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उम्र और वर्ण मतलब नहीं रखता जब आपके मंसूबे पवित्र और अादर्श हो। ऐसा ही कुछ हुआ जब हाल में ही श्रीनगर म्युनिसपल कार्पोरेश (SMC) ने अपना नया ब्रैण्ड अम्बेसडर चुना। फिल्मी सितारों को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने 15 साल के एक कुड़ा उठाने वाले बिलाल अहमद डार को चुना। जिसने अपना जीविकोपार्जन वुलर झील की सफाई में ढूँढा। वुलर झील एशिया की दूसरी सबसे बड़ी ताजे जल का झील है।

यह पहचान अनगिनत कठिनाईयों, भूखमरी के दिन और लोगों के घृणाओं का सामना करने के बाद मिली है। वुलर झील के तट पर बसे लहावालपुरा गाँव के रहने वाले बिलाल उस वक्त 6ठी कक्षा में थे, जब साल 2007 में उन्होंने अपने पिता मोहम्मद रमजान, को उनके कैंसर के कारण खो दिया है। पूरा परिवार चूर-चूर हो गया और इस नन्हें से बालक को अपने कँधे पर परिवार को उठाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी।

“शुरुआत में हमारी माँ ने हम सब के खर्चे ऊठाये। मेरी दो बहनों और मुझे उन्होंने ही पाला। मगर मेरे पिता ने जो अपनी छोटी सी बचत छोड़ गये थे वह मुश्किल से कुछ ही साल ही चल पाई”

जब बिलाल 7वीं कक्षा में पहुँचे तो एक दिन उन्होंने स्कूल के फीस के लिए माँ से पैसे माँगे तो माँ फफक कर रो पड़ी। ऐसे में बिलाल ने निश्चय किया कि वह पढ़ाई छोड़कर कोई छोटे-मोटे काम करेगा। इस छोटे से बच्चे ने कई तरह के छोटे-मोटे काम जैसे गाड़ी रिपेंयरिंग दुकान से लेकर छोटे-मोटे होटल में सफाई तक के काम किए। इन कामों से उसका पेट तो भर जाता था मगर मुसीबतें अब भी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। एक दिन एक टूरिस्ट ने होटल मालिक से कहा वह बाल मजदूरी अधिनियम के तहत उस पर कार्यवाही कर देगा यदि उसने बच्चे को काम से नहीं निकाला तो। यह बिलाल के लिए एक और बड़ा झटका था।

ब्रैण्ड अम्बेसडर के रुप में नियुक्त होने की बात पर बिलाल कहते हैं, “यह मेरे और मेरे परिवार के लिए बहुत ही गौरव का पल है क्योंकि कई बार हमें रात के खाने के लिए कुछ भी नहीं होता था।” बिलाल को शोहरत तब मिली जब एक स्थानीय फिल्म निर्माता जलालुद्दीन बाबा ने उन पर और पर्यावरण की रक्षा के लिए उनके संघर्षों पर एक वृतचित्र ‘सेविंग द सेवियर- स्टोरी आॅफ ए किड एण्ड वुलर लेक’ बनाई।

बिलाल जब अपने दोस्तों के साथ एक बार जब झील घूमने गए तो उन्होंने झील की करुणामयी स्थिति का अवलोकन किया। कैसे अपशिष्ट पदार्थ झील के ऊपर तैर रहे थे। उन्होंने बिना कोई समय गँवाए झील की सफाई में जुट गये। वह झील पर बिखरे प्लास्टिकों को चुनकर जमा करते और उन्हें बेच कर रोजाना 200-250 रुपये तक उपार्जित करने लगे। जिससे उन्हें अपनी बहनों में से एक के विवाह की व्यवस्था करने में भी मदद मिली।

पर्यावरण के बचाव के लिए लिए बिलाल कई लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं। इनकी कहानी एक संदेश है कि किस प्रकार कचड़ा भी एक कमाई और शोहरत का स्त्रोत हो सकता है। इस युवक को अब एक विशिष्ठ वर्दी दिया गया है और कचड़े और प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरुक करने का कार्य सौंपा गया है। गवर्नर एन.एन. वोहरा ने बिलाल को प्रोत्साहन के रुप में 10,000 रुपये का चेक दिया और म्युनसिपल कमिश्नर आबिद राशिद शाह से बिलाल के भविष्य के वृद्धि और विकास में सहयोग करने का आग्रह किया है।

“एक ‘इच्छा’ कुछ नहीं बदलती, एक ‘निर्णय’ कुछ बदलता है, लेकिन एक ‘निश्चय’ सब कुछ बदल देता है।” बिलाल ने जब जीविकोपार्जन का निर्णय किया तो उसके जीवन में बहुत कुछ बदलाव आए। पर जब उसने वुलर की स्वच्छता का निश्चय किया तो आज उसकी किस्मत बदल गई। एक अच्छे लक्ष्य का निश्चय एक अच्छे मुकाम तक ले जाता है। बिलाल का यह प्रयास हम सबों के लिए हमारे पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराता है। आज के शिक्षित युवावर्ग और पीढ़ी के लिए वातावरण एक धरोहर है जिसे संजो कर हमें आनेवाली पीढ़ी को विरासत के रुप में देना है।