीं, सपने देखना नहीं छोड़ा। हाई स्कूल में 92 प्रतिशत और 12वीं में 95 प्रतिशत पाने वाले ब्रिजेश ने कुछ पैसे जुटाकर आनंद सर की सुपर क्लास ज्वाइन की और एक ही साल बाद वे आइआइटी मुंबई में सेलेक्ट हो गए। सिलेक्शन के बाद असली जंग शुरू हुई, जब उन्हें दाखिला लेने के लिए पैसे जुटाने पड़े। ऐसे समय में मीडिया ने उनका साथ दिया, नेशनल कवरेज मिलने के बाद उन्हें कई नेताओं ने और सेलिब्रिटीज ने सम्पर्क किया, और तो और उन्हें फंड देने के लिए विदेश से भी कॉल आये। उन्हें उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुलाया और सहायता की। बृजेश के साथ-साथ उनके गाँव में भी विकास हुआ, वहां सडकें बनीं, बिजली पहुंची।

नीच जाती के होने के कारण मिला असम्मान, ठान लिया कि कुछ करके दिखाएंगे

बृजेश कहते हैं कि नीच जाति होने के कारण गाँव में उन्हें और उनके परिवार को सम्मान नहीं मिलता था, लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि एक दिन वो सब बदल देंगे। इस दौरान बृजेश को आमिर खान ने भी बुलाया और सहायता की और जल्द ही बृजेश पर एक फिल्म भी बनने वाली है। अब पिछले 3 साल से बृजेश मुंबई में हैं और जब उनका दाखिला हुआ तब उन्होंने ठान लिया था कि वो अपने जैसे तमाम बच्चों का भविष्य सुधारेंगे, ताकि जो उनके साथ हुआ, वो किसी और के साथ न हो। वो कहते हैं, "मुझे तो मीडिया के कारण फंड्स मिल गए लेकिन ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता, इसीलिए मैंने समदर्शी नाम से संस्था बनाई, समदर्शी मतलब सब बराबर।" वो आगे कहते हैं, "मेरे एनजीओ में हर जाति धर्म के बच्चे पढने आते हैं, मैं उन्हें पढ़ाकर उनका दाखिला सरकारी स्कूल में करवाता हूँ।"

तीन गांव भी गोद लिये, मुहैया करा रहे हैं मूलभूत सुविधाएँ

इतना ही नहीं उन्होंने कसारा में तीन गांवों को गोद ले रखा है, जहाँ वो सारी बुनियादी सुविधाएँ पहुंचाते हैं। वो बताते हैं कि वे गाँव पहाड़ पर हैं जिस वजह से वहां रह रहे लोगों को पानी और तमाम चीजों के लिए नीचे जाना पड़ता था। बृजेश ने वहां पम्पिंग की सुविधा की ताकि गाँव वालों को पानी लेने नीचे न जाना पड़े और चक्की लगवाई ताकि उन्हें आटा भी वहीँ मिल जाए, बृजेश कहते हैं मैं प्लेसमेंट लेकर सिर्फ अपना भविष्य और परिवार की दशा ही नहीं सुधारना चाहता, मैं सिस्टम में आना चाहता हूँ ताकि समाज बदल सकूँ और लोगों को सरकार और सिस्टम पर भरोसा दोबारा आ सके।

जहाँ आज के समय में तमाम युवा प्लेसमेंट लेकर विदेश जाते हैं वहीँ बृजेश जैसे युवा अपने देश में रहकर सिस्टम में बदलाव लाना चाहते हैं, ऐसे युवा ही असल मायने में किसी भी देश- समाज के सच्चे निधि हो सकते हैं। बृजेश जैसी सोच वाले लोग ही नई पीढ़ी को और बेहतर बनाने में सच्चे मार्गदर्शक भी साबित हो सकते हैं। बृजेश के कारण आज तमाम बच्चों को मुफ्त में शिक्षा मिल रही है जिससे आगे उनका दाखिला किसी अच्छे संस्थान में किया जा सकेगा। बृजेश ने बचपन से ही गरीबी देखी, पैसे और सुख-सुविधा का अभाव रहा लेकिन उन्होंने उन परिस्थितियों से हार नहीं मानीं और आज वो अपने सपनों की मंजिल पाने में बस कुछ ही दूर हैं।

 

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