KenFolios

KenFolios can be best defined as a social entrepreneurship project where every initiative is a step toward positive social change. Our evolution as a media house began in 2013 and we have come a long way since then.

Headquartered in New Delhi, our publishing wing is aimed at instilling hope and motivation in individuals while our community of changemakers and influencers works for a common goal - to cause change and make this a better society for all.

Our mission is to impact the world around us with a problem-solving approach and bring together knowledge and people.

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यदि आप अपने शौक को अपने बिज़नेस का रूप देते  हैं तो सफलता आपके कदम निश्चित तौर पर चूमेगी इसी विचार को सत्यार्थ किया है बंगलुरु में रहने वाले दो युवको ने जिन्होंने अपनी मीट के प्रति दीवानगी को अपने व्यवसाय में बदला और मात्र 2 सालों में अपने व्यापार को 15 करोड़ तक पंहुचा दिया।यह है अभय हंजूरा और उनके दोस्त विवेक गुप्ता। इकतीस वर्षीय कश्मीरी पंडित अभय जम्मू के रहने वाले है ,वर्ष 2004 में स्नातक करने के लिये वह बंगलुरु आ गये। स्नातक करने के बाद उन्होंने बिज़नेस और रिस्क मैनेजमेंट में भी डिग्री हासिल करी वह विवेक चंडीगढ़ के रहने वाले है और चार्टेड अकाउंटेंट है। वो भी वर्ष 2004 में नौकरी के सिलसिले में बंगलुरु आ गये थे।वह दोनों एक दुसरो से काम के सिलसिले वर्ष 2010 में मिले और काफी अच्छे दोस्त बन गये और अक्सर खाली समय में लंच या डिनर पर किसी होटल या रेस्टोरेंट में मिलने लगे। यहाँ वह दोनों खाने में सिर्फ मीट का ही आर्डर देते थे और ऐसी कई मुलाकातों ने उनको एहसास  कराया की दोनों का स्वाभाव एक सा है और दोनों को मीट खाना बेहद पसंद है। हालांकि दोनों ही जॉब कर रहे थे लेकिन इनके मन में बिज़नेस करने की प्रबल इच्छा थी और दोनों को ही लगता था की नौकरी छोड़ कर  उन्हें साथ में  कुछ अपना करना चाहिये। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए  अभय ने विवेक के साथ  2015 में मीट का बिज़नेस करने की सोची,विवेक के अनुसार उन्हें उस समय मीट के बारे में कुछ भी नहीं पता था लेकिन अभय ने कहा कि वह इसकी चिंता छोड़े वह उन्हें सब कुछ सीखा देंगे। जब दोनों के परिवारों को उनकी इस सोच का पता चला तो सभी ने उनके नौकरी छोड़ कर बिज़नेस में जाने का विरोध किया और मीट के बिज़नेस में तो बिलकुल ही नहीं। कहते है न "एक और एक ग्यारह होता है " दोनों दोस्तों को एक दूसरे पर पूरा विश्वास था  और सारे विरोधो को दरकिनार करते हुए इन्होने "लिशस ब्रांड" नाम से कंपनी शुरू की।

इनकी कंपनी मीट और मांसाहारी उद्पाद बनती है जिनमे मछली ,सीफ़ूड और मांस के उत्पाद की कई श्रेणियां  है, जो की रॉ और मैरीनेड उत्पादों में उपलब्ध है। लिशस में ऑनलाइन आर्डर बुक किये जाते है।अपनी लगन और मेहनत के बलबूते पर पहले ही महीने में उन्हें 1300 आर्डर मिले और आज मीट की फ्रेश और अच्छी क़्वालिटी के चलते सिर्फ बंगलुरु में ही एक महीने में 50 हज़ार आर्डर पुरे करते है। शुरू में इनके पास मीट रखने की केवल 30 यूनिट थी जो अब बढ़कर 90 हो गयी है। अभय बताते है की भारत में मीट का कारोबार लगभग 30 -35 अरब डॉलर का है लेकिन सही गुडवत्ता वाला मीट एक समस्या थी। दुकानों पर मिलने वाला मीट जिस ढंग से रखा जाता है उससे बीमारी फैलने की बहुत आशंका रहती है इसलिए ग्राहकों को अच्छी क़्वालिटी वाला मीट देने के लिए दोनों कंपनी में एंटीबायोटिक्स से लेकर  स्टेरॉयड्स तक का निरक्षण करते है और कई तरह के प्रयोग और रिसर्च के बाद फार्म टू टेबल का मॉडल तैयार किया  जिसके तहत गुडवत्ता और और लगातार ताज़गी को बरक़रार रखने के लिये कोल्ड चेन को मजबूत किया।साथ ही अपनी कंपनी को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करने के लिए अभय और विवेक ने निओपल्क्स टेक्रॉलोजी फंड, सिस्टेमा एशिया फंड, 3 वन4 कैपिटल और मेफील्ड इंडिया के नेतृत्व में एक करोड़ डॉलर की सीरीज-बी का फंड जुटाया। दिसंबर 2015 में इसने मेफिल्ड कैपिटल और 3वन4 कैपिटल से 30 लाख डॉलर का सीरीज-ए का फंड जुटाया था। इससे पहले इस कंपनी ने अगस्त 2015 में इन्फोसिस बोर्ड के पूर्व सदस्य टीवी मोहनदास पई और हीलियन वेंचर्स के सहसंस्थापक कंवलजीत सिंह समेत ऐंजल इन्वेस्टर्स से पांच लाख डॉलर जुटाए थे।

मांस की उच्च क्वालिटी के लिये इन्होने सीधे  मुर्गी पलकों से गठजोड़ कर उनको मुर्गी के बच्चे को उसकी खास उम्र, वजन, आकार और उसके आहार के बारे जानकारी दी जाती है और  इन मुर्गियों को तैयार करके हर रोज चार घंटों के अंदर तापमान नियंत्रित वाहनों में संसाधन केंद्रों तक पहुंचाया जाता है।कंपनी का अपने स्टॉक पर पूरा नियंत्रण रहता है। हर खेप को लैब में परखा जाता है, उसके बाद ही उसे पैक किया जाता है और कोल्ड चेन से व्यवस्थित डिलिवरी केंद्रों पर भेजा जाता है। विवेक कहते हैं कि इस कोल्ड चेन को शुरू से लेकर आखिर तक कहीं भी नहीं तोड़ा जाता है। यानी प्रॉडक्ट को हर समय ठंडे तापमान पर रखा जाता है। लिशस 30 विक्रेताओं के साथ काम करती है और हर रोज करीब तीन टन मांस खरीदती है।

विवेक बताते है पहले उन लोगो को लगता था जैसे जैसे काम बढ़ेगा तब आवश्कता के अनुसार ज्यादा मॉस ख़रीदना बहुत चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन मार्किट की समझ और कुशल नेतृत्व के कारण यह हमेशा ही बहुत आसान रहा। अभय कहते हैं लिशस ब्रांड कभी भी गुडवत्ता से समझोता नहीं करती इसलिये  हम समुद्र तट से सी फूड लेते हैं और कोल्ड चेन में उसकी गुणवत्ता कायम रखते हैं। आज कंपनी का एक रिसर्च सेंटर बेंगलुरु में है और हैदराबाद में इसके तीन डिलिवरी केंद्र हैं।कीमत के बारे अभय बताते है कई हमारे कुछ प्रोडक्ट देखने में खुले में उपलब्ध मीट की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत ज्यादा लगते है लेकिन ऐसा है नहीं। परंपरागत बाजार में वजन के बाद मांस टुकड़ों में काटा जाता है और अंतिम खरीद की मात्रा 10-15 प्रतिशत कम होती है। लेकिन हम पूरी तौल और अच्छे से साफ-सफाई के बाद ही हम मीट को ग्राहक को देते हैं।

बंगलुरु शहर में मिली अपार सफलता और नयी फंडिंग के बाद इनके हौसले काफी बुलंद है और अगले 2 सालो में यह कंपनी को देश के कई बड़े शहरो में ले जायँगे जिनमे दिल्ली ,मुंबई और पुणे प्रमुख है।  इसकी मौजूदा बिक्री ज्यादातर ऑनलाइन हो रही है, वहीं एक बार फ्रंटएंड पर विश्वास हासिल करने के बाद कंपनी  रीटेल पर भी ध्यान देगी।अभय बताते है की आज इनके सामने दो प्रमुख चुनौतियां है पहली ग्राहकों को बताना सही मीट क्या है और दूसरा कम दाम में उच्च गुणवत्ता वाला मीट प्रोडक्ट लांच करना। अपने मजबूत इरादों एवं  इच्छाशक्ति के चलते 2016-17 में  दोनों दोस्तों  की कंपनी का कुल टर्नओवर 15 करोड़ था। विवेक और अभय का लक्ष्य  इसे बहुत जल्द हर महीने 6-7 करोड़ रुपये करने का है। 

 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, देश की शान होती है बेटियां, माता-पिता का सम्मान है बेटियां, बेटियां किसी से कम नहीं होती, ऐसे अनेकों स्लोगन हमें सुनने और देखने को अक्सर मिल ही जाते हैं, जो बेटियों के प्रति प्रेम भावना को जागृत करते हैं। लेकिन जब परिवार की बेटी परिवार के साथ साथ देश का नाम भी रोशन करती है तो माता-पिता के लिए यह बड़े गौरवान्वित पल होते हैं। 

देहरादून की बेटी पूनम टोडी ने उत्तराखंड पीसीएस जूनियर की परीक्षा में टॉप किया है। पूनम के पिता एक ऑटो ड्राइवर है जो गर्व से फूले नहीं समाते, उनका कहना है कि हर घर में ऐसी बेटी का जन्म हो। 

न्यायिक सेवा सिविल जज जूनियर डिवीजन 2016 की परीक्षा में उत्तराखंड के सात और उत्तर प्रदेश के एक अभ्यर्थी ने सफलता प्राप्त की है, पूनम टोडी भी इन्हीं में से एक है।

असफलताओं ने सफल बनने के लिए प्रेरित किया 

अपनी पिछली दो असफलताओं से पूनम के हौसले तो पस्‍त हुए लेकिन इरादे कमजोर नहीं हुए। दोनों बार लिखित परीक्षा पास करके भी साक्षात्‍कार में असफल होने के बाद पूनम ने दिल्‍ली की कोचिंग क्‍लास में प्रवेश्‍ लेकर इस बार दुगनी मेहनत से परीक्षा की तैयारी की और सफल हो कर दिखाया। पूनम को पढ़ाई के लिए महंगी किताबों की जरूरत पड़ने पर उनके पिता जो ऑटो ड्राइवर हैं और मात्र 300 रुपए प्रतिदिन ही कमा पाते हैं उन्होंने कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी।

पूनम के माता-पिता ने कभी भी पूनम को नौकरी करने पर जोर नहीं दिया हमेशा उसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए ही प्रेरित किया इसी कारण पूनम मास्टर्स के साथ लॉ की डिग्री ले पाई। अपने परिवार में कभी बेटे और बेटी में फर्क नहीं करने पर अशोक टोडी को गर्व है। उन्होंने पूनम की शैक्षिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी जरूरतों को भी ताक पर रख दिया।

परिवार का प्‍यार ही रहा सफलता का आधार

अपने माता पिता और भाइयों का आभार व्यक्त करते हुए पूनम अपनी सफलता का सबसे बड़ा आधार अपने परिवार को और उसके प्यार को मानती हैं। डी ए वी कॉलेज देहरादून से मास्टर्स इन कॉमर्स की डिग्री प्राप्त करने के बाद पूनम को जज बनने की प्रेरणा इस पेशे से मिलने वाले सम्मान से मिली। 

पूनम के पिता अशोक टोडी चाहे अपने बच्चों को सुख सुविधाओं से भरपूर जीवन नहीं दे पाए लेकिन उनकी शिक्षा पर खर्च करके उनकी जड़ों को इतना मजबूत कर दिया कि 4 सालों से जज बनने की तैयारी कर रही बेटी ने इस सपने को पूरा करके उनके जीवन की हर कमी को दूर कर दिया।

बेटे और बेटी की समानता ही है बेटी के प्रति सच्‍चा प्‍यार

पूनम हर माता-पिता को यही संदेश देना चाहती हैं कि बेटी के जीवन के लक्ष्य को विवाह तक ही सीमित ना करके उसे भरपूर पढ़ने का मौका देना चाहिए। शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जिससे जीवन की विषम परिस्थितियों से लड़ा जा सकता है और वास्तविक ऊंचाइयों को प्राप्त किया जा सकता है। 

 

जीवन किसी के लिए रुकता नहीं है, यह किसी की आलोचना या प्रशंसा सुनने के लिए ठहरता नहीं है। हमारी पृथ्वी या अन्य ग्रह एक पल के लिए भी घूर्णन या परिभ्रमण करना रोकते नहीं हैं अथवा उनका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है। जीवन कभी ठहर जाए यह संभव ही नहीं। यदि आप इस का आनंद लेना चाहते हैं, तो आप को इसके उतार चढ़ाव का साहसपूर्वक सामना करना होगा। संघर्षों का सामना करके जीवन की राहों का निर्माण स्वयं करने वाले ही सच्चे योद्धा होते हैं। हमारी आज की कहानी की धुरी हैं कैप्‍टन शालिनी सिंह जिन्‍होंने एक बहादुर मां से लेकर आर्मी कैप्‍टन तक का सफर अदम्‍य साहस के साथ तय किया लेकिन कभी हार नहीं मानी।

सन 1998  में शालिनी की शादी भारतीय सेना के मेजर अविनाश सिंह भदोरिया से हुई तब वह मात्र 19 वर्ष की थीं। छोटी उम्र में शादी होने के कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। शादी के दो साल बाद ही मेजर अविनाश की पोस्टिंग कश्मीर में हो गई और उन्‍हें परिवार से दूर जाना पड़ा। इस दूरी के बावजूद भी अविनाश और शालिनी का वैवाहिक जीवन सुखद पूर्ण था।

28 सितंबर 2001 को शालिनी के ऊपर नियति का कहर टूटा जब उसे पता चला की आतंकवादियों से लड़ते हुए अविनाश वीरगति को प्राप्त हो गए। अपने 2 वर्ष के बेटे ध्रुव के साथ शालिनी का जीवन मानो शून्‍य हो गया था। लेकिन इस शून्‍य में बेटे की हंसती खिलखिलाती आवाज ने शालिनी को इस दुख का सामना करने के लिए दोबारा खड़ा किया।

6 महीने की कड़ी मेहनत और ट्रेनिंग के बाद 7 सितंबर 2002 को शालिनी ने भारतीय सेना में अधिकारी के तौर पर ज्वाइन किया। भारतीय सेना के अधिकारी के तौर पर ही उन्होंने राष्ट्रपति से अपने पति का मरणोपरांत कीर्ति चक्र सम्मान भी प्राप्त किया। अपने माता पिता और भाई का भरपूर सहयोग शालिनी को अपने बेटे के पालन-पोषण में मिला। 6 साल आर्मी की नौकरी करने के बाद ध्रुव के भविष्य के लिए शालिनी ने यह नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया।

शालिनी की बिखरी जिंदगी अब संभलने लगी थी। लोगों और परिवार के बहुत समझाने और कहने पर शालिनी ने जीवन का सबसे कठिन निर्णय लेकर सेना के ही मेजर एस पी सिंह से दूसरी शादी की लेकिन शादी के कुछ समय में ही शालिनी को पता लगा कि मेजर ने उसके विश्वास का फ़ायदा उठाते हुए शादी के पहले ही उसके एकाउंट से कई लाख रूपये शालिनी को बताए बगैर निकाल लिए। इसी बीच मेजर शालिनी से मारपीट करने लगा। 2011 में तो मेजर ने शालिनी के सिर पर गिलास से ऐसा हमला किया कि उसे 32 टाँके लगवाने पड़े। इसके बाद शालिनी ने अपने दूसरे पति से तलाक लेकर केस दर्ज करवाया है।

14 अप्रैल 2017 को मिसेज इंडिया क्लासिक क्वीन ऑफ सबस्टेंस 2017 का खिताबी ताज पहनने वाली कैप्टन (रिटायर्ड) शालिनी सिंह का मिसेज इंडिया बनने का सफर इतना आसान भी नहीं था।

फिलहाल शालिनी एक कंपनी में बतौर सीनियर मैनेजर कार्यरत हैं। इसके अलावा वह सोशल वर्क भी करती हैं। गरीब और दिव्यांग बच्चों को पढ़ाई में मदद करती हैं। शालिनी अपने त्‍याग के तोहफे के रूप में 17 साल के बेटे ध्रुव को भी भारतीय सेना की वर्दी में देखना चाहती हैं। 

सफलता के रास्ते उन्हीं के लिए खुलते हैं जो असफल होने पर भी मेहनत और प्रयास जारी रखते हैं। आराम परस्ती के लिए  यह कहकर परिश्रम से पीछा छुड़ा लेते हैं कि दुनिया का दस्तूर है अमीर और अमीर हो रहे हैं गरीब और गरीब। वह कभी सफलता का स्वाद नहीं चख पाते हैं। परिश्रमी लोग ऐसे होते हैं जो आशा और आत्मविश्वास का सहारा लेकर अंधेरों को रोशन करने का दम रखते हैं।  हमारी आज की कहानी भी ऐसी ही महिलाओं के एक समूह के बारे में है जिन्होंने प्रियदर्शनी महिला उद्योग की स्थापना कर के उसे एक ब्रांड में तब्दील कर दिया। 1996 में  महाराष्ट्र के छोटे से शहर वरोरा के बैंक मैनेजर मोइन काजी से मिलने महिलाओं का एक समूह पहुंचा। वह महिलाएं बैंक से लोन लेना चाहती थी। मोइन काजी ने जब उनका उद्देश्य पूछा तो उन्होंने बताया कि वह इससे आगे लोगों को छोटे-छोटे लोन देंगी। इन लोगों के पास गिरवी रखने के लिए कोई सिक्योरिटी नहीं है रोजगार से आमदनी बहुत कम है और पहले लिए उधार का कोई रिकॉर्ड नहीं है लेकिन उन महिलाओं का कहना था कि जिन लोगों को वह पैसा देंगी उन पर उनका अच्छा दबदबा है इसलिए लोन का रुपया शत-प्रतिशत वापस आएगा।  सब कुछ बैंक मैनेजर के ऊपर था उनका विश्वास जीतने पर ही महिलाओं को लोन मिल सकता था। यह उन महिलाओं की खुशकिस्‍मती थी कि मोइन काजी ने लोन देने के साथ-साथ जिला प्रशासन की मदद से महिलाओं के समूह को बीना रावत जो कि कॉमर्स में स्नातक है, की अध्यक्षता में महिला उद्योग के नाम से रजिस्टर्ड करवाया। दो सप्ताह में व्यापार योजना, लोन की औपचारिकताएं, स्टोरेज और गोदाम जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में भरपूर सहयोग और मार्गदर्शन दिया।

प्रियदर्शिनी के ब्रांड बनने का सफर यहीं से शुरू हुआ। एक वस्तु नहीं अनेकों वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित कर सभी को प्रियदर्शनी ब्रांड के अंतर्गत लाने का फैसला लिया गया।  छोटी मशीनों की औद्योगिक नगरी नागपुर में संस्था की मशीनरी को बनवाने का काम शुरू हुआ जैसे कि, पॉपकॉर्न बनाने की मशीन, जो पेट्रोलियम से चलती है। 

ब्रांड का प्रचार करने के लिए प्रिंटर ने कैरी बैगस पर प्रियदर्शिनी के नाम और लोगो लगाने का काम उचित दामों पर मुहैया करा दिया। मोमबत्ती के निर्माता ने मुंबई से नई से नई डिजाइन के सांचे उन्हें दिए जिससे इलाके में लोगों के बीच प्रिय‍दर्शिनी की मांग बढ़ने लगी।

मार्केटिंग की समस्या को दूर करने के लिए वरोरा की म्‍यूनिसिपल काउंसिल ने चॉक स्टिक, मोमबत्ती और झाड़ू का ऑर्डर अधिक से अधिक मात्रा में दिया। उधर स्थानीय दुकानदारों ने प्रियदर्शनी का माल अपनी दुकानों पर रखना शुरू कर दिया।  महिलाओं की मेहनत बढ़ती पूंजी और विस्तृत सेवाओं के रूप में रंग ला रही थी। वर्मीसेली जवें, कपूर की टिकिया बनाना, बचे हुए समय में सिलाई के काम में कार्यरत रहकर महिलाएं निरंतर प्रगति कर रही थी। 

स्कूल के बच्चों के लिए दिन के खाने की सप्लाई एक सुनहरे अवसर के रूप में प्रियदर्शिनी को मिली लेकिन खाने में मिल रही लगातार शिकायतों के कारण प्रियदर्शनी ने 1000  बच्चों के भोजन तक सीमित कर के विश्वासपात्र महिलाओं को कार्य के लिए चुना। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रियदर्शनी महिला उद्योग को मिले सम्मान से एक प्रतिष्ठित समूह के रूप में प्रियदर्शनी की पहचान बननी शुरू हुई।  

व्यापार की बारीकियों की जानकारी के बिना इन महिलाओं के समूह ने जिस आत्मविश्वास से व्‍यापार शुरू किया और लगातार सीखते हुए विकास की अनवरत सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सफलता की जिस मंजिल को पाया है उसका मूल मंत्र कर्मशीलता और कड़ा परिश्रम है।  

 

आज की कहानी के उद्देश्य को सार्थक करने के लिए यह छोटी सी कहानी बहुत जरूरी है। साहिल अपने दादा जी के साथ समुद्र किनारे चल रहा था किनारे पर हजारों तड़पती मछलियों को देखकर वह उनका हाथ छुड़ाकर भागा और एक-एक कर मछलियों को समुद्र में डालने लगा। दादाजी ने डांटा और कहा ‘’तू अकेली नन्ही सी जान कब तक इन हजारों को बचाएगा’’। साहिल रूआंसा सा होकर दादा जी के साथ हो लिया। थोड़ी दूर जाकर उसने पीछे मुड़कर देखा कि बच्चों का एक बहुत बड़ा समूह तड़पती मछलियों को समुद्र में वापस डाल रहा था। साहिल के चेहरे पर खुशी और जीत की लहर दौड़ गई। कुछ ऐसा ही उदाहरण दिल्ली के रहने वाले मीडिया कर्मी अभिमन्यु चक्रवर्ती ने दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है। उन्होंने अकेले ही प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण की बनाने के लिए जो पहल की है उससे आज अनेकों लोग जुड़ रहे हैं। 

सोशल मीडिया की एक पोस्‍ट ने अभिमन्‍यु की सोच को बदल दिया  

फेसबुक पर 10 फुट लंबी व्‍हेल की तस्वीर स्पेन के समुद्री बीच पर देखकर अभिमन्यु का मन बहुत आहत हुआ जब इस तस्वीर के माध्यम से उन्हें पता चला कि व्‍हेल के पेट में 29 किलो प्लास्टिक गया था जो उसकी मौत का कारण बन गया। 

15 सालों तक नष्ट नहीं होने वाले प्लास्टिक के बुरे परिणाम पूरी मानव जाति सहित पशु-पक्षी भी झेल रहे हैं। समुद्र में डाला जाने वाला प्लास्टिक का कचरा समुद्री जीव भोजन की भूल में खा बैठते हैं जिसके कारण अंदरूनी अंगों में रुकावट होने से वह काम करना बंद कर देते हैं और निर्दोष जीव जंतु मौत के मुंह में समा जाते हैं। अभिमन्यु इस समस्या से निपटने के लिए कुछ करना चाहते थे लेकिन क्या और कैसे नहीं जानते थे।

प्‍लागिंग यानि पिक अप एंड जॉगिंग 

इन्हीं दिनों खबरों में मुंबई के वकील अफरोज शाह द्वारा वर्सोवा बीच पर सफाई अभियान के बारे में जब अभिमन्यु ने पढ़ा तो बिना किसी की सहायता के सफाई अभियान का मन बना लिया। इस योजना पर सोचते हुए अभिमन्यु को स्वीडन के लोगों के बारे में पता चला कि प्‍लागिंग नाम की मुहिम के जरिए वह प्लास्टिक के कचरे को साफ करते हैं। प्‍लागिंग यानि पिक अप एंड जॉगिंग। जॉगिंग करते हुए रास्ते में दिखने वाले प्लास्टिक के कचरे को उठाना। अभिमन्यु के लिए यह बिना लागत वाला आईडिया बड़े काम का था। बस फिर क्‍या था उन्होंने जॉगिंग के साथ-साथ प्लास्टिक का कचरा उठाना शुरू कर दिया।

काफी लोगों ने अभिमन्‍यु की इस पहल का स्‍वागत किया  

मार्च में अभिमन्यु ने अकेले ही इस सफर की शुरुआत की जिसमें उनका साथ सिर्फ एक दोस्त ने निभाया। डिजिटल युग में सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा अभिमन्यु को मीडिया कर्मी होने के नाते भली-भांति था। सो प्‍लागिंग के हैश टैग के साथ अभिमन्यु ने सोशल मीडिया पर अपनी फोटोस डाली शुरू की। धीरे-धीरे उनके दोस्तों के जिज्ञासा भरे फोन आने शुरू हो गए। सफाई के पहले और बाद की जगहों की फोटोस डालने से एक बड़ा बदलाव आया काफी लोग अभिमन्यु की इस मुहिम में जुड़ने लगे।

समुद्र में फेंका जाने वाला 60 प्रतिशत प्‍लास्टिक साऊथ ईस्‍ट एशिया की देन

विश्व पर्यावरण दिवस पर  भारत का थीम है ‘प्लास्टिक प्रदूषण से जंग’ जो अभिमन्यु की थीम से मिलता-जुलता है। अभिमन्यु ने अब मोटरसाइकिल पर साउथ ईस्ट एशिया में वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, इंडोनेशिया, फिलीपींस एवं चाइना में जाकर अपनी मुहिम से लोगों को जोड़ने का निर्णय लिया है क्योंकि समुद्र में 60 प्रतिशत कचरा साउथ ईस्ट एशिया के इन देशों की देन है।

इस मुहिम से अब नहीं तो कब जुडेंगे

अब जरूरत है एक बार प्रयोग में आने वाले प्लास्टिक को अपने जीवन से निकाल फेंकने की। छोटी-छोटी चीजें बड़ा बदलाव ला सकती हैं जैसे पानी के लिए दोबारा प्रयोग होने वाली बोतलें, कपड़े या जूट के बैग का इस्‍तेमाल करना,  प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना। दोस्तों, रिश्तेदारों से प्लास्टिक के भयानक परिणामों पर चर्चा और प्लास्टिक के प्रयोग नहीं करने का संकल्प लेना इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। अभिमन्‍यु भी साहिल की तरह बार-बार पीछे मुड़कर देखे तो हमारा साथ किसी न किसी रूप में मिलने से ही उसकी या कहें मानव जाति की  जीत सुनिश्चित होगी। 

 (यह कहानी मेघना गोयल द्वारा दिखी गयी है।)

बेंगलुरु पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर डी सी राज्‍जपा अपने पेशे के साथ एक कुशल कवि भी हैं जिन्होंने अपने जीवन और पेशे के अनुभवों को कविताओं में ढालने का अनूठा प्रयास किया है। अभी तक 500 पुलिसकर्मियों के अंतर्मन की प्रतिभा को कविता लिखने के द्वारा प्रेरित भी किया है। सामाजिक सौहार्द के साथ पुलिस के पेशे को जोड़ने में विश्वास रखने वाले डी सी राज्जपा संवेदना और भावनाओं को कन्नड़ भाषा में कविताएं लिखकर खूबसूरती से पिरो लेते हैं।  

पुलिस फोर्स में उनका चुना जाना भी अचानक ही हुआ दरअसल राज्‍जपा अपने नाम से पहले डी सी से प्रेरित होकर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बनना चाहते थे इसी प्रयास में आईपीएस की परीक्षा पास होने पर पुलिस का कैरियर चुनना तो स्वाभाविक ही था। 

पिछले 28 सालों से पुलिस फोर्स में कार्य करते हुए राज्जपा ने अपने कार्य के प्रति हमेशा मुस्तैदी और ईमानदारी दिखाई है। इन्‍होंने कर्नाटक के अलावा सागर, मंगलुरु, गुलबर्ग, शिमोगा, बिलारी, बीजापुर और बेंगलुरु में भी रेलवे सीआईडी और डीसीपी वेस्ट पद पर कार्य किया है। इस समय वह सिटी आर्मड रिजर्व बेंगलुरु में जॉइंट कमिश्नर हैं। राजप्पा ने 14 साल की उम्र से कविताएं लिखना शुरू किया था। कन्नड़ भाषा के महान कवि कुवेंपु की ‘करीसिडा’ कविता ने राजप्पा पर गहरा असर छोड़ा। इस कविता में कुवेंपु ने अपने जन्म स्थान कुप्पल्ली और कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में अपने घर के बारे में लिखा था। इससे प्रेरित होकर राजप्पा ने अपने घर के बारे में एक कविता लिखी। इसके बाद राजप्पा ने अपना लेखन जारी रखा। 1979 में जब वह मैसूर के महाराजा कॉलेज से स्नातक कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात उनके प्रेरणास्त्रोत कुवेंपु से हुई। राजप्पा ने अपनी कविताएं कुवेंपु को दिखाईं और उन्हें काफी सराहना मिली। कुवेंपु ने उन्हें लेखन जारी रखने की सलाह दी। अब तक लगभग 300 कविताओं की रचना कर चुके हैं काफी कविताएं उनके जीवन और पेशे के अनुभवों पर भी आधारित है। इनमें से ज्यादतर बतौर पुलिसकर्मी, उनके निजी अनुभवों से प्रेरित हैं। इस संबंध में एक बार उनके सामने एक केस आया। जिसमें एक 13 साल की बच्ची, रेप के बाद गर्भवती हो गई। पीड़िता के मां-बाप उसे राजप्पा के ऑफिस लाए और उनसे न्याय की गुहार लगाई। उस बच्ची ने राजप्पा की संवेदनाओं को झकझोर दिया। राजप्पा को अपने अंदर उमड़ रहे तूफान को संभालने के लिए कविता का सहारा लेना पड़ा। जब राजप्पा गुलबर्ग में बतौर एएसपी कार्यरत थे। खदान के पत्थरों से भरा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हुआ और इस दुर्घटना में कई लोगों की जान चली गई। जब वह शवों को एक दूसरे से अलग कर रहे थे, तब उन्होंने एक 9 महीने के बच्चे को उसकी मां के शव से अलग किया। बच्चा मां का दूध पी रहा और उस अवस्था में ही दोनों की मौत हो गई थी। इस बारें में अपनी संवेदनाएं जाहिर करने के लिए राजप्पा ने एक कविता लिखी। अंग्रेजी अनुवाद में जिसका शीर्षक था, ‘डेथ ऐंड सेलिब्रेशन’। यह कविता कवि और मौत के बीच का संवाद है। कवि, मौत से सवाल करता है कि उसने एक मासूम को अपना शिकार क्यों बनाया? मौत ने उन लोगों को क्यों नहीं चुना, जो रोज मौत की दुआ मांगते हैं। 

अब तक राज्जपा के तीन कविता संग्रह छप चुके हैं। अम्मा, बसावा और राज्यश्री अवार्ड से सम्मानित यह आईपीएस अधिकारी चार साहित्य सम्मेलनों में अपनी कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। 

पुलिस का कडा रवैया कई बार जनता की नाराजगी का कारण बनता है। जनता और पुलिस की इस दूरी को पाटने के लिए पुलिसकर्मियों की भावनाओं को जागृत कर के उन्हें भी कविताएं लिखने के लिए राज्‍जपा ने प्रेरित किया। लगभग 500 कॉन्स्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर की कविताओं के चार संकलन राज्‍जपा अब तक संपादित कर चुके हैं। उन के पुलिस अधिकारी अत्यंत नकारात्मक परिस्थितियों में भी संवेदना और भावनाओं को प्रधान रखते हुए सकारात्मक समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। 

राज्‍जपा का सपना है कि पूरे देश के पुलिसकर्मी अपनी भावनाएं कविताओं के माध्यम से व्यक्त करने के लिए एक मंच पर आएं हालांकि यह कार्य मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं।

आपने अब तक कई ऐसे स्‍टार्टअप के बारे में सुना होगा जो घर के कमरे से शुरू हुए और करोड़ो की सीमा पार कर कामयाबी की नई ऊंचाइयों को छूते चले गए लेकिन आज जिस स्‍टार्टअप के बारे में हम बताने जा रहे हैं वह मात्र कमाई के साधनों तक सीमित नहीं है वह समाज सेवा से संबंधित है। 

पिछले 26 सालों से मधु सिंघल भारत में रह रहे दिव्‍यांगों की सहायता कर उन्‍हें शिक्षित और आत्‍मनिर्भर बना कर रही हैं। 90 के दशक में अपने पड़ोस के गरीब दिव्‍यांग बच्‍चों की सहायता करने के उद्देश्य से जो मुहिम मधु ने शुरू की थी उसमें दिव्‍यांग नई आशा लेकर उनसे जुड़ते चले गए और वह हरेक की कसौटी पर खरी उतरीं। 

मूक बधिर लोगों ने मधु सिंघल से गुहार लगाई कि वह पढ़ना चाहते हैं लेकिन ब्रेल लिपि में उनके लिए किताबें उपलब्‍ध नहीं है। इसके लिए 1992 में मधु ने बोलने वाली किताबों की लाइब्रेरी की शुरूआत की जिसमें उनका सहयोग 50 लोगों ने ऑडियो टेप बना कर दिया आज यह संख्‍या 2500 तक पहुंच चुकी है।

मधु ने दिव्‍यांगों को ही अपने कार्यक्षेत्र के लिए क्‍यों चुना इसका कारण भी बड़ा ही मार्मिक है। रोहतक हरियाणा में जन्‍मीं मधु बचपन से रोशनी की तरफ देख कर कुछ प्रतिक्रिया नहीं कर पाती थीं डॉक्‍टर से पूछने पर पता चला कि मधु की आंखों में देखने की शक्ति न के बराबर है। 50 लोगों के संयुक्‍त परिवार में मधु ने सामान्‍य जीवन जीते हुए 5 वर्ष बिता दिए। उनके माता पिता ने एक नेत्रहीन अध्‍यापक द्वारा ब्रेल लिपि में उन्‍हें पढ़वाना शुरू किया। 12 वर्ष की उम्र तक उन्‍होंने मधु को सामान्‍य स्‍कूल में पढ़ने के लिए तैयार कर दिया। सामान्‍य बच्‍चों के साथ नए स्‍कूल में मधु ने बेहद विषम परिस्थितियों का सामना किया लेकिन अपने सहपाठियों को अपनी योग्‍यता के आधार पर बता दिया कि वह किसी अलग ग्रह की प्राणी नहीं बस एकमात्र देख नहीं सकतीं अन्‍यथा उनमें और सामान्‍य बच्‍चों में कोई अंतर नहीं है। अपनी योग्‍यता का परिचय मधु ने बारहवीं में उत्‍तम स्‍कोर लाकर दिया। 

कॉलेज में भी मधु सभी लैक्‍चर्स को अपनी आवाज में रिकॉर्ड करतीं और घर आकर प्रतिदिन 40 से 50 पेज ब्रेल लिपि में लिख कर किताबें तैयार करतीं मानो अपनी उंगलियों को ही आंखे बना लिया हो। स्‍नातक और परास्‍नातक की डिग्री मधु ने प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण की। 

पिता के देहांत के बाद भाई ने अपना व्‍यापार और परिवार कानपुर ले जाने का निर्णय लिया तो मधु भी कानपुर चली गईं। पिता के बिना मार्गदर्शन की कमी उन्‍हें हमेशा खलती थी। वह चार साल तक भविष्‍य की राहों के बारे में शायद सोचती भर रहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाई। इसी बीच ब्रेल लिपि की पुस्‍तकें पढ़ते हुए उन्‍हें पता चला कि कितने ही लोग इस विषय पर काम कर रहे हैं इसलिए वह भी बहुत कुछ समाज के लिए कर सकती हैं। 

स्‍वयं नेत्रहीन होते हुए उन्‍हें दिव्‍यांगों के लिए आत्‍मनिर्भरता सबसे ज्‍यादा जरूरी लगी। इसलिए वह प्रतिबद़ध हो गईं इस प्रोजेक्‍ट पर कार्य करने के लिए। मधु के बहनोई ज्ञान प्रकाश गोयल ने रोहतक में अपने ऑफिस में कई लोगों से मिलवाया और ऐसी संस्‍थाओं से भी मिलवाया जो समाज सेवा के लिए कार्यरत हैं। 

इस नई शुरूआत से मधु ने भी 1990 में मित्रज्‍योति के नाम से एक चैरिटेबल संस्‍था की शुरूआत की जिसका कार्य मूक बधिरों और दिव्‍यांगों की सहायता शिक्षा, सलाह, मार्गदर्शन और नई तकनीक के माध्‍यम से करना है। अपने कठिन परिश्रम और सेवा की सच्‍ची भावना के कारण ही उनहें अनेकों पुरस्‍कारों से नवाजा गया है। अपने कार्यक्षेत्र की नई चुनौतियों को वह नए सुअवसर कह कर संबोधित करने वाली मधु सिंघल एक सशक्‍त भारतीय दिवयांग समाज की रचनाकार हैं। 

चिकित्सा का क्षेत्र सबसे जिम्मेदवारी भरा और चुनौतीपूर्ण क्षत्रों में से एक है। इस पेशे को अपनाने के लिए कड़ी मेहनत, दृढ़ता और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। आज चिकित्सा और मेडिकल का क्षेत्र सबसे उन्नत क्षेत्रों में से एक है। रोज़ नए-नए तकनीकों का ईजाद हो रहा है और उपचार के अत्यधिक उन्नत तरीकों का उपयोग भी किया जा रहा है।

एक डॉक्टर किसी का जीवन बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है। तभी तो लोग उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं और इस क्षेत्र को आदर की नज़र से देखा जाता है। आज के आधुनिक दिनचर्या के कारण एक बड़ी संख्या में लोग हृदय रोग से पीड़ित हैं। पर आज हृदय रोग के इलाज के किये बहुत सारे डॉक्टर और स्पेशलिस्ट उपलब्ध है। लोग अपना इलाज करवाने के किये विभिन्न हृदय रोग विशेषज्ञों तक पहुंच जाते हैं। लेकिन क्या आप उस व्यक्ति को जानते हैं जिसनें भारत में पहली बार हृदय रोग का उपचार यानी कार्डियोलॉजी को लाया?

तो इनका नाम है डॉ शिवरामकृष्ण अय्यर पद्मावती, यह महिला भारत की पहली हृदय रोग विशेषज्ञ है। 60 से भी अधिक वर्षों से हृदय रोगियों का ईलाज करने वाली डॉ पद्मावती जल्द ही 101 वर्ष की हो जाएगी। उन्हें सबसे पहले देश में कार्डियक शोध लाने और हृदय रोग उपचार के अभ्यास करने का श्रेय दिया जाता है। इतनी उम्र दराज होने के के बाद भी वे दिन में 12 घंटे काम करती हैं, ताकि आज भी वे रोगियों की मदद कर सके।

डॉ पद्मावती 1917 में बर्मा में पैदा हुईं, जिसे अब म्यांमार कहा जाता है। वे बर्मा के दक्षिण भाग में स्थित मेर्गुई द्वीपसमूह में पली-बढ़ीं। वे हमेशा से पढ़ने में बहुत अच्छी थी और उन्होंने स्कूल व विश्वविद्यालय में कई पुरस्कार प्राप्त किये थे। उन्हें बर्मा के रंगून विश्वविद्यालय से अपनी पहली डिग्री मिली, जहां वह पहली महिला छात्र थीं। पद्मावती ने रंगून मेडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की है एवं लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिसियंस से एफ.आर.सी.पी. एवं इडिनबर्ग के रॉयल कालेज ऑफ फिजिशियंश से एफ.आर.सी.पी.ई. की डिग्री हासिल की है ।

1941 में जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डॉ पद्मावती को परिवार सहित भारत वापस भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह तीन साल तक तमिलनाडु में रही और युद्ध समाप्त होने के बाद 1949 में वह अपने परास्नातक के लिए लंदन चली गयी।लंदन जाने के बाद उन्हें रॉयल कॉलेज ऑफ फिजियंस से फैलोशिप मिली। इस दौरान पद्मावती ने जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में भी अध्ययन किया।

वे 1953 में भारत आ गईं एवं दिल्ली के लेडी हार्डिंग्स मेडिकल कालेज में लेक्चरर हो गईं, जहां उन्होंने एक कार्डियोलॉजी क्लिनीक भी स्थापित की। वह एक ऐसा समय था जब लोगों के बीच हृदय रोग के प्रति जागरूकता की कमी थी। उन्होंने खुद को एक प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में स्थापित किया और अपने पूरे करियर को इसी पर केंद्रित कर दिया। फिर उन्होंने दिल्ली में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में भारत का पहला कार्डियक क्लिनिक और कैथेटर प्रयोगशाला स्थापित किया गया।

वे कहती हैं, "जब मैं लेडी हार्डिग अस्पताल से जुड़ी, वहां सभी महिलाएं अंग्रेज़ थीं। वहां कार्डियोलॉजी विभाग नहीं था। हमने इसे शुरू किया। फिर जी.बी. पंत हॉस्पिटल में मैंने कार्डियोलॉजी विभाग शुरू किया। "

उन्होंने देश मे प्रतिष्ठित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में भी पहले कार्डियोलॉजी विभाग की स्थापना की जहां की वह निदेशक थीं। उन्होंने भारत के कई अग्रणी चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया है जो चिकित्सा क्षेत्र में अपना योगदान देने के लिए आगे बढ़े हैं।

उस दौर में कार्डियोलॉजी एक अज्ञात क्षेत्र हुआ करता था, पर पद्मावती को इसका महत्व और जरूरत का अंदाज़ा था। उन्होंने 1981 में दिल्ली में भारत के पहले राष्ट्रीय हृदय संस्थान (एनएचआई) की स्थापना के लिए पुरजोर पहल की। इसके उद्घाटन के लिए उन्होंने तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से गुजारिश की थी। उसी दिन राजीव गांधी का जन्मदिन भी था पर इतनी व्यस्तता के बाद भी वे उनके बुलावे पर आयी और उद्घाटन किया। डॉ पद्मावती ने कार्डियोलॉजी के अनुसंधान को बढ़ावा दिया और हृदय रोगों के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद की। इस क्षेत्र में उनके अग्रणी कार्य के लिए, भारत सरकार ने उन्हें 1992 में  पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

101 की उम्र में भी पद्मावती हर दिन में लगभग 12 घंटे रोगी को देखते हैं। वे अभी भी राष्ट्रीय हृदय संस्थान, दिल्ली के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, और अखिल भारतीय हृदय फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वह कार्डियोलॉजी में छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को भी सहियोग करती हैं।

भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में उनका एक अतुलनीय योगदान रहा है। आज भी उनका लोगों के प्रति सेवा का जो भाव है उसे देख दूसरे डॉक्टरो  को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

 

सन 1947 में हमारा देश आज़ाद हुआ। देश अभी सही तरीके से आज़ादी का जश्न मना भी नहीं पाया था कि उससे पहले ही विभाजन के काले साये ने पूरे देश को घेर किया। भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने वाले और पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों के लिए वो दिन आज भी ख़ुशी से ज़्यादा दहशत मन में पैदा कर जाता है। विभाजन के दौरान उठे आतंक के तूफ़ान ने 10 लाख से ज़्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया। करोड़ों लोगों को अपना घर-परिवार, ज़मीन-जायदाद और रिश्तेदारों को छोड़ कर दूसरी जगह जाना पड़ा। लोगों को किसी अनजान व नए देश में खुद को स्थापित करना किसी चुनैती के काम नहीं थी। लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये थे, उन्हें इस देश में सिर्फ बसना नहीं था बल्कि अपनी जमीन तैयार करनी थी। उनके आँखों में सपने तो थे पर जेब में पैसे नहीं थे। ऐसे ही एक शख्स की बात करने जा रहे हैं भारत-पाक बंटबारे के समय मात्र 5 हज़ार रुपये लेकर आये थे। लेकिन आज वे देश की सबसे बड़ी ट्रैक्टर कंपनियों में से एक के मालिक हैं।

इनका नाम है हर प्रसाद नंदा (एच.पी नंदा)। हर प्रसाद नंदा का जन्म सन 1918 में पाकिस्तान में हुआ था। मूलतः पाकिस्तान के लाहौर के रहने वाले नंदा, भारत-पाक विभाजन के वक़्त दिल्ली आ गए। उस वक़्त से वे लाहौर से 5000 रुपये और अपनी दो कारें लेकर आये थे। बावजूद इसके उन्होंने लक्जरी होटल द इम्पीरियल में रुकना सही समझा। इसकी वजह यह थी कि वे चाहते थे कि वहाँ उनकी बड़े-बड़े बिजनेसमैन से मुलाकात कर सकने और व्यपारिक संपर्क बना सकें। बाद में उन्होंने ट्रेक्टर और एग्रीकल्चर उपकरण की कंपनी एस्कोर्ट्स ग्रुप की स्थापना की।

दरअसल हर प्रसाद नंदा और उनके भाई युदी नंदा नें मिलकर एस्कॉर्ट्स ग्रुप की स्थापना की थी। इसकी स्थापना सन 1944 में लाहौर में एस्कॉर्ट्स एजेंट के नाम से हुई थी। उन्होंने अपने परिवार के बिजनेस नंदा बस कंपनी जो कि जम्मू में स्थित थी, वहीं से अपनी शुरुआत की। भारत आने के बाद  नंदा एस्कोर्ट्स को भारत के एक बड़े बिजनेज़ ग्रुप के रूप में स्थापित करने का सपना संजोये हुए थीम उन्होंने इसके लिए भारत की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित क़िया। उन्होंने पाया कि भारत में एक बहुत बड़ा तबका खेती करता है और यहाँ आधुनिक कृषि उपकरण की भारी कमी है। उन्हें इस क्षेत्र में बहुत संभावना नज़र आई।

1948 में उन्होंने एस्कोर्ट्स एग्रीकल्चर मशीन्स की नींव रखी ताकि वे ट्रैक्टर और खेती उपकरण के बाजार में ढक जमा सकें। धीरे-धीरे वे खेती उपकरणों के अलावा कंस्ट्रक्शन, मेटल हैंडलिंग और रेलवे के लिए भी उपकरण बनना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने ऑटोमोबाइल पार्ट्स भी बनाना शुरू किया और इसके लिए यामाहा मोटर्स के साझेदारी की। 1959 नें उन्होंने पोलैंड में भी ट्रैक्टर का एक प्लांट स्थापित किया। उन्होंने फोर्ड के साथ पार्टनरशिप की और तेजी के अपने बिजनेज़ को एक्सपैंड किया। 1990 में पत्नी के देहांत के बाद नंदा नें बिजनेज़ से सन्यास के लिया और बागडोर बेटे राजन के हाथों में दे दी। 13 अप्रैल 1999 को 82 वर्ष की उम्र में नंदा का देहांत हो गया। पर तबतक उन्होंने एस्कोर्ट्स ग्रुप को देश के शीर्ष संस्थान के शामिल करने का सपना पूरा कर लिया था।

फिलहाल एस्कोर्ट्स की जिम्मेदवारी एच.पी नंदा के पोते निखिल नंदा के हाथों में इसकी बागडोर है। आज एस्कोर्ट्स ग्रुप देश का सबसे बड़ा ट्रैक्टर उत्पादक है। आज एस्कॉर्टस ग्रुप 3500 करोड़ के अधिक की कंपनी है। एस्कोर्ट्स ग्रुप 40 से अधिक देशों में बिजनेज़ करता है और इस कंपनी में 8000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। 

हमारे देश में ज्यादातर किसानों की हालत बहुत ही दयनीय है। अक्सर किसान आर्थिक हालातों के आगे मजबूर होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं। लेकिन इन सब से अलग समाज में कुछ किसान ऐसे भी हैं जो अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर सफलता के एक मुकाम तक पहुंच चुके हैं। ऐसे ही एक किसान उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में हैं। जिन्होंने अपनी सोच और काबिलियत के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई। पर आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो आठवीं में फेल है। जिसने सपनों को सपनों तक ही सीमित रखा, हकीकत में भी उतारा। आज वह केले व टमाटर की खेती से लाखों का मुनाफा कमाता है।

इनका नाम है रामशरण वर्मा। उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जनपद के ग्राम दौलतपुर के मामूली पढ़े-लिखे रामशरण वर्मा ने वह कर दिखाया जो बड़े बड़े शूरमा नहीं कर पाते। जिन्होंने अपने छोटे से गाव में रहकर वह कामयाबी हासिल की है। लखनऊ से सटे 30 किलोमीटर दूर बाराबंकी जनपद में खेतों से उगता है हरा सोना और ये सोना जमीन से उगाने वाला यह मामूली इंसान आज करोड़पति हैं। हाईस्कूल फेल होने के बावजूद उन्होंने आज वह सब करके दिखा दिया। जिसे बड़ी-बड़ी डिग्री लेने के बाद भी लोग हासिल नहीं कर पाते। इतनी कम पढ़ाई करके मेहनत और लगन से जिंदगी में वो सब हासिल कर लिया, जिससे आज उत्तर-प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश में भी उसका नाम प्रसिद्द हो चुका है। उन दिनों में जब किसान खेती छोड़कर अधिक लाभ के लोभ में शहरों की तरफ पलायन कर रहे थे, तो ऐसे समय में रामशरण वर्मा खेतों से हरा सोना पैदा करने का सपना देख रहे थे।

रामशरण सिर्फ हरा केला नहीं उगाते लाल केला भी उगाते हैं। जी सही सुना अपने यह केला आम नहीं बल्कि बहुत खास है क्योंकि अभी तक आपने हरे और पीले रंग के केले के बारे में सुना होगा और इसका स्वाद भी लिया है लेकिन लाल रंग के केले के बारे में आप कम ही जानते होंगे। लाल रंग का केला ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, वेस्टइंडीज, मेक्सिको जैसे देश के साथ ही भारत में सिर्फ तमिलनाडु राज्य के कुछ हिस्सों में पैदा किया जाता है।आसपास के गाँवों से लेकर दूसरे जिलों से किसान उनके खेत पर केले की खेती देखने पहुंच रहे हैं किसानों के साथ-साथ रामशरण वर्मा से हाईटेक खेती सीखने तमाम वीआईपी हस्थिया भी उनके फार्म हाउस पर पहुंचती हैं। रामशरण वर्मा “टिशूकल्चर पद्धति से केले की खेती” करते हैं और आज केले की पैदावार में रामशरण वर्मा सबसे आगे निकल चुके हैं। रामशरण वर्मा एक एकड़ केले की फसल में 2.5 – 3 लाख तक फायदा उठाते हैं। इसके अलावा रामशरण वर्मा अपने खेतों में अलावा टमाटर और आलू की भी खेती करते हैं।

उन्नत किसान रामशरण वर्मा हाईटेक एग्रीकल्चर एवं कंसल्टेशन के माध्यम से पहले खुद खेतों में पौधों से सीखते हैं उसके बाद किसानों को खेती के नए नए गुर सिखाते हैं। रामशरण वर्मा ने खेती में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए जो रास्ता चुना, उसमें कामयाबी भी हासिल की। पर उन्हें यह नहीं पता था कि प्रदेश के हजारों किसान उन्हीं की राह चल पड़ेंगे। उनका अनुसरण करने वाले हजारों किसान प्रदेश के बहुत से जिलों में रामशरण मॉडल पर खेती कर रहे हैं और सफल हैं। मजदूरी से जीवन यापन करने वाले किसानों ने कभी सोचा न था कि वे अपने खेत के एक टुकड़े से ही समृद्ध किसान बन जाएंगे। हाईटेक खेती के गुर से रामशरन वर्मा ने प्रदेश में पांच हजार से अधिक गरीब मजदूरों को प्रगतिशील किसान बना दिया। खुद रामशरन वर्मा ने एक हेक्टेयर खेत पर पारम्परिक खेती छोड़, वर्ष 1990 में हाईटेक खेती शुरू की। नित नया करने की जिज्ञासा से दूसरे वर्ष ही टमाटर और केला की खेती अपने छह हेक्टेयर खेतों पर उन्होंने की। उत्पादन को बाजार तक पहुंचाने के साथ रामशरन का नित नए प्रयोग करना ही छोटे किसानों के लिए वरदान बन गया और आज वह करोड़ों रुपए केला और टमाटर से कमा रहे हैं।

रामशरण वर्मा जी की इसी मेहनत का नतीजा है कि उन्हें साल 2007 और 2010 में राष्ट्रीय कृषि पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। राष्ट्रीय कृषि पुरस्कार को देश के सबसे बड़े कृषि सम्मान के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही साल 2014 में रामशरण वर्मा को बागवानी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपको बता दें कि रामशरण वर्मा को कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल सम्मानित कर चुके हैं। साल 2012 में पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तो रामशरण वर्मा को खेती का जादूगर होने का खिताब देते हुए सम्मानित किया था।

 

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर चौथा  आदमी डिप्रेशन का शिकार होता जा रहा है। डिप्रेशन की स्थिति तब होती है जब हम जीवन के हर पहलू पर नकारात्मक  रूप से सोचने लगते हैं। जब यह स्थिति चरम पर पहुंच जाती है तो इंसान को अपनी  ज़िंदगी बेकार लगने लगने लगती है और धीरे धीरे इंसान डिप्रेशन की स्थिति मे पहुच जाता है।डिप्रेशन के कारण शरीर में कई हार्मोन का स्तर  बढ़ता जाता है,  जिनमें एड्रीनलीन  और कार्टिसोल प्रमुख हैं और इस कारण    इसका शिकार व्यक्ति कभी कभी कुछ ऐसे कदम भी उठा लेता हैं जो उसके जीवन को तबाह कर देते हैं।

ऐसे ही लोगों के लिये मसीहा का काम कर रहीं एना चांडी जो भारत  की पहली सुपरवाइज़िंग और ट्रेनिंग ट्रांजैक्शनल ऐनालिस्ट हैं जिन्हे कॉउंसलिंग के क्षेत्र में विशेषता के साथ इंटरनेशनल ट्रांजैक्शनल ऐनालिस्ट एसोसिएशन से मान्यता भी प्राप्त हैं।वह न्यूरो लिंग्विस्टिक  प्रोग्रामिंग और आर्ट थेरेपी में भी सर्टिफाइड हैं।  आज कल वह फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जिनको उन्होंने कभी डिप्रेशन से बाहर निकला था द्वारा स्थापित "द लिव लव लॉफ फाउंडेशन "की डायरेक्टर हैं।जिसके माध्यम से इन्होने पिछले 2 सालो में कितने ही लोगों को डिप्रेशन से बाहर निकाल कर उनके जीवन में नयी उमंग का संचार किया हैं।

एना का जन्म दक्षिण भारत के चैन्नई शहर हुआ था। उनकी स्कूलिंग बेंगलुरु के बिशप कॉटन स्कूल और कॉलेज की शिक्षा माउंट कारमेल से हुई हैं। परंपरागत परिवार होने के कारण इनके जल्द ही कॉलेज के बाद शादी कर दी गयी लेकिन भाग्य को तो कुछ और ही मंज़ूर था। सुसराल में इनके देवर को “सज़ोफ्रेनिया” नाम की बीमारी थीं जो की एक  mental disorder होता हैं जिसमे मरीज़  abnormal social behavior का शिकार होता हैं। परिवार में किसी को भी इस बीमारी के बारे पता नहीं था लेकिन परिवार वालों को साइकोथेरेपिस्ट ने उनकी देखभाल करना सीखा दिया था। एना ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और उनकी अच्छे से देख भाल की। परिवार में ही मिले इस अनुभव के बाद एना ने "विश्वास " नाम की गैर सरकारी संस्था के साथ फ्रीलांसर के तौर पर काम करने लगी जो असमर्थता और विकास के क्षेत्र में काम करती थीं।  अपने अच्छे काम व लगन के चलते उन्हें संस्था में और अधिक जिम्मेदारी दी गयी। 

एना बताती है कि "समाज में मानसिक बीमारियों के बारे में भ्रन्तिओं को तोड़ने के लिये इन्होने कॉउंसलर बनने का फैसला लिया हालांकि घर वालों ने कुछ ऐसा करने को बोला जिसमे फ्यूचर सिक्योर हो क्योकि उस वक़्त भारत में इसका कोई भी स्कोप नहीं था , लेकिन एना फैसला ले चुकी थीं और उन्होंने अमेरिका से ट्रांजैक्शनल एनालिसिस की जानकरी ली और तीन साल बाद वह एक ट्रांजैक्शनल ऐनालिस्ट बन गयी तथा प्रथम भारतीय महिला भी जो डेप्रेशन और मानसिक बीमारियों वाले मरीज़ो की कॉउंसलिंग करती थीं।

एना बताती हैं कि "कॉउंसलिंग से जुडी सबसे अच्छी बात ये हैं कि आप अपने बारे में भी बहुत कुछ सीख जाते हैं और अपनी कमियों को दूर कर आत्मविश्वास के साथ अपनी जिंदगी को जीते हैं "। आगे वह बताती हैं कि शरुवात में उनके घर वालो की कॉउंसलिंग के करिअर में न जाने की बात कुछ हद तक सही थी क्योकि उस समय भारत में इस विषय पर कोई सोचता तक नहीं था ,लेकिन आज धीरे धीरे ही सही लोगो में जागरूकता आयी हैं और लोग इसका फायदा भी उठा रहे हैं। दीपका पादुकोण के साथ हुऐ अनुभव के बारे में बात  करते हुऐ एना बताती है कि "वह जानती थी कि दीपका ठीक नहीं हैं ,लेकिन वजह क्या हैं यह पता नहीं था और जब दीपिका ने एना को फ़ोन किया तो वह फ़ोन पर ही अपना हाल बताकर रोने लगी। सही वजह जानने के लिये अगले ही दिन एना दीपिका के पास मुंबई पहुंच गयी और एक पूरा दिन उनके साथ बिताया और बाद में वह उन्हें डॉक्टर के पास भी ले गयी। " लिव लव लॉफ " दीपिका की ही फिलोस्फी हैं और इस फाउंडेशन का मकसद मानसिक स्वास्थ के बारे में जागरूकता बढ़ाना हैं जिसमें एना  एना चांडी डायरेक्टर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। 

एना के अनुसार आज जब वह पीछे मुड़कर अपने सफर को देखती हैं तो उन्हें इस बात की बहुत की बहुत ख़ुशी होती हैं कि अनेको परेशानियां होने के बावजूद वह आगे बढ़ती रही और इसका श्रेय वह अपने पैशन के प्रति जुनून को देती हैं ,जो आपके अंदर से ही आता हैं और आपको निरंतर आगे ही बढ़ाता हैं।

खुद के लिए कुछ करने की चाह तो सब में होती हैं परन्तु अपने साथ साथ समाज में व्याप्त दुर्दशा को सवारने का जुनून विरलों में ही होता है , कुछ ऐसी ही है कनिका आहूजा जिन्होंने दिल्ली के  श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से एमबीए की  डिग्री  लेने के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम किया । एक अच्छी नौकरी होने के बावजूद उनका मन हमेशा समाज के लिए कुछ सकात्मक करने की सोच में लगा रहता था। कनिका को शुरू से ही सामाजिक कार्यो में रूचि थी तथा वह अपने माता पिता द्वारा बनाई संस्था कंज़र्वे इंडिया जो कचरा प्रबन्दन और ऊर्जा कौशलकी फील्ड में काम करती हैं ,एक वालेंटियर के रूप में  कार्य करती थीं।कुछ साल पहले हरियाणा के बहादुरगढ़ के स्लम में लगे एक मेडिकल कैंप ने कनिका को एक मकसद दे दिया ,कनिका बताती है की उनके एक दोस्त जो कैंप में बच्चों का इलाज कर रहे थे ,ने बताया की 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अत्यधिक कुपोषण का शिकार थे।यही नहीं  कनिका ने बहादुरगढ़ के स्लम में  जा कर यह भी देखा यहाँ सब्जी वाले सड़ी गली सब्जियाँ महँगे दामों में बेच जाते थे तथा ये वो सब्जियाँ थी जिनको उगाने में काफी बड़ी मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल होता था।यही से यह  विचार आया क्यों ना एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए की ये लोग बिना किसी कीटनाशक के  उपयोग के साफ़ और पौष्टिक सब्जियाँ उगा सकें।इसी विचार को क्रियान्वित करते हुए उन्होने नौकरी छोड़ी और करनाल जा कर ऐसी सब्जियों को उगने के लिए रिसर्च की। आज कनिका अपने संगठन "क्लेवर बड "(clever bud) के जरिये लोगों को पोली हॉउस फार्मिंग का हुनर सीखा रही हैं।खास बात ये है की सब्जियाँ उगाने के लिए वह मिटटी की जगह नारियल की जटा का इस्तेमाल कर रही है,जिसके लिए इन्होने इंटरनेट की भी  मदद ली। कनिका ने अपने आईडिया पर काम करते हुए यह तय किया की वो सब्ज़ियों को उगने की ट्रैनिंग के लिये करनाल के “इंडो इस्राली सेंटर आफ एक्सीलेंस फॉर वेजिटेबल” में जायँगी।

कनिका ने अपनी रिसर्च पूरी करने के बाद दो साल पहले  बहदुरगढ़ में तीन फ़ैक्टरियो  की छतो पर अपना पहला प्रोजेक्ट शुरू किया और उसकी सफलता से प्रेरित हो कर सितम्बर 2016 में अपनी एक सामाजिक उधम  'क्लेवर बड " की स्थापना की जिसके माध्यम से वह पाली हाउस फ़ार्मिंग से खेती कर पौष्टिक सब्जियाँ पैदा करने वाले तरीको को बेचती है ।पाली हाउस फ़ार्मिंग के बारे में कनिका बताती है की यह एक तरीके का ग्रीन हाउस होता है। जहाँ पर चारो तरफ एक प्लास्टिक फिल्म लगायी जाती हैं जिसके कारण बहार व भीतर के वातावरण में काफी  अन्तर होता हैं तथा अन्दर का वातावरण ज्यादा सुरक्षित होता है। यह प्लास्टिक फिल्म सूरज की  ख़तरनाक अल्ट्रावायलेट किरणों को बाहर वापस भेज देती है तथा अच्छी किरणों को ही अंदर आने देता हैं।इसके बाद पॉली बैग में कोकोनट पीट के बुरादे को भरा जाता है जिसे नारियल की  जटा को पीस कर बनाया जाता है। इसके बाद इसी बुरादे में सब्जियों के  बीज डाले जाते है। वही दूसरे पोषक तत्व आवश्यकता अनुसार अलग से डाले जाते है। इन पोषक तत्वों में नाइट्रोजन,पोटाशियम और फॉस्फोरस के मिश्रण का इस्तेमाल होता है जिससे आम पौधों की तुलना में यह चार पांच गुडा तेज़ी से बढ़ते है और सबसे खास बात इनमे किसी भी प्रकार के  कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं होता है।कनिका के द्वारा तैयार पॉलीहाउस में तापमान नियंत्रित रहता है इसलिए गर्मियों में भी जाड़ो में  उगने वाली पालक और मेथी जैसी  मौसमी सब्जियाँ भी उगाई जा सकती है।इनके एक पॉलीबैग से एक टमाटर के पेड़ में करीब 150 टमाटर तक लग जाते है।

इस समय हरियाणा में बनाए 3 पॉलीहाउस में से 2  बहादुरगढ़  व  1  मानेसर में है।एक दिल्ली के पंजाबी बाग़ के स्कूल में काम कर रहा हैं जहाँ बच्चों के मिड डे मील के लिये सब्ज़ियाँ इसी पॉलीहॉउस से ली जाती है।इसके अलावा एक पॉलीहाउस मदनपुर खादर में भी है जो खास तौर पर वहाँ के स्लम में रहने वाले लोगो के लिये है जिसकी सारी फंडिंग कॉर्पोरेट की सी एस आर पालिसी से हुई हैं।क्लेवर बड "(clever bud) आज हर उस  व्यक्ति की मदद करता है जो  अपने घर की छत के हिसाब से पॉलीहॉउस  तैयार करना चाहता हैं। पॉलीहॉउस के सिस्टम को बनाने में करीब 20 दिन लगते हैं। इस सिस्टम को लगाने के साथ साथ इसके रखरखाव की ट्रैंनिंग भी दी जाती है। एक बार इस्तेमाल होने के बाद कोकोनट पीट  को बाहर निकाल कर नरम किया जाता हैं तथा उसको लगातार तीन साल तक इस्तेमाल कर सकते हैं। सबसे छोटा पॉलीहॉउस 4 सौ वर्ग फुट का होता है जिसकी लागत लगभग 1 लाख 20  हज़ार रूपए आती है। जबकि 800 वर्ग फुट में पॉलीबैग बनाने की कीमत लगभग 2 लाख 10 हज़ार के आस पास आती है। 1 एकर के ऊपर का पॉलीहॉउस बनाने में सरकार सब्सिडी भी देती है।क्लेवर बड की अब तक की सफलता से उत्साहित हो कर कनिका अब नोएडा ,कोटा और भुवनेश्वर में भी पॉलीहॉउस बनाने जा रही हैं।                  

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