KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

Headquartered in New Delhi, our publishing wing is aimed at instilling hope and motivation in individuals while our community of changemakers and influencers works for a common goal - to cause change and make this a better society for all.

Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

Friends
Empty
Profile Feed

वर्तमान में भारत हर क्षेत्र में तरक्की के नये आयाम तय कर रहा हैं। जहाँ एक ओर भारतीय युवा सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहे हैं वही दूसरी ओर समाज की रूढ़िवादिता व अंधविश्वास का भी अंत हो रहा है। हमारे युवा अपने देश की तस्वीर बदलने की राह में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे है। वह बस आगे बढ़ना चाहते है और कोई भी अवरोध उन्हें रोकने में नाकाम सिद्ध हो रहा है।फिर चाहे वह दिव्यांगता ही क्यों न हो। एक शख्स  ने आज समाज में दिव्यांगता शब्द की परिभाषा ही बदल डाली है। जी हाँ हम बात कर रहे है निर्मल कुमार की जिन्होंने  सर्वप्रथम भारत में ऑटो रिक्शा का समूहन कर " जी ऑटो " नाम से कंपनी शुरू करी। निर्मल का मकसद लोगो के मध्य ऑटो चालको की छवि को सुधरना और उनको आर्थिक रूप से मजबूत बनाना था।उनका यह सफर बड़ा ही रोचक एवं प्रेरणादायक रहा हैं जिस किसी ने भी उनकी इस संघर्ष से भरी इस यात्रा को पढ़ा या सुना वह उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहा ।

बिहार के सिवान जिले के रिसौरा गांव में 14 मई 1980 को निर्मल कुमार का जन्म हुआ पिता प्राइमरी स्कूल में टीचर थे और माता गृहणी।1980  के दशक में बिहार की देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिनती होती थी करोडो लोग गरीबी के कारण मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर थे। निर्मल का गांव भी बहुत पिछड़ा था। गांव में ना बिजली थी और ना ही कोई अस्पताल ,टेलीफोन तो दूर तक नहीं था । गांव में सभी लोग बहुत  गरीब थे उनमे से निर्मल के परिवार की माली हालत औरो से कुछ बेहतर थी  चुकि वो शिक्षक थे और तनख्हवा समय पर मिल जाती थी,लेकिन जब निर्मल मात्र तीन वर्ष के थे तो उन्हें पोलियो ने जकड़ लिया ,अस्पताल न होने के कारण माता पिता ने नीम हकीमो से इलाज करवाया , तंत्र मंत्र और जादू टोने का सहारा लिया परन्तु  निर्मल पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा और उनके हाथ पाँव और दूसरे अंगो का विकास सामान्य बच्चों की तरह नहीं हो पाया।

माता पिता ने निर्मल को स्कूल पड़ने भेजा ,शुरू से ही निर्मल पढ़ाई लिखाई में काफी तेज़ थे ,गांव में एक ही स्कूल था जहाँ गांव के सारे बच्चे पड़ने आते थे। अपने स्कूल को याद करते हुए निर्मल बताते है की कक्षा तीन तक बच्चों की क्लास पेड़ के नीचे लगती थी जहाँ बच्चे अपने घर से लाये टाट के बोरो को बिछाकर बैठते थे।चौथी और पाँचवी  कक्षा में स्कूल की ईमारत में बैठने का मौका मिला ,लेकिन अभी भी घर से लाये टाट के बोरो पर बैठ कर पड़ना पड़ता था। छटी में जाकर उनको बेंच पर बैठने का सौभांग्य प्राप्त हुआ इस अनुभव को याद करते हुए निर्मल बताते है की बेंच पर बैठने के बाद उन्हें एक स्टेटस फील हुआ और एहसास हुआ की वह बड़े हो गए है।

गांव का स्कूल सिर्फ सातवीं तक ही था आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें गांव से 3 किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में जाना पड़ा ,अक्सर वह यह दूरी पैदल ही तय कर लेते थे और कभी अपने सहपाठी की साइकिल पर। निर्मल को शुरू से यह एहसास था की वह अन्य बच्चों की तरह नहीं है और आगे बढ़ने और जीवन में कामयाब होने के लिए उन्हें अच्छे से पढ़ाई करनी पड़ेगी और अपना सारा ध्यान उन्होंने पढ़ाई पर लगा दिया। अपनी लगन और दृढ़इच्छा के बल  पर रात में कनडील की रौशनी में पड़ते हुए भी हमेशा क्लास में अव्वल रहे।निर्मल ने वर्ष 1996 में हाईस्कूल फर्स्ट क्लास पास किया ,सभी विषयो में बहुत अच्छे अंक थे ,अपनी सफलता से उत्साहित निर्मल डॉक्टर बनने का सपना देखने लगे।पिता ने भी उनकी योगिता को पहचाना साथ ही इस बात को भी की गांव में रहकर वह अब आगे की पढ़ाई  नहीं कर सकते है । माता पिता और बड़े भाई से मिले  प्रोत्साहन  के कारण निर्मल ने आगे की पढ़ाई के साथ साथ मेडिकल की तैयारी के लिए पटना जाने का निर्णय लिया। कुछ बड़ा करने का जुनून लिए निर्मल पटना आ गए लेकिन शहर की चकाचौंद व लोगो का रहन सहन देखकर दंग रह गये ,सब कुछ गांव के माहौल से बहुत अलग था चोबीसों घंटे बिजली थी ,खान पान व बोल चाल भी अलग था ।पटना के संघर्ष पूर्ण माहौल ने उन्हें काफी आत्मनिर्भर बना दिया ,परचितो की मदद से छोटा सा कमरा ढूढ़ने के बाद खुद ही कॉलेज और ट्यूटर ढूंढा। विकलांगता होने के बावजूद वह अपना सारा काम बिना किसी की सहायता के खुद ही करते थे ,खाना भी खुद ही बनाते थे ,पढ़ाई का जुनून ऐसा की क्लास मिस न हो ,वह रोज़ अपने  कॉलेज का 14 -15  किलोमीटर का सफर पैदल ही कर लेते थे। निर्मल बताते है उन्होंने जी जान से पढ़ाई करी और ग्यारवी और बाहरवीं में अच्छे अंक प्राप्त  किए। बायोलॉजी और केमिस्ट्री में अच्छे अंक होने और फिजिक्स में डिस्टिंक्शन होने के बावजूद उनको  मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाया। बाहरवीं के दौरान ही मेडिकल की तैयारी करते हुए निर्मल ने अन्य संस्थानों के भी फॉर्म भरे थे अन्तः उन्होंने आंध्र प्रदेश के एन जी रंगा कृषि विश्वविधालय से बी टेक करने का निर्णय लिया। बी टेक करने के बाद वह IAS बनाना चाहते थे लकिन एक दिन उनके दोस्त ने उन्हें IIM तथा उसके बाद मिलने वाले पैकेज के बारे में बताया जिसे  जानकार  वह अचम्बित रह गए क्योकि इससे पहले उन्होंने IIM के बारे में कभी नहीं सुना था।उन्होंने IIM जाने का फैसला किया और बीटेक के बाद पहले एटेम्पट में कैट की परीक्षा पास कर  IIM अहमदाबाद में एडमिशन लिया। अपने नेतृत्व करने की काबिलियत वह विश्वविधालय में  बी टेक का दौरान ही दिखा चुके थे जब उन्होने यू पी और बिहार के अंग्रजी में कमजोर छात्रों के साथ मिलकर एक समूह बनाया था जो बी टेक की अंग्रेजी की पढ़ाई को लेकर सहज नहीं थे और परेशानिओ का सामना कर रहे थे।

निर्मल बताते है की  IIM की जिंदगी कई मामलों बहुत अलग सी थी। सिर्फ और सिर्फ हुनरमंद लोग ही यहाँ दाखिला ले पाते है और अलग अलग पृष्ट्भूमि से आये लोगो से बहुत कुछ सिखने का मौका मिलता है। पहले साल में उन्होंने प्रबंदन के सारे गुर सीख लिए थे और साथ ही  यह भी फैसला कर लिया की वह औरो की तरह नौकरी नहीं करेंगे और बिज़नेस की दिशा में बढ़ेंगे ,लकिन समझ नहीं पा रहे थे की करे क्या। तभी घटी एक घटना ने उनकी जिंदगी को नया आयाम दे दिया। हुआ यू एक दिन वह डिनर करने IIM  के बाहर निकले ऑटो चालक ने मीटर रीडिंग देख उनसे 25 रूपए माँगे। जब वापस वह ऑटो से उसी रास्ते से  IIM के गेट तक पहुंचे ऑटोवाले ने 35 रूपए मांगे जो की पिछली बार से 10 रूपए ज्यादा थी। जब उन्होंने ऑटोवाले से इस का कारण पूछा तो वह भड़क गया और ऊंची आवाज़  में बात करने लगा। बात को आगे न बढ़ाते हुए उन्होंने उसे 35 रूपए दे दिए लेकिन यह घटना उनके दिलो दिमाग पर छा गयी। निर्मल को एहसास हुआ की देश भर में कई लोग ऑटोचालकों की बेमानी और बतमीज़ी का शिकार होते होंगे इसी विचार से प्रेरित हो इन्होने ऑटोचालकों को व्यवस्थित करने की सोची जिसमे वह इन्हे प्रशिक्षित कर एक जिम्मेदार नागरिक बना सके। निर्मल पिछले एक साल में  अब तक प्रबंदन के गुर सीख चुके थे और अपनी योजना को अमलीजामा पहनने के लिए इन्होने IIM गेट से ही 15 ऑटो चालको को चुना जिनको ग्राहकों से कैसे बात की जाए इस बात का प्रशिक्षण दे कर तथा सभी को इस योजना का हिस्सा बनने का इन्सेन्टिव भी दिया साथ ही सभी के बैंक एकाउंट खुलवाये  और जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा भी करवाया। ग्राहकों के लिए ऑटो में अख़बार और पत्रिकाए के साथ साथ मोबाइल फ़ोन चार्जर ,कूड़ादान और रेडियो की सुविधा भी उपलब्ध कराई। शुरू में यह काम बिलकुल भी आसान नहीं था ज्यादातर ऑटो वाले इस तरह के लीक से हटकर होने वाले काम को लेकर शंकित थे और रही सही कसर यूनियन वालो के विरोध ने पूरी कर दी थी फिर भी आत्म विश्वास से भरे निर्मल को प्रोजेक्ट के लिए जरूरी 15 ऑटो चालक मिल ही गये। निर्मल के पास उस समय लैपटॉप नहीं था वह सारी परियोजना का संचालन डेस्कटॉप के द्वारा ही करते थे बाद में एक मित्र के लैपटॉप पर अपना प्रेजेंटेशन बना कर उन्हें अख़बार और पत्रिकाओं के सम्पादको को दिखाते थे और उनसे  अपने ऑटो के लिए अख़बार और पत्रिकाए देने की गुज़ारिश करते थे। निर्मल को अपने इस प्रोजेक्ट पर इतना भरोसा था की खुद की पढ़ाई लोन पर चलने के बावज़ूद उन्होंने ऑटोचालकों को इन्सेन्टिव देने का जोखिम उठाया। कहते है इच्छा शक्ति के आगे परिस्थतियाँ भी हार मानती है और हफ्ते भर में ही इन्हे अच्छा रिस्पांस मिलने लगा। लोगो की सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहित हो कर निर्मल ने इस परियोजना का विस्तार करने की ठानी और सफलता भी प्राप्त करी। आज जी ऑटो से 21 हज़ार ऑटो चालक जुड़े है।  

ऑटो विज्ञापनो का प्रचार-प्रसार करने का उत्तम साधन होते है इसी कारण बहुत से कम्पनियो ने जी ऑटो का सहारा लिया तथा इससे कुछ आर्थिक रूप से भी मदद मिलने लगी। इसके अलावा एस बी आई  ,यूको बैंक,बैंक ऑफ़ बड़ौदा ,इंडियन बैंक आदि ने निर्मल की मदद की साथ ही इंडियन आयल ,एल आई सी और हिंदुस्तान जैसी कम्पनियो ने कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी के तहत योगदान दिया। साथ ही गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके काम की सरहाना की और उनकी कंपनी जी ऑटो जो बाद में  "निर्मल फाउंडेशन" बनी  की नींव रखने में जरूरी संसाधन मुहैया करने में मदद दी जो उनकी और उनके साथ काम करने वाले 21 लोगो की सैलरी की व्यवस्था करता है। निर्मल के  कुशल नेतृत्व के कारण परिवहन क्षेत्र में जी ऑटो इकलौती मुनाफा कमाने वाली कंपनी है ,अपने पहले ही साल में इसने 1.75 करोड़ रूपए का व्यवसाय किया और 20 लाख का मुनाफा कमाया।निर्मल की संस्था अभी 6 बड़े शहरो में काम कर रही है और भविष्य में वह इसे 100 नए शहरो में ले जाना चाहते है। शुरू में  ऑटो की बुकिंग फ़ोन के जरिए होती थी अब समय की मांग को महसूस करते हुए इंटरनेट और मोबाइल से भी होती है साथ ही इनका जी ऑटो ऐप भी काफी लोकप्रिय हो गया है। इसके अलावा कॉल सेंटर में भी फ़ोन करके ऑटो रिक्शा मगवा सकते है। कॉल सेंटर में ही ग्राहक किसी की शिकायत भी दर्ज़ करा सकता है और ऑटो में लगी जीपीएस सुविधा के चलते आसानी से ऑटो की लोकेशन को जाना जा सकता है।

आज निर्मल एक सफल बिज़नेसमैन है ,अपने व्यस्त जीवन में समय निकाल कर इन्होने 10 अक्टूबर 2009 में सिवान जिले की भगवानपुर के सारीपट्टी गांव की ज्योति से शादी की है। ज्योति एमएससी है और पैरो से दिव्यांग हैं। आज वह निर्मल के साथ जी ऑटो के संचालन में भरपूर योगदान दे रही है।

 

विश्व भर में आज भारत की पहचान फैशन के क्षेत्र में काफी तेज़ी से बन रही है न केवल फैशन डिज़ाइनिंग बल्कि टेक्सटाइल  डिज़ाइनिंग के क्षेत्र जो की फैशन इंडस्ट्री का ही अंग है ने काफी तेज़ी से प्रगति की है। रचनात्मक सोच रखने वाले युवाओ के लिए आज टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग में कॅरिअर काफी नयापन लेकर आया है। यही कारण है की वर्तमान में युवा इस ओर तेज़ी  से आकर्षित हो रहा है। आधुनिक टेक्नोलॉजी के चलते ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध हो गए है जिससे टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग को नये आयाम मिल रहे है।इसी क्षेत्र से जुड़ा एक  नाम उभर कर सामने आया है कनिका गुप्ता का ,जो की एक टेक्सटाइल डिज़ाइनर है। रंगो का प्रस्तुति का  सम्पूर्ण ज्ञान रखने वाली कनिका को नये नये डिज़ाइन बनाने का शौक है और अपने शौक को नया रूप देने के लिये दिल्ली में “Ezel home” और “Ezel lab” नाम से दो स्टूडियो चला रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी रचनात्मकता को और अधिक उभरने के लिए वे उन कारीगरों की मदद लेती है जो की कला व शिल्पकारी में  अच्छी जानकारी रखते है किन्तु आर्थिक शोषण के कारण वे अपनी कला से दूर होते जा रहे है।कनिका ने इन कारीगरों पर हो रहे शोषण को रोकने के लिए मजबूती से कदम बढ़ाया है और उनकी कला को नयी पहचान दिलवाने के लिये लगातार प्रयास कर रही है जिसमे वह बखूबी सफल भी हो रही है।


दिल्ली की रहने वाली कनिका गुप्ता ने टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी से  स्नातक किया है। कनिका ने सबसे पहले 2010  में जरी के काम से जुड़ा स्टूडियो खोला। लेकिन  उससे भी पहले कनिका ने क्राफ्ट पर और अधिक जानकारी जुटाने की कोशिश करते हुए देश के कोने कोने में भृमण किया। इसी बीच वे झारखंड पहुंची। वहाँ की शिल्पकारी ने उन्हें बेहद प्रभावित किया परन्तु उन्होंने यह भी अहसास किया कि रोज़गार के क्षेत्र में वह काफी संघर्ष कर रहे है और अपनी कला से काफी दूर होते जा रहे है।इसी बात पर बहुत अधिक गौर करते हुए कनिका ने ADVIKA नाम से मॉडल प्रोजेक्ट शुरू किया।जिसमे उन्होंने टेक्सटाइल का डिज़ाइन शहरी लोगो की रूचि के अनुसार बनवाया और अपने इस कदम को वह Ezel lab की ओर पहला कदम मानती है। कनिका बताती है “डिज़ाइन सिर्फ सुन्दर वस्तु ही नहीं अपितु एक प्रक्रिया होती है जो की एक व्यवसायिक  बदलाव है। जिसमे आप दूसरो से अलग वस्तुए बनवाते है और विचार करते है कि इस बदलाव को एक कंपनी के रूप में कैसे लाया जाये। बस यही काम Ezel lab में किया जाता है”। शुरू में कनिका ने पाया की उच्च  व उच्च माध्यम  वर्ग के लोगो में अपना  घर सजाने का बहुत शौक होता है लेकिन वे टेक्सटाइल की शॉपिंग विदेशो से करना पसंद करते थे ,देशी गुणवत्ता उन्हें पसंद नहीं आ रही थी। बस यही जानकारी के साथ कनिका ने Ezel home का निर्माण किया। कनिका बताती है कि “उनका कोई बिज़नेस बैकग्राउंड नहीं है और न ही MBA किया है इसलिए थोड़ी दिक्कत तो आयी”। पहले साल उन्होंने सिर्फ बिसनेस को जाना दूसरे वर्ष अपने प्रोजेक्ट पर स्टडी किया बस उसके बाद कनिका ने कभी मुड़ कर पीछे नहीं देखा। आज यही वजह है कि कनिका के होम फर्निशिंग सामान के डिजाइन दिल्ली के अलावा हैदराबाद ,मुंबई ,जम्मू और दुसरे शहरों में भी खूब पसंद किये जा रहे है।

कनिका ने ईज़ल होम के नींव 2011 सितम्बर में रखी। सबसे पहले उन्होंने अपने काम की शुरुआत 8"और 10"मैट्रेस की बेडशीट से की। क्यूंकि इस  साइज़ की  बेडशीट पहले उपलब्ध नहीं हो पाती  थी और लोग बाहर से मंगवाते थे। बाद में उन्होंने कुशन कवर ,बेड कवर,टेबल मैट्स ,टेबल कवर और परदे डिज़ाइन करना शुरू किये। फिर 2012 में उन्होंने बसंत कुंज और गुडगाँव के ग्राहकों के लिये घर की सजावट का काम शुरू किया। कनिका का डिज़ाइन स्टूडियो भी है जिसमे वह रिटेल में कोई सामान नहीं बेचती है बल्कि घर ,होटल व रेस्टोरेंट के लिए डिज़ाइन बनाती है।

कनिका सबसे पहले अपने ग्राहक की पसंद व नापसंद जानने का प्रयास करती है क्योकि हर व्यक्ति की अलग अलग पसंद होती है कोई  नयी प्रकार की सजावट  चाहता है तो कोई परम्परिक ।फिर वह उनकी बजट से जुडी जानकारी प्राप्त करने के बाद ही काम शुरू करती है। कनिका के डिज़ाइन हमेशा नये होते है क्योकि वह अपने एक  ग्राहक का डिज़ाइन दूसरे ग्राहक को कभी भी उपलब्ध नहीं कराती है। इसलिए उनके काम में हमेशा नयापन देखना को मिलता है। आज कनिका के ग्राहक देश के अलावा अमेरिका व सिंगापुर में भी मौजूद है।

कनिका अपने बिज़नेस के लिये  छोटे कारीगरों से काम लेती है जिसके लिए उनका मकसद बहुत नेक है। वे बताती है की “मै  जानकार कारीगरों को रोज़गार दिलवाकर उन्हें खुद के पैरों पर खड़ा करना चाहती हूँ। अगर कारीगर काम जनता है चाहे फिर उसके पास एक ही मशीन क्यों न हो मै उसे काम जरूर देती हूँ”। देश के अलग अलग हिस्सों के कारीगरों से कनिका अपने मन मुताबिक काम लेती है। पहले उन्हें  कारीगरों को काम समझना पड़ता था लेकिन अब काफी सालो से साथ काम करने के कारण कारीगर भी कनिका की पसंद को जान चुके है।

कनिका कहती है कि " अगर आपका काम अच्छा है तो मार्केटिंग की कोई जरूरत नहीं होती है " । इसलिये आज तक उन्होने अपनी कंपनी का कोई पम्पलेट नहीं छपवाया और न ही कोई होर्डिंग लगवायी। आगे वह कहती है कि  मेरे जितने भी ग्राहक है वे एक दूसरे से मिली जानकारी के बाद ही मेरे पास आते है। मेरा मानना है कि “अगर  मुझमे हुनर है और मै लोगो के लिए अच्छा डिज़ाइन न बना पाऊ तो वह मेरे पास नहीं आयंगे”। कनिका पिछले डेढ़ साल से बड़े ही प्रोजेक्ट ले रही है लेकिन अगर किसी का बजट काम है तो वह एक कमरे के लिये भी डिज़ाइन करती है। अपने भविष्य की योजनाओ की जानकारी देते हुए कनिका बताती है की मेरी इच्छा अब होटल और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में आगे बढ़ने की है। अभी भी इस क्षेत्र में काम करने की काफी आवश्यकता है।

आगे बढ़ने की चाह तो हर इंसान में होती है। लेकिन दूसरो के हुनर को अपने साथ लेकर आगे बढ़ना सच्ची काबिलयत की निशानी होती है और इसी काबिलियत का बेहतरीन प्रदर्शन कनिका गुप्ता ने किया है। 

अगर आपसे पूछा जाए कि पेड़ पौधे उगाने  के लिये किन चीज़ो का उपयोग किया जाता है तो स्वाभाविक है आप का जवाब मिट्टी ,खाद और पानी ही होगा। आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि आज कल ऐसी तकनीक आ गयी है जिसमें  आप बिना मिटटी के भी पेड़ पौधे उगा सकते है। इस तकनीक को " हाइड्रोपोनिक्स  " कहते है। भारत में इस तकनीक को आगे बढ़ाने का बीड़ा  उठाया है चेन्नई के रहने वाले श्रीराम गोपाल ने जिनके अनुसार कृषि कोई पढ़ाई नहीं बल्कि इस देश में पनपने वाली  कई समस्याओं का समाधान है और इसमें आधुनिक तकनीक का विशेष महत्व है। 

चौत्तीस वर्षीय श्रीराम ने BITS बैंगलोर से इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग की डिग्री ली है और कालेडोनियन बिज़नेस स्कूल यूनाइटेड किंगडम से मार्केटिंग एंड स्ट्रॅटजी में मास्टर्स  किया है  । उनके पिता गोपालकृष्णन की फोटो प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग की मशीन बनाने की फैक्ट्री थी जिसे उन्होंने ख़राब स्वास्थ और कम बिसनेस के चलते वर्ष 2007 में बंद कर दिया था। श्रीराम के पिता की कई फोटो लैब्स भी थी जिसके कारण श्रीराम को कॉलेज के दिनों से ही हाई एन्ड कैमरा का बेहद शौक था इसलिए पढ़ाई के बाद उन्होंने चेन्नई में हाई एन्ड कैमरा रिपेयर शॉप खोलने की सोची। 

पांच साल पहले जब वह एक सफल IT कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे  तभी उनके दोस्त ने उनको हाइड्रोपोनिक्स से सम्बंधित  एक विडिओ यू-ट्यूब पर दिखाया जिससे वह बेहद प्रभावित हुये । श्रीराम मानते है कि भारत वैसे तो हमेशा से ही कृषि प्रधान देश है जहाँ कृषि का विशेष महत्व है परन्तु मौजूदा परस्थितियो में इस प्रकार की तकनीक का सहारा लेना बेहद जरूरी हो गया है क्योकि  अब बढ़ती आबादी एवं  शहरों के विकास के काऱण खेती योग्य भूमि सिमटती जा रही है। सिंचाई  की सुविधा के लिये पानी की व्यवस्था भी पूरी नहीं पड़ती है।

कन्फोलिअस टीम से बात करते हुए श्रीराम बताते है कि” भारत में कृषि और इंडस्ट्रीज  दो अलग अलग क्षेत्र है परन्तु समय की मांग को देखते हुए हम  सफल तभी हो सकते है जब हम कृषि को ही इंडस्ट्री मान ले।श्रीराम गोपाल बताते है कि पेरुंगुडी में  अपने पिता की बंद पड़ी फैक्ट्री  की रूफटॉप पर सप्ताह के अंत में बिना मिट्टी के पौधे उगने की तकनीक का परिक्षण करने लगे जिसमे उनके पिता ने भी पूरा सहयोग दिया और उन पौधों की वजह से उनके पिता की सेहत मे काफी सुधार आने लगा तब उन्होंने यह फैसला लिया कि वह इस दिशा में जरूर कुछ बड़ा करेंगे जिसके लिये उन्होंने पहले से ही हयड्रोपॉनिक्स के क्षेत्र में काम कर रही विदेशी कंपनियों से बात  की तथा उन्हे इस बात के लिये राज़ी किया की वह उन्हें सिर्फ हाइड्रोपोनिक्स से सम्बंधित टेक्नोलॉजी का ज्ञान दे तथा वह उनकी कंपनियों को भारत में रिप्रेजेंट करेंगे और निवेश भी  स्वयं करेंगे । विदेशी कंपनियों से मिले तकनीकी  सहयोग से उन्होंने मात्र पांच लाख रुपए का निवेश कर  "फ्यूचर फार्म्स " नामक एक कंपनी खोली और धीरे धीरे  उनके प्रयास रंग लाने लगे और मात्र 5  सालो में उनकी कंपनी का टर्न ओवर 2 करोड़ हो गया है। श्री राम ने बताया उनकी कंपनी 300 प्रतिशत की दर से हर साल बढ़ रही हैं। 2015 -2016  में कंपनी का टर्नओवर 38 लाख रूपए का था जो 2016 -17  में 2 करोड़ हो गया था तथा इस साल के पहले क्वाटर तक यह आंकड़ा 2 करोड़ तक पहुंच गया है जो वर्ष के अंत तक 6  करोड़ तक पहुंच जायगा। आज इस कंपनी में विभिन्न क्षेत्रों में महारत हासिल करे हुऐ 60 के करीब युवा अपना बहुमूल्य योगदान दे रहें  हैं। अभी तक श्रीराम कंपनी में करीब 2.5 करोड़ तक इन्वेस्ट कर चुके हैं।  वे गयारह लोग जिन्होंने  10 -15 लाख रूपए कंपनी में लगाये है उनको और श्रीराम को कोई फिक्स्ड सैलरी नहीं मिलती है बल्कि इन सभी बारह लोगों के  कंपनी के शेयर में हिस्सा है जो बहुत जल्द प्राइवेट लिमिटेड बनने जा रही हैं। यह नियम कंपनी के 40 और कर्मचारियो पर लागू नहीं होता हैं। उन सभी को सैलरी मिलती हैं “।   

हाइड्रोपोनिक्स के  बारे में और अधिक जानकारी देते हुये श्रीराम बताते है कि इस विधि से फ्लैट या घर में बिना मिट्टी के पौधे और सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती है। पानी में लकड़ी का बुरादा ,बालू  या कंकड़ों को डाला जाता है और पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिये एक खास तरीके का घोल डाला जाता है तथा पौधों में ऑक्सीजन पहुंचाने  के लिये पतली नाली या पम्पिंग मशीन का इस्तेमाल किया जाता हैं।इसमें  सामान्य फसलों की अपेक्षा करीब 90% कम पानी का उपयोग होता है ,pestiside का उपयोग बिलकुल नहीं होता है तथा उत्पादन  भी ज्यादा होता  है। Transparency Market Research की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल हयड्रोपोनिक्स का बिसनेस जो 2016 में 6,934.6 मिलियन डॉलर  था  वह 2025 में बढ़कर 12,106.5 मिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना हैं । 

आज कंपनी वेबसाइट पर हाइड्रोपोनिक्स की जो किट बेचती है उसकी कीमत 999 रूपए से लेकर 69,999 रूपए तक होती हैं। इसके अलावा वह हाइड्रोपोनिक्स सेटअप आवशकता अनुसार भी बनाते है। 200 से 5000 स्क्वायर फ़ीट हाइड्रोपोनिक्स फार्म बनाने का खर्चा लगभग 1 लाख से 10 लाख रूपए का आता हैं। 

पांच साल पहले हॉबी के तौर पर किये गये बिज़नेस ने आज एक क्रांति का रूप ले लिया है। श्रीराम की यह पहल देश को लगातार कम हो रहे प्राकर्तिक संसाधनों से निपटने में काफी कारगर सिद्ध होंगी। 


 

टीवी में दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन ‘’दाग अच्छे होते हैं’’ सही अर्थों में जीवन की एक बहुत बड़ी सीख देता है कि जीवन में घटने वाली त्रासदियों में मनुष्य की बहुत बड़ी भलाई छिपी होती है। क्योंकि त्रासदी के खिलाफ लड़ने की मुहिम उसके घटने के बाद ही शुरू होती है। तब निर्माण होता है एक सभ्य और संगठित समाज का।

1978 में पश्चिम बंगाल में आई बाढ़ में पश्चिमी जिलों के राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। लगभग बीस लाख लोग बेरोजगार और बेघर हो गए और 50 लोगों ने अपना जीवन गंवा दिया। बाढ़ के बाद इन लाखों लोगों की लड़ाई जीवन की मुट्ठी भर आशा के साथ जारी थी। 

इन लाखों लोगों में नौ महिलाओं का एक ऐसा समूह उस समय तैयार हुआ जिन्होंने बाढ़ पीड़ित परिवारों और लोगों को पुनः घर एवं रोजगार दिलाने के लिए नारी-शिशु कल्याण केंद्र का संगठन बनाकर काम शुरू कर दिया। हालांकि समय के साथ-साथ इस संस्था ने अपने उद्देश्य में ग्रामीण मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के उत्थान को भी शामिल कर लिया। 

रहीमा खातून इस संस्था की सचिव और सबसे कर्मठ कार्यकर्ता हैं। पिछले चार दशक से समर्पित भाव से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही रही रहीमा ने अब तक अनेकों महिलाओं और बच्चों की मदद की है। 

भारत में लगभग चार करोड़ के करीब आबादी अनपढ़ मुस्लिम महिलाओं की है। अशिक्षा ही इन महिलाओं और उनके बच्चों के लिए जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। रहीमा की देखरेख में उनकी संस्था के केंद्र हावड़ा, मुर्शिदाबाद, दिनाजपुर, एवं सुंदरबन क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, रोजगार, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा, बच्चों के कल्याण एवं स्वच्छता के लिए काम कर रहे हैं। 

रहीमा ने नारी-शिशु कल्‍याण केंद्र की शाखा के अंतर्गत फ्रीडम ग्रुप नैपकिन संस्था की स्थापना द्वारा लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन बनाकर तकनीकी ज्ञान की बढ़ोतरी के साथ स्वयं की सफाई की शिक्षा प्रदान करके अब तक की सफलतम कार्यप्रणाली को स्‍थापित किया है। इस संस्था द्वारा बनाए जा रहे सैनिटरी नैपकिन स्कूली लड़कियों को मुफ्त में बांटे जाते हैं। उसके बाद बचे हुए नैपकिन को बाजार में बेचा जाता है ताकि इस इकाई को चलाने का खर्चा निकाला जा सके। स्वच्छता के साथ साथ नैपकिन की इकाई रोजगार भी प्रदान कर सकती है यह संदेश गांव वालों को भली-भांति समझ आ चुका है। 

नारी-शिशु कल्याण केंद्र की कारवां शाखाओं में महिलाओं को सिलाई एवं ब्यूटीशियन के कोर्स भी सिखाए जाते हैं जिससे वह रोजगार प्राप्त कर सकें। महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में काम करते-करते रहीमा ने महसूस किया कि मात्र शिक्षित होने भर से महिलाओं के जीवन में सुधार नहीं आ सकता जब तक रोजगार नहीं होगा महिलाओं की दुविधाएं खत्म नहीं होंगी। इसलिए सिलाई-कढ़ाई और सेनेटरी नैपकिन की इकाइयों के साथ-साथ गैर परंपरागत कार्य जैसे मोबाइल रिपेयरिंग एवं इलेक्ट्रिक कार्यों के क्षेत्र में भी ट्रेनिंग शुरू करवाई गई। 

पिछले 40 वर्षों के सफर से भी लंबा सफर अनेकों सामाजिक उद्देश्यों विशेष तौर पर शिक्षा को साथ लेकर रहीमा तय करना चाहती हैं, यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। रहीमा महिलाओं को समाज और देश में परिवर्तन लाने वाली सबसे बड़ी धुरी मानती हैं। लेकिन यह तभी संभव है जब कि उन्हें अपने अंदर छुपी प्रतिभा और शक्ति का एहसास होगा। रहीमा का यह प्रयास अनवरत जारी रहेगा।

कहते हैं सेवा ही जीवन है, सेवा ही समर्पण है एवं दूसरों के लिए जीना ही व्यक्ति का जीवन-दर्शन होता है। यह विचार कहीं न कहीं मानवता का सार बयां करता है। वास्तव में मानवता का सही अर्थ यह ही होता है कि व्यक्ति खुद के अलावा दूसरों के लिए भी सोचे एवं औरों के काम आये। यह सच है कि दूसरों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना न केवल एक विशिष्ठ संतुष्टि के भाव से व्यक्ति के मन को भरता है, बल्कि समाज में व्यक्ति को एक अलग पहचान भी दिलाता है। अगर कोई मनुष्य किसी भी रूप में समाज के उद्धार में अपना योगदान दे पाये तो यह एक उत्कृष्ट कार्य कहलाता है। आज कल की भाग दौड़ भरी दुनिया में जहाँ अक्सर लोगों के पास खुद के लिए समय नहीं होता वहीँ आज भी समाज में कुछ ऐसे लोग मौजूद हैं, जो अपने अलावा देश के उस वर्ग के बारे में भी सोचते हैं जो कहीं न कहीं समाज के मुख्य धारा से अलग हैं। आज हम एक ऐसे ही शख्स की बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिनका नाम अमिताभ सोनी है, जिन्होंने विदेशी में मिली नौकरी को छोड़कर अपनें देश के आदिवासी युवाओं के उठान के लिए काम करना उचित समझा। आईये इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।

इंग्लैंड में मिली नौकरी को छोड़कर, आज आदिवासी युवाओं की भलाई में दे रहे हैं अपना अहम् योगदान

अमिताभ का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में हुआ था। वे इंदौर और भोपाल में ही पले बढे हैं। उनके पिता ब्रिगेडियर स्व। चंद्रप्रकाश सोनी, सेना में थे तो अमिताभ के अंदर शुरुवात से ही देश के प्रति समर्पण की भावना थी। इंटरनेशनल बिज़नेस में मास्टर डिग्री हासिल करनें वाले अमिताभ को सामाजिक क्षेत्र में शुरू से ही काफी रूचि रही। पर 2003 में वे इंग्लैंड चले गए, अमिताभ नें दस वर्षों तक इंग्लैंड में सरकारी नौकरी की। अमिताभ ब्रिटिश सरकार के सोशल वेलफेयर बोर्ड लंदन यानी कि वहां के समाज कल्याण मंत्रालय में काम करते थे। काफी वर्षों का अनुभव बटोरने के बाद अमिताभ का मन अपने देश लौटनें का कर रहा था। वे भारत लौटकर यहाँ के लोगों के लिए कुछ करना चाहते थे। करीब साढ़े तीन वर्ष पहले जुलाई 2014 में वे सब कुछ छोड़छाड़कर इंग्लैंड से वापस भोपाल आ गए। आजकल अमिताभ निरंतर रूप से आदिवासी लोगों के शैक्षणिक और सामाजिक विकास के कार्यों में लगे हैं। वो यह मानते हैं कि कहीं न कहीं आदिवासी जन मुख्यधारा समाज से अलग-थलग पड़ गए और उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि आदिवासी प्रजाति को कैसे भी मुख्यधारा में लाया जाए और कैसे उनके जीवन स्तर में सुधर लाया जाए। अमिताभ इन्हीं मुद्दों पर हर संभव कदम उठा रहे हैं। अमिताभ युवा आदिवासियों को शिक्षा के प्रति जागरूक भी कर रहे हैं और जो शिक्षा प्राप्त करनें में असमर्थ हैं उन्हें अपनी तरफ से हरसंभव सहयोग दे रहे हैं। यहाँ तक की शिक्षित युवाओं को रोजगार मुहैया करवानें में भी वे अपनी तरफ से सहयोग दे रहे हैं।

भारत लौटने में लगा थोड़ा वक़्त, लेकिन देर आये दुरुस्त आये

अमिताभ कहते हैं कि, "मैं लंदन में सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट में काम करता था, जहाँ मैंने समाज से जुड़े तमाम पहलुओं के बारे में जाना, वहां के क्रियाकलापों को समझा, सामाजिक विकास के लिए जरुरी बिंदुओं का ज्ञान प्राप्त किया। मैंने वहां कि कार्य-प्रणाली को भी समझा, लोगों की समस्या को सरकार तक कैसे पहुँचाया जाए इस बारे में भी जाना"। वो आगे कहते हैं की उन्हें शुरू से ही भारत आकर यहां के लोगों के लिए कुछ करना था, पर उन्हें वहां बहुत कुछ ऐसा सीखना था जिसका उपयोग वो यहाँ आकर कर सकें। आर्थिक रूप से भी उन्हें सुदृढ़ बनना था ताकि वो लोगों की मदद कर सकें। तो इन सब कारणों से उन्हें लौटनें में थोडा ज्यादा वक़्त लग गया। लेकिन भारत आने के बाद से ही वो पूरी तरह कमजोर वर्ग के लोगों, खासकर आदिवासियों की भलाई के लिए कार्य करने लगे।

भोपाल से करीब 25 किलोमीटर दूर शुरू की अपनी मुहिम

मध्यप्रदेश के आदिवासी गांव भानपुर केकड़िया को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। अमिताभ नें यहां के आदिवासियों को स्वावलम्बी बनाने की पहल शुरू की। उन्होनें सबसे पहले लोगों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास शुरू किया और उन्होंने इस जागरुकता की शुरूआत सरकारी स्कूलों से की। उन्होंने गांव में ही आदिवासियों के लिए स्कूल भी खुलवाया है। गांव का युवाओं के पास रोजगार नहीं था जिस वजह से वे रोजागर के लिए शहरों की ओर पलायन कर जाते थे। इसे रोकने व रोजगार मुहैया करवानें के लिए अमिताभ ने हर सम्भव प्रयास करने शुरू किये। उसके बाद अमिताभ ने भारत की पहली ऐसी आईटी कम्पनी खोली जिसे आदिवासी युवा स्वयं ही संचालित करते हैं। जनसहयोग से बनीं इस कंपनी का नाम 'विलेज क्वेस्ट' रखा गया। इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने बेसिक कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र खोला जहां पर बच्चों को न केवल प्रशिक्षण दिया जाता है बल्कि डेटा एंट्री का काम दिलाकर रोजगार भी मुहैया कराया जा रहा है।

खोली है अभेद्य नाम की संस्था, आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने में करती है मदद

अमिताभ ने दो साल पहले 'अभेद्य' नाम की एक गैर सरकारी संस्था भी खोली है। जिसका मुख्य उद्देश्य है आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारना, इसके जरिये वो उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ रहे हैं और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी उपलब्ध करवा रहे हैं। इसके माध्यम से स्कूल भी संचालित किये जा रहे हैं। हाल ही में यहाँ के बच्चों को बाहर के शिक्षकों की मदद से भी पढ़ाना शुरू किया गया है। कुछ सहयोगियों की मदद से अमिताभ ने इस स्कूल में बच्चों के लिए फर्नीचर, बैग, जूते, स्वेटर, कॉपी- किताबें जैसी सुविधाएं मुहैया करवाई है। यहां तक की स्कूलों में बच्चों को बेसिक तकनीकी ज्ञान के लिए कम्प्यूटर लैब की भी व्यवस्था करवाई।

अमिताभ अब आदिवासी गाँव के जल प्रबंधन के कार्यों में भी लगे हुए हैं। वे गर्मी के दिनों में सिंचाई के लिए पानी की होनें वाली कमी की समस्या को कम करनें की पहल कर रहे हैं। इसके लिए वे विभिन्न जगहों पर छोटे डैम, तालाब और झील बनानें की योजना भी बना रहे हैं, जहाँ बारिश का पानी संग्रहित हो सके। उसके अलावा वे आदिवासियों में आर्गेनिक फार्मिंग के प्रति भी जागरूकता बढ़ा रहे हैं ताकि गाँव में ही उन्नत खेती के प्रयास किये जा सकें। आदिवासी लोगो के विकास व उनके जीवन स्तर को सुधारनें के लिए अमिताभ जिस प्रकार काम कर रहे हैं वह सचमुच क़ाबिले तारीफ़ है। हम उन्हें अपनी पूरी टीम की तरफ से सलाम करते हैं। वास्तव में उनके जैसे तमाम लोग हमारे आस पास के समाज में बदलाव की एक अनोखी मुहिम को अंजाम दे रहे हैं।

 

मुंबई स्लम में रहने वाला “गुदड़ी का लाल” बना इसरो का साइंटिस्ट

भारत की सर्वोच्‍च प्रतिष्ठित संस्‍था ‘इसरो’ (भारतीय स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन) में जाने का सपना भला कौन नहीं देखना चाहेगा लेकिन इसे देखना तो दूर सोचना भी आसान नहीं है। खासकर स्लम में 10’ by 10’ के एक कमरे में रहकर जीवन की बुनियादी जरूरतों के अभाव में ऐसा सोचना तो नामुमकिन ही है। लेकिन मेहनत और लगन का जुनून हो तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई के 25 साल के प्रथमेश हिरवे ने जो मुंबई के स्‍लम पोवई इलाके में फिल्टरपाड़ा के 10’ by 10’ के एक कमरे में अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। 

मुंबई के चर्चित रेड एफएम शो में प्रथमेश अपने 10’ by 10’ के इस घर को माता-पिता की नजदीकी का मुख्य कारण बताते हुए कहते हैं कि इतने छोटे से कमरे में हमेशा मां बाप के सामने रहने से ध्यान कभी पढ़ाई से भटका नहीं और उनके मीठे बोल हमेशा मन में कुछ बनने की प्रेरणा भर देते थे। 

प्रथमेश को 10 वीं कक्षा में कैरियर काउंसलर ने इंजीनियरिंग की बजाए आर्ट्स लेने की सलाह दी। हिरवे का मन तो बहुत टूटा लेकिन हौसला नहीं, इसलिए उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में भग्गूभाई मफतलाल पॉलिटेक्निक कॉलेज से डिप्लोमा किया। दसवीं तक मराठी मीडियम से पढ़ने के बाद अंग्रेजी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना प्रथमेश के लिए बहुत बड़ी चुनौती था, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। लार्सन एंड टर्बो, टाटा पावर में इंटर्नशिप करने के बाद इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग नवी मुंबई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की डिग्री 2014 में प्रथमेश को मिली। इसके बाद उन्होंने UPSC के एंट्रेंस एग्जाम दिए लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। कभी कभी असफलता भी किसी बड़ी सफलता का रास्ता खोल देती है। मन में कुछ बड़ा करने की चाह रखने वाले प्रथमेश ने देश के प्रतिष्ठित इसरो 2016 के एंट्रेंस के पेपर्स की तरफ रुख कर लिया। कुल 16000 विद्यार्थियों में से मात्र 9 विद्यार्थी चुने गए जिनमें एक नाम प्रथमेश हिरवे का भी है। 

प्रथमेश की सफलता सामान्य विद्यार्थियों से कहीं ज्यादा महत्व रखती है क्‍योंकि जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में स्लम में रहकर भी, उन्होंने इस नामुमकिन सफलता को अर्जित किया है। 

हिरवे की मां मात्र आठवीं कक्षा तक पढ़ी हैं। अपनी खुशी के आंसू नहीं रोक पाती चाहे वह नहीं जानती कि उनके बेटे ने देश की जिस संस्था में पद पाया है वह भारत की एक सर्वोच्च संस्था है। हिरवे के पिता उनकी मां को इस संस्था का महत्व समझाते हैं। ऐसे होनहार बेटे पर पर माता पिता को गौरवान्वित होना ही चाहिए, जिसने जीवन की कठिनाइयों को अपनी सफलता की सीढ़ी बना लिया, और एक एक कर पार करने में इतना मगन हुआ कि एक दिन स्वयं को आकाश की ऊंचाइयों पर पाया। 

इसरो चंडीगढ़ में हिरवे इलेक्ट्रिकल वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत होंगे। मुंबई से चुना जाने वाला यह पहला वैज्ञानिक देश के युवाओं का संदेश वाहक है कि कड़ी मेहनत, दृढ़ निश्चय, कठिनाइयों के आगे न झुकना और माता पिता का सानिन्‍ध्‍य यह लक्ष्य प्राप्त करने का अचूक नुस्खा है।

देश के गंभीर पद पर कार्यरत अधिकारियों को ईमानदारी के कारण यदि स्‍थानांतरण झेलने पड़ें तो आम जनता का प्रेम उन्‍हें स्‍वत: ही मिल जाता है। ऐसी ही आईएएस ऑफिसर मुग्‍धा सिन्‍हा के बारे में आज हम जानेंगे जिन्‍होंने 15 वर्षों में 13 स्‍थानांतरण आर्डर का सामना किया। 

मुग्धा सिन्हा 1999 बैच की राजस्थान कैडर की आईएएस ऑफिसर हैं। जब ये कलेक्टर बनकर राजस्थान की झुंझनु जिले गईं थीं तो ये उस जिले की तब तक की पहली महिला कलेक्टर थी। मुग्धा सिन्हा ने अपनी पढ़ाई देश के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज जेएनयू से पूरी की है। इन्होंने जेएनयू से इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में एमफिल किया है।

18 साल तक राजस्थान में आईएएस ऑफिसर की भूमिका को मुग्धा एक प्रेरक लीडर की तरह सीखने और देशवासियों में बांटने का निरंतर सफर मानती हैं। कार्य की कठिनता को आनंददायक और चुनौतीपूर्ण दोनों ही विशेषणों से संजोकर अपनी कार्यकुशलता के अनेकों उदाहरण उन्होंने प्रस्तुत किए हैं। सरकारी योजनाओं को जिले के प्रत्येक आम आदमी तक पहुंचाने में उन्हें देशवासियों की सरकार से अपेक्षाओं के बारे में खासी जानकारी मिली। 

केंद्रीय सरकार के टेक्सटाइल और वाणिज्य विभाग में कार्य करते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और इंडस्ट्री में उन्हें विभिन्न महत्वपूर्ण योजनाओं के निर्माण का मौका भी मिला। 

राजस्थान के चार विभिन्न जिलों में काम करते हुए उन्होंने अनेक चुनौतियों का सामना किया। बूंदी जिले में कार्य करते हुए गांव वासियों के सहयोग से पर्यटन को बढ़ावा दिया। ‘शिक्षा आपके द्वार’ अभियान चलाकर बच्चों का स्कूलों में रजिस्ट्रेशन करवाया। ‘सारथी योजना’ को उन क्षेत्रों में लागू किया जहां तक सरकारी योजनाएं अभी तक नहीं पहुंच पाई थी। हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर क्षेत्रों में मनरेगा मजदूरों को नहर खुदाई के लिए अवसर देकर दोनों समस्याओं को सुलझाया। झुंझुनू क्षेत्र में जमीन एवं खनन माफिया के खिलाफ कार्य करने पर मुग्धा को ट्रांसफर आर्डर का सामना करना पड़ा। 

भविष्य में IAS ऑफिसर बनने वाले युवाओं के लिए मुग्धा का यह संदेश है कि आईएएस बनकर आप ईमानदारी, सत्यता, न्यायपूर्ण ढंग से अपने कर्तव्य को निभा कर आने वाली पीढ़ियों के लिए तो मिसाल कायम करते ही हैं साथ ही आम आदमी का साथ आप की राजनीतिक हार को भी जीत में बदल देता है। अपने कर्तव्य की राह में स्वयं की चेतना और देश के संविधान को अपना मार्गदर्शक मानकर कार्य करेंगे तो हमेशा पाएंगे सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं 

बूंदी जिले के एक मंदिर में लिखें इस संदेश को मुग्धा अपने जीवन की प्रेरणा मानती हैं 

जो अपने पद पर रहकर काम करते हैं वह कभी ना कभी भूतपूर्व हो जाते हैं लेकिन जो अपने कर्म से काम करते हैं वह सदैव अभूतपूर्व कहलाते हैं

वर्तमान में मुग्धा दिल्‍ली मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर की कमिश्नर हैं इससे पहले राजस्‍थान राज्‍य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम में एम डी के पद पर रह कर अपने अनुभवों से राज्य में होने वाले निवेश और औद्योगिकरण को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। 

जीवन की कठिन परिस्थितियों को अपने प्रेरणात्मक विचारों से रोचक अनुभवों में बदलने वाली अद्भुत व्यक्तित्व और प्रतिभा की धनी मुग्धा सिन्हा की कार्य निष्ठा देश के विकास की महत्पूर्ण कड़ी है।

पहले के जमाने में अक्सर कहा जाता था कि डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं हालांकि आजकल के समय में यह कथन सुनने को मुश्किल में ही मिलता है। एक  गांव जहां 500 से ज्यादा लोग नम आंखों से एक डॉक्टर को विदाई दे रहे हों यह अविश्वसनीय तो है लेकिन इसका कारण जानकर आप अभिभूत हो जाएंगे। 

32 वर्ष के डॉक्टर किशोर चंद्र दास, ओडिशा के तेंतुलीखूंटी गांव को छोड़कर परा स्नातक की डिग्री लेने भुवनेश्वर जा रहे हैं, यह खबर सुनते ही प्रभु श्री राम के वनवास के समय उमड़ी अयोध्या वासियों की भीड़ की तरह सभी गांववासी उमड़ पड़े, डॉक्टर किशोर की एक झलक पाने को। नम आंखों से कुछ उनसे रूकने की गुहार कर रहे हैं और कुछ उनसे लिपट कर वापिस जरूर आने का वचन लेना चाहते हैं। आंखे तो डॉक्‍टर किशोर की भी नम हैं। आश्‍चर्य होता है डॉक्‍टर और मरीजों के रिश्‍ते के इस भावनात्‍मक पहलू को देखकर।  

पिछले 8 साल से डॉक्टर किशोर तेंतुलीखूंटी गांव के लोगों की सेवा में कार्यरत थे। क्या दिन क्या रात, मानो गांव का कम्युनिटी हेल्थ सेंटर उनका कर्म क्षेत्र था जहां वे निरंतर मरीजों की सेवा में लगे रहते थे। राजीव गांधी इंस्टिट्यूट बेंगलूरु से पढ़े किशोर ने डॉक्टरी का सफर ओडिशा के इसी गांव से शुरू किया था। 

8 साल के भीतर कम्‍यूनिटी  हेल्थ सेंटर में आधुनिक लैब, एयर कंडीशनड डिलीवरी रूम, ऑपरेशन थिएटर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर इत्‍यादि आवश्यक सुविधाएं जो शहरी अस्पतालों में मिल जाती हैं मुहैया करवाने का जिम्‍मा डॉक्‍टर किशोर ने लिया और उसे पूरा भी कर दिखाया। 

दूर से आने वाले मरीजों के समय की चिंता उन्हें इतनी रहती थी कि अपना अधिक से अधिक समय उनके लिए समर्पित था। मीलों दूर से लोग 300-400 रुपए  किराए के खर्च करके डॉक्टर किशोर के पास आते थे क्‍योंकि किशोर ही उनके विश्वासपात्र डॉक्टर हैं। 

2014 में जब पास के गांव में डायरिया फैला तो डॉक्‍टर किशोर ने अपनी टीम के साथ यहां के लोगों को बचाया। सरकार से प्रार्थना करके सीवर के पानी का बहाव स्थानीय कुंओं में जाने से भी रूकवाया। 

मात्र 24 वर्ष की उम्र में गांव वासियों की सेवा के इस जज्बे से डॉक्टर किशोर ने गांववासियों के शरीर को तो स्वस्थ किया ही है तेंतुलीखूंटी गांव को भी एक नया जीवन और आशा की नई किरण प्रदान की। 

डॉ. किशोर भुवनेश्वर में एक निजी मेडिकल कॉलेज-सह-अस्पताल में ऑर्थोपेडिक्स में स्नातकोत्तर डिग्री करने के लिए जा रहे हैं। गांव छोड़ने के पहले दिन भी उन्होंने अस्पताल के कैंपस में 500 पौधे लगाए। 

किशोर ने तेतुलीखूंटी के गांव के लिए जो किया उससे यह तो सिद्ध कर ही दिया कि इंसानियत को यदि पेशे से ऊपर रखा जाए तो अस्पतालों की शाखाओं की जरूरत नहीं सिर्फ डॉक्टर्स ही काफी हैं और ऐसे डॉक्टरों की हमारे देश और देशवासियों को बहुत जरूरत है। 

ग्रामीण जीवन की सरलता, सरसता, प्रदूषण मुक्त वातावरण, सौहार्द और प्रेम जहां भारत की असली संस्कृति का सूचक है वहीं दूसरी ओर शिक्षा के कमजोर ढांचे के कारण अशिक्षा और ग्रामीण जीवन एक दूसरे के पूरक है। लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा 2017 में 8 वीं रैंक हासिल करने वाले अनुभव सिंह ने इस मिथक को झुठला दिया है। 

उत्तर प्रदेश राज्य के टॉपर अनुभव, ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। उनके पिता धनंजय सिंह किसान हैं और मां सुषमा सिंह सरकारी स्कूल में क्लर्क हैं। अनुभव की बड़ी बहन ने विज्ञान के क्षेत्र में मास्टर्स किया है। अनुभव ने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा गांव से करने के बाद इलाहाबाद के बीबीसी इंटर कॉलेज, शिवपुरी से आगे की पढ़ाई की। 11वीं कक्षा से ही IIT की तैयारी में अनुभव जुट गए। जिसके फलस्वरुप आईआईटी रुड़की में उन्हें दाखिला मिला। 

अनुभव की मां सुषमा सिंह लगभग 12 साल उनके साथ इलाहाबाद में रहीं। और उनकी पढ़ाई से लेकर खाने-पीने तक हर चीज का ध्यान रखा। अनुभव की मां गर्व से कहती हैं कि उनके बेटे को किताबों और पढ़ाई के अलावा कोई अन्य शौक नहीं है। शादी के प्रश्न पर सकुचाते हुए बस इतना ही कहती हैं कि समय आने पर ही शादी भी जरूर होगी। 

अनुभव के पिता के शब्दों में उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन वह अनुभव की इस कामयाबी को मानते हैं। बचपन से ही अनुभव का गंभीर बातों को ग्रहण करना और कंठस्थ रखना उनकी सफलता में सहायक बना। 

अनुभव अपने परिवार और मित्रों को अपनी सफलता का मुख्य स्रोत मानते हैं आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग करने के बाद भारतीय राजस्व सेवा में अनुभव का चयन होने पर भी ट्रेनिंग के दौरान वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी करते रहे। उन्हें अपनी मेहनत और लगन पर पूरा विश्वास था इसलिए अपने सपने को पूरा करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। पंडित नेहरू को अपना प्रेरणास्रोत मानने वाले अनुभव स्वभाव से गंभीर और शांत है। उनका मानना है कि प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी किसी के बहकावे या दबाव में आकर नहीं वरन अपने मन में प्रबल इच्छा के अनुरूप ही करनी चाहिए। दो से ढाई साल की कड़ी मेहनत और दोस्तों से लगातार पढ़ाई के विषयों के बारे में चर्चा करने से और परीक्षा के विषयों की किताबें लगातार पढ़ते रहने से आप सफलता के ज्यादा करीब पहुंच सकते हैं। 

ग्रामीण जीवन के पारंपरिक शैक्षिक ढांचे से बाहर निकलकर ही अनुभव ने यह सफलता अर्जित की, अन्यथा ज्यादातर ग्रामीण युवा स्वयं को इसी ढांचे में ढालकर अपने जीवन से संतुष्ट हो जाते हैं। 

अनुभव ने अपने जीवन के लक्ष्य को अपनी कड़ी मेहनत से प्राप्त करके यह सिद्ध कर दिया है कि सफलता भी उन्हीं के कदम चूमती है जो कदम उसकी तरफ बढ़ना चाहते हैं।

किसी भी प्रदेश में पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी के रुतबे को हम सभी समझ सकते हैं। उसकी कर्तव्यनिष्ठा, सम्मान और उपलब्धियों के चलते ही वह इस पद तक पहुँचता है। उसके ऊपर न केवल प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी होती है बल्कि वह समाज के प्रति भी समग्र रूप से जवाबदेह होता है। हमारे देश में ऐसे तमाम पुलिस अधिकारी हुए हैं जिन्होंने अपनी संवेदनशीलता से देश को आगे ले जाने का काम किया है। यह सच है कि जिस समाज को सँभालने का उनपर जिम्मा होता है उसमे रहते हुए वो तमाम तरह की मुश्किलों की भी पहचान करते हैं। हालाँकि कानून व्यवस्था को सँभालते हुए यह हर बार संभव नहीं होता कि वो उन मुश्किलों का हल तुरंत दे सकें। लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी होते हैं जो सेवा-निवृत्त हो जाने के बाद भी ने केवल अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं बल्कि उन मुश्किलों के हल पर भी काम करते हैं। आज की कहानी ऐसे ही एक पूर्व डीजीपी (प्रदेश में पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी), मुकेश सहाय की है जिन्होंने सेवामुक्त होने के अगले दिन से ही एक सामान्य से विद्यालय में गणित पढ़ाना शुरू करदिया। आइये जानते हैं उनके इस सलाम करने योग्य कार्य के बारे में।


34 साल पुलिस में रहते हुए की समाज की सेवा और अब बने शिक्षक
मुकेश सहाय बीते 30 अप्रैल को असम के डीजीपी के रूप में सेवामुक्त हुए और उन्होंने अगले ही दिन से गुवाहाटी के भरलुमुख क्षेत्र में स्थित सोनाराम हायर सेकेंडरी स्कूल में बतौर गणित शिक्षक अपनी जिंदगी की दूसरी पारी की शुरुआत करदी। इसके पीछे का कारण यह रहा कि उन्होंने अपने बचपन में शिक्षा को लेकर खुदके संघर्ष को देखा था, सेवा में रहने के दौरान समाज में शिक्षा के स्तर को देखा था और उसके बाद उन्होंने यह ठान लिया था कि वो एक शिक्षक के रूप में भी इस समाज के काम आना चाहेंगे। यह गौरतलब है कि पुलिस सेवा से जुड़ने के पहले मुकेश जी की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं हुआ करती थी, जिसके चलते उन्हें एक ट्यूटर के तौर पर कार्य करते हुए पैसे कमाने पड़ते थे।

एक बार विद्यालय में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे और महसूस कि वहां पर अपनी जरुरत
इस विद्यालय में एक बार उनको मुख्य अतिथि के रूप में निमंत्रण प्राप्त हुआ था (वर्ष 2017 में) और जब वो वहां पहुंचे तो वहां के प्रधानाध्यापक, द्विजेन्द्र नाथ बरठकुर ने बताया कि विद्यालय में गणित शिक्षक की कमी होने के कारण वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि, "2016 से हमारे पास एक गणित शिक्षक की कमी है, अगर यह कमी दूर हो जाए तो बच्चों का काफी भला हो सकेगा।" उसी पल मुकेश सहाय को लगा कि काश वो खुद वहां पढ़ा पाते तो बच्चों को एक गणित का शिक्षक मिल जाता जिससे उनकी पढ़ाई ढंग से हो पाती। यह सोचते हुए मुकेश जी ने प्रधानाध्यापक से कहा कि, वो विद्यालय में आकर शिक्षक के तौर पर कार्य करने के इच्छुक हैं लेकिन व्यस्तता के चलते ऐसा शायद संभव न हो सके। हालाँकि उन्होंने प्रधानाध्यापक से कहकर विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली गणित की पुस्तकों को अपने घर माँगा लिया और उसपर अध्ययन भी किया। उन्होंने प्रधानाध्यापक को इस सम्बन्ध में हल खोजने का भरोसा भी दिलाया था।

सेवामुक्ति की सूचना मिलते ही जाहिर की गणित शिक्षक के तौर पर विद्यालय से जुड़ने की मंशा
मुकेश जी को जब यह मालूम चला कि वो आगामी 30 अप्रैल 2018 को सेवामुक्त होने जा रहे हैं तो उन्होंने विद्यालय के प्रधानाध्यापक से मिलकर विद्यालय के साथ बतौर नियमित गणित शिक्षक जुड़ने की अपनी मंशा जाहिर की। और सेवामुक्ति के अगले दिन यानि कि 1 मई से उन्होंने उस विद्यालय में गणित पढ़ाने की शुरुआत भी करदी। अपनी इस नई पारी के बारे में उनका कहना था कि, "मैंने शिक्षक के तौर पर कभी कार्य नहीं किया है, हालाँकि मै एक पुलिस ट्रेनर रहा हूँ और इस कारण मुझे मदद मिलती है।" उन्होंने यह भी कहा कि, "इन बच्चों को पढ़ने के पहले मै स्वयं कैलकुलस के उन अध्यायों को घर पर दोहराता हूँ। मै समझता हूँ कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है।"

उनके आने से विद्यालय में छाई हैं खुशियां
जहाँ मुकेश जी को समाज के काम आने का एक मौका मिला है, वहीँ बच्चों को उनके रूप में एक बेहतर मार्गदर्शक भी मिला है। उनके बारे में पूछने पर एक विद्यार्थी ने कहा कि, "वो एक साधारण इंसान की तरह हमे पढ़ाते हैं और उनकी यही बात हम सबकी पसंदीदा है।" वास्तव में मुकेश जी के इस कार्य को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि न केवल खुदके प्रति, अपने परिवार के प्रति बल्कि समाज के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी बनती है। मुकेश जी के बारे में जानकार ऐसा लगता है कि आज भी समाज में ऐसे लोग हैं जो खुदके लिए न सोचकर दूसरों के भले के लिए सोचते हैं। वो चाहते तो शायद सेवामुक्ति के पश्च्यात एक आरामदायक जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा न करने का निर्णय लिया और वो आज एक साधारण से विद्यालय में शिक्षक के तौर पर कार्य कर रहे हैं। हम उनके इस नेक कार्य के लिए उन्हें सलाम करते हैं।

कहते हैं इंसान का जीवन की उसका सबसे बड़ा गुरु होता है।ज़िंदगी के हर मोड़ पर हमें कोई न कोई ऐसा जरूर मिलता है जो हमें उम्रभर का पाठ पढ़ा जाता है। कभी कभी तो हम उन घटनाओं की अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं पर कुछ घटनाएं हमनें ताउम्र याद रह जाती है। जरूरी नहीं यह सीख हमें केवल अपनों से मिले, कभी-कभी एक अजनबी भी हमें वह सीख दे जाते हैं जो हमारे लिए एक प्रेरणा बन जाती है।

कुछ ऐसी ही सिख मिली बॉलीवुड के जाने-मानें अभिनेता और ट्रैजिडी किंग के नाम से मशहूर दलीप कुमार को। उनको जीवन भर की सीख दे जाने वाले भी कोई आम शख्स नहीं थे। वह थे भारत का जाना-माना बिजनेस मैन और टाटा समूह का मालिक जेआरडी टाटा।
यह किस्सा है एक्टर दिलीप कुमार और जेआरडी टाटा के बीच फ्लाइट में हुई पहली मुलाकात का। ये वो दौर था जब दिलीप कुमार अपने करियर के पीक पर थे और टाटा भारत के सबसे जानेमाने और सफल बिजनेसमैन। इस किस्से का जिक्र उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द सबस्टांस एंड द शैडो' में भी किया है।

पाकिस्तान के पेशावर में जन्म लेने वाले मोहम्मद यूसुफ खान अब बॉलीवुड के लिए दिलीप कुमार बन गए थे। यह उस वक्त की बात है, जब दलीप कुमार अपने करियर के शीर्ष पर थे। एक बार वे प्लेन में यात्रा कर रहे थे, और अपनी गाड़ी से उतरते ही एयरपोर्ट पर उनको सैकड़ों फैंस की भीड़ मिलती है। कोई उनसे ऑटोग्राफ चाह रहा था, कोई उन्हें चुना चाहता था तो कोई बस एक नज़र देखना चाहता है। उन दिलों दिलीप कुमार का क्रेज़ था, वे उस दौर में बॉलीवुड पर एकतरफा राज़ किया करते थे। जैसे तैसे वे भीड़ से निकलकर अपने फ्लाइट में पहुँचे पर वहां भी आलम कुछ जुदा नहीं थी। सारे यात्री उनकी तरफ देखे जा रहे थे, हर कोई उनसे मिलने, उनका ऑटोग्राफ लेने को बेकरार था। दिलीप के लिए भी एक सब रोज की बात थी पर उन्हें असहज तो तब महसूस हुआ जब उनके ठीक बगल में बैठा शख्स उन्हें देख तक नहीं रहा था।

दरअसर ये शख्स था भारत का सबसे बड़ा बिजनेसमैन और टाटा समूह का मालिक जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा यानी जेआरडी टाटा। हिन्दुस्तान के उद्योग जगत का एक ऐसा नाम जिनके बिना भारत के उद्योग जगत का इतिहास लिखा जाना असंभव है। जेआरडी टाटा ने ऐसे समय में अपनी कंपनी का कारोबार बढ़ाया जब भारतीय अर्थव्यवस्था सही नहीं चल रही थी। 1904 में फ्रांस के पेरिस में जन्में जेआरडी भारत के पहले लाइसेंसधारी पायलट भी थे। उन्होंने अपने उड़ने के साथ-साथ सबकी उड़ान का इंतजाम भी किया। इसी लिए जेआरडी टाटा को इंडियन सिविल एविएशन का पिता भी कहा जाता है। शायद ही आपको पता हो कि एयर इंडिया की शुरुआत उन्होंने ही की थी।

दरअसल उस सफर के दौरान दिलीप कुमार को भी नहीं पता था कि वह शख्स कौन है। अब इसमें उनका भी दोष कहाँ था, उस दौर में उन्हें किसी को पहचाननें की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। क्योंकि लोग पहले ही उन्हें पहचान लिया करते थे। दलीप कुमार पर जहाँ सबकी नजरें थी वहीं दिलीप कुमार की नज़र अपने बगल वाली सीट पर बैठे आदमी को ताड़े जा रही थी। सादे शर्ट-पैंट पहनें बैठा वह शख्स चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था। कभी वह अखबार को देखता तो कभी विंडो के बाहर। बस देख नही रहा था तो इतने बड़े सुपरस्टार को जो ठीक उसके बगल में बैठा था।


दिलीप कुमार खुद को रोक नहीं सके और उस शख्स के करीब जाकर पूछा-

‘क्या आप फिल्में देखतें हैं?’
सामनें से जवाब मिला, -‘कभी-कभी’।

दिलीप कुमार ने कहा, ‘मैं भी फिल्मों में काम करता हूं।'
फिर जवाब आया - ‘वंडरफुल’, आप फिल्मों में क्या काम करते है ?

दिलीप नें जवाब दिया – मैं एक्टर हूँ|

जेआरडी नें कहा – बहुत अच्छा |

इस बातचीत के बाद वो शख्स फिर अपनी चाय की चुस्कियों और अखबार के पन्नों में खो गया। दिलीप के साथ पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी कि उन्हें किसी नें पहचाना ना हो।

जब प्लेन लैंड हुआ तो दिलीप कुमार नें उस शख्स से हाथ मिलाया और कहा –

“आपके साथ यात्रा करके अच्छा लगा| वैसे मेरा नाम दिलीप कुमार है।”

दिलीप कुमार ने फिर जोर देकर कहा, ‘मेरा नाम दिलीप कुमार है। सामने वाले शख्स ने कहा, ‘आई ऐम जेआरडी टाटा’ और एक बड़े गुड बाई के साथ बातचीत यहीं खत्म हो गई।

दिलीप कुमार, टाटा का नाम सुनते ही चौंक गए| उन्हें इस बात की सिख मिली कि आप चाहे कितने भी बड़े हो जाओ लेकिन आपसे भी बड़ा हमेशा कोई न कोई होता ही है| घमंड न करें, विनम्र रहें क्योंकि विनम्रता से अच्छी कोई चीज नहीं। दिलीप कुमार नें इस घटना को एक सीख में तौर पर हमेशा याद रखा। यहां तक कि उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द सबस्टांस एंड द शैडो' में भी इस घटना का ज़िक्र किया है।

जब पंछी वर्षा के समय अपने घोसलों की तरफ आसरा लेने के लिए लौटने लगते हैं, बाज उस समय आसमान से ऊपर की उड़ान भरकर वर्षा की अनंत सीमाओं से परे जाने के प्रयास में जुट जाता है। पंछी तो दोनों ही उड़ने वाले हैं अंतर केवल हौसलों और सोच का है। हौसलों और निश्चय से ही इतिहास की पाती लिखी जाती है जो सदियों तक याद की जाती है। 

दशरथ मांझी तो आपको याद होंगे ही जिन्होंने बिहार के गहलोत गांव में 360 फुट का पहाड़ मात्र एक छेनी और हथौड़ी की मदद से काटकर 22 साल में 55 किलोमीटर रास्ते को 15 किलोमीटर करके अत्रि और वजीरगंज ब्लॉक के रास्ते को जोड़ा था। ऐसा ही अद्भुत कारनामा कर दिखाया है उड़ीसा के जालंधर नायक ने मात्र 2 वर्षों में 8 किलोमीटर लंबी चट्टानी सड़क पहाड़ियों को काटकर बनाई है। नायक ने ओडिशा के कंधमाल जिले के फूलबनी शहर और अपने गांव गुमांशी को मुख्य सड़क से जोड़ा है। 

अत्यधिक प्रेरणादाई बात यह है कि 2 वर्ष तक लगातार 8 घंटे मेहनत करने का कारण था कि नायक अपने तीनों बेटों को स्कूल भेजना चाहते थे। गुमांशी में कठिन जीवन के चलते सभी गांववासी यहां से अपने घर छोड़ कर चले गए थे। लेकिन नायक का एकमात्र परिवार इसी गांव में रह रहा है, मानो नायक ने तो ठान ही लिया था कि अपने गांव को मुख्य सड़क से जोड़कर ही रहेंगे और सच में कर भी दिखाया। 

जालंधर नायक के तीनों बेटों को स्कूल पहुंचने में लगभग 3 घंटे लग जाते थे। सब्जी बेचने वाले नायक सुविधाओं के अभावों के चलते स्‍वयं शिक्षा प्राप्‍त नहीं कर पाए थे इसलिए शिक्षा के महत्‍व को भली भांति समझते हैं। नायक ने बच्चों की शिक्षा के लिए इस कठिन सड़क को बनाने का निर्णय लिया। गुमांशी गांव के शहर से ना जुड़ा होने के कारण, सुख सुविधाओं के अभाव में गांव छोड़ने वालों के लिए एक मिसाल भी नायक ने रखी कि कठिनाइयों से भाग कर नहीं लड़ कर जीता जा सकता है। 

सोशल मीडिया ने जब नायक के इस कार्य को दिखाया तो सरकारी अधिकारियों ने तुरंत इस खबर का संज्ञान लिया। वहां के लोकल एडमिनिस्ट्रेटर ने नायक के सराहनीय कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि नायक को 2 वर्ष की इस पूरी मेहनत का भुगतान सरकारी खर्चे से किया जाएगा। इतना ही नहीं बाकी बची 7 किलोमीटर की सड़क को बनाने का काम अब सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है। जिसे बनाने में नायक को 3 वर्ष लग जाते। 

जालंधर नायक ने नाम से ही नहीं अपने काम से भी स्वयं को नायक सिद्ध करके दिखाया है। एक ऐसा नायक जिसने अपने निजी हित को पूरा करने के साथ-साथ समाज के लिए भी नए रास्ते खोल दिए। मांझी और नायक के इस अभूतपूर्व कार्य से आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा मिलेगी।

... or jump to: 2018
Info
Organization Name:
KenFolios
Category:
Membership

Administrator

My Posts