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यदि आप अपने शौक को अपने बिज़नेस का रूप देते  हैं तो सफलता आपके कदम निश्चित तौर पर चूमेगी इसी विचार को सत्यार्थ किया है बंगलुरु में रहने वाले दो युवको ने जिन्होंने अपनी मीट के प्रति दीवानगी को अपने व्यवसाय में बदला और मात्र 2 सालों में अपने व्यापार को 15 करोड़ तक पंहुचा दिया।यह है अभय हंजूरा और उनके दोस्त विवेक गुप्ता। इकतीस वर्षीय कश्मीरी पंडित अभय जम्मू के रहने वाले है ,वर्ष 2004 में स्नातक करने के लिये वह बंगलुरु आ गये। स्नातक करने के बाद उन्होंने बिज़नेस और रिस्क मैनेजमेंट में भी डिग्री हासिल करी वह विवेक चंडीगढ़ के रहने वाले है और चार्टेड अकाउंटेंट है। वो भी वर्ष 2004 में नौकरी के सिलसिले में बंगलुरु आ गये थे।वह दोनों एक दुसरो से काम के सिलसिले वर्ष 2010 में मिले और काफी अच्छे दोस्त बन गये और अक्सर खाली समय में लंच या डिनर पर किसी होटल या रेस्टोरेंट में मिलने लगे। यहाँ वह दोनों खाने में सिर्फ मीट का ही आर्डर देते थे और ऐसी कई मुलाकातों ने उनको एहसास  कराया की दोनों का स्वाभाव एक सा है और दोनों को मीट खाना बेहद पसंद है। हालांकि दोनों ही जॉब कर रहे थे लेकिन इनके मन में बिज़नेस करने की प्रबल इच्छा थी और दोनों को ही लगता था की नौकरी छोड़ कर  उन्हें साथ में  कुछ अपना करना चाहिये। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए  अभय ने विवेक के साथ  2015 में मीट का बिज़नेस करने की सोची,विवेक के अनुसार उन्हें उस समय मीट के बारे में कुछ भी नहीं पता था लेकिन अभय ने कहा कि वह इसकी चिंता छोड़े वह उन्हें सब कुछ सीखा देंगे। जब दोनों के परिवारों को उनकी इस सोच का पता चला तो सभी ने उनके नौकरी छोड़ कर बिज़नेस में जाने का विरोध किया और मीट के बिज़नेस में तो बिलकुल ही नहीं। कहते है न "एक और एक ग्यारह होता है " दोनों दोस्तों को एक दूसरे पर पूरा विश्वास था  और सारे विरोधो को दरकिनार करते हुए इन्होने "लिशस ब्रांड" नाम से कंपनी शुरू की।

इनकी कंपनी मीट और मांसाहारी उद्पाद बनती है जिनमे मछली ,सीफ़ूड और मांस के उत्पाद की कई श्रेणियां  है, जो की रॉ और मैरीनेड उत्पादों में उपलब्ध है। लिशस में ऑनलाइन आर्डर बुक किये जाते है।अपनी लगन और मेहनत के बलबूते पर पहले ही महीने में उन्हें 1300 आर्डर मिले और आज मीट की फ्रेश और अच्छी क़्वालिटी के चलते सिर्फ बंगलुरु में ही एक महीने में 50 हज़ार आर्डर पुरे करते है। शुरू में इनके पास मीट रखने की केवल 30 यूनिट थी जो अब बढ़कर 90 हो गयी है। अभय बताते है की भारत में मीट का कारोबार लगभग 30 -35 अरब डॉलर का है लेकिन सही गुडवत्ता वाला मीट एक समस्या थी। दुकानों पर मिलने वाला मीट जिस ढंग से रखा जाता है उससे बीमारी फैलने की बहुत आशंका रहती है इसलिए ग्राहकों को अच्छी क़्वालिटी वाला मीट देने के लिए दोनों कंपनी में एंटीबायोटिक्स से लेकर  स्टेरॉयड्स तक का निरक्षण करते है और कई तरह के प्रयोग और रिसर्च के बाद फार्म टू टेबल का मॉडल तैयार किया  जिसके तहत गुडवत्ता और और लगातार ताज़गी को बरक़रार रखने के लिये कोल्ड चेन को मजबूत किया।साथ ही अपनी कंपनी को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करने के लिए अभय और विवेक ने निओपल्क्स टेक्रॉलोजी फंड, सिस्टेमा एशिया फंड, 3 वन4 कैपिटल और मेफील्ड इंडिया के नेतृत्व में एक करोड़ डॉलर की सीरीज-बी का फंड जुटाया। दिसंबर 2015 में इसने मेफिल्ड कैपिटल और 3वन4 कैपिटल से 30 लाख डॉलर का सीरीज-ए का फंड जुटाया था। इससे पहले इस कंपनी ने अगस्त 2015 में इन्फोसिस बोर्ड के पूर्व सदस्य टीवी मोहनदास पई और हीलियन वेंचर्स के सहसंस्थापक कंवलजीत सिंह समेत ऐंजल इन्वेस्टर्स से पांच लाख डॉलर जुटाए थे।

मांस की उच्च क्वालिटी के लिये इन्होने सीधे  मुर्गी पलकों से गठजोड़ कर उनको मुर्गी के बच्चे को उसकी खास उम्र, वजन, आकार और उसके आहार के बारे जानकारी दी जाती है और  इन मुर्गियों को तैयार करके हर रोज चार घंटों के अंदर तापमान नियंत्रित वाहनों में संसाधन केंद्रों तक पहुंचाया जाता है।कंपनी का अपने स्टॉक पर पूरा नियंत्रण रहता है। हर खेप को लैब में परखा जाता है, उसके बाद ही उसे पैक किया जाता है और कोल्ड चेन से व्यवस्थित डिलिवरी केंद्रों पर भेजा जाता है। विवेक कहते हैं कि इस कोल्ड चेन को शुरू से लेकर आखिर तक कहीं भी नहीं तोड़ा जाता है। यानी प्रॉडक्ट को हर समय ठंडे तापमान पर रखा जाता है। लिशस 30 विक्रेताओं के साथ काम करती है और हर रोज करीब तीन टन मांस खरीदती है।

विवेक बताते है पहले उन लोगो को लगता था जैसे जैसे काम बढ़ेगा तब आवश्कता के अनुसार ज्यादा मॉस ख़रीदना बहुत चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन मार्किट की समझ और कुशल नेतृत्व के कारण यह हमेशा ही बहुत आसान रहा। अभय कहते हैं लिशस ब्रांड कभी भी गुडवत्ता से समझोता नहीं करती इसलिये  हम समुद्र तट से सी फूड लेते हैं और कोल्ड चेन में उसकी गुणवत्ता कायम रखते हैं। आज कंपनी का एक रिसर्च सेंटर बेंगलुरु में है और हैदराबाद में इसके तीन डिलिवरी केंद्र हैं।कीमत के बारे अभय बताते है कई हमारे कुछ प्रोडक्ट देखने में खुले में उपलब्ध मीट की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत ज्यादा लगते है लेकिन ऐसा है नहीं। परंपरागत बाजार में वजन के बाद मांस टुकड़ों में काटा जाता है और अंतिम खरीद की मात्रा 10-15 प्रतिशत कम होती है। लेकिन हम पूरी तौल और अच्छे से साफ-सफाई के बाद ही हम मीट को ग्राहक को देते हैं।

बंगलुरु शहर में मिली अपार सफलता और नयी फंडिंग के बाद इनके हौसले काफी बुलंद है और अगले 2 सालो में यह कंपनी को देश के कई बड़े शहरो में ले जायँगे जिनमे दिल्ली ,मुंबई और पुणे प्रमुख है।  इसकी मौजूदा बिक्री ज्यादातर ऑनलाइन हो रही है, वहीं एक बार फ्रंटएंड पर विश्वास हासिल करने के बाद कंपनी  रीटेल पर भी ध्यान देगी।अभय बताते है की आज इनके सामने दो प्रमुख चुनौतियां है पहली ग्राहकों को बताना सही मीट क्या है और दूसरा कम दाम में उच्च गुणवत्ता वाला मीट प्रोडक्ट लांच करना। अपने मजबूत इरादों एवं  इच्छाशक्ति के चलते 2016-17 में  दोनों दोस्तों  की कंपनी का कुल टर्नओवर 15 करोड़ था। विवेक और अभय का लक्ष्य  इसे बहुत जल्द हर महीने 6-7 करोड़ रुपये करने का है।