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परोपकार और तपस्या में भले ही शाब्दिक अंतर हो लेकिन लंबे समय तक परोपकार से जुड़े रहना सच्ची तपस्या ही कहलाता है। दामोदर गणेश बापत पिछले 40 सालों से कुष्ठ रोगियों की सेवा कर रहे हैं। पेशे से चिकित्‍सक तो नहीं लेकिन कुष्‍ठ रोगियों के मनोचिकित्‍सक से कम भी नहीं हैं। कुष्ठ रोग जिसे एक महारोग माना जाता है जिसमें शारीरिक अपंगता के साथ-साथ कुष्ठरोगी अपनों की अनदेखी के कारण मानसिक रूप से भी अपंग हो जाते हैं क्योंकि उनका आत्मविश्वास ही उनका साथ छोड़ देता है। छत्तीसगढ़ के कटरीनगर गांव में पिछले 40 सालों से दामोदर गणेश बापत कुष्ठ रोगियों के समाज के साथ रह रहे हैं, उनके साथ ही भोजन करना पानी पीना, उनकी सेवा करके समाज के लोगों को संदेश दे रहे हैं कि कुष्‍ठ रोगी भी सामान्‍य जीवन जी सकते हैं।

आज से 40 वर्ष पहले समाज की अवधारणा कुष्ठ रोगियों के प्रति ऐसी थी कि लोग उनसे बात करना भी पसंद नहीं करते थे लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। दामोदर गणेश की टीम में 17  सहयोगी हैं जो अपना पूरा समय संस्था को देते हैं। छत्तीसगढ़ की सरकार ने भारतीय कुष्ठ निवारण संघ के सराहनीय कार्य को देखते हुए उन्हें सरकारी सहायता देने का फैसला भी किया है। बापत को इस बात का गर्व है की सरकार के साथ-साथ आज बहुत से लोग नियमित रूप में कुष्ठ रोगियों की मदद करना चाहते हैं और कर रहे हैं। 

कुष्ठ रोगियों की सहायता दो स्‍तरों पर की जाती है। अपनों द्वारा नकारे जाने पर उनको रहने के लिए जगह की व्यवस्था करना और दूसरा उनको अपने पैरों पर खड़ा करना। वापत की संस्था कुष्‍ठ रोगियों को मानसिक रूप से आश्‍वस्‍त करके उनके आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं। साथ ही ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता कुष्ठरोगी है लेकिन वह इस रोग से प्रभावित नहीं है लेकिन समाज द्वारा स्वीकार्य भी नहीं है। ऐसे बच्चों के लिए सुशील बालक ग्रह के नाम से एक संस्था वापत चलाते हैं जिसमें 150 बच्चों की देखभाल की जाती है। यही संस्था छोटे बच्चों के लिए देखभाल केंद्र भी चलाती है जिसमें 65 बच्चों की देखभाल की जा रही है। इतना ही नहीं 73 एकड़ भूमि पर चावल, सब्जियों और फलों की खेती करके इन लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। आईडीबीआई द्वारा वोकेशनल ट्रेनिंग स्कूल भी चलाया जाता है जिसमें दरियां, पायदान, रस्सी इत्यादि बनाना छोटे-छोटे कार्य सिखाए जाते हैं। कुष्ठ रोगियों की सेवा के साथ-साथ भागवत समाज में यह जागरुकता भी फैला रहे हैं कुष्ठ रोग छूत का रोग नहीं है।

निस्‍वार्थ सेवा का सच्‍चा उदाहरण प्रस्‍तुत करने वाले बापत महाराष्‍ट के अमरावती गांव से संबंध रखते हैं उनके पिता रेलवे में काम करते थे। अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे बापत ने नागपुर से स्‍नातक पूरी करने के बाद कुछ समय तक नौकरी की व छोड़ी लेकिन राष्ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के सदस्‍य रहे बापत विवेकानंद के जीवन से भी प्रभावित थे अत: समाज के लिए कुछ करना चाहते थे। यह खोज पूरी हुई जब कुष्‍ठ रोगियों की सेवा करते हुए संस्‍था के लोगों को देख कर 1972 में उन्‍होंने सैक्रेटरी के तौर पर संस्‍था का कार्यभार संभाला। आज तक बिना रूके समाज सेवा के निस्‍वार्थ लक्ष्‍य को पूरा कर रहे हैं।

बापत की सच्‍ची सेवा के फलस्‍वरूप उन्‍हें अनेकों पुरस्‍कारों से नवाजा गया है। वर्ष 2018 में बापत को पदमश्री पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। लेकिन बापत के लिए तो भारत की श्रेष्‍ठ भूमि पर जन्‍म लेना ही सबसे बड़ा सम्‍मान और पुरस्‍कार है।