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आज पूरी दुनिया में महिलाओं का बोलबाला है। आज हम ऐसी महिला की कहानी आपके सामने लेकर आये हैं जो दो बच्चों की माँ हैं। वे भारत के सबसे बड़े डिस्काउंट कूपन साइट की सीईओ और संस्थापिका हैं। 1000 करोड़ रुपये की माईडाला डॉट कॉम की आधारशिला रखने वाली अनिशा सिंह की कहानी पढ़ें उन्हीं की जुबानी।

केनफ़ोलिओज़ से बातचीत करते हुए अनिशा ने अपने जीवन के अनुभव को बेबाकी से साझा किया।

“मेरा जन्म दिल्ली के एक ठेठ सिख संयुक्त परिवार में हुआ। मेरा अधिकतर समय अपने दादा-दादी के यहाँ बीता। मेरे पिता ने उस समय अपना बिज़नेस शुरू ही किया था और हम कठिन दौर से गुजर रहे थे। वे एयर फ़ोर्स में काम करते थे इसलिए मेरी पढ़ाई एयर फ़ोर्स के स्कूल में ही पूरी हुई। मैं पढ़ाई में साधारण थी और मुझे हमेशा लगता था कि मुझमें बहुत ही कम प्रतिभा है।”

वे आगे बताती हैं; “मैंने अपने आप से कसम ली थी कि मैं कभी एक उद्यमी नहीं बनूंगी क्योंकि पिता को कठिन परिश्रम करते देखा था जब उन्होंने अपना बिज़नेस शुरू किया था। कभी-कभी मेरी फ़ीस भरने के लिए भी हमारे पास पैसे नहीं होते थे। उस समय मुझ में महत्वाकांक्षा बिलकुल नहीं थी और मैं हमेशा हतोत्साहित रहती थी। एक दिन मेरे चचेरे भाई ने मुझे डिस्कवरी चैनल के बारे में बताया और मैंने उनके साथ इंटर्नशिप करने के लिए उनसे विनती की। जब मैं उनके साथ काम कर रही थी तब मुझे महसूस हुआ कि मैं जितना सोचती हूँ दुनिया उससे कहीं बड़ी है।”

कुछ दिनों के बाद मैंने अमेरिकन यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल कम्युनिकेशन प्रोग्राम करने के लिए अप्लाई किया था। हैरानी की बात थी कि मैं उसमें चुन ली गई और मेरे माता-पिता इसलिए खुश थे क्योंकि पोस्ट ग्रेजुएशन की वजह से मुझे शादी के लिए अच्छा लड़का मिल जाएगा। बिज़नेस स्कूल की एक क्लास अटेंड करने के बाद मैंने एमए करने के बजाय एमबीए पूरा किया। भाग्यवश मैं एक ऐसे प्रोफेसर से मिली जिन्होंने मुझे खुद से मिलवा दिया। मुझे लगा कि मुझमें भी दिमाग और आवाज़ है, और मैं जिसका उपयोग कर सकती हूँ। जितना मैं इसका उपयोग करुँगी उतना मैं कुछ और करना चाहूंगी।”

बिज़नेस स्कूल में मैंने एक अभूतपूर्व महिला उद्यमी को देखा। मैंने जूली होल्डरेन के साथ काम किया। कमाल की महिला थीं वे। उनके जुड़वां बच्चे थे, 400 लोगों के स्टाफ वाला एक स्टार्टअप चला रही थीं और 30 पुश-अप्स करने की आदी थीं। मैं जान गई थी कि मुझे उनके जैसा बनना है। मैंने सुना था कि कोई एक क्षण आता है जो आप को पूरी तरह बदल देता है और यह मेरी जिंदगी का वही क्षण था जहाँ मैंने अपने आप को ढूंढ लिया था। मेरे माता-पिता अब डर गए थे कि ज्यादा काबिल लड़की के लिए लड़का कहाँ से मिलेगा!

बिज़नेस स्कूल के दौरान मैंने क्लिंटन एडमिनिस्ट्रेशन में काम किया था जहाँ महिला उद्यमी के लिए पूँजी की व्यवस्था में मदद किया जाता था। इस नौकरी ने मुझे बदल कर रख दिया। वहां मैं बहुत सी ऐसी महिलाओं से मिली जिनसे मुझे प्रेरणा मिली। यहाँ मैंने चार साल काम किया। उस समय मुझे दो नौकरी के ऑफर मिले एक वाशिंगटन डीसी और दूसरा बोस्टन। मैंने बोस्टन जाने का फैसला लिया। मैंने इ-लर्निंग कंपनी में काम किया। चार साल बाद मैंने भारत लौटने का निश्चय लिया और अपना खुद का कुछ करने का सोचा। मैं 2005 में भारत आ गई और अपने पहले वेंचर KINIS में काम करना शुरू किया।

मेरे दिमाग में यह था कि कंपनी एक रात में ही सफलता प्राप्त कर ले। मैं अपनी सारी पूँजी इसमें लगा चुकी थी। कई रात मैंने रो-रो कर गुजारी थी क्योंकि तनख्वाह देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं होते थे। भाग्यवश मैंने यूएस में अपनी साख बना रखी थी। हमने डिजिटल कंटेंट स्पेस के कई प्रोजेक्ट्स शुरू किये और कुछ समय के बाद KINIS एक लाभप्रद बिज़नेस में तब्दील हो गया और हमनें यूएस बेस्ड कंपनी के साथ जॉइंट-वेंचर पर हस्ताक्षर किये।

चार साल बाद 2009 में मैंने कुछ दूसरा देखना शुरू किया। मैं फिर से यूएस लौट गई और मैंने वहां शादी कर ली और काम की तलाश करने लगी। जब मैं विभिन्न पहलुओं की संभावनाओं को तौल कर रही थी तभी माई-डाला के आइडिया को जैसे किसी ने मेरी गोद में दाल दिया था। तब भारत में ट्रेवल ही एक ऐसी इंडस्ट्री थी जो बदल रही थी। 

उस समय ग्रुपऑन नामक कंपनी यूएस में शुरू हुई थी और इस आइडिया को भारत ले जाने का मन हो रहा था और मैं वापस भारत आ गई। मैं मेक माय ट्रिप के दीप कालरा से मिली और मैं जो चाहती थी उन्हें समझाया। एक गर्भवती महिला द्वारा स्टार्टअप शुरू करने की कोशिश करना आम बात नहीं थी। हमने किया और एक अलग रास्ता चुन लिया। मैनें मेरी माँ के डेंटल क्लिनिक के साथ जगह शेयर कर एक छोटी सी जगह से अपना काम शुरू किया।

एक महिला उद्यमी के लिए भारत में ज्यादा चुनौतियाँ है क्योंकि यहाँ अभी शुरूआत है। जब मैं गर्भवती थी और बहुत से काम एक साथ कर पाती थी और जब मैं पूँजी जुटाने के लिए बाहर जाती तो लोग मेरे बारे में बहुत कुछ कहते थे। लोग मेरे बच्चे के लिए अपनी चिंता जाहिर करते थे। मेरा भाग्य अच्छा था कि मुझे बहुत अच्छे सहयोगी मिले जो मुझ पर भरोसा करते थे।

बहुत से लोग यही मानते हैं कि आईआईटी या आईआईएम वाले ही कुछ अच्छा कर सकते हैं परन्तु यह सही नहीं है। सफलता का मानदंड व्यक्ति से परिभाषित होता है।

आज अनिशा का उद्यम माई-डाला का मूल्य 1000 करोड़ आंका गया है। वे आज बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं। उन्होंने सभी बाधाओं के साथ विजय प्राप्त किया और अपने काम से लगातार महिलाओं को प्रोत्साहित कर रही हैं।