KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

Headquartered in New Delhi, our publishing wing is aimed at instilling hope and motivation in individuals while our community of changemakers and influencers works for a common goal - to cause change and make this a better society for all.

Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

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मेहनत व लगन से आपके लिए अपनी मंजिल पाना खासा आसान हो जाता है। पर इस मंजिल को पाने के दौरान आपको बहुत संघर्ष से होकर गुजरना पड़ता है। पर यही संघर्ष जीवन को निखारती है, संवारती है, तराशती है और गढ़कर ऐसा बना देते हैं, जिसकी प्रशंसा करते लोगों की जबान नहीं थकती। साथ में अगर प्लानिंग व टाइम मैनेजमेंट भी हो, तो आप कुछ भी कर सकते हैं।  आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात करने जा रहे हैं जो अपने काम के प्रति इतना दृढ़ थे कि जहाँ अगर सामान्यतः लोग 8 घण्टे काम करते हैं वहाँ वह 16 घंटे काम करते हैं। जिन्हें पूरे अफ्रीका के एक बड़े बिजनेसमैन के रूप में जाना जाता है।

इनका नाम है मणिलाल प्रेमचंद चंदारिया। पर लोग इन्हें मनु चंदारिया के नाम से भी जानते हैं। मनु चंदारिया को केन्या के सबसे सफल बिजनेसमैन के रूप में जाना जाता है। उनकी कंपनी कॉमक्राफ्ट ग्रुप एक बिलियन डॉलर की कंपनी है, जिसका बिजनेस विश्व के 40 देशों में फैला हुआ है। वह कई प्रमुख अफ्रीकी कंपनियों के बोर्डों में सदस्य भी है। अपनें उद्यमशील प्रयासों के कारण उन्होंने पूर्वी अफ्रीका में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कई पुरस्कार जीते हैं। साथ ही उनके द्वारा किए जा रहे जनकल्याणकारी कामों के लिए लोगों में उनके प्रति श्रद्धा है। उन्होंने इसके लिए चंदारिया फाउंडेशन के नाम से एक संस्था भी बना रखी है। जिसके माध्यम से वे तमाम परोपकारी कार्य करते हैं। आज 89 वर्ष के उम्र में भी वे रोजाना 16 घंटा काम करते हैं।

मणिलाल का जन्म 1 मार्च 1929 को केन्या के नैरोबी में हुआ था। दरअसल उनके पिता प्रेमचंद चंदारिया मूलतः भारत में स्थित सौराष्ट्र यानी गुजरात राज्य के रहने वाले थे। वे एक वयापारी थे लेकिन भारत में उनका बिजनेस कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। अच्छे भविष्य की तलाश में उन्होंने केन्या का रुख किया। वे 1915 में केन्या चले गए थे। मनु चंदारिया के पिता बहुत ज्यादा पड़े लिखे नहीं थे,यहाँ तक कि वे अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं बोल पाते थे। उस वक़्त केन्या स्थित नैरोबी एक छोटा शहर हुआ करता था। इसलिए उनके पिता बियसहारा स्ट्रीट पर एक छोटी सी स्टॉल किराए पर लेनें में सफल रहे। जहाँ वे अपनी एक छोटी सी दुकान लगते थे। उन्होंने नैरोबी के निचले इलाके नगरा में एक घर किराए पर ले रखा था जहाँ कुल 3 परिवार रहते थे। मनु जा जन्म भी वहीं हुआ और बचपन भी वहीं बिता। मनु भी जब छोटे थे तो अपने पिता का हाथ बटाया करते थे।

मनु चंदारिया के पिता भले ही ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे पर उनकी इक्षा थी कि उनका बेटा खूब पढ़े। मनु की शुरुआती पढ़ाई नैरोबी और मोम्बासा शहर के स्कूलों में हुई। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने भारत का रुख किया। उन्होंने जामनगर यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की है। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे यूके चले गए। जहाँ उन्होंने ओखलोम यूनिवर्सिटी से अपनी बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग और मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त। 1951 में अपनी पढ़ाई पूरी करनें के बाद वे केन्या वापस चले आये। वापस आने के बाद उन्होंने कोई सरकारी नौकरी करने के बजाय पिता के कारोबार को बढ़ाने का सोचा। मनु चंदारिया नें धीरे-धीरे प्रोपर्टी खरीदनी शुरू की जिसके बाद उन्होंने मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज में कदम रखा।

उन्होंने स्टील और अलुमिनियम के प्लांट्स स्थापित किये। उसका नाम था कालुवर्क्स जिसमें कुल 40 कर्मचारी थे और मनु उसमें सेकंड इंजीनियर थे। उनके कठिन मेहनत और अच्छी क्वालिटी के बदौलत मात्र 5 साल के अंदर ही उनकी कंपनी का बोलबाला हो गया। उन्होंने अपने बड़े प्रतिद्वंदी केन्या अलुमिनियम को भी खरीद लिया। देखते ही देखते उनके कंपनी में 800 से अधिक इम्प्लॉय हो गए थे। उसके बाद उन्होंने इंडिया, नाइजीरिया,कांगो,इथोपिया, ज़ाम्बिया आदि देशों तक अपना वयापार फैला लिया। आज के समय में उनकी कंपनी विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही है। उनका व्यापार 40 देशों तक फैला हुआ है। और उनकी कंपनी में कुल लगभग 50 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं। आज मनु चंदारिया कालुवर्क्स,मवाती रोलिंग मिल्स,बाती लिमिटेड,अलुमिनियम अफ्रीका जैसे ब्रांड के मालिक हैं।

इतने अमीर बिजनेसमैन होने के वाबजूद मनु चंदारिया बहुत ही साधारण जीवन जीते हैं। जहां बड़े बन जाने के बाद लोग अपना कल भूल जाते हैं, वहीं मनु चंदारिया नें कभी अपनी जमीन को नहीं भुला। वेलोगों के लिए हर संभव काम करते हैं। चंदारिया फाउंडेशन के तहत उन्होंने कई अस्पताल, बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल व कॉलेज साथ ही तमाम तरह के जनकल्याण हेतु कदम उठाए। वे अबतक 18 हज़ार बेसहारा बच्चो को आश्रय दे चुके हैं। वे महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को बहुत मानते हैं।

उनका कहना है कि "भारत में टाटा,अमेरिका में रॉकफेलर और फोर्ड जैसे लोग हैं। जिनके पास दूसरों की तरह ही दो हाथ, दो पैर और दो आंख हैं। फिर भी उन्होंने अपने देश के लिए दूसरों से 100 गुना अधिक किया है। वे सब मेरे लिए एक प्रेरणा है।"

मनु चंदारिया के कुछ शब्द बहुत लोकप्रिय हैं उनका कहना है कि "ज़ीरो को ज़ीरो से गुना किया जाए तो ज़ीरो ही आता है। इस लिए अगर आप सिर्फ घर में बैठे रहेंगे कुछ नहीं करेंगे तो कल सुबह परिणाम ज़ीरो ही रहेगा। लेकिन अगर आप थोड़ा भी प्रयास करेंगे तो एक तक तो पहुंचेंगे। फिर यह 1 कभी तो 2 में और फिर 4 में भी तब्दील होगा।"

2003 में चंदरिया को रानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर (ओबीई) से सम्मानित किया गया था। उसी वर्ष दिसंबर में उन्हें पूर्व राष्ट्रपति मवाई किबाकी द्वारा "एल्डर ऑफ द बर्निंग स्पेयर" से सम्मानित किया गया था, जो केन्या में सर्वोच्च नागरिक का सम्मान है।

मनु चंदारिया की पत्नी अरुणा चंदारिया और उनके पुत्र निल चंदारिया में उनके साथ बिजनेस और परोपकारी कामों में सहियोग करते हैं। वे एक बिजनेस टायकून के साथ साथ एक बेहतरीन इंसान भी हैं। उनकी सोच से दूसरे बिजनेसमैन को भी प्रेरणा लेने की जरूरत है जो बड़े बनने के बाद सबको भूल जाते हैं।

After independence, India was primarily a poor country and therefore has produced several rags to riches stories but what this man did uplifted the entire country’s economy in a matter of decades. This is the greatest rags to riches story there can ever be because it scaled to unimaginable heights without any godfather or corporate backing.

When Hirachand had a third boy in Chorvad, Gujarat, he did not expect anything out of the world from his son. Just like any other school master, he wanted his son to fare well in studies and earn a decent amount which would be enough for a living. But the confidence and approach of this young boy was shocking right since his childhood.

The boy, Dhirubhai, was a highly impatient boy who got sick of sitting in classrooms. He had a spontaneous motivation for exploring his physical abilities, going out and doing something which would bring him money. He thought the weekly village market was a great place to begin from so he started his entrepreneurial journey with selling bhajiya. He gave earnings from the market to his mother to help with household expenses.

He thought the weekly village market was a great place and started his entrepreneurial journey with selling bhajiya

What was striking about Dhirubhai was that he always knew he is going to become a very rich man in the future. One day when his mother asked him to help his father by earning money, he angrily replied “Why do you keep screaming for money? I will make heaps of money one day”. People say that he was extremely intelligent and confident about his abilities.

At the age of 16, a big break came his way when he went to Aden in Yemen to chase his big dreams. The teenager began working as a dispatch boy and his dedication almost immediately reflected in his work. Soon enough he became a distributor for Shell Products, a company which dealt in natural gas, crude oil, refined products etc.

He was an explorer and wandered around Yemen to know and learn more. In one of his adventures he found that London Stock Exchange had high demand for Yemen’s currency known as rial because of its high silver content. The smart chap that he was, Dhirubhai bought rials in bulk and melted them. For a few months he did this and sold the melted silver to jewelers and made several lakh rupees on it. This would have been a pretty satisfying amount for any other person but Dhirubhai was hungry for more.

After 10 years of working in Yemen he thought it was time to return to his homeland. With a few lakhs in hand, he began to import polyester yarn and export Indian spices. He used Rs 15,000 as capital and established Reliance Commercial Company in Mumbai. Then in 1964, he started with Reliance Textiles, produced and sold polyester cloth. Because of his constant urge to maintain high quality standards, his brand Vimal was applauded as the best polyester clothing brand. This was the time when Dhirubhai eyed on bigger goals, of becoming the heavyweight in the corporate India.

After Vimal’s success, Dhirubhai Ambani was inspired to launch Reliance Industries Limited in the 70’s. He started equity cult, which included over 58000 investors in 1977. Dhirubhai ensured and convinced rustic populations of Gujarat that buying shares will fetch profits. In fact, he ensured that annual general meetings of Reliance were held in stadiums to ensure that investors, whether small or large could attend them.

In 1986, the meeting saw over 30,000 shareholders! Even though Ambani had to deal with trauma and business difficulties, including RBI investigating his funds, yet he always managed to emerge as a winner. In 2000, Times of India voted Ambani as the greatest creator of wealth in India. This was the man who went from rags to riches.

Although it took years for corporate like Tata and Birla to achieve their worth, Ambani did it in shorter duration because of his sharp mind. He proved himself the king of diversification and generated jobs for countrymen. Moreover, he induced a faith among rural investors, making his a man with wealth and riches along with a rustic appeal! Ambani died of a stroke in 2002, but his legacy still continues

The man who started by earning Rs 300 left a humongous empire of Rs 62,000 crore behind him when he died.

When Dhirubhai died the former Prime Minister of India Atal Bihari Vajpayee said, “The country has lost iconic proof of what an ordinary Indian fired by the spirit of enterprise and driven by determination can achieve in his own lifetime.”

 

Marathi movie “Sairat” is creating records on box office with every new day. Collection of the movie is nearing 50 cr. which is highest for any Marathi movies ever.  The plot of the movie and its handling is appreciated by critics as well as audience, but something that has emerged as the USP of the movie is debutante Rinku Rajguru.

Rinku, aged only 14, hails from Akluj which is a small village in the Solapur district of Maharashtra. She is widely appreciated for her first ever movie. Despite spending a lot of time shooting for the movie, she got 81% marks in the 9th grade. She has also won national award for her performance in the movie at the hands of Honorable President of India. Her acting is praised by known actors like Aamir Khan, Ritesh Deshmukh and Aayushman Khurana. Famous director Subhash Ghai has also praised Rinku for her acting.

Rinku has become extremely popular with Google and Facebook receiving thousands of search queries. Her official handle is maintained by a team involved in the production of the movie but many fake profiles and pages in her name have been appearing on social media.

Recently, the mobile number of the Industries Minister of Maharashtra, Subhash Desai, was posted on such a page and Mr. Desai had a tough time attending to unsolicited calls. He then filed a complaint with cyber crime cell of Mumbai Police. The police with the help of cyber experts have removed the information of Mr. Desai from the page, however, phone calls received by Mr. Desai are evident to prove the popularity of this young actress.

In the movie, Rinku is appearing with another debutante Akash Thosar. She is playing a rich girl belonging to to a landlord family. She finds herself in love with a poor guy shown to be from a lower cast. The story is about their love, resistance due to social customs, their escape and survival ending in a shocking climax.

Rinku did not intend to become an actress till she went to see director Nagraj Manjule while he was on a visit to the small town of Akaluj. Nagaraj spotted her and offered the role. She appeared for a screen test and then got the call about selection after few days.

Rinku has become a sensation in just few days. Police have to deploy forces in events where she is appearing. Recently, Maharashtra Chief Minister Devendra Fadanavis greeted the entire team of Sairat on a special invitation at his official residence in Mumbai.

Rinku has portrayed a bold girl in the movie, a girl who rides bullet, can drive tractor and can fight for her thoughts. But in the real life, Rinku belongs to a common rural family of Maharashtra. Her talent and efforts have become inspiration for many girls across the state. We wish her stardom and a great future.

आंखों के रुप में ईश्वर ने हम सभी को एक अनमोल उपहार दिया है। वो उपहार जिसकी मदद से खूबसूरत प्रकृति और लोगों को देख सकते हैं, सामान्य तौर पर पढ़ सकते हैं। पर दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो नेत्रहीन हैं। जो इसकी खूबसूरती को ध्वनि और स्पर्श के एहसास के माध्यम से देखते हैं।

भारत जैसे देश में दिव्यांग लड़कियों की तो छोड़ें यहाँ सामान्य लड़कियों को आगे बढ़ने नहीं दिया जाता, उनकी शिक्षा तक रोक दी जाती है। अक्सर लड़कियों को पढ़ाई पर यह बोल दिया जाता है कि लड़किया पढ़ लिख कर क्या करेंगी, शादी के बाद उन्हें दूसरों के घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना हैं। अगर गलती से कोई लड़की दिव्यांग हो, तो उसके लिए हालात और अधिक विपरीत हो जाती है। पर आज हम आपको एक ऐसे स्कूल के बारे में बताने जा रहे हैं जहां ना सिर्फ लड़कियों को पढ़ाया जाता है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया जाता है। भले ही यहाँ की बच्चियों की आँखों की रोशनी नहीं है लेकिन दीवाली पर इनके द्वारा बनाये गए दीये दूसरों के घरों को रोशन करती है।

इस अनोखे स्कूल का नाम है “अंध कन्या प्रकाश गृह"। यह संस्था गुजरात के अहमदाबाद के मेमनगर स्थित है। यह अनोखा स्कूल दृष्टिहीन लोगों की जिंदगी में खुशियों के रंग भरने और उनके जीवन को प्रकाशित करने का काम कर रही है। इस स्कूल को 1954 में खोला गया था, जिसका मकसद विकलांग लड़कियों को शिक्षा देने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाना है। स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां पढ़ाई के साथ-साथ चिक्की, दिवाली के दीये और दूसरे हाथ से बने हथकरघा प्रोडक्ट भी बनाती हैं। जिन्हें मार्केट में काफी पसंद किया जाता है और उनके ठीक-ठाक पैसे भी मिल जाते हैं। अबतक इस संस्था की बच्चियों  द्वारा बनाये गए कुल 1.75 लाख दियों को बाजार में बेचा जा चुका है। इस काम को करने के लिए दिव्यांग बच्चियों के साथ साथ वोलेंटियर भी होते हैं जो उनको इस काम में मदद करते हैं। यहां विभिन्न प्रकार की हाथों से बनी डेकोरेटिव लैम्प्स और रंग-बिरंगे दिये बनाये जाते हैं।

यहाँ ना सिर्फ लड़कियों को पढ़ाया जाता है बल्कि पढ़ाई के बाद उनकी शादी का भी ख्याल रखा जाता है। जी बिल्कुल सही सुना आपने, शिक्षा पूरा होने के बाद अंध कन्या प्रकाश गृह ही इनके योग्य कोई लड़का ढूढ़कर इनकी शादी भी कराती हैं। बताते चलें कि विकलांग लड़कियों की खराब शिक्षा को लेकर 1954 में नीलकांत राय छत्रपति ने 10 हजार रुपए फंड के साथ इस स्कूल को शुरू किया था। शुरुआत में यहां पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या केवल चार थी। लेकिन समय के साथ इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी होती गई। यह आज एक बड़े आवासीय विद्यालय के रूप में दुनिया के सामने है। आज यहां लड़कियों की काफी संख्या है जो कुछ करने का जुनून लेकर पढ़ रही हैं। यहां पढ़ाई करने वाली लड़कियों का टैलेंट देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। ये लड़कियां अंग्रेजी फर्राटेदार बोलती हैं। इसके साथ ही वह खुद को आम लड़कियों की तरह ही हर कॉम्पिटिशन के लिए खुद को तैयार करती हैं।

आज की तारीख में यह संस्थान शारीरिक रूप से विकलांग लड़कियों को क्वालिटी एजुकेशन देने के साथ ही उन्हें जीवन के प्रति आत्मनिर्भर बनाने के लिए जाना जाता है। निश्चित ही यह अन्य परंपरागत स्कूलों से बिल्कुल अलग है। यहां के छात्रों को धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते सुनना या दीये आदि बनाते देख किसी का चौकना भले लाजिमी हो लेकिन ये विकलांग छात्र पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के मामले में किसी भी सामान्य छात्र से बिल्कुल कम नहीं हैं।

 

An old Indian saying goes, “Pyaase ko paani pilaana punya ka kaam hota hai” meaning offering water to a thirst is a good deed which will be rewarded. Acute shortage of water is a major worry for millions of fellow countrymen and snatches away much of their time, productivity and efficiency. Thankfully, we have people like Bhagwati Agrawal to restore relief and a new normalcy in their lives.

The Indian-American social entrepreneur has facilitated easier access to clean, drinking water to over 10,000 people who could not have imagined it without his support through harvesting the much-precious rainwater. His contribution has spread to six villages in India’s driest state of Rajasthan where people have to walk miles to collect water in pots crushing their heads. Agrawal’s system called ‘Aakash Ganga’ (River from the Sky) is a network of rooftops, gutters, pipes and underground reservoirs that collect and store the monsoon rains, which fall from July to September.

“The way I look at it, I’m 70-year-old. I only have maybe 10-15 years left of active life. But right now, I’m like Usain Bolt, the sprinter and I will run very fast to accomplish this mission,” Agrawal says.

The harvesting system frees adults to spend time doing more valuable activities. Not having to fetch water allows children, especially girls, to spend more time in school. People report fewer health problems and better hygiene. Dairy cows have become twice as productive. Agrawal’s nonprofit organisation, Sustainable Innovation, works in the fields of rainwater harvesting and low cost healthcare service.

Under his model, pipes are installed on the rooftops which collect rain water and fills large and small tanks. This water supports the household comfortably till the next monsoons. Earlier, women spent upto four hours daily in order to fetch water from far-away resources. Life was a constant struggle for water which should be a fundamental right of every human being.

Agrawal put together his business and tech-savy knowledge and resolved to make lives simpler for the villagers who were far from helping themselves. His efforts have been recognised by CNN and he is running for a handsome prize money and training which will widen his reach in Rajasthan.

Besides this, he is a frequent speaker on rapid commercialisation of technologies, Gandhian Approach to Sustainability, and People Culture and Innovations. Agrawal is the recipient of $100,000 Lemelson-Massachusetts Institute of Technology Sustainability Award, Energy Globe World Award for social innovation and World Bank Development Marketplace awards (twice) for rainwater harvesting and for delivery of healthcare.

 

कहा जाता है किसान मिट्टी में सोना भी उगा देने का माद्दा रखते हैं। आखिर हो भी क्यों ना, इतनी मेहनत और खून-पसीनें से उगाई गयी फसल किसी सोने से कम तो होती भी नहीं। लेकिन आज के परिवेश में किसानों को इस सोने रूपी फसल को उगाने के लिए मिट्टी की भी जरुरत नहीं पड़ती। आज तरह-तरह के आधुनिक तकनीक की खेती से बिना मिट्टी की खेती संभव है। सिर्फ संभव ही नहीं वल्कि यह अच्छी पैदावार के साथ जबरदस्त मुनाफा भी देता है। अब आधुनिक तकनीक के आने से किसानों का मिट्टी की गुणवत्ता और जलवायु पर से निर्भरता खत्म हो गयी है।

बढ़ते शहरीकरण के कारण खेती योग्य जमीनों की संख्या भी लगातार कम हो रही है। लेकिन अब बिना मिट्टी के खेती की तकनीक से इन सभी समस्याओं का हल संभव है। आज किसान हाइड्रोपोनिक तकनीक, कोको पिट तकनीक द्वारा मिट्टी व पोली हाउस तकनीक द्वारा मौसम से अपनी निर्भरता खत्म कर रहे हैं। आज हम एक ऐसे ही किसान की बात कर रहे हैं जिसनें अपनी सोच और बेहतर तकनीकों का इस्तेमाल कर खेती को मुनाफे से सौदे में तब्दील कर दिया।

इनका नाम है नंदलाल दांगी। नंदलाल राजस्थान जिला उदयपुर के महाराज खेड़ी गांव के रहनें वाले हैं। नंदलाल आज बिना मिट्टी की खेती कर सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। मिट्टी रहित कोको पीट तकनीक तथा पॉली हाउस तकनीक द्वारा खेती कर नंदलाल बम्पर पैदावार कर रहे है। उन्होंने साल 2013 में अपनी पत्नी और भाई के नाम राजकीय सहायता प्राप्त कर करीबन आठ हजार वर्गमीटर दो एकड़ भूमि पर संरक्षित खेती के लिए तीन पॉली हाउस में खीरा, टमाटर व शिमला मिर्च की खेती शुरू की। कुछ समय बाद ही टमाटर व खीरा की नई फसल भूमि सूत्र कृमि से बुरी तरह प्रभावित हो गयी। इससे नंदलाल की बहुत फसल भी बर्बाद हो गयी थी और उन्हें नुकसान भी हुआ।

नंदलाल मिट्टी की गुणवत्ता से परेसान थे पर जल्द ही उनको इसका हल मिल गया। उन्हें पता चला कि कोकोपीट विधि द्वारा खेती करने से सूत्र कृमि की समस्या नहीं आती। नंदलाल ने अपने पड़ोसी राज्य गुजरात के एक कृषि सलाहकार की मदद लेकर मृदा के स्थान पर कोकोपीट के उपयोग का पूरा ज्ञान हासिल किया। इस आईडिया की शुरूआत 2013 में हुई जब नंदलाल गुजरात गए हुए थे। इस दौरान उन्हें इजरायली तकनीक के बारे में जाना। गुजरात के साबरकांठा में हिम्मतनगर नगर निकाय में उन्होंने देखा कि एशियन एग्रो कंपनी सब्जियों का उत्पादन कोको पीट में कर रही है। कोको पीट नारियल की भुसी से तैयार हुई मिट्टी जैसे तत्व को कहते हैं पर ये मिट्टी नहीं होती।

उसके बाद उन्होंने नारियल के बुरादे का उपयोग करते हुए मिट्टी रहित खेती का तरीका शुरू किया। नंदलाल ने कोकोपीट को 5-5 किलोग्राम की प्लास्टिक की थैलियों में भरकर कुल 13,000 थैलियों में बीजारोपण कर एक एकड़ पॉली हास क्षेत्र में खीरे की खेती आरम्भ की। इस विधि में पौधों की गुणवत्ता बरक़रार रखने व इसे पोषक देने के लिए इन्हें पूर्ण रूप से फर्टिगेशन विधि द्वारा बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली से किया जाता है। नन्दलाल नें  विभिन्न प्रकार के सॉल्ट की व्यवस्था की ताकि पौधों को सभी 16 तत्वों से पोषित किया जा सके। बुआई के करीब 45 दिन बाद फूल आने लगे व खीरे लगने लगे। नंदलाल की यह खीरे की फसल पूर्ण रूप से गुणवत्तापूर्ण व सूत्र कृमि प्रकोप रहित थी।

पहले जहाँ वे अपनी दो एकड़ जमीन पर सालभर में मुश्किल से मात्र 20 टन खीरा उगा पाते थे। मिट्टी रहित कोको पीट खेती की तकनीक ने उनकी तकदीर ही बदल दी और उनकी उपज चार गुना बढ़कर 80 टन सालाना हो गई। किसान नंदलाल के फसल की पैदावार में आई बढ़ोतरी के कारण उनकी वार्षिक आय बहुत बढ़ी है। अपनी सफलता को देखते हुए उन्होंने अब तुर्की की एक उत्तम खीरे की प्रजाति युक्सकेल 53321 हाइब्रिड का उत्पादन भी शुरू कर दिया है। अब आलम यह है कि नन्दलाल के 4000 वर्गमीटर पॉली हाउस से करीब 450 क्विंटल खीरा उत्पादन हो रहा है। जिसे साधारण बाजार भाव पर भी बाजार में बेचा जाये तो उन्हें प्रति माह एक लाख रुपए से अधिक शुद्ध मुनाफा मिल रहा है। पर उनके फसल की क्वालिटी देख कर उन्हें साधारण से अधिक ही दाम मिल रहा है।

नंदलाल ना केवल किसानों के लिए एक प्रेरणा हैं बल्कि उनलोगों के लिए भी एक प्रेरणा हैं जो एक बार गिरकर ही हार मान लेते हैं। नंदलाल नें एक बार फसल का नुकसान होने के बाद भी हौसला नहीं हारा और नई तकनीक सीख कर सफल हुए व अपनें हौसले से नई मिसाल कायम की।

(यह आर्टिकल संदीप कपूर द्वारा लिखा गया है)

बुरा वक्त हर किसी का आता है। कई बार हम पैदा ही बुरी परिस्थितियों में होते हैं तो कई बार हम हालात हमारे लिए विपरीत हो जाते हैं। पर ऐसा क्यों होता है कि कठिन परिस्थितियों में कुछ लोग बिलकुल टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं। जबकि इन्ही परिस्थितियों का कुछ लोग न सिर्फ दृढ़ता से सामना करते हैं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में वो और भी ज्यादा निखर जाते हैं। दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं जिसके जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां नहीं आतीं, परंतु कुछ लोग बुरी से बुरी परिस्थिति से सफलतापूर्वक लड़कर कठिन से कठिन परिस्थिति से बाहर आ जाने की क्षमता रखते हैं। यदि आप भी अपनी मानसिक, शारीरिक, कलात्मक क्षमताओं को कुछ इसी तरह से विकसित करें तो सफलता ज्यादा दूर नहीं है। ऐसा ही एक उदाहरण पेश किया एक महिला नें जो पहले अपनी माँ के साथ सब्जी बेच करती थी। आज है एक अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाली कलाकार।

इनका नाम है शकीला शेख। 45 वर्षीय  शकीला ने गरीबी के सबसे बुरे दिनों को देखा है। शकीला का जन्म 1973 में बंगाल के दक्षिण परगना 24 जिले के मोगराघाट गांव में हुआ था। जो कि कोलकाता से करीब 30 किमी दूर स्थित है। शकीला अपने छः भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। वह महज़ 1 वर्ष की रही होगी जब उसके पिता सबकुछ छोड़ कर बांग्लादेश चले गए। उनकी माँ ज़ेहरण बीवी नें बच्चों को पालने-पोसने के लिए सब्जी बेचना शुरू किया। गाँव में सब्जियों की कीमत कम थी इसलिए वे मोगराघाट से 40 कलोमीटर दूर कोलकाता अपनी सब्जियां बेचने जाया करती थीं। जिद करने पर कभी कभी वे अपनी छोटी बेटी शकीला को भी साथ ले जाया करती थी।

शकीला कहती हैं-
"माँ ने मुझे काम करने की इजाज़त नहीं दी लेकिन मुझे घुमाने के लिए शहर ले जाती थी। मुझे सड़कों पर चलने वाले ट्राम और बसों को देखना पसंद था। कई बार जब माँ काम कर रही होती तो में अपनी नींद फुटपाथ पर ही पूरी कर लेती थी। "

शकीला की जिंदगी तब बदली जब वे बलदेव राज पनेसर नाम के एक आदमी से मिली। बलदेव राज पनेसर एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी थे और एक चित्रकार भी थे। वे सब्जियां खरीदने के लिए हर दिन बाजार आते थे और शकीला की माँ से सब्जियां खरीदते थे। वे सिर्फ एक कलाकार ही नहीं बल्कि एक समाजसेवी भी थे। वे हर रोज चॉकलेट, अंडे, पेंसिल और पत्रिकाओं वितरण गरीब बच्चों के बीच किया करते थे। बच्चे प्यार से उन्हें "डिंबबाबू" बुलाते थे और उनके पीछे भागते थे। डिंब का मतलब बंगाली में अंडा होता है।

पनेसर की अपनी हस्ताक्षर शैली थी। वह कुर्ता पायजामा पहनते थे, एक कपास का झोला रखते थे और एक छतरी को लाठी की तरह इस्तेमाल करते थे। एक दिन वे बच्चों को चॉकलेट और अंडे वितरित कर रहे था और उन्होंने शकीला यह भी चॉकलेट व अंडे दिए लेकिन शकीला ने लेने से इनकार कर दिया। इससे पनेसर बहुत प्रभावित हुए और शकीला को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। उन्होंने शकील और उसके परिवार की हर संभव मदद की। शकीला उन्हें प्यार से बाबा बुलाती थी। जिसका बंगाली में मतलब होता है दादा।

पर 1987 में उनकी शादी अकबर शेख से हो गयी। जो उससे 15 साल बड़े थे और पहले से ही एक शादी कर चुके थे। जिसके बाद शकीला सुरजापुर गांव आ गयी। परिवार के भरण पोषण के लिए उन्होंने ठोंगा बनना शुरू किया जिससे उनको रोजाना 20-30 रुपये की कमाई हो जाती थी। बलदेव राज पनेसर नें 1989 में शकीला और उनके पति अकबर को उनकी एक प्रदर्शनी में आमंत्रित किया। प्रदर्शनी के बाद, शकीला के अंदर एक अलग ही उत्साह पैदा हो गया। उन्होंने अपने पति से कहकर कार्डबॉर्ड और पेंट मंगवाए और अपने पहले कोलाज पर काम करना शुरू किया। उन्होंने सब्जियों और फलों के चित्र बनाये जो न केवल अकबर बल्कि बाबा और उनके साथी कलाकारों को भी बहुत पसंद आये।

1 साल खुद को मांझने के बाद 1990 में, शकीला ने कोलकाता में अपनी पहली एकल प्रदर्शनी आयोजित की। जहां उन्होंने अपनी पेंटिंग से 70,000 रुपये कमाए। यह उन दिनों में एक बड़ी राशि थी। जिसके बाद शकीला नें कभी मुड़ कर नहीं देखा। वे अब अपने गांव में एक छोटे लेकिन आरामदायक घर मे अपने तीन बच्चे के साथ रहती है। उन्हें गर्व है कि उनके 22 वर्षीय बेटे बाप्पा शेख कभी-कभी कोलाज भी बनाते हैं।

उनके बाबा यानी बलदेव पनेसर ने उन्हें कोलकाता में सीआईएमए (इंटरनेशनल मॉडर्न आर्ट सेंटर) कला गैलरी से जोड़ा। जहां अब वे भारत और विदेशों में अपने कोलाज बेच रही हैं। आज वे फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और अमेरिका जैसे देशों में अपनी कला बेच रही हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल में अकादमी ऑफ डांस से म्यूजिक एंड विजुअल आर्ट अवार्ड , 2003 में ललित कला अकादमी अवार्ड, चारुकला पुरस्कार समेत विभिन्न पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे पूरी तरह अपनी सफलता का श्रेय अपनी बाबा यानी बलदेव राज पनेसर को देती है, जो 2014 में इस दुनिया को छोड़ गए।

उनकी कहानी इस बात का सशक्त सबूत है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है, बशर्ते अपने सपनों के प्रति आपका जुनून और ईमानदारी पक्की हो।

(यह आर्टिकल संदीप कपूर द्वारा लिखा गया है)

बेरोजगारी हमारे देश की एक प्रमुख समस्या में से एक है जो देश की प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरुद्‌ध करती है। बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है। अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। यूँ तो हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं, पर एक जो सबसे बड़ा कारण है उसके बारे में कोई बात नहीं करता। वह है किसी भी काम को छोटा या बड़ा समझना और समाज के अनुसार गधों की दौड़ में शामिल हो जाना। आजकल के लोग बहुत बड़ी गलतफैमी में रहते है और वह है ओहदे की। लोग चाहकर भी वह काम नहीं करते जो उन्हें छोटा लगता है या जो काम उनके स्टेटस को शोभा नहीं देता।

आदमी का रुतबा कितना भी बड़ा हो पर बुरे दौर में अगर वो किसी काम को छोटा समझ कर करने के लिए तैयार नही होता तो एक न एक दिन उसे हाशिये पर आना ही है। वह इंसान उस छोटे काम को भी पूरी ईमानदारी से करे तो वह काम उसे बड़ा जरूर बनाता है। एक बात सोचो अगर किसान आज अपने काम को छोटा समझ कर खेती नहीं करते तो क्या होता? क्या हम भूखे पेट जिंदा रह पाते। फिर हमें खेती करने से क्यों गुरेज़ है ? इसीलिए कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता।

आज यह बात महिलाएं भी जान गई हैं और महिलाएं आज सभी क्षेत्र में सफलता का परचम लहरा रही हैं। आज हम एक ऐसी महिला की बात करनें जा रहे हैं, जो ना केवल बकरी पालन जैसे काम कर महिलाएं आर्थिक रूप से सबल बनीं हैं। बल्कि अपनी लगन और मेहनत से अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनने का काम किया है।

इनका नाम है श्रीमती भानु कलिता। भानु असम के कामरूप से नाहीरा गाँव की रहनें वाली हैं। असाम की रहने वाली भानु नें एक साधारण गृहणी से आज एक स्वनियोजित महिला तक का सफर तय किया है। एक गरीब घर की पत्नी जो अच्छी तरह से शिक्षित भी नहीं है। उनके पति गुरुदेव कलिता की आय उनके परिवार और बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं थी। घर चलाना मुश्किल हो रहा था, बच्चों की फीस इकठ्ठा नहीं हो पाती थी, इस वजह से उनकी पढ़ाई भी बाधित होती थी।फिर वक़्त बदला और भानु कलिता नें स्वरोजगार करने का निर्णाय लिया और दिमाग में विचार आया बकरी पालन का। चूँकि भानु ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी उनके कोई दूसरा काम नहीं आता था। पर बकरी पालन का काम तो वह कर ही सकती थीं। उन्होंने इसकी शुरुआत 5 बकरियों के साथ की। अपने काम के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी की वजह से भानु सफलता की राह पर अग्रसर हो गयी और फिर इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

भानु नें बकरियों का अर्ध-गहन प्रबंधन प्रणाली के तहत पालन पोषण किया। जैसे सुबह में भानु उन बकरियों को खुले खेतों में चराई के लिए भेज देती थीं और शाम को जब बकरियाँ वापस आती थी तो उन्हें खेत का ताज़ा घास और चार खिलाया जाता था। इसके अलावा भानु अपने रसोई से फल सब्जीयों के छिलके भी उनके खिलाया करती थीं। जिससे बकरियों को फल सब्जियों के छिलके में मौजूद पौष्टिक पोषक तत्व भी प्राप्त हो जाते थे। जिससे बकरियों में तेज़ी से विकास हुआ और बकरियों की गुणवत्ता बहुत अच्छी हुई। बकरी को गरीबों की गाय माना जाता है क्योंकि वे उन्हें अपना दूध, मांस, खाल से लेकर बाल सबकुछ दे देती हैं।

इसके अलावा भानु नें बकरियों के लिए अलग से हवादार शेड्स बनवाये हैं। भानु नें बकरी पालन के लिये कई तरह के पारंपरिक उपाय भी आजमाए। मसलन नीम और तंबाकू के पत्तों के साथ बकरी को नहलाना। इससे बकरियों में त्वचा रोग और एक्टोपारासाइट्स रोग होने का खतरा कम हो जाता है। साथ ही उन्होंने बकरियों के बेहतर प्रजनन के लिए व्यवस्था की।

भानु द्वारा पारंपरिक तौर तरीके अपनानें के कारण उनकी बकरियों में कम मृत्यु दर और बढ़ती जनसंख्या के साथ स्वस्थ और वजन भी बहुत अच्छा रहा। भानु कालिता आज गांव में एक उदाहरण के रूप में उभरीं हैं। उनकी इक्षाशक्ति और आत्मविश्वास ने क्षेत्र में बकरी पालन को बढ़ावा दिया और गाँव में उनसे प्रेरणा लेकर बकरी पालन की छोटी इकाईयां भी शुरू हुई है। 2016 में भानु नें 53 बकरियां बेचीं थी और उन्हें 80,430 रुपये की कमाई हुई थी। वर्ष 2017 में उनकी कमाई बढ़कर लाखों में पहुंच गई।

भानु नें साबित कर दिया कि बकरी पालन निश्चित रूप से महिलाओं की कमाई में वृद्धि और उनके लिए स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर सकता है। उनको आजीविका मिलेगी जो उनके आत्मविश्वास को बढ़ावा देगी। गरीब महिलाएं बकरी पालन कर दूध और बकरियाँ बेचकर अपने बच्चों की शिक्षा के साथ परिवार की बुनियादी आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम हो सकती हैं और इससे गरीबी निश्चित रूप से कम हो सकती है।

(यह आर्टिकल संदीप कपूर द्वारा लिखा गया है)

आज भारत उन देशों में हैं जहाँ गरीब और भुखमरी सर्वव्यप्त है।दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है और भूखे लोगों की करीब 23 फीसदी आबादी भारत में रहती है। सयुंक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है, जो कि विश्व भर में सबसे अधिक है। आज आपको हर चौक-चौराहे,मंदिर-मस्जिद,बस-ट्रेन कोई भी ऐसी जगह नहीं होगी जहाँ आपको भिखारी ना मिले। यह हमारे देश की बढ़ रहे गरीबी को समझने के लिए काफी है। ना जाने ऐसे कितने लोग हैं जिनको दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती। भूखों में इस दर्द को कुछ युवा देख नहीं पाया और उसे दूर करने के लिए एक पहल की शुरुआत की। आज इसी सोच के साथ भूखों का पेट भर रहा है दरभंगा का 'रोटी बैंक'।

बिहार में एक छोटे सा शहर है दरभंगा, यहाँ में कुछ युवाओं की एक टोली ने गरीबों की भूख मिटाने के लोए कुछ महीने शुरू किया एक अनोखा बैंक "रोटी बैंक"। इस संस्था के एक दर्जन सदस्य पिछले आठ महीने से घर-घर से बची रोटी जमा कर गरीबों को निवाला मुहैया करा रहे हैं। ये युवा रोटी बैंक बनाकर निःस्वार्थ भाव से गरीब, लाचार और बेबस लोगों के पेट की आग बुझाने में लगे हैं। बनारस में रोटी बैंक देखकर कुछ युवाओं नें दरभंगा में भी इसे शुरू करने की ठानी।  यह संस्था हर दिन पांच सौ से अधिक गरीब लोगों को रात का भोजन उनके घर पहुंचाती है। शुरूआत में कुछ लोगों ने इन युवाओं का खूब मजाक उड़ाया। लेकिन कई लोगों के अलावा सोशल मीडिया पर मिले लोगों की सराहना से इन युवाओं को खूब ऊर्जा और प्रेरणा मिली। जिसके बल पर आज यह टीम पूरे जिले में मशहूर हो गयी है, इनसे लाभान्वित लोग इन्हें दुआ देते नहीं थकते।

रोटी बैंक की टीम में कुछ युवा और छात्र जुड़े हुए हैं हो लोगों द्वारा दान किये गए और पार्टियों में बचे खाने को कलेक्ट करके उन्हें गरीबों तक पहुंचाते हैं। दअरसल इन्होंने सोशल मीडिया और बैनर-पोस्टर के जरिये अपने मोबाइल नम्बर को पूरे शहर में फैला दिया है।  उन्होंने लोगो से स्लोगल के माध्यम से अपील की है कि बचे भोजन फेंकें नहीं, सौंप दें रोटी बैंक को। उसमें साफ लिखा है कि आप भी इस सामाजिक और पुण्य के काम में मदद कर सकते हैं।  जसके बाद विभिन्न मोहल्लावासी फोन कर इस टीम के सदस्यों को अपने यहां बचे हुए खाना देने बुलाते हैं। कई रेस्टोरेंट और होटल तो इनके प्रयास के कायल हो गए हैं। ये रोज रात का खाना इन्हें मुहैया कराते हैं। शाम होते ही रोटी बैंक के सदस्यों को लोगों का फोन आना शुरू हो जाता है। 

फोन करने वालों का पता लेकर रोटी बैंक के सदस्य खाना इकट्ठा कर लेते हैं। फिर सभी खानों की पैकिंग करते हैं।इसके बाद रात के अंधेरे में रोटी बैंक के सदस्य निकल पड़ते हैं। जहां भी ऐसे लाचार लोग इन्हें दिखाई देते हैं, फौरन गाड़ी रोक कर उन्हें खाना देते हैं। रोटी बैंक की खास बात यह है कि इसमें काम करने वाले सभी सदस्य या तो छात्र है या अपना कारोबार करते हैं। खुद के काम से निपटने के बाद वे रोटी बैंक का यह नेक काम करते हैं। वार्ड 21 की पार्षद मधुबाला सिन्हा इस कार्य से इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने बर्तनों से सुसज्जित एक मारुति वैन टीम को उपलब्ध कराई है। इसमें खाना ढककर रखने के लिए चार बर्तन अलग से हैं।

इंसानियत का फर्ज निभायेंगे, भूखे को रोटी खिलायेंगे की सोच के साथ आज दरभंगा का यह रोटी बैंक सैकड़ों गरीब और भूखों के लिए किसी बरदान से कम नहीं है। अन्न को फेंकने के बदले भूखे को उपलब्ध कराने की यह पहल बहुत कबीले तारीफ है। आज देश के हर हिस्से में इस तरह के नेक पहल की आवश्यकता है।

(यह कहानी संदीप कपूर द्वारा सबमिट किया गया है)

Google’s CEO Sundar Pichai found an unusual letter lying on his desk which he hadn’t expected. The Google big boss found himself reading a handwritten letter from a seven-year-old girl named Chloe Bridgewater from Hereford in UK. It wasn’t a fan mail but a clear expression of her intentions.

The seven-year-old wants a job at Google when she is bigger. We think a picture of robots serving coffee and the idea of working from a bean bag excited little Chloe and made her write to Pichai himself.

This is what she wrote:

Wasn’t that super cute? She was very happy to post her hand-written letter but her joys knew no bounds when she received a reply from the Google Boss.

Sundar Pichai gave a thumbs up for her ambitions and told her to work hard and apply for a job after she is done with the school. “I look forward to receiving your job application when you are finished with school! :)”

Now who wouldn’t be cheered up after reading this? Well, Pichai just proved he is definitely the coolest boss to work with. Hope Chloe’s name appears in Google’s payroll soon!

पत्रकारिता का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में न्यूज़ चैनल और अखबारों के पन्ने घूमने लग जाता है। दूर से हमें यह एक नाम, शोहरत और पैसे वाला कैरियर नज़र आता है। पर इसके पीछे एक पत्रकार की मेहनत हमें नज़र नहीं आती।

बगैर जज्बे के पत्रकारिता मुमकिन नहीं है। पत्रकार होना केवल नौकरी नहीं बल्कि यह एक जुनून होता है। पत्रकारिता में मानसिक संतुलन के साथ समाजिक नैतिकता होना जरूरी है।जरूरी है कि पत्रकार अपने धर्म को समझे और निभायें। पर आज कल यह चीजें काम ही देखने को मिलती है। दिनों दिन पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा है। दरअसल चंद खराब लोगों की वजह से पत्रकारिता का मूल मकसद की छिन्न-भिन्न होने लग गया है। आलम तो यह हो गया है कि जिस समाज के लिए पत्रकारिता का जन्म हुआ है, उसी का विश्वास उसपर से उठता जा रहा है। आज पत्रकारिता भी गुटों में बटी नज़र आती है, कोई विशेष मीडिया समूह किसी विशेष का पक्षधर या विरोधी प्रतीत होता है। पैसे और टीआरपी के खेल बीच कोई मर रहा है तो वह है पत्रकारिता।
पर गनीमत है कि आज भी कुछ ऐसे पत्रकार जीवित है जिन्होंने अपनें साथ-साथ असली पत्रकारिता को भी जिंदा रखा हुआ है। आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात करने जा रहे है जो पत्रकारिता पैसों से लिये नहीं अपनें जुनून के लिए करता है।

इस स्वतंत्र पत्रकार का नाम है दिनेश कुमार। उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के गाँधी कॉलोनी में रहने वाले दिनेश पत्रकारिता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। 53 साल के दिनेश के पास ना तो कोई का दफ्तर है, ना मशीन और ना ही कोई कर्मचारी। बावजूद इसके बस उनका जुनून ही है जो पिछले 17 सालों से एक अख़बार चला रहे हैं। इस अखबार का नाम है " विद्या दर्शन"। दिनेश के इस अख़बार ख़ासियत यह है कि यह पूरा अखबार वे अपने हाथों से लिखते हैं। उनका काम है हाथ से लिखना और एक हस्तलिखित कॉपी की फ़ोटोकॉपीयां करवाकर अकेले लोगों तक पहुंचाना। इस काम में उनका एक मात्र साथी है उनका साइकिल, जिसकी मदद से वो जगह-जगह जा कर अपना अख़बार सार्वजनिक स्थान पर चिपकाते हैं।

दिनेश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आजीविका के लिये वो बच्चों को आइसक्रीम, चॉकलेट और खाने की बाकी चीज़ें बेचते हैं। वो शुरुआत से ही समाज के लिये कुछ करना चाहते थे। उनका सपना था वकालत करने का, लेकिन घर के माली हालात कुछ ठीक न होने के कारण वो सिर्फ 8वीं कक्षा तक ही पढ़ पाए। इसके बाद उनके ऊपर पारिवारिक बोझ आ गया। परिवार चलाने के लिये उन्होंने मेहनत मज़दूरी करना शुरू कर दिया और उनके सपने कहीं पीछे छूट गए।
पर उन्होंने अपने जुनून को मारने नहीं दिया। सुबह से शाम तक आजीविका के लिये हार्डवर्क करने वाले दिनेश को अख़बार चलाने के लिये किसी भी प्रकार की सरकारी अथवा गैर सरकारी वित्त सहायता प्राप्त नहीं नहीं है। अपने गैर विज्ञापनी अख़बार से दिनेश किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं कर पाते है। फिर भी अपने हौसले और जूनून से दिनेश निरंतर सामाजिक परिवर्तन के लिये नियमित रुप से अख़बार निकाल रहे है। दिनेश हर सुबह 10 बजे जिलाधिकारी कार्यालय जाते हैं और 3 घंटे में अपनी ख़बर लिखते हैं, उसके बाद अपने काम पर निकल जाते हैं।

मात्र कोरे कागज़ के पन्ने और काला स्केच पेन ही उनके पत्रकारिता का शस्त्र है। तमाम शहर की दूरी वे अपनी साईकिल से तय कर लेते हैं। हर रोज अपनी रोजी रोटी चलाने के अलावा दिनेश पिछले सत्रह वर्षों से अपने हस्तलिखित अख़बार “विद्या दर्शन” को चला रहा है यह बात काबिले तारीफ है। प्रतिदिन अपने अख़बार को लिखने में दिनेश को ढाई-तीन घंटे लग जाते हैं, उसके बाद उन्हें आने आजिविका के काम पर भी निकलना पड़ता है। पर दिनेश ने ना तो कभी हौसला हारा ना ही कभी पत्रकारिता छोड़ने का सोचा।

हर दिन दिनेश अपने अख़बार में किसी न किसी विशेष घटना अथवा मुद्दे को उठाते है और उस पर वे अपनी निर्भीक राय रखते हुए खबर लिखते हैं। पूरा अख़बार उनकी सुन्दर लिखावट से तो सजा ही होता है साथ ही उसमें समाज की प्रमुख समस्याओं और उनके निवारण पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है।

दिनेश के द्वारा मुज़ज्फ्फर नगर की गांधी कालोनी और उसके आस-पास फ़ोटोकॉपी किये हुए कुछ अख़बार नुमा कागज़ दीवारों पर चस्पा किये हुए मिल जाएंगे। इनमें दिनेश देश और समाज से जुड़ी समस्याओं को उठाते हैं और अपनी निर्भीक राय प्रस्तुत करते हैं। वो रोज़ाना अपने हाथ से किसी एक समस्या पर ख़बरें लिखते हैं और फिर उसकी फ़ोटोकॉपी लेकर साइकिल पर निकल जाते हैं मुज़फ्फरनगर की गलियों में। इन्हें वो ख़ुद अपने हाथों से पेड़ों, दीवारों, बस स्टॉप पर चिपकाते हैं जहां लोगों का ध्यान आसानी से जा सके। उनकी इन ख़बरों में सभी समस्याओं के उल्लेख के साथ उचित हल भी बताया जाता है। अपनें अखबार की एक प्रति वो फ़ैक्स के द्वारा संबंधित राज्य के सीएम और देश के प्रधानमंत्री तक भी भेजते हैं।

दिनेश वाकई अन्य पत्रकारों के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं। अगर हर पत्रकार दिनेश से कुछ प्रेरणा ले तो सामज का मीडिया पर से घटता विश्वास दोबारा लौट सकता है।

(यह कहानी संदीप कपूर द्वारा सबमिट किया गया है)

हमारे देश के हज़ारों युवा आपनें आंखों में सपनें संजोये दूसरे देशों का रुख करते हैं। अपने बेहतर भविष्य की खातिर वे हर भौगोलिक बंधनों को लांघ जाते हैं। उनमें से कुछ अपनी मंज़िल को पाने में सफल होते हैं और अपनें साथ-साथ अपनें देश का भी नाम रौशन करते हैं। पर असल मायनें में आपकी सफलता तभी मानी जा सकती है। जब आप खुद के अलावा दूसरों के हित के बारे में भी, समाज के उत्थान हेतु प्रयास करें। पर आज के दौर इस तरह के लोग बहुत कम ही मिल पाते हैं। लोग स्वयं के सुख एवं परिवार के लियर धन इकट्ठा करनें में इतने मसगुल हैं कि उन्हें सड़क किनारे भूख से मार रहे भिखारी की कोई परवाह भी नहीं होगी। पर आज हम जिस शख्स की बात करनें जा रहे हैं उन्होंने विदेश जाकर ना केवल करोड़ों का साम्राज्य स्थापित किया बल्कि जनकल्याण हेतु सैकड़ों काम भी किये हैं।

इनका नाम है असा सिंह जोहल। जोहल कनाडा के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं और शायद सबसे बुजुर्ग भी। वे कनाडा में स्थित कंपनी टर्मिनल ग्रुप में मालिक हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जोहल की उम्र 95 वर्ष की है और अगले महीने अगस्त में वे 96 के हो जाएंगे। पर उम्र के इस पड़ाव में भी असा सिंह जोहल सिर्फ शारीरिक व मानशिक ही नहीं सामाजिक रूप से भी सक्रिय रहते हैं। उनके इस ऊर्जा से देख बहुत लोग उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं। दरअसल असा सिंह जोहल का जन्म 1922 में पंजाब के जालंधर जिले के जांदीयला में हुआ था। जब वह महज़ डेढ़ वर्ष के थे तब अपनें पिता के साथ कनाडा आये थे।

उनके पिता पहली बार सन 1905 में पहली बार कनाडा आये थे।  उन्होंने कई साल ओंटारियो लंबर सॉ मिल्स में काम किया। 1919 में वे अपने देश भारत वापस आ गए और यहां उनकी शादी हो गयी। कुछ वर्षों तक वे अपने परिवार के साथ भारत में ही रहे लेकिन भविष्य ही तलाश में उन्हें एक बार कनाडा के रुख करना पड़ा। 1924 में वे अपनी पत्नी और डेढ़ साल के पुत्र यानी असा सिंह के साथ कनाडा आ गए। वे कनाडा के शहर वैंकुवर के निकट ओक स्ट्रीट ब्रिज के इलाके में रहने लगे। उनके पिता ने वापस सॉ मील में काम करना शुरू कर दिया और कुछ साल बाद असा भी स्कूल जाने लगे। लाइफ धीरे-धीरे पटरी पर आनी शुरू हो गयी थी।

1928 में उनके परिवार को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा। दो सालों के अंदर उनकी सारी सेविंग्स खत्म हो गयी और उन्हें नार्थ वैंकुवर शिफ्ट होना पड़ा। असा को अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी, तब वे ग्रेड 6 में पढ़ रहे थे। उन्हें पढ़ाई छूटने के बहुत गम था लेकिन उनके पास कोई और चारा भी नहीं था। मजह 13 साल की छोटी से उम्र में ही वे भी लंबर सॉ मिल्स में काम करने लगे। उन्हें प्रति घंटे 25 सेंट मिलते थे जो कि दूसरों से 10 सेंट कम थी और वह इसलिए क्योंकि वे अंडर एज थे। असा धीरे-धीरे वहां लकड़ी का काम सीखते गए और साथ ही कुछ पैसों की बचत भी की। 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना खुद का बिजनेस करने का फैसला लिया। उन्होंने एक पार्टनर से साथ जलावन की लकड़ी घरों तक पहुंचाने का काम शुरू किया।

उस वक़्त फायर वुड यानी जलावन की लकड़ियों की खासी मांग थी। क्योंकि उस वक़्त गैस और बिजली उपलब्ध नहीं थी, लोग लकड़ियों का इस्तेमाल अपने घरों को गर्म करने के लिए किया करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने इस बिजनेस को बढ़ना शुरू किया और इस दौरान वे कभी कभी सॉ मिल भी जाया करते थे। यह एक छोटी शुरुआत थी लेकिन समय गुजरने के साथ इसे बड़ा बनने में देर नहीं लगी। 1948 में असा सिंह नें शादी करने का फैसला किया और लड़की ढूंढने के लिए वतन वापस लौट आये। बचपन के बाद वह पहली बार भारत वापस आ रहे थे। जालंधर जिले में स्थित एक गाँव की लकड़ी कश्मीर कौर से शादी की। 1949 में वे अपनी पत्नी के साथ वैंकुवर वापस आ गए।

इस दौरान वे अपने बिजनेस पार्टनर के साथ लकड़ियों का बिजनेस कर रहे थे। जिसमें वे फायर वुड सप्लाई करने के साथ साथ निजी जंगलों से लड़की काटने और सप्लाई करने का काम कर रहे थे। 1955 में उनकी ज़िंदगी में एक टर्निंग पॉइंट आया जहां उन्होंने एक छोटी सी सॉ मिल स्थापित की। इस दौरान दोनों बिजनेस पार्टनर्स ने बटबार कर लिया। जोहल नें सॉ मिल रख ली और उनके पार्टनर नें बाकी लकड़ी सप्लाई का बिजनेस। जोहल के लिए यह लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। 9 कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ यह बिजनेस बहुत तेजी से गति पकड़ रहा था। 1962 में जोहल नें इसका नाम टर्मिनल रख दिया। 1973 तक उन्होंने दो और बड़ी सॉ मिल खरीद ली, जिसमें कुल 125 वर्कर काम करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने मैनुफेक्चरिंग बिजनेस में भी कदम रखा और वासिंगटन सिटी में एक मैनुफैक्चरिंग यूनिट भी स्थापित की।

आज उनकी कंपनी का बिलियनस ऑफ डॉलर का टर्नओवर है। उनके अंदर कुल 500 इम्प्लॉय काम करते हैं। टर्मिनल फॉरेस्ट इंडस्ट्रीज आज सबसे बड़ी प्राइवेट ओन कंपनी है। जिसके पास स्क्विमिस और सनसाइन कॉस्ट पर अपने जंगल हैं। इतना बड़ा अंपायर खड़ा करने वाले असा सिंह जोहल दिल के भी बहुत नेक हैं। वे जरूरतमंदों की मदद के लिए बहुत तरह के काम करते हैं। वे इंडियन कल्चर सेंटर ऑफ कनाडा गुरुनानक निवास के चेयरमैन हैं। जहाँ उन्होंने जनकल्याण हेतु करोड़ों का दान दिया है। उसके अलावा उन्होंने लड़कियों की शिक्षा, बेसहारा बच्चों के रहने व पढ़ाई के लिए और कैंसर मरीजों के इलाज के लिए भी अरबों का दान दिया है। अपनें देश के लिए भी वे हर संभव काम करते हैं। उन्होंने अपने गाँव जंदीयाला में 1लाख 65 हज़ार डॉलर की लागत से लड़कियों के लिए एक भव्य स्कूल बनवाया है। जिसमें आसपास के 18 किलोमीटर के इलाके की कुल 750 बच्चियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।

असा सिंह जोहल की कहानी सच में बहुत प्रेरणादायक है। एक ओर जहां उन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। वहीं दूसरी को सफलता मिलने पर भी अपनें पैर को जमीन पर टिकाए रखा। जमीन से जुड़कर उन्होंने लोगों की सेवा की और इस उम्र में भी कर रहे हैं। आज के युवाओं को उनसे कुछ सीखने की जरूरत है।

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