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कहते हैं किसी भी काम को इतनी मेहनत और शांति से करो की सफलता शोर मचा दे। आज हमारे देश में मेहनतकश और अच्छे अधिकारीयों की बहुत कमी है। हर जगह भ्रष्टाचार अपनी जड़ें इस कदर फैला चुका है कि ईमानदार अधिकारीयों को कहीं टिकने नहीं दिया जाता और उन्हें तबादले का दंश झेलना पड़ता है। यही वजह है कि अच्छे-अच्छे लोग भी भ्रष्ट बन जाते हैं। लेकिन सभी ऐसा नहीं करते, कुछ लोग में ईमानदारी फितरती होती है। यह कुदरत का कानून है, हर दौर में ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं और उसके आधार पर कार्रवाई करते हैं। जब भी ऐसा होता है, अपराधियों और नौकरशाहों के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे गैर-कानूनी धंधे ठप पड़ने लगते हैं। ऐसे में उनके पास बस एक ही रास्ता बचता है कि ईमानदार अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का या किसी बदतर जगह पर ट्रांसफर करने का।

आज हम एक ऐसे ही आईएएस अधिकारी की बात करने जा रहे हैं, जिन्हें अपनी ईमानदारी और बेबाकी के कारण 34 साल के कार्यकाल में रिकॉर्ड 71 तबादलों का सामना करना पड़ा।

1997 बैच के आइएएस अधिकारी प्रदीप कासनी हैं हमारी आज की कहानी के सुपर हीरो। साल 1980 में प्रदीप ने हरियाणा सर्विस कमीशन की परीक्षा में सफलता हासिल की और फिर 1997 में उन्हें पदोन्नती देकर आईएएस बना दिया गया। अपने 34 साल के करियर में उनके 71 बार तबादले हो चुके हैं।

कासनी मूल रूप से हरियाणा के भिवानी जिले के चरखी दादरी के रहने वाले हैं। उनके पिता धर्म सिंह किसान-मज़दूर आंदोलन के नेता थे। इमरजेंसी से पहले भिवानी में रिवासा कांड हुआ था। उस कांड से तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल के प्रति राज्य में गुस्सा था। धर्म सिंह उस आंदोलन की अगुआई कर रहे थे। वह अपने साप्ताहिक अखबार लोक हरियाणा में बंसीलाल और इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलकर लिखते थे। किशोरावस्था में प्रदीप भी अखबार निकालने में उनकी मदद करते थे और सामाजिक आंदोलन में सक्रिय थे। प्रदीप की शुरुआती पढ़ाई हरियाणा के भिवानी में हुई और फिर उन्होंने दिल्ली का रुख किया। वह एक तेजतर्रार अधिकारी माने जाते हैं और अपनी बेवाकी के लिए हमेशा चर्चे में रहते हैं।

हरियाणा सरकार के साथ शुरू से ही उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। कासनी जितना अपने काम के लिए चर्चे में रहे, उतना ही अपने तबादलों के लिए भी। आईएएस पदोन्नत होने के बाद कासनी ने अहम जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन बेबाकी के चलते एक पद पर अधिक समय तक नहीं रह पाए। हरियाणा में आई हर सरकार में उनके तबादले होते रहे, वर्तमान सरकार से भी उनका छत्तीस का आंकड़ा ही रहा और गुरुग्राम के मंडलायुक्त पद पर सेवाएं देने के दौरान गुड़गांव के हरसरू में भू-माफिया और निजी कंपनियों के बीच साठगांठ उजागर करने के बाद उनका तबादला कर दिया गया था।

आखिरी में कासनी को लैंड यूज बोर्ड का ओएसडी बनाया गया। पर 2008 से यह विभाग अस्तित्व में ही नहीं है और 2008 से आज तक इसका बजट ही नहीं बना है। किसी को यह भी नहीं पता कि यह बोर्ड किसके अधीन किस तरह से काम करता है। यहाँ कासनी के पास कोई काम नहीं था और उन्हें 6 माह से सैलरी भी नहीं मिली है। लैंड यूज बोर्ड का ओएसडी बनने से पहले वे हरियाणा खादी ग्रामोद्योग बोर्ड में अधिकारी नियुक्त किये गए थे। पर वहां भी उनके पास कोई काम नहीं था। दरअसल उनको ऐसी जगह नियुक्त किया जा रहा था जहाँ से वह प्रशासन में दखल ही ना कर सकें। अब 34 वर्ष की प्रशासनिक सेवा देने के बाद बिना वेतन ही 28 फरवरी 2018 को वे रिटायर हो गए। उन्होंने इसके खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में अपील की है, जिस पर 8 मार्च को फैसला आएगा। अगर यह फैसला कासनी के हक़ में आती है तो उनको ब्याज के साथ सैलरी दी जायेगी।

आईएएस प्रदीप कासनी एक मिसाल है जिन्होंने इतनी अड़चनों के बावजूद अपनी ईमानदारी को कभी झुकनें नहीं दिया। वह न सिर्फ सरकारी अधिकारीयों के लिए प्रेरणास्रोत हैं बल्कि देश की भावी पीढ़ी को भी एक बड़ी सिख दे रहे हैं।