KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

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Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

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डॉक्टर का पेशा एक ऐसा पेशा माना जाता है जिसमे दया सहानुभूति और किसी की समस्या को समझने और उसका निराकरण करने की शक्ति निहित होती है। लेकिन आज के दौर में डॉक्टरी का पेशा व्यवसायिकता की चरम सीमा पर पहुँच गया है। दया सहानुभूति की भावना खोने लगी है। लगभग हर डॉक्टर व्यवसायिकता की दौड़ में अपने आप को आगे लाना चाह रहा है लेकिन कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो आज भी अपने पेशे को पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। सेवा ही उनका पहला धर्म है और अपने धर्म का निर्वाह करना ही उनके जीवन का लक्ष्य। आज एक ऐसे ही डॉक्टर का परिचय हम आप से करवाने जा रहे हैं। 

 स्टेनली मेडिकल कॉलेज चेन्नई के एक पूर्व होनहार छात्र रहे डॉ थिरुवेंगदाम वीराघवन की जो निःस्वार्थ भाव से 1973 से व्यासपीढ़ी के निवासियों की सेवा कर रहे हैं। डॉ थिरुवेंगदाम तो आज भी मात्र दो रुपये लेने वाले डॉक्टर है जो चार दशक से भी अधिक समय से उत्तर चेन्नई में गरीबों का इलाज कर रहे हैं। अपने कार्य और व्यवहार से वह इतने लोकप्रिय होने लगे कि उनके साथ के और आस पड़ोस के अन्य डॉक्टरों ने एक साथ मिलकर उनका विरोध करना प्रारम्भ किया और मांग रखी की डॉ थिरुवेंगदाम मरीज़ो से कम से कम 100 रुपये परामर्श शुल्क लें। उसके बाद डॉ थिरुवेंगदाम ने अपने मरीजों से किसी भी प्रकार का शुल्क स्वीकार करना ही बंद कर दिया। लेकिन उनकी स्वयं की आवश्यकताओं की  पूर्ति भी आवश्यक थी। उनकी क़ाबिलियत से सभी वाकिफ़ थे इसलिए उन्हें एक बड़े कॉरपोरेट अस्पताल में नौकरी के लिए उम्मीदवारों को जांच करने के लिए नियुक्त किया गया और इससे उन्हें एक स्थिर आय मिलनी शुरू हो गई।

डॉ थिरुवेंगदाम बताते है की "मैंने अपनी फैलोशिप को राज्य सरकार की मदद से किसी भी खर्च के बिना अध्ययन करते हुए पूर्ण किया। पूर्व मुख्यमंत्री की नीतियों का आभार प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा कि मुझे रोगियों से शुल्‍क लेने के लिए बाध्‍य नहीं किया गया।

 डॉ थिरुवेंगदाम का सपना है की व्यासपीढ़ी की झुग्गी में रहने वाले गरीबों के लिए एक अस्पताल बना दिया जाए जहां आखरी साँस तक वे उनकी सेवा का कार्य करें। वर्तमान में वह ईराकंशेरी में एक क्लिनिक में 8 बजे से शाम 10 बजे और व्यासपीढ़ी में 10 बजे से मध्यरात्रि के बीच अशोक स्तंभ के पास बैठकर रोगियों को देखने का कार्य करते हैं। मद्रास मेडिकल कॉलेज में तो उन्होंने कुष्ठ रोगी मर्दों को कपड़े पहनाना तक सिखा दिया है।

डॉ थिरुवेंगदाम की पत्नी सरस्वती भारतीय रेलवे में अधिकारी के रूप में कार्यरत थीं और कुछ वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्त हुई है। उनके बेटे दीपक और बेटी प्रीती भी मॉरीशस के एक कॉलेज में दवाओं का अध्ययन कर रहें हैं। डॉ थिरुवेंगदाम अब चाहते है की उनका पूरा परिवार अब उनके साथ कार्य करे और गरीबों को उच्च स्तरीय इलाज उपलब्ध हो।

डॉ थिरुवेंगदाम का निःस्वार्थ सेवा भाव जवाब है उस प्रत्येक डॉक्टर के लिए जो व्यवसायिकता की आंधी में खोते जा रहे हैं और अपने पेशे को बदनाम कर रहे हैं।

 


तेज़ाब से जलने का दर्द, अपनों का सितम और फिर इलाज कराने के लिए लाखों का खर्च। आखिर ऐसी स्थिति में किसी के लिए जीना कितना मुश्किल होता होगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। अगर वह शख्स ग़रीब हो, तब तो उसके लिए जीना और भी कठिन हो जाता है। लेकिन इसी दर्द और मुश्किल को कम करने का काम कर रहे हैं लखनऊ शहर के कॉस्मेटिक और प्लास्टिक सर्जन डॉ विवेक सक्सेना। विवेक तेज़ाब से जले लोगों का मुफ्त में इलाज करते हैं, उन्होंने तेज़ाब से पीड़ित कई लोगों की मुफ्त में प्लास्टिक सर्जरी करके, उन्हें दोबारा नया जीवन दिया।

एसिड से जले युवक को दिया नया जीवन

डॉ विवेक सक्सेना गोमतीनगर में दिवा क्लिनिक नाम से प्लास्टिक और कॉस्मेटिक सर्जरी का हॉस्पिटल चलाते हैं, डॉ विवेक ने इस सोशल वर्क की शुरुआत तब की, जब उनकी मुलाकात भोपाल के बिलाल से हुई। दिखने में चुस्त दुरुस्त, स्मार्ट नौजवान सा दिखने वाला इकबाल भी एसिड अटैक का शिकार हुआ था, सुनने में अटपटा जरूर लगता है लेकिन ये सच है। इकबाल एक तरफा प्यार का शिकार हुआ था, उस हमले में उसकी आँखें और बाल जल गए थे। डॉ विवेक ने उसका मुफ्त में इलाज किया और उसको आर्टिफिशियल बाल दिए।

जले पर नमक नहीं, मरहम लगाते हैं डॉ विवेक

समाज के जो लोग संवेदनहीन होकर लोगों पर तेज़ाब फेंकते हैं, उसी समाज के संवेदनशील इंसान हैं, डॉ विवेक कुमार सक्सेना। लखनऊ के केजीएमयू से प्रैक्टिस कर चुके डॉ विवेक अभी तक कई तेजाब पीड़ितों का मुफ्त में इलाज कर चुके हैं। केनफ़ोलिओज़ से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि तेज़ाब पीड़ित के इलाज में कम से कम 15-20 लाख का खर्च आता है। और 8-10 सर्जरीज के बाद घरवाले कर्ज में डूब जाते हैं। इतना ही नहीं वे तेज़ाब पीड़ितों के अलावा लेप्रोजी, कैंसर पेशंट और दृष्टिहीन लोगों का भी फ्री में इलाज करते हैं। तेज़ाब से पीड़ित कविता को प्लास्टिक सर्जरी की मदद से दोबारा सुन्दर सूरत देने का श्रेय डॉ विवेक को ही जाता है। डॉ विवेक ने कविता की एसिड अटैक में जल गयीं आइब्रो बनाई, जिसमें एक लाख रुपये खर्च हुए और बिलाल के हेयर ट्रांसप्लांट में डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए।

ऐसे हुई शुरुआत

उन्होंने कहा कि उनके पिताजी भी डॉक्टर थे। उनके एक संबंधी का देहांत सिर्फ इस वजह से हो गया क्योंकि उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे। इसी घटना ने उनके जीवन को बदला और उन्होंने जरूरतमंदों का निशुल्क इलाज करना शुरू किया। डॉ विवेक को उनके इस काम के लिए कई जगह सम्मानित भी किया जा चुका है। इतना ही नहीं डॉ विवेक हर साल एसिड अटैक पीड़िता कविता का जन्मदिन भी धूमधाम से मनाते हैं।

डॉ विवेक की इस पहल के बाद देशभर के कई एसिड अटैक पीड़िता उनसे मिल चुकी हैं और अपना इलाज करवा रही हैं। यदि हर कोई डॉ विवेक की तरह सोचने लगे और डॉक्टर को पेशे की तरह न जोड़े तो कोई भी व्यक्ति इलाज के अभाव में दुनिया से नहीं जाएगा। सुना तो था कि डॉक्टर भगवान होते हैं लेकिन डॉ विवेक इस बात का प्रमाण भी हैं।



हमारे आस पास हर रोज न जाने कितनी ऐसी वस्तुएँ दिखती हैं जो भले ही व्यर्थ मान कर फेंक दी गयी हों, पर उन वस्तुओं में उपयोगिता जीवित रह जाती है। हम अक्सर उन वस्तुओं पर इसलिए ध्यान नहीं देते क्योंकि हमे उनके सही उपयोग की जानकारी नहीं होती। हम उन्हें या तो कूड़े में फेंक देते हैं या कबाड़ में बेच देते हैं। लेकिन कहते हैं न कि असली हीरे की पहचान केवल एक जौहरी को ही होती है, उसी प्रकार से ऐसी वस्तुएँ की उपयोगिता केवल कुछ लोगों द्वारा ही समझी जाती है। ऐसे ही जौहरी मणिपुर के इम्फाल में भी रहते हैं। वहां रहने वाली पिता-पुत्र की जोड़ी एक सफल रीसाइक्लिंग कार्यक्रम के जरिये न केवल वातावरण का बचाव कर रही है बल्कि इसके जरिये शहर के हज़ारों लोगों को रोजगार भी प्राप्त हो रहा है। सदोकपम ईतोम्बी सिंह एवं उनके पिता सदोकपम गुणकांता ने इम्फाल में वर्ष 2007 में प्लास्टिक-वेस्ट रीसाइक्लिंग यन्त्र को स्थापित किया था। जिसके जरिये प्लास्टिक के कचरे से पाइप, फूलों का गमला, टब एवं अन्य घरेलू उत्पाद बनाये जाते हैं। आइये उनके इस कार्य को विस्तार से समझते हैं।

वर्ष 2007 में हुई 1.5 लाख से शुरुआत, आज कंपनी करती है 1.5 करोड़ का कारोबार

पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने वर्ष 2007 में केवल रीसाइक्लिंग के उद्देश्य से अपने यन्त्र को स्थापित किया था। हालाँकि उनकी सफलता की उड़ान का आलम कुछ यह रहा कि उन्होंने वर्ष 2010 में विनिर्माण इकाई में और मशीनों को जोड़ देने के पश्च्यात इसे एक पूर्ण कंपनी में तब्दील कर दिया। इस कंपनी का नाम एसजे प्लास्टिक इंडस्ट्रीज़ है और यह इम्फाल जिले के सगोलबंद सदोकपम लेइकै इलाके में स्थित है। इस इकाई का सञ्चालन करने वाली पिता पुत्र की जोड़ी में जहाँ पिता ने सरकारी कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है तो वहीँ बेटे ईतोम्बी एक कंप्यूटर एप्लीकेशन के विद्यार्थी रहे हैं। उनके द्वारा व्यापार के क्षेत्र में यह सफलता पाना अतुलनीय है।

शहर को प्लास्टिक प्रदूषण से बचने के लिए शुरू की थी यह विनिर्माण इकाई

जैसा की हम जानते हैं कि सरकार से लेकर तमाम गैर सरकारी संगठन एवं सामाजिक कार्यकर्ता हमेशा से इस बात पर जोर देते आये हैं कि हम सभी को प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि इसके कारण होने वाले प्रदूषण से हमारा भविष्य अंधेरे में पड़ सकता है। इस बात को इस पिता-पुत्र की जोड़ी ने गंभीरता से समझा और अपने राज्य में प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल की रोकथाम के लिए उसे रीसायकल करने का सोचा और फिर स्थापित की अपनी विनिर्माण इकाई। इसके जरिये वो अपने इलाके के जीवन यापन स्तर को भी बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं। ईतोम्बी ने एएनआई से बातचीत करते हुए कहा कि, "प्लास्टिक एक बेहद ही ज़रूरी उत्पाद है और उतना ही जरूरी है इसे खत्म करने का इंतज़ाम करना।"

खुद की इकाई स्थापित करने से पहले प्लास्टिक इकट्ठा करके भेजते थे गुवाहाटी और दिल्ली

इस पिता पुत्र की जोड़ी का पर्यावरण से पुराना प्रेम है। 90 के दशक में अपने इलाके में गुणकांता प्लास्टिक कचरे को रीसायकल करने का प्रयास अपने अकेले दम पर किया करते थे। इसमें उनके बेटे भी उनका साथ दिया करते थे। वो दोनों मिलकर अपने इलाके में कचरे को बटोर कर नई दिल्ली एवं गुवाहाटी में स्थित रीसाइक्लिंग प्लांट में भेजा करते थे। अभी भी राज्य में पाए जाने वाले 120 प्रकार के प्लास्टिक में 30 प्रकार के प्लास्टिक मणिपुर में रीसायकल कर लिए जाते हैं, बाकि 90 प्रकार के प्लास्टिक को अब भी गुवाहाटी और दिल्ली भेजना पड़ता है। हालाँकि एसजे इंडस्ट्रीज़ के इम्फाल में कार्यशील हो जाने के बाद प्रदेश में बहुत हद तक प्लास्टिक रीसाइक्लिंग की समस्या हल हुई है।

पिता-पुत्र की इस जोड़ी के प्रयासों को देख कर यह ज़रूर कहा जा सकता है कि पर्यावरण को बचाते हुए एवं लोगों को रोज़गार देते हुए उनके द्वारा बेहद नेक कार्य किया जा रहा है। उन्होंने इस बात को बेहद गहराई से समझा कि चूँकि प्लास्टिक को रीसायकल किया जा सकता है और इससे पहले कि उनके बढ़ते उपयोग के कारण हमारे पर्यावरण एवं पानी को नुक्सान पहुंचे, उसका सही इस्तेमाल होना चाहिए एवं उसको रीसायकल करते रहना चाहिए। इसी सोच के साथ इस जोड़ी ने अकेले दम पर ने केवल एक सफल व्यापार की शुरुआत कि बल्कि यह भी दिखा दिया की अगर व्यक्ति चाहे तो समाज में परिवर्तन की मुहिम अकेले अपने कंधो पर उठा सकता है। 

सुख और दुख मनुष्य के जीवन में इस तरह शामिल हैं जैसे दिन और रात। दुख आने पर यदि मनुष्य दूसरे के दुख को महसूस करके ऐसा समाधान खोज ले जिससे पूरा समाज लाभान्वित हो तो एक समय ऐसा आएगा कि दुनिया में कोई दुखी नहीं रहेगा। 

ऐसी ही एक शुरुआत की है सैयदुल लश्कर ने जो पेशे से एक टैक्सी ड्राइवर हैं। 12 साल पहले उनकी बहन को इलाज नहीं मिलने के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। बहन की मृत्यु से आहत लश्कर ने एक अनोखे मिशन की शुरुआत की। अपनी टैक्सी में बैठने वाली सवारियों से किराए के अतिरिक्त वह अस्पताल बनाने के लिए दान मांग कर इकट्ठा करने लगे। 

55 वर्ष की उम्र में उनका यह सपना साकार हुआ और कोलकाता से 55 किलोमीटर दूर पुनरी गांव में मरुर्फा स्मृति वेलफेयर फाउंडेशन के नाम से 36 लाख की लागत से बने इस अस्पताल की शुरुआत उन्होंने की। यहां आस-पास के सौ गांवों के लोगों को इलाज मिल सकेगा। 6 बिस्‍तरों वाले इस अस्पताल को अगले 6 महीनों में 30 बिस्तरों तक बनाने का लक्ष्य भी लश्कर ने रखा है। यहां 12 डॉक्टरों की टीम मरीजों को देखती है। एक्स-रे, ईसीजी मशीन की सुविधा के साथ, 20 रुपए ओपीडी शुल्क और दवाइयों की निशुल्क सुविधा विभिन्न एनजीओ द्वारा यहां मुहैया कराई जाएगी।  

23 वर्ष की सृष्टि घोष ने इस अस्पताल का उद्घाटन किया जो कालिकापुर में मैकेनिकल इंजीनियर है उन्होंने अपनी पहले महीने की तनख्वाह अस्पताल के लिए दान दी है। सृष्टि और उनकी मां लश्कर की टैक्सी में जब पहली बार बैठी थी तो उन्होंने सौ रुपए अस्पताल के लिए दान में दिए थे। चेन्नई में नौकरी मिलने पर चाहे सृष्टि कोलकाता नहीं आ पाई लेकिन इस अस्पताल में देने के लिए अपनी पहली तनख्‍वाह उन्होंने रख ली थी। लश्कर के इस महान कार्य से प्रेरित होकर सृष्टि ने  यह सहयोग करना अपना कर्तव्य समझा। 

आसपास के क्षेत्र में कोई अस्पताल नहीं होने के कारण गांव के लोगों को परेशानी होती थी। बहन की छाती में इन्फेक्शन के चलते 2004 में 17 वर्ष की उम्र में लश्कर की बहन चल बसी थी। किसी और के साथ ऐसा ना हो यह लक्ष्य पूरा करने का संकल्प लश्कर ने लिया था। 

सच्ची सेवा भावना के लिए भी किसी कार्य को शुरू करना एक चुनौती होती है।  बीघा जमीन खरीदने के लिए तीन लाख रुपए जुटाना लश्कर के लिए बहुत कठिन कार्य था। अपनी बीवी के सभी गहने बेचकर उन्होंने यह जमीन खरीदी। लश्कर की पत्नी शमीमा ने उन्हें हमेशा भरपूर सहयोग प्रदान किया। लश्‍कर अस्पताल में नर्सिंग ट्रेनिंग सेंटर खोलकर गांव की लड़कियों को ट्रेनिंग भी दिलवाना चाहते हैं। इसके लिए उनका प्रयास जारी है। 

अस्पताल की नींव रख कर जो शुरुआत लश्कर ने 12 वर्ष पहले की थी वह ना केवल इमारत का रुप ले चुकी है, बहुत से सकारात्मक लोग उनके साथ जुड़ते जा रहे हैं जो यकीनन इस अस्पताल को जरूरी सुविधाएं मुहैया करा रहे है और भविष्य में करवाएंगे। 

समाज के लिए अच्छा कार्य शुरू करने की देर होती है बहुत से ऐसे लोग जो शायद किसी के साथ का इंतजार कर रहे होते हैं। वह ऐसे कार्यों से जुड़ते चले जाते हैं शायद उनकी इस उपलब्धि से यह सिद्ध हो गया है।

इतिहास हमें अपने अस्तित्व से अवगत कराता है ये बात 100 प्रतिशत सही है। कुछ बाते हमे गौरवशाली होने का एहसास कराती है तो भारतीय इतिहास की कुछ दुखद घटनाएं हमारी आँखे नम कर जाती है । इतिहास में हमने क्या खोया और साथ ही ये एहसास कराती है आने वाले भविष्य में हम ये गलतियां दुबारा न दोहराये। हमारे देश नें इतिहास का ऐसा ही काला दिन देखा था 3 दिसम्बर 1984 को जब भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से मिथाइल आइसो साइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसमें कई हजार लोगों की मौत हो गई थी। हजारों लोग शारीरिक अपंगता और अंधेपन का शिकार हुए थे। भारतीय इतिहास ने ऐसा दर्दनाक मंज़र नहीं देखा था। लोग इसे भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते हैं। पर इस भयावह कांड में एक ऐसा शख्स भी था जिन्होंने अपनी व अपने परिवार की जान की परवाह किये बिना सैकड़ों की जान बचाई। जिसे भोपाल गैस त्रासदि का हीरो कहा जाए तो कम नहीं होगा।

इनका नाम है गुलाम दस्तगीर। गुमान उस वक़्त भोपाल के डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट थे। जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के उस भयानक रात को लाखों लोगों की ज़िन्दगी बचाई थी। उन्होंने अपने एक फैसले से सैकड़ों की जान बचाई ओर न बचा पाया तो अपने 3 बेटे और पत्नी को। भोपाल गैस कांड को 34 साल पूरे हो गए हैं, 3 दिसंबर 1984 की उस रात की यादें आज भी लोगों के जहन में जिंदा हैं जब भोपाल में हजारों लोग सोए तो थे लेकिन अगली सुबह लोग जागे ही नहीं। इस काली रात की आज तक सुबह नहीं हो सकी है। आज भी वह मंजर लोगों के दिलो को कचोट जाता है।यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली गैस ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था।यूनियन काबाईड से जहरीली गैस रिसने का सबसे ज्यादा असर रेलवे पर हुआ। यहां 10 हजार कर्मचारियों की आबादी में 130 मौतें रिकार्ड हुईं। 1 घंटे के अंदर 21 व्यक्तियों की मौत हुई और 300 व्यक्ति बेहोश हुए।

उस रात डिप्टी स्टेशनअधीक्षक गुलाम दस्तगीर कुछ लंबित कागजी कार्य पूरा करने के लिए अपने कार्यालय में ही बैठे थे। इस काम ने उन्हें रात में 1 बजे तक अपने ऑफिस में ही बैठाये रखा। इसी बीच गोरखपुर मुंबई एक्सप्रेस के आने का समय हो गया जैसे ही वह बाहर निकले उनकी आंखों में जलन शुरू हो गई। उन्होंने अपने गले में खुजली महसूस की। उन्हें नहीं पता था कि यूनियन कार्बाइड की कीटनाशक कारखाने से लीक जहरीले धुएं रेलवे स्टेशन पर भी फैल चुकी थी। अब तक स्टेशन अधीक्षक हरीश धूर्वे समेत उनके तीन रेल सहयोगियों की मृत्यु हो चुकी थी। वह पूरी तरह से समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। इसके बाद भी उन्होंने तुरंत कार्य करने का फैसला किया। जब स्टेशन मास्टर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने भोपाल को सभी ट्रेन यातायात को निलंबित करने के लिए विदिशा और इटारसी जैसे पास के स्टेशनों के वरिष्ठ कर्मचारियों को सतर्क कर दिया।

सवारियों से भरी गोरखपुर-कानपुर एक्सप्रेस पहले से ही एक प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी और इसका जाने का समय 20 मिनट देरी का था। मगर अपने मन की बात सुनते हुए गुलाम दास्तागीर ने कर्मचारियों को बुलाया और ट्रेन को तुरंत प्लेटफॉर्म से रवाना करने लिए कहा। जब सभी ने पूछा कि क्या उन्हें तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक कि ऐसा करने का आदेश प्रधान कार्यालय से नहीं आए, तो गुलाम दास्तागीर ने जवाब दिया कि वह ट्रेन के शुरुआती प्रस्थान के लिए पूरी जिम्मेदारी लेंगे।सभी नियमों को तोड़कर और किसी से अनुमति लेने के बिना, वह और उनके बहादुर कर्मचारियों ने व्यक्तिगत रूप से ट्रेन को आगे जाने के संकेत दे दिए। ये उन्हीं का दिमाग था जिसने कितने ही लोगों की जान बचा ली थी।

पीड़ित लोगों की भीड़ से घिरा हुआ स्टेशन जल्द ही एक बड़े अस्पताल सा दिखाई देने लगा। दस्तगीर स्टेशन पर रहे, दृढ़ता से अपना कर्तव्य कर रहे थे। उन्होंने इस बात की भी फिक्र नहीं की कि उनका परिवार भी शहर के बीचो-बीच बसा हुआ है। गुलम दस्तगीर के इस काम नें सैकड़ों लोगों का जीवन बचाया। हालांकि, इस आपदा का शिकार उनके घर वाले भी बनें। त्रासदी की रात को उनके बेटों में से एक की मृत्यु हो गई और दूसरे ने आजीवन के लिए स्किन इंन्फेक्शन हो गया। खुद दस्तगीर ने अपने 19 वर्ष अस्पताल में बिताएं। जहरीले धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने के कारण उनके गले में संक्रमण हो गया। 2003 में जब वह अपनी लम्बी बीमारी से हार गए और दम तोड़ दिया। उनके मृत्यु प्रमाण पत्र से इस बात का खुलासा हुआ कि वह एमआईसी (मेथिल इस्साइनेट) गैस ही उनकी बीमारी और मौत का कारण बनी। सचमुच वह किसी हीरो से कम नहीं थे जिन्होंने अपने परिवार और खुद के जान को गवां कर सैकड़ों की जान बचाई।

शिक्षा और साक्षरता के लिए देश में सभी को प्रयास करना चाहिए क्योंकि गरीबी से लड़ने के लिए, भ्रष्टाचार दूर करने के लिए और देश के समग्र विकास के लिए सभी का शिक्षित होना अनिवार्य है। कई बार हमें इसकी अहमियत बहुत देर में पता चलती है और हम यह कहकर इसे टाल देते हैं कि अब तो हमारी उम्र तो अब कमाने और परिवार चलाने की है।

पर "पढ़ने और सीखने की कोई उम्र नहीं होती"। यानी कि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम कुछ भी सीख सकते हैं। ये जितना कहना आसान है करने में थोड़ा मुश्किल है। हमने कुछ सीखने की उम्र खुद ही तय कर रखी है। जैसे कि पढ़ाई लिखाई, गाड़ी या साईकल चलाना, तैराकी सीखना। इन सब के लिए हमारे मन में यही धारणा है कि शुरुआती दौर में इन्हें सीख लो तो ठीक लेकिन बढ़ती उम्र के साथ इनको सीखने की गुंजाइश कम होती जाती है। लेकिन फिर भी दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपने अंदर की सीखने की इच्छा को मरने नही देते और उम्र के ऐसे पड़ाव में नई चीजें सीख जाते हैं जो दूसरों के लिए नामुमकिन के बराबर था।आज हम आपको एक ऐसी वृद्ध महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने ना केवल 96 साल की उम्र में साक्षरता परीक्षा पास की बल्कि उसमें टॉप भी किया।

इनका नाम है कार्त्यानी अम्मा। 96 वर्षीय महिला कार्त्यानी अम्मा केरल राज्य के साक्षरता परीक्षा में 100 में से 98 अंक हासिल कर परीक्षा में टॉप किया है। यह परीक्षा मलयालम में आयोजित की गई थी। इस परीक्षा का आयोजन केरल सरकार 'अक्षरलक्षम् मिशन' के तहत करवाती है। अलपुज्जा ज़िले के चेप्पाड़ गांव में रहने वाली कार्त्यानी अम्मा को केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के हाथों अक्षरलक्ष्यम् साक्षरता सर्टिफिकेट दिया गया। बता दें कि कार्त्यानी अम्मा कभी स्कूल नहीं गईं। वे जब तक जीवित हैं, तब तक पढ़ना चाहती हैं। उनका परिवार मंदिरों और घरों में सफाई का काम करता था। फिलहाल कार्त्यानी अम्मा चेप्पाड़ गांव में अपनी बेटी और पोते-पोतियों के साथ रहती हैं।

अम्मा के पिता के एक टीचर तब बावजूद इसके वो और उनकी बहन शिक्षा से दूर रहीं। अम्मा को बचपन में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी इसका कारण उनके घर की आर्थिक स्तिथि का अच्छा न होना था। शादी के बाद उनके छह बच्चे हुए। अपने पति की मृत्यु के बाद अब सारे घर की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर ही आ गयी।

बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने घरों में जाकर काम करने के अलावा स्वीपर का काम भी किया। हालांकि, वह थोड़ा बहुत पढ़ना जानती थीं। आज उन्होंने वहीं से पढ़ना शुरू किया, जहाँ से छोड़ा था। जिस उम्र में अक्सर बुजुर्ग लोगों का उठना-बैठना भी मुश्किल हो जाता है। वह स्वयं को सिर्फ भगवान नाम में लगाने के बारे में ही सोचते हैं। लेकिन अम्मा ने इस सोच को पीछे ढकेलते हुए शिक्षा प्राप्त करने के लिए कदम आगे बढाए हैं। ऐसे में अम्मा वाकई समाज के हर तबके के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत हैं।

केरल सरकार की अक्षरलक्षम साक्षरता मिशन की इस परीक्षा में हिस्सा लेने वाली वे सबसे बुजुर्ग महिला थीं। इस परीक्षा में लगभग 43 हजार अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था, जसमें से करीब 42 हज़ार नें यह परीक्षा पास की है। बता दें कि इस मिशन में लेखन, पाठन और गणित के कौशल को मापा जाता है। यह परीक्षा इसी साल अगस्त में हुई थी, जिसके नतीजे बुधवार को घोषित किए गए। सूत्रों के मुताबिक, अम्मा इससे पहले भी कई परीक्षाएं दे चुकी हैं। इस परीक्षा में 80 कैदियों ने भी हिस्सा लिया था। साथ ही अनुसूचित जाति के 2420 अभ्यर्थियों और अनुसूचित जनजाति के 946 अभ्यर्थियों ने भी हिस्सा लिया था।
परीक्षा तीन चरणों में आयोजित की गई थी। पहली 30 नंबर की रीडिंग टेस्ट,40 नंबर की मलयालम लेखन और 30 नंबर गणित के। इसमें अम्मा ने रीडिंग टेस्ट में पूरे नंबर लेकर आई।

बात दें केरल को पूर्ण साक्षरता वाला राज्य घोषित किया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद वहां अलग-अलग प्रकार के जन साक्षरता वाले अभियान जारी हैं ताकि जो भी कमी रह गई हैं उसे पूरा किया जा सके। इस अभियान में सीनियर सिटिजन, आदिवासियों, मछुआरों, झुग्गी बस्तियों के लोगों जो निरक्षर हैं उनपर खास ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।  दरअसल यूनेस्को के नियम के मुताबिक अगर किसी देश या राज्य की 90 फीसदी जनसंख्या साक्षर है तो उसे पूर्ण साक्षर मान लिया जाता है।अब नए अभियान के द्वारा केरल सरकार ने 100 फीसदी साक्षरता दर हासिल करने का लक्ष्य बनाया है जिसके तहत समाज के हर वर्ग, हर व्यक्ति को साक्षर बनाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में इस उम्र में कार्त्यानी अम्मा के इस जज्बे नें सबको एक ऊर्जा देने का काम किया है।

 

मुश्किल हालात हम सब के जीवन में आते हैं लेकिन फर्क सिर्फ इतना है की कोई उन हालातों के आगे घुटने टेक लेता है तो कोई उनका सामना करने का निश्चय कर लेता है। और जो इन मुश्किल हालातों का सामना करते हैं, आखिर में वही मंजिल को प्राप्त करते हैं। यह भी सच है कि हमारे जीवन में हमारे सामने आने वाले कष्टों से ही हमारा परिमार्जन होता है। जो उन कष्टों को सह नहीं पाते वो शायद मुकाम पाने की दिशा में आगे बढ़ भी नहीं पाते। हमे हमारे हौसले के बलबूते खुद की परेशानियों से जूझना जिस रोज आ जाता है, जीवन में मंज़िल की राह उसी दिन आसान हो जाती है। आज की कहानी भी ऐसी ही एक लड़की की है जिसने तमाम परेशानियों के बीच भी अपनी हिम्मत को बुलंद रखते हुए जीवन में एक बड़ा मुकाम हासिल किया। हम जानते हैं कि हाल ही में यूपीएससी के परिणामों की घोषणा हुई है और इन्हीं परिणामों के साथ कई कहानियां जुड़ कर इतिहास बन गयी हैं जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करेगी। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक दास्ताँ है यूपीएससी में 577 वीं रैंक हासिल करने वाली देहरादून की डॉ. मोनिका राणा की। आइये जानते हैं कि आखिर कैसे विपरीत परिस्थितियों में होने के बावजूद उन्होंने यह सफलता अपने नाम की।

बचपन से थीं होनहार, पिता का सपना था उन्हें अधिकारी बनते देखना

मूल रूप से ग्राम नाडा लाखामंडल चकराता निवासी मोनिका बचपन से हो पढ़ाई में बहुत होशियार थी जिसके चलते उनके माता पिता ने एक सपना देखा कि एक दिन उनकी बेटी प्रशासनिक अधिकारी बनेगी। मोनिका ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दून के स्कॉलर्स होम से पूरी की, उसके बाद कक्षा छठी से 12वीं की शिक्षा उन्होंने सेंट जोसेफ्स स्कूल से पूरी की। लेकिन तभी समय ने करवट ली और मोनिका के पिता गोपाल सिंह राणा और मां इंदिरा राणा की साल 2012 में लाखामंडल में एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। माता पिता की मृत्यु ने मोनिका और उनके पूरे परिवार को बिखेर दिया। लेकिन उस दुःख की घड़ी में मोनिका की बहन दिव्या राणा ने उनका हौसला बढ़ाया जो कि दिल्ली के यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में मैनेजर पद पर कार्यरत हैं। उसके बाद डॉक्टर बनने का लक्ष्य लेकर मोनिका ने साल 2015 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। मोनिका बताती हैं कि, "मम्मी पापा को खोने के बाद मैं बिलकुल टूट गयी थी और ऐसे समय में मेरे पास एक ही लक्ष्य था और वो था बहुत पढाई करना। ऐसा करते हुए मैंने ठान लिया था कि मुझे उनके हर सपने को अब पूरा करना है। एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं वापस अपनी बुआ मीरा तोमर के यहाँ आ गई और यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।"

हर हाल में अफ़सर बनना था उनका एकमात्र लक्ष्य

अपने माता पिता की मृत्यु के बाद उनके सपने को पूरा करना मोनिका ने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना दिया और कठिन लगन और मेहनत के साथ इस प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। मोनिका ने वेदांता कोचिंग सेंटर से कोचिंग की उसके बाद वह दिल्ली चली गई जहां उन्होंने श्रीराम सेंटर से कोचिंग कर यूपीएससी एग्जाम में यह सफलता प्राप्त की। जब उनकी यूपीएससी में 577 रैंक आई तो उनके घर में रिश्तेदार आकर बधाई देने लगे पर मोनिका को तो सबसे ज्यादा अपने माता-पिता याद आ रहे थे। वो उन्हें याद करते हुए काफी भावुक नजर आई। मोनिका ने बताया कि, "काश मेरे माता-पिता आज जिंदा होते तो वह बहुत ज्यादा खुश होते क्योंकि आज मैंने उनके सपने को पूरा कर दिया है। वो मुझे अफ़सर बनकर खुद के पैरों पर खड़े होते देखना चाहते थे और आज यह मैंने कर दिखाया है।"

मोनिका की सफलता के बारे में जान कर यह लगता है कि अगर व्यक्ति चाह ले तो वो हर असंभव लगते कार्य को भी पूरा कर लेता है। माता पिता की मृत्यु के बाद वो चाहती तो हार मानकर इसे अपनी नियति समझ सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं सोचा और मेहनत करते हुए यह मुकाम हासिल कर लिया। मोनिका के माता पिता आज जहाँ कहीं भी होंगे, वो अपनी बेटी की सफलता पर गर्व अवश्य कर रहे होंगे की उसने मुश्किल हालातों का सामना करके आखिरकार यह सफलता अर्जित कर ली। मोनिका के साहस, निश्चय और कठिन परिश्रम को सलाम है। 

सफलता के रास्ते उन्हीं के लिए खुलते हैं जो असफल होने पर भी मेहनत और प्रयास जारी रखते हैं। आराम परस्ती के लिए  यह कहकर परिश्रम से पीछा छुड़ा लेते हैं कि दुनिया का दस्तूर है अमीर और अमीर हो रहे हैं गरीब और गरीब। वह कभी सफलता का स्वाद नहीं चल पाते हैं। परिश्रमी लोग ऐसे होते हैं जो आशा और आत्मविश्वास का सहारा लेकर अंधेरों को रोशन करने का दम रखते हैं।  हमारी आज की कहानी भी ऐसी ही महिलाओं के एक समूह के बारे में है जिन्होंने प्रियदर्शनी महिला उद्योग की स्थापना कर के उसे एक ब्रांड में तब्दील कर दिया। 1996 में  महाराष्ट्र के छोटे से शहर वरोरा के बैंक मैनेजर मोइन काजी से मिलने महिलाओं का एक समूह पहुंचा। वह महिलाएं बैंक से लोन लेना चाहती थी। मोइन काजी ने जब उनका उद्देश्य पूछा तो उन्होंने बताया कि वह इससे आगे लोगों को छोटे-छोटे लोन देंगी। इन लोगों के पास गिरवी रखने के लिए कोई सिक्योरिटी नहीं है रोजगार से आमदनी बहुत कम है और पहले लिए उधार का कोई रिकॉर्ड नहीं है लेकिन उन महिलाओं का कहना था कि जिन लोगों को वह पैसा देंगी उन पर उनका अच्छा दबदबा है इसलिए लोन का रुपया शत-प्रतिशत वापस आएगा।  सब कुछ बैंक मैनेजर के ऊपर था उनका विश्वास जीतने पर ही महिलाओं को लोन मिल सकता था। यह उन महिलाओं की खुशकिस्‍मती थी कि मोइन काजी ने लोन देने के साथ-साथ जिला प्रशासन की मदद से महिलाओं के समूह को बीना रावत जो कि कॉमर्स में स्नातक है, की अध्यक्षता में महिला उद्योग के नाम से रजिस्टर्ड करवाया। दो सप्ताह में व्यापार योजना, लोन की औपचारिकताएं, स्टोरेज और गोदाम जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में भरपूर सहयोग और मार्गदर्शन दिया।

प्रियदर्शिनी के ब्रांड बनने का सफर यहीं से शुरू हुआ। एक वस्तु नहीं अनेकों वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित कर सभी को प्रियदर्शनी ब्रांड के अंतर्गत लाने का फैसला लिया गया।  छोटी मशीनों की औद्योगिक नगरी नागपुर में संस्था की मशीनरी को बनवाने का काम शुरू हुआ जैसे कि, पॉपकॉर्न बनाने की मशीन, जो पेट्रोलियम से चलती है। 

ब्रांड का प्रचार करने के लिए प्रिंटर ने कैरी बैगस पर प्रियदर्शिनी के नाम और लोगो लगाने का काम उचित दामों पर मुहैया करा दिया। मोमबत्ती के निर्माता ने मुंबई से नई से नई डिजाइन के सांचे उन्हें दिए जिससे इलाके में लोगों के बीच प्रिय‍दर्शिनी की मांग बढ़ने लगी।

मार्केटिंग की समस्या को दूर करने के लिए वरोरा की म्‍यूनिसिपल काउंसिल ने चॉक स्टिक, मोमबत्ती और झाड़ू का ऑर्डर अधिक से अधिक मात्रा में दिया। उधर स्थानीय दुकानदारों ने प्रियदर्शनी का माल अपनी दुकानों पर रखना शुरू कर दिया।  महिलाओं की मेहनत बढ़ती पूंजी और विस्तृत सेवाओं के रूप में रंग ला रही थी। वर्मीसेली जवें, कपूर की टिकिया बनाना, बचे हुए समय में सिलाई के काम में कार्यरत रहकर महिलाएं निरंतर प्रगति कर रही थी। 

स्कूल के बच्चों के लिए दिन के खाने की सप्लाई एक सुनहरे अवसर के रूप में प्रियदर्शिनी को मिली लेकिन खाने में मिल रही लगातार शिकायतों के कारण प्रियदर्शनी ने 1000  बच्चों के भोजन तक सीमित कर के विश्वासपात्र महिलाओं को कार्य के लिए चुना। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रियदर्शनी महिला उद्योग को मिले सम्मान से एक प्रतिष्ठित समूह के रूप में प्रियदर्शनी की पहचान बननी शुरू हुई।  

व्यापार की बारीकियों की जानकारी के बिना इन महिलाओं के समूह ने जिस आत्मविश्वास से व्‍यापार शुरू किया और लगातार सीखते हुए विकास की अनवरत सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सफलता की जिस मंजिल को पाया है उसका मूल मंत्र कर्मशीलता और कड़ा परिश्रम है।  

 

खुशी और संतुष्टि की परिभाषा प्रत्येक मनुष्य के जीवन में उम्र के हर पडाव पर अलग हो सकती है। मसलन बचपन में खेलना कूदना, युवावस्‍था में दोस्‍तों के साथ मौज मस्‍ती, रिटायरमेंट के बाद घर पर आराम करने में किसी को खुशी मिल सकती है कई ऐसे भी है जो स्वेच्छा से चैरिटेबल संस्थाओं में निशुल्क सेवा देकर खुशी महसूस करते हैं, लेकिन आज हम जिनके बारे में आपको बताने जा रहे हैं वह हैं हैदराबाद के गंगाधर तिलक जो रेलवे में इंजीनियर के पद पर 35 वर्षों तक कार्य करते रहे। 2008 में उनका रिटायरमेंट होने के बाद उन्होंने एक ऐसा मिशन शुरू किया कि आज वह देश भर में ‘सड़कों के डॉक्टर’ के नाम से जाने जाते हैं समाज सेवा के अनोखे कार्य से वह सड़क पर दिखने वाले किसी भी गड्ढे की मरम्मत करते हैं ताकि सड़क पर एक्सीडेंट ना हो। 

गंगाधर तिलक का बेटा अमेरिका में है। रिटायरमेंट के बाद कुछ समय वह अपने बेटे के पास रहने गए। वहां से वापस आकर एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सलाहकार के रूप में काम करने लगे। एक दिन कार से गुजरते हुए रास्ते में एक गड़ढे के आ जाने के कारण कीचड़ उछल कर वहां से गुजर रहे स्कूली बच्चों की ड्रेस पर जा गिरा जिससे वह गंदे हो गए। इस घटना के बाद गंगाधर तिलक को सड़क के गड्ढों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के बारे में पता चला। शहर में उन्होंने एक एक्सीडेंट देखा जिसमें एक सरकारी बस ने ऑटो को टक्कर मार दी और ड्राइवर की मौके पर मौत हो गई। तिलक ने पुलिस को इसकी जानकारी दी की सड़कों के गड्ढों को भरकर कितनी ही जानें बचाई जा सकती है। लेकिन शायद पुलिस की कार्यवाही उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाई। बस फिर क्या था उन्होंने अपनी कार में टाट के बोरे रखने शुरू कर दिए और बन गए सड़कों के डॉक्टर। जहां गड्ढा देखते उसे भरने की कोशिश करते। 2011 में उन्होंने सॉफ्टवेयर कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ दी और पेंशन के पैसों से सड़कों की मरम्मत करने की जिम्मेदारी संभाली। 

सोशल मीडिया पर तिलक की अनोखी समाज सेवा आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। तिलक की पत्नी को सड़कों के गड्ढे भरने का उनका यह काम अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने चुपचाप अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे को पिता के इस काम की जानकारी शिकायती स्‍वर में की। लेकिन बेटा तो पिता से भी दो कदम आगे निकला उसने अपने पिता के इस अद्भुत कार्य की जानकारी सोशल मीडिया पर फेसबुक पेज और वेबसाइट के माध्यम से लोगों और सरकार तक पहुंचानी शुरू कर दी। इस पहल के कारण कॉलेज के युवा और बच्चे तिलक की मदद के लिए आगे आए तो दूसरी ओर लोगों ने अपने इलाकों के गड्ढों की रिपेयर के लिए तिलक को फोन करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं तिलक के बेटे ने इलाके के कमिश्नर को अपने पिता की इस मुहिम के बारे में जानकारी दी तो कमिश्नर ने आश्वासन दिया कि अब सरकार की ओर से यह काम किया जाएगा। लेकिन तिलक ने सरकारी मदद का इंतजार ना करते हुए अपनी समाज सेवा को जारी रखा। जून 2012 से कमिश्नर की ओर से उन्हें गड्ढे भरने की सामग्री भी दी जाने लगी। 

एक परिवर्तन की आहट तिलक को अपने आसपास महसूस होने लगी। सड़कों के इस डॉक्टर ने अपनी अनोखी मुहिम से सोशल मीडिया की सहायता से सरकारी तंत्र और आम जनता को जागरुक कर ही दिया। 

आज अनेकों इस प्रकार की समस्याएं हम अपने देश में देखते, सुनते और उनका सामना करते हैं इन समस्याओं का निराकरण करने के लिए एक छोटी सी पहल कर दी जाए तो देश व समाज की तस्वीर हम स्वयं बदलने में सक्षम हो सकते हैं।

‘माइक मूर्ति’ सुनने में जितना दिलचस्प लगता है, उतनी ही रोचक मूर्ति के नाम के साथ यह विशेषण जुड़ने की कहानी भी है। दक्षिण भारत के धार्मिक उत्सवों में खोए हुए बच्चों की सूचना देने वाली आवाज लोगों को अकस्‍मात ही आकर्षित करती है, वह आवाज मूर्ति की है जो पिछले 50 सालों में 48 हजार बच्चों को अपने परिवार से मिला चुके हैं। 

ऐसे शुरू हुआ था मूर्ति का सफर

लगभग 54 साल पहले 1964 में रामेश्वरम के एक होटल में मूर्ति की आवाज की तरफ आकर्षित होकर एक पुलिस इंस्पेक्टर ने 10 साल के मूर्ति को पहली बार खोए हुए बच्चे की घोषणा करने के लिए पुलिस विभाग की तरफ से नियुक्त किया था। मूर्ति ने तब सोचा भी नहीं था कि यह काम उनके जीवन का उद्देश्य बनने जा रहा है। जिले के आईजी ने मूर्ति की पहली घोषणा पर खुश होकर उन्हें 100 रुपए  दिए थे। उस समय यह एक बड़ी रकम थी। तब से पुलिस विभाग ने मूर्ति को बड़े-बड़े धार्मिक उत्सवों में भीड़-भाड़ के दौरान बुलाना शुरू कर दिया।

50 वर्षों में अपनी प्रतिभा को निखारते रहे  

इस 50 साल के सफर में मूर्ति ने तमिल, इंग्लिश, मराठी, हिंदी, गुजराती, तेलुगु और कन्नड़ भाषा में भी घोषणा करना सीख लिया जिसके कारण रामेश्वरम जैसे मशहूर तीर्थ स्थल पर भी उन्हें बुलाया जाने लगा। मूर्ति के लिए वह पल बहुत संतोषप्रद होता है जब खोया हुआ बच्चा अपने माता पिता से मिलता है। बहुत वर्षों बाद मिलने पर भी माता-पिता माइक मूर्ति का धन्यवाद करना नहीं भूलते हैं।

मीठे ही नहीं कड़वे अनुभवों के भी साक्षी रहे 

अपने 50 साल के सफर में मूर्ति को मीठे और कड़वे दोनों ही प्रकार के अनुभव हुए हैं। सभी बच्चों को उनके मां बाप से नहीं मिला पाने का दुख भी मूर्ति को सालता है। ऐसी ही एक घटना में अनन्या नाम की लड़की के लिए पूरे दिन मूर्ति ने भूखे रहकर घोषणा की लेकिन शाम को अनन्या का शव मंदिर के पास तालाब में तैरता हुआ मिला। यह घटना आज भी मूर्ति को दुखी कर देती है। एक इस्लामिक उत्सव के दौरान 3 साल के गूंगे बहरे बच्चे शाहुल हामिद के खोने पर मूर्ति ने सिर्फ घोषणा करके ही अपने काम को खत्म नहीं माना, बल्कि पुलिस के साथ मिलकर आस-पास के गांव में बच्चे को ढूंढने में दिन रात लगे रहे। आखिरकार एक घर में बच्चा सुरक्षित मिल गया, गूंगा बहरा होने के कारण हामिद अपने माता-पिता के बारे में कुछ बता नहीं पा रहा था। निस्वार्थ सेवा का यह भाव मूर्ति के कर्तव्यनिष्ठ होने का प्रमाण है।

जान का जोखिम उठाकर भी अपने कर्तव्‍य के प्रति सजग रहते हैं मूर्ति 

उत्‍सव के दौरान भीड़ के चलते कई बार मूर्ति को अपनी जान का जोखिम भी उठाना पड़ा, जब लोगों के बीच झगड़े और विवाद की स्थिति आ गई लेकिन अपने कर्तव्य को समाज के प्रति जिम्मेदारी मानते हुए मूर्ति सदैव पूरा करते हैं। खोए हुए बच्चों की घोषणा के अलावा लोगों की मदद करने के लिए मूर्ति खोए हुए सामान की घोषणा भी करते हैं। इतना ही नहीं अपने मधुर और कुशल व्यवहार से कई चोरों को सामान लौटाने के लिए प्रेरित भी कर चुके हैं। एक धार्मिक उत्सव के दौरान एक महिला की सोने की चेन खोने पर मूर्ति ने घोषणा की कि चेन नहीं मिलने की स्थिति में महिला को आर्थिक रुप से गहरा आघात लगेगा। यह घोषणा होने के कुछ समय में ही भीड़ में से एक व्यक्ति निकल कर आया और उसने उस महिला की चेन लौटा दी। 

जिस तरह एक कुशल अभिनेता अपने चरित्र में स्वयं को ढाल लेता है। 64 वर्षीय मूर्ति ने भी ‘माइक मूर्ति’ के रूप में अपनी नौकरी को अपने जीवन का कर्तव्य और उद्देश्य बनाकर कर्तव्‍यनिष्‍ठा की एक अनूठी मिसाल कायम की है।

With communal divide gaping wider in the Indian society, this resolution by Rajasthan traffic department has got our applause. From September 3 onward, the cops will penalise motorists who display their caste, religion, profession, and affiliation to political parties.

The letter stated that slogans and stickers on vehicles, especially on the windscreens, were hazardous since they could distract drivers which could result into accidents. The rights group claimed that number plates of vehicles in Rajasthan even carried names and slogans.

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The Times of India quotes a senior traffic police office, "Writings on number plates were always illegal and carry a penalty of Rs 5,000. However, having names and designations on the body and windscreens of vehicles had no specified penalty. The basic aim of the move is to ensure that the windscreens are free from any such insignias which cause poor visibility and distract drivers."

The order was issued after the Civil Rights Society wrote a letter on August 9 raising concerns on the trend of writing caste, designations and village names on vehicles was on the rise, which in turn was fanning communalism and casteism in society.

The only bummer is that the fine is quite petty if we consider purchasing power of people in this category (who display caste, political affiliations, and professions on their vehicles). Well, According to Section 177 of Motor Vehicles Act 1988, if there is no penalty for the offence, the maximum fine that can be imposed is Rs 100 at the first instance and subsequently it may be extended to Rs 300 for repeat offenders.

But hey, let's welcome this step toward respecting and treating everyone as equals. Rajasthan traffic department is certainly setting an example for other state governments to follow.

हम सभी एक बेहद आरामदायक नौकरी की तलाश में रहते हैं, और लगातार अपने काम के बोझ की दुहाई देते रहते हैं। लेकिन हमारे आस पास बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपनी नौकरी को केवल एक नौकरी की तरह नहीं बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं। ऐसे लोग यह नहीं सोचते कि उनका कार्य केवल सरकारी घडी में बंद, महज़ एक औपचारिकता भर है बल्कि वो अपने कार्य को इतनी गंभीरता से लेते हैं कि शायद दिन के 24 घंटे भी उनके लिए कम पड़ जाते हैं। और जब व्यक्ति की नौकरी का सीधा सम्बन्ध जनता की भलाई एवं सेवा से हो तो जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे ही लोग होते हैं जिनके कारण हमारा समाज और देश सफलता की नई ऊंचाइयों को प्राप्त करता है। आज हम आपको नॉएडा में कार्यरत ऐसे ही एक एसएसपी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी को इतनी गंभीरता से लिया कि उन्हें देखने वाले उन्हें सलाम करे बिना नहीं रह पाए। यह कहानी है अजयपाल शर्मा की जो अपने सिपाहियों पर नजर रखने एवं रात में गश्त कर रहे पुलिस कर्मियों की सजगता का परिक्षण लेने देर रात को ऑटो में सवार होकर गश्त पर निकल पड़े। उनका इरादा अवैध वसूली की चेकिंग करने का भी था। आइये इस पूरे वाकये को विस्तार से समझते हैं।

पुलिस की मुस्तैदी की परीक्षा लेने के इरादे से निकले एक सामान्य ऑटो में

हाल ही में उत्तर प्रदेश में अवैध वसूली की कथित लिस्ट वायरल होने से पुलिस की छवि को काफी नुकसान हुआ है। इस सम्बन्ध में नॉएडा में कार्यरत एसएसपी अजयपाल ने तुरंत सख्त कदम उठाने के उद्देश्य से खुद ही गैरजिम्मेदार एवं भ्रष्ट पुलिस कर्मियों पर नकेल कसने के इरादा किया और बिना वर्दी निकल पड़े उनकी परीक्षा लेने। उन्होंने इसके लिए एक सामान्य ऑटो को पकड़ा और फिर शुरू हुआ गश्त लगाते हुए अवैध वसूली पर नकेल कसने का दौर। उन्होंने न वक़्त की सीमा को देखा न अपनी सुरक्षा की किसी प्रकार से चिंता की। वो बस निकल पड़े यह सोचकर कि उन्हें अपने पुलिस तंत्र को बेहतर करना है जिससे वो समाज के काम आ सकें। खास बात यह रही कि ऑटो में गश्त पर निकलने से पहले उन्होंने वायरलेस पर एक संदिग्ध गाड़ी के गुजरने और ऑटो चोरी की सूचना प्रसारित करवाई, जबकि वह खुद उसी ऑटो में सवार थे। उन्होंने यह जोखिम इसलिए भी लिया कि आखिर पता चल सके कि वाकई में वायरलेस पर दी गयी इस सूचना के चलते पुलिस कर्मी सजग हुए या नहीं।

रास्ते में एक पुलिस वाले की लापरवाही के चलते किया उसे सस्पेंड

वो जब अकेले ऑटो में सवार होकर रास्ते से गुजर रहे थे तो उन्हें एक पुलिस कर्मी दिखा जो अपनी ड्यूटी एवं चेकिंग के प्रति लापरवाही बरत रहा था। उन्होंने तुरंत इसका संज्ञान लिया और वो ऑटो से उतरे, उन्होंने उससे लापरवाही का कारण पूछा और जब उस पुलिस कर्मी को पता चला कि उसके सामने एसएसपी अजयपाल खड़े हैं तो वो अपनी लापरवाही के लिए माफ़ी मांगे लगा, पर अजयपाल शर्मा जी ने उस पुलिस कर्मी को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया और एक नजीर कायम कर दी कि अगर कोई भी पुलिस कर्मी ड्यूटी के दौरान लापरवाह पाया गया या वह मुस्तैद नहीं दिखा तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाएगी।

जब एसएसपी पर तान ली एक कांस्टेबल ने बन्दूक, बाद में उन्होंने किया उसे सम्मानित

आगे बढ़ते हुए उनकी ऑटो को एक कांस्टेबल ने रोकने का प्रयास किया। उस कांस्टेबल को वायरलेस वाली सूचना के चलते एसएसपी की ऑटो पर शक हुआ, पर उसके द्वारा रोकने का इशारा करने के बावजूद एसएसपी जानबूझकर रुके नहीं। ऐसा देखकर वो कांस्टेबल तुरंत हरकत में आ गया और वो ऑटो के पीछे दौड़ता हुआ आया और बेहद बहादुरी से और मौके की गंभीरता को समझते हुए उसने ऑटो में बैठे एसएसपी पर एके-47 बन्दूक तान ली और उन्हें बाहर उतरने का आदेश दिया। यह देखकर एसएसपी उस कांस्टेबल से काफी ज्यादा खुश हुए और अपने जवान की मुस्तैदी की प्रशंसा भी की, इसके अलावा पीसीआर- 22 जवान को चेकिंग में सजग मिलने पर 500 रुपए का नगद पुरस्कार देकर उसे सम्मानित भी किया। इसके अलावा वो रात भर गश्त लगाते हुए अपने पुलिस कर्मियों की मुस्तैदी को परखते रहे और कुछ के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का निर्देश भी दिया।

इस पूरे वाकये से हमे यह सीख अवश्य मिलती है कि केवल एक व्यक्ति के प्रयास से भी पूरे तंत्र पर कितना सकारात्मक प्रभाव डाला जा सकता है। अजपाल शर्मा ने ऑटो से गश्त लगाकर अपने पुलिस कर्मियों की परीक्षा लेते हुए यह भी साबित किया कि अगर व्यक्ति परिवर्तन लाने का निश्चय करले तो फिर यह मायने नहीं रखता कि आप किस प्रकार से वह परिवर्तन लाते हैं। इस औचक निरीक्षण के जरिये अजयपाल ने अन्य पुलिसवालों को यह नजीर भी दी कि क्या दिन और क्या रात, उनकी ड्यूटी का हर एक पल आम लोगों की सेवा में समर्पित होना चाहिए। हम उनकी इस पहल के लिए उन्हें सलाम करते हैं और जिस जवान ने बेख़ौफ़ अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपने एसएसपी को संदिग्ध समझ कर उनपर बन्दूक तानी उसे उसकी बहादुरी के लिए हम अनेक शुभकामनायें देते हैं। 

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