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खुद के लिए कुछ करने की चाह तो सब में होती हैं परन्तु अपने साथ साथ समाज में व्याप्त दुर्दशा को सवारने का जुनून विरलों में ही होता है , कुछ ऐसी ही है कनिका आहूजा जिन्होंने दिल्ली के  श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से एमबीए की  डिग्री  लेने के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम किया । एक अच्छी नौकरी होने के बावजूद उनका मन हमेशा समाज के लिए कुछ सकात्मक करने की सोच में लगा रहता था। कनिका को शुरू से ही सामाजिक कार्यो में रूचि थी तथा वह अपने माता पिता द्वारा बनाई संस्था कंज़र्वे इंडिया जो कचरा प्रबन्दन और ऊर्जा कौशलकी फील्ड में काम करती हैं ,एक वालेंटियर के रूप में  कार्य करती थीं।कुछ साल पहले हरियाणा के बहादुरगढ़ के स्लम में लगे एक मेडिकल कैंप ने कनिका को एक मकसद दे दिया ,कनिका बताती है की उनके एक दोस्त जो कैंप में बच्चों का इलाज कर रहे थे ,ने बताया की 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अत्यधिक कुपोषण का शिकार थे।यही नहीं  कनिका ने बहादुरगढ़ के स्लम में  जा कर यह भी देखा यहाँ सब्जी वाले सड़ी गली सब्जियाँ महँगे दामों में बेच जाते थे तथा ये वो सब्जियाँ थी जिनको उगाने में काफी बड़ी मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल होता था।यही से यह  विचार आया क्यों ना एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए की ये लोग बिना किसी कीटनाशक के  उपयोग के साफ़ और पौष्टिक सब्जियाँ उगा सकें।इसी विचार को क्रियान्वित करते हुए उन्होने नौकरी छोड़ी और करनाल जा कर ऐसी सब्जियों को उगने के लिए रिसर्च की। आज कनिका अपने संगठन "क्लेवर बड "(clever bud) के जरिये लोगों को पोली हॉउस फार्मिंग का हुनर सीखा रही हैं।खास बात ये है की सब्जियाँ उगाने के लिए वह मिटटी की जगह नारियल की जटा का इस्तेमाल कर रही है,जिसके लिए इन्होने इंटरनेट की भी  मदद ली। कनिका ने अपने आईडिया पर काम करते हुए यह तय किया की वो सब्ज़ियों को उगने की ट्रैनिंग के लिये करनाल के “इंडो इस्राली सेंटर आफ एक्सीलेंस फॉर वेजिटेबल” में जायँगी।

कनिका ने अपनी रिसर्च पूरी करने के बाद दो साल पहले  बहदुरगढ़ में तीन फ़ैक्टरियो  की छतो पर अपना पहला प्रोजेक्ट शुरू किया और उसकी सफलता से प्रेरित हो कर सितम्बर 2016 में अपनी एक सामाजिक उधम  'क्लेवर बड " की स्थापना की जिसके माध्यम से वह पाली हाउस फ़ार्मिंग से खेती कर पौष्टिक सब्जियाँ पैदा करने वाले तरीको को बेचती है ।पाली हाउस फ़ार्मिंग के बारे में कनिका बताती है की यह एक तरीके का ग्रीन हाउस होता है। जहाँ पर चारो तरफ एक प्लास्टिक फिल्म लगायी जाती हैं जिसके कारण बहार व भीतर के वातावरण में काफी  अन्तर होता हैं तथा अन्दर का वातावरण ज्यादा सुरक्षित होता है। यह प्लास्टिक फिल्म सूरज की  ख़तरनाक अल्ट्रावायलेट किरणों को बाहर वापस भेज देती है तथा अच्छी किरणों को ही अंदर आने देता हैं।इसके बाद पॉली बैग में कोकोनट पीट के बुरादे को भरा जाता है जिसे नारियल की  जटा को पीस कर बनाया जाता है। इसके बाद इसी बुरादे में सब्जियों के  बीज डाले जाते है। वही दूसरे पोषक तत्व आवश्यकता अनुसार अलग से डाले जाते है। इन पोषक तत्वों में नाइट्रोजन,पोटाशियम और फॉस्फोरस के मिश्रण का इस्तेमाल होता है जिससे आम पौधों की तुलना में यह चार पांच गुडा तेज़ी से बढ़ते है और सबसे खास बात इनमे किसी भी प्रकार के  कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं होता है।कनिका के द्वारा तैयार पॉलीहाउस में तापमान नियंत्रित रहता है इसलिए गर्मियों में भी जाड़ो में  उगने वाली पालक और मेथी जैसी  मौसमी सब्जियाँ भी उगाई जा सकती है।इनके एक पॉलीबैग से एक टमाटर के पेड़ में करीब 150 टमाटर तक लग जाते है।

इस समय हरियाणा में बनाए 3 पॉलीहाउस में से 2  बहादुरगढ़  व  1  मानेसर में है।एक दिल्ली के पंजाबी बाग़ के स्कूल में काम कर रहा हैं जहाँ बच्चों के मिड डे मील के लिये सब्ज़ियाँ इसी पॉलीहॉउस से ली जाती है।इसके अलावा एक पॉलीहाउस मदनपुर खादर में भी है जो खास तौर पर वहाँ के स्लम में रहने वाले लोगो के लिये है जिसकी सारी फंडिंग कॉर्पोरेट की सी एस आर पालिसी से हुई हैं।क्लेवर बड "(clever bud) आज हर उस  व्यक्ति की मदद करता है जो  अपने घर की छत के हिसाब से पॉलीहॉउस  तैयार करना चाहता हैं। पॉलीहॉउस के सिस्टम को बनाने में करीब 20 दिन लगते हैं। इस सिस्टम को लगाने के साथ साथ इसके रखरखाव की ट्रैंनिंग भी दी जाती है। एक बार इस्तेमाल होने के बाद कोकोनट पीट  को बाहर निकाल कर नरम किया जाता हैं तथा उसको लगातार तीन साल तक इस्तेमाल कर सकते हैं। सबसे छोटा पॉलीहॉउस 4 सौ वर्ग फुट का होता है जिसकी लागत लगभग 1 लाख 20  हज़ार रूपए आती है। जबकि 800 वर्ग फुट में पॉलीबैग बनाने की कीमत लगभग 2 लाख 10 हज़ार के आस पास आती है। 1 एकर के ऊपर का पॉलीहॉउस बनाने में सरकार सब्सिडी भी देती है।क्लेवर बड की अब तक की सफलता से उत्साहित हो कर कनिका अब नोएडा ,कोटा और भुवनेश्वर में भी पॉलीहॉउस बनाने जा रही हैं।