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क्या आपको पता है, आपात स्थितियों में चिकित्सा संबंधित जानकारियों के अभाव में हर वर्ष लाखों लोग अपना जीवन खो देते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि 40 प्रतिशत से अधिक मौतें रोकी जा सकती है अगर सही वक़्त पर बुनियादी प्राथमिक चिकित्सा प्रदान की जाए। अगर आम आदमी को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाए तो हम लाखों लोगों की जान बचा सकते हैं। इसी सोच के साथ एक अनूठे मुहिम की शुरुआत करने वाले प्रवीण गौड़ा हैं हमारी आज की कहानी के हीरो।

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बेंगलुरु में जन्में और पले-बढ़े प्रवीण पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। अपनी बहन के लिए चिकित्सा आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था करने के लिए उन्हें जो संघर्ष करना पड़ा, उस व्यक्तिगत अनुभव को उन्होंने एक मिशन में तब्दील कर दिया। उन्होंने सूचना प्रोद्योगिकी के माध्यम से इस समस्या का एक शानदार हल निकाला।वीएमईडीओ नामक एक कंपनी की स्थापना कर, उन्होंने अब तक 5,000 से अधिक लोगों को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया है। 

तीन साल पहले जिस चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना उन्हें करना पड़ा था, उसके बारे में बात करते हुए वे बताते हैं कि "मेरी बहन को आपातकालीन रक्त की आवश्यकता थी और हम इसे प्राप्त करने में असफल थे। पूरा परिवार लगभग आधे घंटे तक असहायता के भाव से गुजरा, जब तक कि एम्बुलेंस हमारे पास नहीं पहुंच गई। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, मैंने फैसला किया कि मुझे कुछ ऐसा करना है ताकि कम से कम दूसरों को इस स्थिति का सामना न करना पड़े।"

गौड़ा ने रक्त की व्यवस्था के लिए ब्लड फॉर श्योर नामक ऐप के साथ शुरुआत की। इसके द्वारा प्राप्त सकारात्मक प्रतिक्रिया ने उन्हें एम्बुलेंस की व्यवस्था के लिए एक सेवा शुरू को प्रेरित किया।

“लेकिन इस सब के बाद भी, मैं यह महसूस करता रहा कि अभी भी कुछ-न-कुछ कमी है। मुझे महसूस हुआ कि शायद आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध होने से पहले हमें खुद डॉक्टर होने की आवश्यकता है। और फिर मैंने कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) के साथ प्राथमिक चिकित्सा की मूल बातें लोगों को सिखाने के लिए प्रशिक्षित पेशेवर बनने का फैसला किया।"

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(सांकेतिक तस्वीर)

जेपी नगर स्थित उनके कार्यालय में लगभग 10 पेशेवर प्रशिक्षक और कई डॉक्टर हैं जो न केवल लोगों के लिए प्रशिक्षण सत्र आयोजित करते हैं बल्कि जरूरतमंदों को वीडियो सहायता भी प्रदान करते हैं। कंपनी कॉर्पोरेट्स के साथ-साथ बेंगलुरु में व्यक्तियों के लिए कार्यशाला और प्रशिक्षण सत्र आयोजित करती है। पिछले तीन वर्षों में, उन्होंने अपार्टमेंट परिसर, स्कूलों, कॉलेजों और 50 से अधिक फर्मों में 5,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है। उनकी मानें तो एनएससी (राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद) द्वारा प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा प्राथमिक चिकित्सा, सीपीआर और दुर्घटना आपातकाल में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा जोखिम मूल्यांकन और आग नियंत्रण से संबंधित जानकरी भी दी जाती है।

 प्रवीण वाकई में एक अनोखा काम कर रहे हैं, जिसकी समाज को जरुरत है। ऐसे समय होते हैं जब हम किसी को अपार्टमेंट में बेहोशी या किसी दुर्घटना में घायल होते देखते हैं। लेकिन हममें से कई लोग यह देखने के लिए भी नहीं रुकते हैं कि क्या हुआ है, ऐसा इसलिए क्योंकि हम ख़ुद को मदद करने लायक नहीं मानते। यदि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त प्रशिक्षण हो तो लाखों लोगों को एक और जीवन मिल सकता है।

 

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एक ओर जहाँ कम मुनाफ़े के कारण ज्यादातर किसान खेती को छोड़ने लगे हैं। तो वही दूसरी तरफ नई पीढ़ी के युवा किसान आधुनिक तरीके को अपना कर खेती के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। मतलब स्पष्ट है कि जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार खेती के भी दो पहलू हैं, खेती भी मुनाफ़े का सौदा बन सकता है बस जरुरत है तो सोच समझ कर आधुनिक तरीका अपनाने की। आज हमारा देश भी खेती की दिशा में दिन-व-दिन हाईटेक होता जा रहा है। कई तरह की फ़सलों और फल-सब्जियों की आधुनिक तरीके से खेती करने के बारे में आपने सुना होगा। लेकिन आज हम एक किसान द्वारा की जा रही ऐसे चीज़ की खेती के बारे में बताने जा रहे हैं, जो शायद ही आप जानते होंगे।

हम जिनकी बात कर रहे हैं उनका नाम है सत्यनारायण यादव। सत्यनारायण राजस्थान के खड़ब गाँव के रहने वाले हैं। सत्यनारायण सीप मोती पालन की खेती है। वे सीप को पालते हैं और उससे मोती पैदा कर बेचते हैं। इस काम में उनका साथ उनकी पत्नी भी देती हैं। दोनों आज साथ मिलकर इस सफल खेती को चला रहे हैं और सालाना 3 लाख रूपये की कमाई कर रहे हैं।

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दरअसल सत्यनारायण भी पहले आम किसानों की तरह खेती-बाड़ी करके अपना परिवार चलाते थे। लेकिन कभी मौसम की मार, कभी फसल का सही दाम नहीं मिलना तमाम कारणों से उन्हें ज्यादा फायदा नहीं हो पाता था। फिर एक दिन उन्हें सीप पालन कर मोती उगाने की खेती के बारे में पता चला। उन्हें इस काम में मुनाफ़ा नज़र आया। भविष्य में अच्छी सम्भावना को देखते हुए उन्होंने इस विधि को सिखने की इच्छा जतायी और ओड़िसा के आईसीएआर भुवनेश्वर में 15 दिनों की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग खत्म करने केे बाद वे अपने गाँव वापस लौट आये और सीप मोती की खेती करना प्रारंभ कर दिया।

शुरुआत में उन्होंने 10 हज़ार की लागत से इस काम की शुरुआत की। उन्होंने इसके लिए एक हौज़ का निर्माण करवाया जिसमें वह पानी भरकर सीप रख सकें। इस हौज़ में वे गुजरात, केरल और हरिद्वार से उन्नत नस्ल की सीप लाकर डालते थे। चूंकि यह मोती प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित होती है, इन सीपों में शल्य कार्यन्वयन द्वारा मेटल ग्राफ्ट और उचित नाविक डाला जाता है। इसी के द्वारा सीप अपने अन्दर मोती का निर्माण करता है। फिर इस सीप को उपयुक्त वातावरण में करीब 8-10 महीने के लिए रखा जाता है जबतक की सीप में मोती का निर्माण न हो जाये। उसके बाद सीप को चीरा लगाकर मोती को निकल लिया जाता है। इस मोती की डिमांड मार्केट में काफी अधिक होती है, तो इससे उन्हें अच्छा खासा मुनाफ़ा भी मिल जाता है।

सीप से मोती निकाल लेने के बाद भी उस सीप से और भी कमाई होती है। दरअसल सीप सेल का इस्तेमाल लोग साज-सज़्ज़ा के लिये भी करते हैं। घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए, गमलों में, झूमर में, गुलदस्ते में, मुख्य द्वारा पर लटकने के लिए, व अन्य सजावटी चीजों में भी लोग सीप के सेल का उपयोग करते हैं। सीप निर्मित इस प्रकार के सामान को लोग अच्छे दामों में खरीदते हैं। यही नहीं सीप के सेल का उपयोग आयुर्वेदिक दवा बनाने में भी होती है। इस लिए सीप का सेल भी बहुत महँगे कीमत पर बिक जाते हैं।

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सत्यनारायण के इस फायदे भरे अनोखी खेती को देख ढेर सारे लोग उनसे इसका तरीका सीखने आते हैं। अबतक वो आसपास के राज्य असाम, जम्मू, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश व पंजाब आदि के करीब 150 विद्यार्थियों को इसकी ट्रेनिंग दे चुके हैं। जहाँ वे लोगों को सीप पालन व मोती की खेती का पूरा तरीका सिखाते हैं। आज उनको देख कई सारे किसान और युवा भी इस खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अब वे भी इसे अपना कर इसमें अपना करियर बनाना चाहते हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो अक्टूबर से दिसम्बर मोतियों की खेती के लिए अनुकूल समय होता है। 0.4 हेक्टेयर के तालाब में करीब 25 हजार सीप से मोती का उत्पादन किया जा सकता है और इससे सालाना 8 से 10 लाख रुपए की आमदनी आसानी से हो सकती है।


A discussion on richest people in the world can not be summarised without naming the players in real estate. It is a sector that has always attracted big money from buyers as well as the investors. And with technology knocking doors of traditional businesses, a million new opportunities are now up for grabs. Surely, a bunch of start-ups have ventured into the space but challenges of building a successful revenue model and attracting a perennial flow of buyers has not been an easy puzzle to solve for most. However, the key to success remains finding a unique and plain sailing solution for problems that plague a large number of people.

Some years back, Tanuj Shori and wife Kanika Gupta stumbled upon an interesting business idea while undergoing a hard time themselves. Neither of them had planned to be entrepreneurs and, in fact, had taken up rewarding jobs overseas after completing their education. After completing his education from IIM Lucknow, Tanuj worked for eight years in areas like real estate, commodity, construction, retail, luxury brand etc.

Struggle gave way to opportunity

As NRIs, the couple wanted to invest in real estate in India but found it extremely difficult to get any guidance or support from an on-ground professional. They realized that they are not alone in this yet nobody was working for finding an effective solution to fill this gap. The duo spoke to several of their friends and began stumbling upon similar stories of struggles and frustration from fellow NRIs. So, in 2013, they launched a company called Square Yards from a small room with three employees.

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Based on solid research, their firm began offering assistance to NRIs on micro-markets of top 10 Indian cities. They built a network of real estate developers and also setup a portal that made research easier for their clients. Tanuj and Kanika had effectively identified and solved a problem which brought them good business along with expansion prospects.

They were creating value and it met with encouraging rewards. Square Yards entered the 100 crore-club in just 22 months of operations.

Business model

They roped in information technology to make user experience seamless and introduced exciting and unexplored investment options like student accommodation, mall redevelopment, car parking etc. Their product also provided end-to-end solution with securing loans and mortgage.

Today, their firm has offices all over India and in nine other countries with over 1000 employees registering an overall gross transactional value of Rs 5,000 crore in 2018. Their growth story is aggressive and displays a strong tech backbone. Square Yards portal and app generate lakhs of leads every month which is then serviced both online and offline.

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For every property sale, Square Yards charges a commission (two-10 percent of the property value) from the property developer. The client is not charged for the services rendered. Similarly, for every loan facilitated, they charge banks/NBFCs a commission on the value of the loan disbursed.

Tanuj and Kanika have scripted a thrilling success story by personifying solution at a time when they couldn't find any. Their aggressive growth strategies have made them a leader in this segment of real estate. It is nothing short of inspiring for all the people out there who always keep an eye out for opportunities, challenges and yearn for the sweet success that follows.

पिछले कुछ वर्षों से रियल एस्टेट कारोबार में एक बड़ी कारोबारी संभावना दिखी है। और इसी वजह से निवेशकों ने कई मिलियन डॉलर का निवेश ऑनलाइन रियल एस्टेट कारोबार में किया है। सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर हमारे देश के कई युवाओं ने स्टार्टअप के लिए इस क्षेत्र को चुना है। हालांकि कुछ स्टार्टअप अपने उत्पादों और विपणन रणनीतियों के जरिए आम जनता का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे, वहीं एक बेहतर व्यापार मॉडल और स्थिर राजस्व पैदा करने में कई स्टार्टअप अब भी जूझ ही रही है।

निजी जिंदगी में आई परेशानियों को खत्म करने के लिए कुछ लोग ऐसे उपाय ढूंढ निकालते हैं जो औरों के लिए वरदान साबित हो जाता है। साल 2013 में तनुज शॉरी और कनिका गुप्ता ने अपनी खुद की समस्याओं को खत्म करने के उद्देश्य से ‘स्क्वायर यार्ड्स’ नामक एक रियल एस्टेट सलाहकार फर्म शुरू करने का फैसला किया जो भारतीय रियल एस्टेट में इच्छुक एनआरआई को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करती है। तीन लोगों के साथ एक छोटे से कमरे में शुरू हुई यह कंपनी 1000 से अधिक लोगों का संगठन बनते हुए 9 से अधिक देशों में विस्तार कर आज इस सेगमेंट में सबसे बड़ी कंपनी है।

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आइडिया इतना दमदार था कि कंपनी एक साल के भीतर ही तीन बड़ी कंपनियों का अधिग्रहण करते हुए करोड़ों रूपये का सालाना टर्नओवर करनी शुरू कर दी। रेवेन्यू, मुनाफ़ा और बाजार हिस्सेदारी इन तीन चीजों पर फोकस करते हुए कंपनी 22 महीने में ही 100 करोड़ के क्लब में शामिल हो गई। इस क्षेत्र में भारत में अपार कारोबारी संभावना को देखते हुए तनुज और कनिका ने शीर्ष 10 भारतीय शहरों के रियल एस्टेट बाज़ार पर व्यापक शोध किया और फिर इसे एनआरआई समुदाय के साथ साझा करने का निश्चय किया। जब एनआरआई द्वारा मांग में वृद्धि को देखा, तो कंपनी ने शीर्ष मेट्रो शहरों में कार्यालयों की स्थापना कर देश के शीर्ष डेवलपर्स के साथ साझेदारी कर भारत में तेजी से विस्तार शुरू किया।

कंपनी अगले एक साल में 15 भारतीय शहरों और सिंगापुर, दुबई, लंदन जैसे शहरों में भी अपनी उपस्थिति स्थापित करने में सफल रही और एनआरआई के बीच अपनी पैठ जमा ली।

कंपनी ने टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल कर वितरण प्लेटफार्मों की पेशकश करने के लिए तकनीकी क्षमताओं का भी निर्माण किया, जिससे खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया बेहद आसान हो गई। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज स्क्वायर यार्ड प्रति माह लगभग 1,000 से अधिक लेन-देन करता है, जिसका सालाना रेवेन्यू दर 25 मिलियन डॉलर के पार है। वर्तमान में कंपनी भारत के प्रमुख शहरों सहित 10 देशों के 32 शहरों में फैली हुई है।

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हालांकि इतने कम समय में एक स्टार्टअप को मल्टी मिलियन कंपनी में तब्दील करना आसान नहीं था तनुज बताते हैं कि कई डेवलपर्स जो जिनके साथ हमारी साझेदारी थी, समय पर निर्माण कार्य पूरा करने में विफल रहे और इस वजह से ग्राहकों के साथ विवाद भी हुए। इन मुद्दों को हल करने के लिए, हमने डेवलपर द्वारा पेनाल्टी देने जैसी चीजों को विकसित किया। इससे ग्राहकों का हमारे प्रति विश्वास बढ़ा और हम आज यहाँ खड़े हैं।

आज भी कंपनी मूल रूप से उद्यमशीलता की भावना और नवीन अवधारणाओं द्वारा संचालित है जो कि एक ठोस रेवेन्यू मॉडल को सबसे ज्यादा महत्वता देती है और हमेशा कुछ नया करते हुए इस क्षेत्र की अग्रणी कंपनियों में शुमार कर रहा है।

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We all are aware of the acute food shortage and hunger which a large portion of the world is facing. Millions of children are underfed and malnourished, many people lose their lives to hunger and incurable diseases caused by insufficient diet. Statistically, we are producing enough food for the world, but it isn’t reaching all seven billion, as gallons of food gets wasted nearly every day.

A simple solution to this is to become more aware of our personal food consumption and wastage, and to take an active part to reduce the amount of food we waste. While many of us have the meals served on the airplane, some don’t. But how many eat everything served on the tray? Well, when Vishab Mehta was flying on an Air India flight, he noticed that a lot of food which is served is uneaten, and is thrown away and wasted.

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He then took the initiative to collect the uneaten food. The airhostesses helped him and separated the uneaten food in a separate black bag while collecting the food trays from the passengers. Altogether, they collected nearly 70 burger buns, 50 butter pockets, and 30 chocolates.

Vishab took the collected food and distributed it among poor who are made to beg as they can’t afford a meal a day.

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He shared this story in a Facebook post which has gone viral. He collected this much food merely on short flight from Mumbai to Jaipur. On longer international flights where two to three meals are served, the amount of uneaten food would triple. On average worldwide, there are over one lakh flights per day. The total amount of uneaten food which is wasted daily would be in gallons.

Vishab’s small initiative, if practiced on every flight, is likely to save tonnes and tonnes of food. It will take us a long way in reducing world hunger and food wastage. Let’s take inspiration from this and work to reduce the amount of food we waste. It’s time to be more aware of our food consumption.

(By Tarini Mehtani)

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हम सबने तमाम ऐसे दर्दनाक किस्से सुनें हैं जहाँ किसी महिला के ऊपर तेज़ाब से हमला किया जाता है और उसके जीवन को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया जाता है। अमूमन यह भी देखा गया है कि तेज़ाब हमले के पीछे एक तरफा प्रेम, जलन की भावना या फिर दहेज की मांग न पूरी होना, होता है। यह सब हमारे समाज का एक नकारात्मक पहलू है, तेज़ाब फेंक कर न केवल महिला को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया जाता है, बल्कि इस कुकृत्य से उस महिला के मान, सम्मान और भविष्य पर भी तेज़ाब फेंका जाता है। ज्यादातर ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित महिलाएं खुद को अंधकार के गर्त में गिरा हुआ पाती हैं और स्वाभाविक है कि इसके बाद उनमें जीवन में कुछ हासिल करने की चाह हमेशा के लिए नष्ट हो जाती है।

हालाँकि उनपर हुए इस घिनौने अपराध के बाद भी कुछ महिलाएं खुद में वो हिम्मत और हौसला पैदा करने में सक्षम हो पाती हैं की वो अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना शुरू करके अपनी बिखरी जिंदगी को सफलता के नए आयाम दें। यह भी सच है कि वो ऐसा करके न केवल खुद का उद्धार करती हैं बल्कि समाज का भी भला करती हैं।

ऐसी ही कहानी है रूपा की, जिनके ऊपर उनकी खुद की सौतेली माँ द्वारा तेज़ाब फेंका गया था। हालाँकि उन्होंने उनके साथ हुए इस वीभत्स अपराध के बाद हार नहीं मानी और उन्होंने खुद के जीवन को अपने लिए एक बेहतर मुकाम हासिल करने का ज़रिया बना लिया। केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में रूपा ने अपनी कहानी को साझा किया।

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बचपन में ही खो दी थी माँ, फिर सौतेली माँ ने किया उनके साथ यह वीभत्स अपराध

रूपा, बचपन में ही माँ का साया सिर से उठ जाने का दुःख झेल रही थीं। लेकिन उनके पिता द्वारा दूसरी शादी करने के बाद उन्हें लगा था की उनके जीवन में माँ की कमी उनकी सौतेली माँ पूरा कर देंगी। हालाँकि ऐसा हुआ नहीं, उनके पिता की दूसरी शादी के ठीक बाद उनकी सौतेली माँ उनसे दुर्व्यवहार करने लगीं और उन्हें विभिन्न तरह की यातनाएं देने लगीं। रूपा ने बातचीत के दौरान बताया कि उनकी सौतेली माँ उन्हें शुरू से ही पसंद नहीं करती थीं, वो उनसे घर के काम करवाने के साथ-साथ उन्हें अक्सर ही मारती–पीटती रहती थीं। वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि उनकी सौतेली माँ उनके साथ यह अक्षम्य अपराध कर सकती हैं। रूपा पर उनकी सौतेली माँ द्वारा यह हमला 8 साल पहले 2 अगस्त 2008 को हुआ था। समय था रात के 2:30 बजे, उस वक़्त रूपा अपने कमरे में सो रही थीं। पहले से उनपर तेज़ाब डालने की तैयारी कर चुकी उनकी सौतेली माँ रूपा के कमरे में आयी और उन्होंने उनपर तेज़ाब फेंक दिया। यह करने से ठीक पहले उन्होंने रूपा के आस-पास से हर प्रकार का तरल पदार्थ भी हटा दिया, जिससे तेज़ाब का असर कम करने में रूपा को कुछ भी मदद न मिल पाए।

पीड़ा का आलम यह था कि हमले के 6 घंटे बाद तक भी रूपा का कोई इलाज नहीं हो सका। न ही पानी न ही कोई और तरल पदार्थ उनके शरीर के जले हुए हिस्सों पर लगाया जा सका। वह 6 घंटे तक लगातार तड़पती रहीं और दर्द से बिलखती रहीं। वो बताती हैं कि उनकी सौतेली माँ का इरादा उन्हें पूरी तरह से मार डालने का था लेकिन शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था।

चाचा ने दिया विशेष साथ, दी उन्हें हिम्मत

रूपा पर इस हमले के बाद सुबह 9 बजे जब उनके चाचा को इस बाबत खबर लगी तब वो वहां पहुंचे और उन्होंने रूपा को वहीँ के एक अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन उस अस्पताल में “बर्न्ट सेंटर” न होने के कारण उनका बेहतर इलाज नहीं हो पाया। इसके बाद रूपा को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहाँ वह 3 महीने तक भर्ती रहीं। आज तक उनकी 7-8 सर्जरी हो चुकी हैं जिसके लिए अबतक 8-9 लाख का खर्च उनके चाचा द्वारा किया जा चुका है। रूपा के इलाज का पूरा खर्च उनके चाचा ने ही उठाया है, उन्हें कहीं से भी कोई मदद नही मिली। उनके चाचा ही उनके इलाज से लेकर उनकी अन्य जरूरतों का भी खर्च उठा रहे हैं। उनका खुद का एक सलून है जिसकी कमाई से उनका गुजर बसर हो रहा है। उनके चाचा ने न केवल उनका इलाज करवाने में पूरी मदद की, बल्कि उन्होंने रूपा के जीवन को एक नयी दिशा देने में भी एक अहम् भूमिका निभाई।

इसके बाद रूपा ने अपने जीवन में मकसद तलाशने शुरू कर दिये। उन्होंने यह ठान लिया कि वो किसी के भी रोके रुकने वाली नहीं। उन्होंने हमसे बातचीत में यह जोर देकर बताया कि वो अपने आप को आईने में देखकर पहले बहुत अफ़सोस किया करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने यह समझ लिया की इस जीवन में उन्हें अपनी पहचान अपने कर्म से बनानी है और जो कुछ भी उनके साथ हुआ उस वजह से अपनी रफ़्तार को थमने नहीं देना है।

सपनों को दी उड़ान, आज हैं फैशन डिज़ाइनर

रूपा उस घटना के बाद असहनीय पीड़ा झेलते हुए मौत से भी बदतर जीवन जी रही थीं और उनके जीवन में निराशा के घोर बदल भी छा गए थे। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने खुद को अंधकार के उस गर्त से निकालकर अपने सपनों के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले तो ‘स्टॉप एसिड अटैक्स‘ नाम की एक संस्था का साथ मिला और वह अपने सपनों को पूरा करने के साथ-साथ समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन लाने की मुहिम में जुट गयीं।

उन्होंने बताया कि वो बचपन से ही एक फैशन डिज़ाइनर बनना चाहती थीं, उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में सिलाई–कढ़ाई सीखना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि अस्पताल और कोर्ट के चक्कर लगाते–लगाते उनका सपना काफी समय तक अधूरा ही रहा। लेकिन 2013 में ‘स्टॉप एसिड अटैक्स‘ संस्था से जुड़ने के बाद उन्होंने फैशन डिज़ाइनर बनने के सपने को पूरा करने की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे उनके कपड़े नमी फैशन शो में लगने लगे। अब वो न केवल खुद फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में नाम कमा रही हैं बल्कि तमाम एसिड अटैक से पीड़ित महिलाओं के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की एक मुहिम का हिस्सा भी बन रही हैं।  चूँकि वो खुद उस असहनीय पीड़ा से गुजरी हैं और एक समय जीवन में हिम्मत हार चुकी थीं, इसलिए उनका यह मकसद है की वो ऐसी सभी महिलाओं के अंदर वह हिम्मत पैदा करने का काम करें जिससे वो जीवन में वापस से उठकर खुदके पैरों पर खड़ी हो सकें। रूपा आज दूसरी एसिड अटैक पीड़िताओं को न्याय दिलवाने में मदद करती हैं।

बन रही है उनके जीवन पर एक फिल्म

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फैशन डिज़ाइनर के रूप में नाम कमाते हुए उन्होंने अपनी संस्था पर विशेष ध्यान दिया है और वो यह सुनिश्चित कर रही हैं कि इस समाज से एसिड अटैक जैसे कुकृत्यों को पूरी तरह से मिटाया जा सके। वो इसके लिए सरकार से सख़्त से सख़्त कानून को लाने की गुज़ारिश करती रहती हैं। उनके जीवन का यही एकमात्र मकसद है कि वो हर महिला के जीवन में फैले हुए अंधकार को मिटाते हुए उम्मीद की नयी रौशनी को जगा दें। उनकी इसी हिम्मत को सलाम करते हुए जल्द ही उनके जीवन पर आधारित एक फीचर फिल्म बनने वाली है, जिसकी शूटिंग लगभग पूरी हो गयी है। निर्माता प्रफुल्ल चौधरी व हंगरी की निर्देशिका ग्लोरिया संक्युक्त रूप से मिलकर उन पर फिल्म बना रहे हैं। केवल यही नहीं उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा ‘नारी शक्ति‘ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

रूपा के जीवन से हमे ऐसे असंख्य उदाहरण मिल सकते हैं, जिससे हम यह सीख सकते हैं कि कैसे जीवन में लगभग सबकुछ हार जाने के बाद भी व्यक्ति वापस से उठके खड़ा हो सकता है और खुद को समाज परिवर्तक के रूप में पहचान दिलवा सकता है। उनका पूरा जीवन ही अपने आप में एक उदाहरण है, इसका जीवंत प्रमाण है कि कैसे अगर ठान लिया जाए तो हमारे सपने पूरे हो सकते हैं। जब रूपा अपने जीवन में आयी इतनी विषमताओं के बाद कुछ करके दिखा सकती हैं, तो हम सब क्यों नहीं? हम उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं की हम सब भी अपने लक्ष्य की ओर उसी जुझारूपन से आगे बढ़ेंगे जिस प्रकार रूपा बढ़ पायीं।

(यह स्टोरी शालु अवस्थी के द्वारा लिखी गई है)

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Some 45 years back from today, a family was struggling to make ends meet in Paravdi village of Bhavnagar in Gujarat. The father would get a monthly salary of Rs 40 which wasn't enough to feed his five children. But their needs were humble and neighbors often showed kindness. Their expectation for a bright future was simply having enough supplies for the family to survive for a month, two would be great. It was a time when nobody imagined that one among these five kids will one day become so big and generous that fate of millions of families would improve just because of his grit and determination.

Dinesh Bhanushankar Pandya (45) has come a long way from growing up in a poverty-ridden household to becoming one of the most respected and influential social entrepreneurs of Gujarat. He lost his eyesight when things looked rosy for him but bounced back to find greater success and ambition in life. He is one of the most inspiring stories KenFolios has ever dug out for its readers so kindly read till the last and share it to help and encourage more people.

Poverty, potato, and pain

"I was in STD 3 when I visited Bhavnagar. Seeing a woman sell masala aalu on a shaky wooden stand near a busy square instantly appealed to me. This was something I could do, too!" recalls Dinesh in an interview with KenFolios. He came from a place where most people were worked in diamond cutting/ mining factories. The kids he hung out with would get enough pocket money from their parents to buy toys and candies. Selling masala aalu seemed like a perfect thing he could do to buy little things his parents couldn't afford for him. This child was a go-getter right from the very beginning.

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He convinced his mother to help in preparation of the savoury dish and thus began his first stint with entrepreneurship. For the next four years he happily continued this little venture alongside his studies and then later quit it to start working as a newspaper delivery guy to make around Rs 50 a month. 

All he wanted at that time was to grow up as soon as he can and try his hands on something bigger. He was always on a lookout to know more about the world and understand how money changed hands. He knew that man has the power to change his destiny if he keeps on working towards it.

I was halfway into a very gripping movie that was playing on my neighbor's TV. An advertisement played right after intermission and I went back to my home for a few minutes. When I came back I found that they had shut their doors. I was so disappointed and sad that I broke down crying. I was really into the movie. That's when my grandfather said something that I draw inspiration from even today. He said, किसी दूसरे को किसी तीसरे के घर में देखने जाने की बजाय कुछ ऐसा करो कि एक दिन दुनिया तुम्हें देखने को लालायित हो जाए (rather than watching others on someone else's television do something in life that the whole world is eager to see you)

Big dreams, teeny job

Tough times often make us question our worth and make us lose confidence in our potential. But Dinesh waded through years of hardship and kept giving in his best. He scored a handsome 90 percent in his STD 12 which was a pretty big deal a couple of decades back. But for the sake of his family he dropped the idea of studying further and started looking ways to make money. He borrowed petty funds from his friends and opened a pan shop (that didn't go a long way). He then joined a diamond factory and started filling out forms for government examinations. Soon came the news that he was selected for cashier's role in Bank of Saurashtra against a monthly pay of Rs 7,000.

A few months into the job and Dinesh had already done the calculations. This job won't pay for the house he wanted to live in and the fleet of cars he wanted to own. Restlessness gripped him and he began looking for things that can help him realize his dreams faster. He was ready to take risks and exhaust himself with hardwork and one day he spotted an advertisement  in the newspapers regarding a marketing job. It did not require any investment yet promised hefty incentives. When he showed up at the mentioned address, the in-charge asked him not to waste his time. "Only a mad person will quit his government job for a marketing role." At least the man had spoken partial truth. Dinesh was certainly a kind of mad man. He asked them to train him and the day he made his first sale, he resigned from the bank.

He had aptly foreseen the opportunities that lay in front of him in marketing. Despite people's discouragement and concerns he joined the role full-time and bagged promotion after promotion based on his record breaking sales. He could sell pen, socks, calculator, you name it. Within a few months he received Rs 48,000 as bonus which gave him the courage to break the news of his shift in career to his family. Two years later, he launched his own marketing company.

Reaching at the top, losing eyesight

In 1994, he launched Ad Shops Promotions Limited from a rented house. To save on cost he would board a local train from Rajkot at 10 pm every night and reach Ahmedabad at 2 in the morning. He would then collect products and return to Rajkot by 7 am. Ditching sleep and rest, he would give the products to his sales boys in the morning and send off his team by 10 am. This went on for 6 months and his efforts bore fruits in form of 90 offices spread across all corners of India. It was a big deal and is still a great feat to achieve for any self-made entrepreneur.

Everything was right as rain but tragedy struck him and his family in 1998. An accident caused injury to his eyes and negligence in treatment destroyed his eyesight. There was nothing he could do except run from one medical expert to another only to sadly accept the fact that the damage was irreversible. All this time he spent in hospitals costed him his team and his business. All was lost and once again Dinesh was forced to start from zero. This time he couldn't even see.

Dinesh is filled with praises and gratitude for his wife Jayshri whom he calls his strongest pillar. It was she who told him that he still has everything he needs to be successful. She told him to be strong and find his strength and self-belief. She would walk and Dinesh would follow her from one door to another carrying heavy bags on his shoulders to sell bottles of phenol. He could still sell and once again our hero took a leap. He jumped to wholesale business and started approaching dealers with his products. Fortune favors the brave and within no time his network spread all across Gujarat. Well-wishers helped him in stepping into pharma sector and he began raking in lakhs of rupees every month.

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Now came the time to look beyond self and start solving some problems that were plaguing the backbone of the country - our farmers. He did intensive research and meticulously launched a campaign called 'Vishmukt kheti samridhh kisaan' (poison-free farming and prosperous farmers). He tirelessly spoke to one farmer after other and informed them about the benefits of organic farming. His campaign gathered support from 5 lakh farmers who showed him the problems they faced in agriculture. A prominent among them was shortage of cowdung. Dinesh got deep into research and came back with a gamechanging product with 18 components that was purely organic and did wonders for the crops. 

In 2014, he secured a loan of Rs 25 lakh which got him to set-up a manufacturing unit. His firm is now doing multi-crore turnover. His businesses are spread across 25 states today selling 90 products that are available at 35,000 outlets. His business entities are today valued at Rs 100 crore and he has also launched IPO six months back.

The man is rightly known as the miracle man of Gujarat. His motivational speeches are thrilling and his own personal story is enough to stir positivity in anyone. Dinesh says nobody here is so rich that they can buy their past and no one ever is so poor that they cannot take charge and change their tomorrow. He may have lost his eyesight but the perspective he has gained (or always had) is awfully inspiring.

Make this story travel far and wide. Share it and tag your friends.

आज से लगभग 45 वर्ष पहले गुजरात के भावनगर से 100 किमी दूर परावड़ी नामक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार दो वक़्त की रोटी के लिए जूझ रहा था। 5 बच्चों से भरे इस परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा सिर्फ एक व्यक्ति के कंधे पर था। 40-50 रुपये महीने की तनख्वाह से किसी तरह जीवन-यापन हो रहा था। तब किसी को मालूम नहीं था कि इन्हीं पांच बच्चों में एक बच्चे के अंदर ऐसी विलक्षण क्षमता है जो कि आने वाले वक़्त में वह केवल उनके परिवार की बल्कि इस देश के लाखों लोगों की किस्मत बदल सकता है। 

जी हाँ, वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि गुजरात के एक सफल कारोबारी दिनेश भानुशंकर पंड्या हैं जिन्होंने चुनैतियों को भी सर झुका के पीछे हटे पर मजबूर कर दिया। इन्होंने स्वयं परिस्थियों के अनुकूल नहीं बनते हुए परिस्थितियों को ही अपने अनुकूल बना लिया। महज़ 2 रुपये से मसाला-आलू बेचने वाला ये शख्स आज 100 करोड़ के बिज़नेस एम्पायर का सामी है और उनकी कहानी हम सबके लिए बेहद प्रेरणादायक है।

शुरूआती संघर्ष 

दिनेश जब तिर्तीय कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्हें एक बार भावनगर जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने एक महिला को आलू मसाले बेचता देखा, तभी उनके दिमाग में इस काम को शुरू करने की मंशा बनी। दिनेश इस कारोबार से अपनी बचपन की छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करना चाहते थे। भावनगर में हीरा कारखानों की वजह से आस-पास के गाँव के लोग रोजगार के लिए आया करते थे। दिनेश जिन बच्चों के साथ खेला करते थे, उनमें से अधिकतर अच्छे परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन उन बच्चों की तरह दिनेश को घर से पैसे मिल पाना उस दरिद्रता के दौर में संभव नहीं था। 

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उन्होंने अपनी मां की सहायता से मसाला-आलू की रेहड़ी लगानी शुरू किया। इससे उन्हें थोड़ी-बहुत कमाई हो जाया करती थी जो उनके टॉफी-खिलौनों के लिए काफी था। स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने इस कारोबार को 4 वर्षों तक जारी रखा। उसके बाद उन्होंने इस काम को छोड़ पेपर डिलीवरी के कार्य को गले लगा लिया। इससे उन्हें 35-50 रुपये महीने की कमाई हो जाया करती थी। 

परिस्थितियां उन्हें भले ही ये सब करा रही थी लेकिन उनके भीतर हमेशा से कुछ बड़ा करने की लालसा थी। उन्होंने गरीबी को जितनी करीब से देखा था, वह नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ी उस पीड़ा गुज़रे।

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में दिनेश ने एक दिलचस्प वाकये का जिक्र करते हुए बताया कि एक दिन वह पड़ोस के घर में टीवी देखने गए थे। इंटरवल के बाद पड़ोसी ने दरवाज़े बंद कर लिए और उन्हें टीवी देखने नहीं दिया। उनके बाल-मन पर ठेस पहुंची और वे रोने लगे तो उनके दादाजी ने समझाया और बोला कि किसी दूसरे को किसी तीसरे के घर में देखने जाने की बजाय कुछ ऐसा करो कि एक दिन दुनिया तुम्हें देखने को लालायित हो जाए। यह वाक्य उनकी ज़िन्दगी के लिए प्रेरणा बन गया।

कठिन दिनों में अक्सर लोग कमज़ोर पड़ने लगते हैं, ये मानने लगते हैं कि उनकी दशा में बहुत ज़्यादा बदलाव की गुंजाइश कम ही है पर दिनेश में हमेशा से ही एक आग दहकती थी। उन्होंने भरपूर मेहनत की और 12वीं में नब्बे फीसदी अंक प्राप्त किए जो कि उस दौर में किसी मिसाल से कम नहीं था। घर की माली हालात को देखते हुए उन्होंने पढ़ाई छोड़ कुछ बिज़नेस करने का ही मन बनाया। दोस्तों से 50-100 रुपये कर्ज लेकर पान का गल्ला लगाया लेकिन उनके दिल ने इस काम के लिए ज़्यादा समय तक हामी नहीं भरी। वे कुछ बड़ा करना चाहते थे। फिर उन्होंने एक हीरा फैक्ट्री में काम करने की शुरुआत की और साथ ही वे सरकारी नौकरी के लिए आवेदन-फॉर्म भरने लगे। तभी सौभाग्य से उनका सिलेक्शन सौराष्ट्र स्टेट बैंक में बतौर कैशियर हो गया। जिस व्यक्ति के कभी 1 हज़ार रुपये एक साथ नहीं देखे थे उनके लिए 7 हज़ार महीने की यह नौकरी एक नई शुरुआत थी।

बड़े सपने पर नौकरी छोटी

7 हज़ार महीने की तनख्वाह से घर तो चल रहा था पर महँगी गाड़ियों और बंगले के सपने बैंक के हवाले पूरे नहीं होंगे, ये वह जान चुके थे। धीरे-उनकी अधीरता बढ़ती गयी और एक दिन उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिस से वे ठिठक पड़े। वे अखबार में इश्तिहार पढ़ा करते थे और एक दिन किसी मार्केटिंग कंपनी द्वारा दिए गए विज्ञापन ने उन्हें आकर्षित किया। जब वे इस विषय में बात करने ऑफिस पहुँचने तो उन्हें यह कहकर भगा दिया कि भला सरकारी नौकरी छोड़कर कौन पागल घर-घर सामान बेचना चाहेगा। लेकिन ये उनका अपने सुनहरे भविष्य को लेकर पागलपन ही तो था कि उन्होंने इस काम को अपना सब कुछ देने की ज़िद पकड़ ली।

दिनेश की दूरदर्शिता इस मार्केटिंग के काम की अपार संभावनाओं को पहचान चुकी थी। पहले कुछ ही दिनों में उन्होंने इसकी बारीकियों को सीख लिया और नौकरी को अलविदा कहने का निश्चय किया। लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि सरकारी नौकरी बड़ी मेहनत से मिलती है और इसे छोड़ना मुर्खतापूर्ण फैसला होगा लेकिन दिनेश अपने फैसले ले चुके थे।

मेरे इस फैसले के बारे में घर पर किसी को भनक तक नहीं थी। मुझे बस हर महीने 5 हज़ार रुपये घर भेजने होते थे। अब मेरे पास इस रुपये को कमाने के लिए भी एक दबाव बन गया था।

19 वर्ष की उम्र में मार्केटिंग जगत में कदम रखते हुए उन्होंने इससे जुड़ी तमाम चीज़ो को सीखा और छह महीने के भीतर ही अपने प्रदर्शन से सबका दिल जीत लिया। उन्हें पदोन्नति मिली और 48 हज़ार रुपये बोनस भी। बोनस की इस राशि के साथ जब वे घर पहुंचे तो पूरे परिवार में खुशियाँ भर आईं। उस दौर में ये काफ़ी मोटी रकम होती थी। दो साल में प्रबंधक बनने के बाद उन्होंने अपना खुद का कारोबार शुरू करने का निश्चय किया।

 एक हादसे ने दृष्टिहीन बना दिया

साल 1994 में किराये के एक मकान में उनकी कम्पनी एड शॉप प्रोमोशन्स लिमिटेड की स्थापना हुई। शुरुआत में पैसे बचाने के लिए वे खुद माल खरीदने राजकोट से अहमदाबाद जाया करते थे। उन्होंने बताया कि वे रात 10 बजे निकलते और 2 AM में अहमदाबाद पहुँचते, फिर माल खरीदकर वापस सुबह 7 बजे राजकोट पहुँच जाते। नींद और आराम की परवाह किये बगैर दिनेश 10 बजे ऑफिस पहुंचकर सेल्स बॉयज़ को माल दे कर उस दिन की मार्केटिंग के लिए विदा करते थे। ऐसा लगभग छह महीनों तक चला और उनकी मेहनत रंग लाई। एक के बाद एक देश में उनके नब्बे से ज्यादा ब्रान्चेस खुल गए। ज़रा सोचिये कि ये किसी भी इंसान लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है कि उनके भारत में 90 ऑफिसेस हों।

सब कुछ अच्छे से चल रहा था, तभी साल 1998 में उनकी जिंदगी में एक हादसा हुआ। इस हादसे में डॉक्टर की लापरवाही ने उनकी देखने की क्षमता छीन ली। चार महीनों तक वे कारोबार से दूर अपनी आँखों की रौशनी वापस लाने की नाकाम कोशिश में लगे रहे। तब न इतने फ़ोन थे न ही किसी को ये जानकारी देना सम्भव था जिसकी वजह से बॉस की नामौजूदगी में उनके साथ काम कर रहे सारे लोग चले गए। एक बार फिर वक़्त ने उन्हें शून्य पर ला खड़ा कर दिया था। 

ज़ीरो से 100 तक की फिर नई शुरुआत 

इस कठिन परिस्थिति में उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें मज़बूती प्रदान की और फिर दोनों ने मिलकर घर-घर फिनाइल बेचने शुरू कर दिए। उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी कंधे पर बोतलें ले कर आगे-आगे चलती थी और मैं पीछे-पीछे। दुकान पर पहुंचकर मैं प्रोडक्ट की खूबियों के बारे में बताता।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चला। फिर उन्होंने हॉलसेल मार्केटिंग में कदम रखने का निश्चय किया। अब वे घर-घर बेचने की बजाय सीधे डीलरों से संपर्क करने लगे। देखते-ही-देखते पूरे गुजरात में उनका जाल फैल गया। फिर उन्होंने एक शुभचिंतक की मदद से फार्मा इंडस्ट्री में भी कदम रखा। अब उनकी कमाई लाखों में हो रही थी। और फिर एक दिन उनके ही एक ग्राहक ने उन्हें किसानों के लिए भी कुछ करने की गुहार लगाई।

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फिर दिनेश भाई ने "विषमुक्त खेती और समृद्ध किसान" नामक एक अभियान के बैनर तले किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया। उनकी इस मुहिम से पांच लाख से ज्यादा किसान जुड़े। जैविक खेती में किसानों के सामने गोबर की कमी एक बड़ी समस्या बनाकर सामने आ रही थी। दिनेश भाई ने इसके समाधान के लिए 18 तत्वों के मिश्रण से एक अनोखा प्रोडक्ट तैयार किया। वे इसकी फैक्ट्री लगाना चाहते थे लेकिन उनके पास पर्याप्त धनराशी नहीं थी। साल 2014 में 25 लाख के बैंक लोन की सहायता से उन्होंने इंडस्ट्री खोला और पिछले वर्ष इसका टर्नओवर करीब 6.5 करोड़ था।

आज उनका कारोबार 25 राज्यों में फैला हुआ है।  उनके 90 से ज्यादा प्रोडक्ट्स लगभग 35 हज़ार जगहों पर उपलब्ध हैं। वे आज 100 करोड़ के साम्राज्य के मालिक हैं। उन्होंने जब अपनी कंपनी का आईपीओ निकाला तो वह 1.5 गुणा सब्सक्राइब किए गए। समाज में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें 150 से ज्यादा अवार्ड भी मिल चुके हैं।

दिनेश पंड्या का मानना है कि जीवन में सफल होने के लिए दृष्टि नहीं बल्कि दृष्टिकोण चाहिए। इस दुनिया में कोई भी इतना अमीर नहीं होता जो अपने बीते हुए कल को खरीद सके और उतना कोई गरीब नहीं होता कि अपने भविष्य को बदल नहीं सके। गरीब पैदा होना आपके हाथ में नहीं है लेकिन अमीर मरना आपके हाथ में है। 

बाईस वर्ष की नाज़ुक उम्र में जहाँ ज्यादातर युवा अपनी कॉलेज-लाइफ या पहली नौकरी में बिजी होकर मस्त हो जाते हैं, वहीं कुछ लोग अपने जीवन को सफलता के आभूषणों से अंलकृत करते रहते हैं। जहाँ वयस्कों की ज्यादातर संख्या नौकरी के लिए दूसरों पर निर्भर रहती है वहीं कुछ खुद का साम्राज्य खड़ा करते हैं और साथ में दूसरों के लिए अनेक रोजगार के अवसर। ऐसी ही यह कहानी हिरण्मय गोगोई की है।

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‘हिरण्मय” का मतलब होता है स्वर्णिम, गोगोई अपने नाम के अनुसार ही एक संवेदना और करुणा से युक्त व्यक्ति हैं जिन्हें प्रकृति से बेहद लगाव है। जब वे पंद्रह वर्ष के थे तब उनके भाई की रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई। इतना ही नहीं फिर उनकी माँ का देहांत भी उसी साल 2012 में हो गया। उनकी माँ 13 वर्ष से बीमारी से लड़ रही थीं। इस दुःखद घटना ने गोगोई को कठोर बना दिया और वे अवसाद में चले गए। उनके पिता अकेलेपन से लड़ते रहे और हार कर एक तलाकशुदा से शादी कर ली। हिरण्मय ने उन्हें अपनी मां का स्थान देने की बहुत कोशिश की पर जल्द उसे यह अहसास हो गया कि माँ की जगह कोई और नहीं ले सकता। जब वे डिप्रेशन में थे तब वे एकांत में स्वयं से बात किया करते थे। ऐसे ही एक आत्म-संवाद के समय उन्होंने अपने आप से पूछा कि क्या जो बीत चुका है और जिसके बारे में कुछ करना संभव ही न हो, उस पर व्यर्थ पछताना और रो कर अपनी ज़िन्दगी गुज़ार देना कोई बुद्धिमानी है! उन्होंने तय कर लिया कि इस तरह से वे अपनी जिंदगी नहीं जियेंगे। उन्होंने अपने आप से वचन लिया कि वे इस कष्ट से खुद को बाहर निकालेंगे और जीवन में मिले अपने अनुभव से दूसरों की भी मदद करेंगे।

यहीं से उनके मन में एक “फ़ूड-टेक” का आइडिया उभरा। यह एक ऑनलाइन बिज़नेस है जो ग्रामीण तकनीक के साथ जुड़ी हुई है। यह बिज़नेस असम में स्थित है और इसकी शाखाएं हर जगह काम कर रही है। हिरण्मय का मानना है कि यह बिज़नेस किसानों के लिए नौकरी का अम्बार लगा देगी।

हिरण्मय ने अपने आइडिया को सही अर्थों  में साकार किया। उन्होंने एक मोबाइल ऐप “गांव का खाना” डेवलप किया जिसमें लोगों को चाहिए वह उन्हें आसानी से मिल जाया करेगा। इस ऐप के सात प्रभाग हैं। इसके तहत अलग-अलग प्रभागों में अलग तरह के खानों और तरीकों के विकल्प हैं;

  • “गांव का खाना” पारम्परिक अंदाज : इसमें आसाम के ग्राहकों को वहां की परम्परा के अनुसार खाना परोसा जाता है।
  • “गांव का खाना” पार्टी अंदाज : इसमें लोग पार्टी के लिए पश्चिमी व्यंजनों का आर्डर कर सकते हैं।
  • “गांव का खाना” प्राकृतिक अंदाज : इसमें ग्राहक ऑर्गनिक रूप से उगाई गई सब्जियां आर्डर कर सकते हैं। इस बिज़नेस में सीधे किसानों से संपर्क किया जाता है और सब्ज़ियां व फल को ग्राहकों के घरों तक पहुँचाया जाता है।
  • “गांव का खाना” “मंदिता” : यह उनकी माँ के नाम पर आधारित है। यहां दूसरे तरह के फ़ूड आइटम्स को शामिल करने की योजना भी है।
  • “गांव का खाना” ट्रिविअल अंदाज : यह आसाम के स्थानीय पर्यटकों के लिए उनके प्रवास को सुविधाजनक बनाये जाने पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • “गांव का खाना” अकोमोडेशन अंदाज : इसमें आसाम के होटल्स में बुकिंग के लिए सुविधा उपलब्ध कराना है।
  • “गांव का खाना” रिलेशनशिप मोड : इसमें जोड़े अपनी होटल बुकिंग करवाते हैं।

मोबाइल मेनू के अलावा “गांव का खाना” ने ‘कृषि विकास योजना’ भी शुरू किया है। इसमें किसानों को “गांव का खाना” में रजिस्टर्ड कराना होता है और उन्हें एक कार्ड दिया जाता है। जब ग्राहक आर्डर करते हैं तब किसानों को आर्गेनिक खेती से तैयार हुई सब्ज्जियाँ और फल ग्राहक के घर तक पहुँचाना होता है। इस कार्ड की कीमत केवल एक रूपये महीने है। इस प्रयास का नाम FFL (फ्रेश फ्रॉम लैंड) है। किसान जो बार-बार गांव से शहर नहीं जा पाते, वे “गांव का खाना” के ऑफिस में सब्जियां पंहुचा देते हैं।

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हिरण्मय के द्वारा शुरू किये गए ये प्रयास गरीब किसानों और कर्मचारियों के आधारभूत अधिकारों की लड़ाई भी है। आगे आने वाले समय में 3000 लोगों को नौकरी दिलाना हिरण्मय का लक्ष्य है।

“मेरा प्यार मेरी माँ के लिए कभी मर नहीं सकता। मां के प्रति अपने प्यार को मैं सब माताओं की ज़िन्दगी को ज्यादा सहज और सुखद बनाने में लगा रहता हूँ।”

इस बिज़नेस के अलावा हिरण्मय फिटनेस के भी मुरीद हैं। वे अपने आप को फिट रखने के लिए अपने व्यस्त दिनचर्या से कुछ घंटे चुरा ही लेते हैं।

“लोग इंटरप्रेन्योरशिप को नहीं समझ पाते और इसलिए वे उनकी मदद नहीं करते। “गांव का खाना” शुरू करने में यही सबसे बड़ा रोड़ा था।”

हिरण्मय ने अपना बिज़नेस जून 2016 में केवल 10 रूपये से शुरू किया था। उनके पास केवल एक गैस-सिलिंडर और एक स्टोव बस थे। उनके गांव सिवसागर से डिलीवरी के लिए शहर जाना सबसे मुश्किल था परन्तु उन्होंने उन बाधाओं को कभी अपने बिज़नेस को प्रभावित करने नहीं दिया। वे जो भी काम करते उसे सोना बना देते।

हिरण्मय गोगोई को “छठे छोटे और उभरते बिज़नेस – 2017” में राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। हम देखते हैं कि उम्र सफलता के लिए कोई महत्व नहीं रखता, रखता है तो केवल कठिन परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति। 22 साल की उम्र में हिरण्मय के सफलता की कहानी से हम सभी यह प्रेरणा ले सकते हैं कि हम यदि हम ईमानदारी और जीवट के साथ कुछ करें तो हम निश्चित ही विजेता के रूप में उभरेंगे।

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We all have varying ability to react to tough situations and a finite strength to cross hurdles that come our way. But if we believe in our potential to sail through and find greener pastures the chances of achche din only get closer. It certainly is difficult to uphold optimism when life tells you otherwise but the trick is to stay afloat and keep swimming.

Today, 50-year-old Nikesh Arora lives life kingsize but there was a time when he was debt-ridden and would take up odd jobs to support himself. He did the right thing by constantly upping his skills and taking risks in life that others wouldn't and today he is known as one of the world’s most celebrated technology investors who draws a gigantic annual salary of Rs 857 crore ($128 million).

Days of bankruptcy

Born to an Air Force officer, Nikesh hails from Ghaziabad in Uttar Pradesh and studied in Kendriya Vidyalaya all over the country. He was a bright student and got into IIT, BHU to pursue a degree in electrical engineering. After finishing his bachelors, he briefly worked with Wipro but then decided to take an orbit leap and made up his mind to get an MBA from the United States.

5kusjxbxtwcqufayymwqssjgwnh78u4u.pngNikesh with former Google CEO Eric Schmidt.

At the age of 21, Nikesh took a loan of $3,000 from his father (Rs 2 lakh today) and went to US with two suitcases as his only possessions. The days were tough but he chose to sweat it out by taking any job that would help him sustain.

“I was technically bankrupt. After my first year at business school, I got married. So I had liabilities, with no earnings,” he told in an interview with The Financial Times.

Serving burgers and getting his first break

Alongside his higher studies, Nikesh could be seen working as a security guard outside the university dorms, taking notes for disabled people, teaching corporate finance to adult education students. For two days in a week he would serve burgers at Burger King to fund his studies. Every struggle fuelled a deeper desire in him to rise higher professionally.

Before finishing his degree in finance, he wrote to 450 companies looking for employment but nobody wanted him on-board. Finally, one day, he received positive response from a company. He joined Fidelity Investments in 1992 as a fund manager where he held top finance and technology management portfolios. Later he became the vice president of finance in Fidelity Technologies.

Nikesh then worked in telecom sector for some years before his life took a major turn when he joined Google in 2004. By 2011, he had become the search giant's chief business officer and Google's highest paid employee with a package of Rs 310 crore. He landed up being the fourth important person in Google, after its co-founders - Larry Page, Sergey Brin and chairman Eric Schmidt.

"I enjoy working in places which are very fast-moving and where things are changing. As my life takes on a steady pattern I do things to undo the pattern," he says.

He joined Japanese internet and telecommunications titan SoftBank in September 2014 at a whopping annual compensation of Rs 850 crore to take charge of its global operations. Last year, Nikesh joined cybersecurity firm Palo Alto against an annual salary of Rs 857 crore.

rgrcfqk3jreqjtegcqqyf6kecshbbjz5.jpgNikesh Arora with Masayoshi Son of SoftBank 

Quoting a report by Business Standard, Nikesh Arora is considered by his colleague and juniors as a team person and a cult-figure among Indian Googlers. But despite being a globe-trotter (Arora travels 100 days a year) Arora is an Indian at heart. His colleagues say that Indian culture still plays a very important part of his life. He eats Indian food at home (Arora carries his own bottle of hot sauce to add to his food in restaurants), his family speaks in Hindi and like all Indians he watches cricket matches, even if it is late in the night. He is a keen golfer and a fast thinker.

Nikesh inspires us to work hard and become so polished that the world queues up behind us for our talent and contribution. His hardwork and skills have made him the man he is today and his story will motivate us to become the best version of ourselves.

 

प्राचीन समय से ही एलोवेरा का प्रयोग चिकित्सा जगत में लोगो का उपचार करने में किया जाता रहा है। एलोवेरा के गुणों से हम सभी भली भांति परिचित हैं तथा हमने इसका उपयोग कभी न कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यछ रूप में किया जरूर होगा। एलोवेरा में अनेकों बीमारियों को उपचारित करने वाले अद्धभुत गुण मौजूद होने के कारण आयुर्वेदिक उद्योग में इसकी मांग बढ़ती जा रही है। एलोवेरा की इन विशेष खूबियों को सही मायने में पहचानते हुए श्यामू सिंह ने हमारे देश के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

श्यामू सिंह मेह गांव के खारीपुरा क्षेत्र के निवासी हैं, एल.एल.एम. (लॉ में मास्टर्स) की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने ग्वालियर हाईकोर्ट में वकालत कर रहे थे किन्तु एक वर्ष पूर्व इनके गांव में आत्मा फाउंडेशन के द्वारा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया, जिसमे एलोवेरा की खेती से संबंधित जानकारी दी गयी। इससे प्रभावित हो कर श्यामू ने वकालत छोड़ अपने साथी आर पी एस खुश्वाह के साथ मिल कर अपनी दो हेक्टेयर भूमि में एलोवेरा की खेती शुरू कर दी। एक बार फसल लगने पर दो से तीन बार फसल ली जा सकती है इसलिए कम लागत व कम समय में अधिक उत्पादन होने के कारण श्यामू ने बहुत तेज़ी से तरक्की की। वर्तमान में वो 50 एकड़ भूमि पर एलोवेरा की खेती कर रहे हैं। श्यामू ने खेती करने के साथ ही किसानों को एलोवेरा की खेती का प्रशिक्षण देना भी शुरू किया जिससे किसानों के आत्मविश्वास में काफी वृद्धि हुई।

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खारीपुरा क्षेत्र अपनी परंपरागत खेती के लिए मशहूर है। यहाँ के अधिकतर किसान की दिलचस्पी रवि व खरीफ के मौसम में एक ही तरह की फसल की बुआई में रहती है। लेकिन एक साल पहले श्यामू को आत्मा से जो मार्गदर्शन मिला उसने सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि कई किसानों की सोच व जिंदगी बदली। अब श्यामू खेती को एक बेहद लाभकारी धंधा बनाये जाने के लिए किसानों को नई तकनीकों का प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि किसान अधिक से अधिक लाभ उठा सके।

श्यामू के तमाम सकारात्मक प्रयासों ने रंग लाना तब शुरू कर दिया जब उन्होंने अपने गांव में एलोवेरा से औषधि तैयार करने की “एस.आर.ए.एग्रो” नाम से फैक्ट्री लगाई और इस फैक्ट्री से उन्होंने अपने क्षेत्र के तमाम किसानों को जोड़ा जिससे वहां के किसानों की जीविका में बेहद सुधार आया। ख़ास बात यह है कि पशु इस पौधे को नहीं खाते हैं और ये कम उपजाऊ भूमि पर भी अच्छे से फलता फूलता है। 20 हज़ार पौधों की मदद से प्रति हेक्टेयर 1000 से 1200 क्विंटल का उत्पादन होता है, जिससे किसान 30 से 40 हज़ार रूपए प्रति हेक्टेयर की दर से लाभ कमा रहे हैं। औषधीय गुणों से परिपूर्ण एलोवेरा का पौधा पूर्णतः जैविक तरीकों से उगाया जाता है इसको ऊंची नीची जगहों पर भी लगाया जा सकता है, इस फसल को पानी की भी कम आवश्यकता होती है। जिससे इसकी खेती में लागत बहुत कम आती है। इन सारे लाभों के चलते ही अब खारीपुरा में एलोवेरा का बिक्री केंद्र भी स्थापित हुआ है जिससे निकट भविष्य में किसानों को और अधिक लाभ होने की संभावना है।

श्यामू सिंह अपनी फैक्ट्री के बारे में बताते हैं कि उनकी फैक्ट्री से पंतजलि एवं डाबर सहित अन्य बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अनुबंध किए है। जिले में यह इस तरह की पहली फैक्ट्री है। इस फैक्ट्री में किसानो से खरीदा गया एलोवेरा प्रोसेस किया जाता है और उनसे एक अनुबंध किया जाता है जिससे उन्हें एलोवेरा बेचने में किसी समस्या का सामना न करना पड़े। श्यामू सिंह के अथक प्रयासों से ना सिर्फ उन्होंने अपनी बल्कि अपने साथी किसानों की आर्थिक स्थिति में बहुत अधिक सुधार किया है तथा अपने क्षेत्र में एक मिसाल बन कर उभरे हैं।

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There used to be a time when farming meant living in poverty within limited means. In absence of livelihood options people would either migrate to cities or continue with their loss-making agricultural activities. But with changing times and upcoming technology this trend is changing too.

New experiments in the field of agriculture have created many successful stories like our protagonist today - a young successful farmer from Sitamarhi district of Bihar who has achieved nothing short of a miracle. Her story inspires us to shun the pessimistic view we have for agriculture.

There was a time when Anupam Kumari was very worried about the financial condition of his family. His father used to practice traditional farming besides working as a teacher. Despite the incessant hardwork their struggles didn't seem to end. In such dire situation, her father decided to give his full attention to farming and quit the teaching job. Anupam was done with her graduation and decided to join her father and do something novel to take charge of the situation.

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Aspiring for accuracy in what was now their sole source of income, the duo turned to the local agricultural science center. Anupam received training on mushroom production and making vermicompost. They also learned the nuances of farming in various research institutes of Sitamarhi, Patna and Delhi. After returning to their village they started to produce mushrooms.

In the year 2010, they ventured into this new stream with a humble capital of Rs 500 on a 500 square feet farm. They were the first ones in the area to take up something like this and met with discouraging comments and taunts from villagers. People thought they were wasting their time, money and skills and would soon get into worse financial condition.

"People used to make fun of us. They would point fingers, laugh and say dekho gobar-chatta ugaa rahi hai," Anupam told India Today.

But they remained focussed and believed that their efforts will soon yield. Their hard work bore fruits and fetched them Rs 10,000 in the first three months. Those who would ridicule their practices now came to them seeking training.

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Today, Anupam sells 50 quintals of mushrooms every three months. They are now self-sufficient and are also creating employment opportunities for other villagers as well. They use wheat, husk, and straw to make vermicompost and train others to it. Recently, they have also started fish farming and gardening.

Although they were battling a tough situation, they dared to do something different. Anupam and her father did not pay heed to the discouraging taunts of the villagers and in a few months became a source of inspiration for others.

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