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अगर आप एक सफल कारोबारी है और आपके पास रुतबे  व धन की कोई कमी नहीं है तो निश्चित रूप से आप अपना समय बड़ी बड़ी पार्टियां आयोजित कर ,देश विदेश में छुट्टियां बिता  कर ऐशो आराम से जिंदगी बिताना पसंद करेंगे। लेकिन दिल्ली की एक कारोबारी मंजू झा का जीवन इससे बिलकुल उलट है ,एक सफल कारोबारी  और  समाज में अच्छी प्रतिष्ठा होने के बावजूद इन्होंने अपना जीवन गरीब बच्चो को शिक्षित कर उनको अपने पैरो पर खड़ा करने तथा महिलाओं के सामाजिक उत्थान और उनको आत्मनिर्भर बनाने में समर्पित कर रखा है।

दिल्ली के करोड़ी मल कॉलेज से पढ़ी मंजू ने बिज़नेस के क्षेत्र में भी झंडे गाड़े है। वह गोपाल जी डेरी की सीईओ रह चुकी है और उस पद पर रहते हुए उन्होंने गोपाल जी ब्रांड को नयी ऊचाँइयों पर पहुंचाया था। कारोबार के सिलसिले में वह देश के कई शहरों,कस्बो और गाँवो में घूमी और हर जगह अपने मिलनसार स्वभाव के कारण उन्हें लोगो को करीब से जानने का मौका मिला ,प्रायः सभी जगह उन्होंने महसूस किया कि चाहे वह देश का कोई भी कोना हो आर्थिक रूप से पिछड़े स्लम में रहने वाले लोगो की स्थिति बड़ी ही दयनीय है। उन्होंने देखा यहाँ रहने वाले बच्चे सामान्य जिन्दगी जीने के लिये आवश्यक चीज़े जैसे पौष्टिक भोजन ,कपडे और पढ़ाई से कोसो दूर हैं। उनकी ऐसी हालत देख कर वह काफी परेशान हो गयी और उन्होंने फैसला किया कि वह स्लम में रहने वाले बच्चो और औरतो के लिये कुछ करेंगी और उनके जीवन को नयी राह दिखाएंगी। अपनी इसी विचार को साकार रूप देने के लिए वर्ष 2003 में गोपाल जी डेरी के सीईओ पद पर रहते हुए इन्होंने "वर्ल्ड होप फाउंडेशन " की स्थापना की जिसकी आज वो अध्यक्ष है। शुरुआत इन्होंने  मात्र 5 बच्चों को पढ़ाने से की थी और 13 साल बाद न सिर्फ हज़ारो बच्चो को पढ़ा रही है बल्कि उनके सम्पूर्ण विकास पर भी बहुत अधिक ध्यान दे रही है। अपनी इस मुहीम में वो गरीब बच्चो को सभी विषयो की कापी किताबे व स्टेशनरी का सामान उपलब्ध कराती है और बच्चों के लिए योग ,पर्सनालिटी डेवलपमेंट व सेल्फ डिफेन्स की ट्रैंनिंग कराती है साथ ही डिजिटल इंडिया कैम्पेन के द्वारा इन बच्चों को कंप्यूटर ट्रैंनिंग भी दिलवा रही है।  मंजू कई स्लम इलाको में रेमिडियल एजुकेशन सेंटर भी चला रही है जिसका उदेश्य है की बच्चे पढ़ाई में पीछे न रह जाए। यहाँ पर स्कूली बच्चे शाम 4 से 7 बजे तक पढ़ाई करते है. यह रेमिडियल सेंटर दिल्ली के पड़पड़गंज ,महावीर एन्क्लेव और गाज़ियाबाद और गुडगाँव में भी काम कर रहा है। जो बच्चे आर्थिक तंगी के कारण स्कूल नहीं जा पाते है उनका दाखिला मंजू सरकारी स्कूलों में कराती है । अपनी वर्ल्ड होप फाउंडेशन के जरिए यह स्लम में रहने वाले गरीब लोगो को “फीड इंडिया भंडारा” के अंतर्गत दो वक़्त की रोटी भी मुहिया कराती है। 

पूर्ण शिद्दत से काम करने वाली मंजू झा महिला सुरक्षा व उनके विकास पर भी विशेष ध्यान दे रही है और दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर समय समय पर  "सेफ वुमन , सेफ इंडिया " नामक कार्यक्रम चलाती है जिसके अंतर्गत पुलिस स्टेशन में मौजूद ट्रेनर की सहायता से महिलाओं को सेल्फ डिफेन्स की ट्रैंनिंग दिलवाई जाती है और आत्म निर्भर बनाने के लिये रोज़गार के साधन दिलवाती है जिसमे सिलाई कड़ाई ,ब्यूटी पार्लर ,गिफ्ट मेकिंग ,कूकरी व बैग बनाने की ट्रैंनिंग प्रमुख है। प्रोत्साहित करने की बात यह है की वर्तमान में ट्रैंनिंग ले चुकी महिलाये 10 से 15 हज़ार रूपए महीना कमा रही है साथ ही इनके द्वारा बनाये गये समान की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है जिससे इनकी अच्छी आय होती है। मंजू झा का फोकस दिल्ली एनसीआर कि महिलाओं पर है और अब तक इनके साथ 10 हज़ार से ज्यादा महिलाये जुड़ चुकी है। इनकी संस्था ने वोलेंटियर्स के जरिए बिहार ,झारखंड ,हरियाणा और राजिस्थान में भी शुरू कर दिया है। यह वोलेंटियर्स बच्चो को पढ़ाने , खाने व कपडे बांटने के साथ ही हेल्थ कैंप का भी आयोजन करते है।  इनकी संस्था एक कम्पैन चला रही है जिसे उन्होंने “गुलाबो” नाम दिया है इसके अंतर्गत वह महिलाओं पर होने वाली घरेलू हिंसा पर काम कर रही है और इस विषय पर कई वर्कशॉप और सेमिनार का आयोजन भी करती है और ऐसी महिलाओं की कॉउंसलिंग कर उन्हें कानूनी अधिकारों की जानकारी भी देती है। इस विषय पर मंजू कहती है कि “अगर आप किसी के घर में अपनी जैसी ख़ुशी चाहते है तो उसके लिये वर्षो तक जमीन तैयार करनी पड़ती है। यह ख़ुशी सदा सच्चे सेवा भाव से ही प्राप्त की जा सकती है”। 

मंजू हर महीने" इंडिया स्पेशल न्यूज़ " और "लाडो की आवाज़ " नामक दो पत्रिकाएं भी निकलती है। इस बारे मंजू बताती है की "उनका मकसद कॉर्पोरेट जगत के लोगो को सन्देश देना है कि सम्पूर्ण समाज में समानता होनी चाहिये और अमीरी और गरीबी के बीच की खाई मिटनी चाहिये " और इसी विषय में वह एक "मिलियन स्माइल" नाम की कैम्पेन चला रही है  जिसके लिए वह कहती है की हर एक अमीर व्यक्ति को एक गरीब का हाथ थाम कर सशक्त बनाना चाहिये जिससे यक़ीनन एक दिन देश से गरीबी मिट जाएगी “। आगे वह बताती है कि “ अपने सारे कार्यक्रमों के लिए वह स्वयं ही फंडिंग की व्यवस्था करती है , उनके  दोस्त व रिश्तेदार भी निस्वार्थ भाव से उनकी सहायता करते है और साथ ही कुछ कॉर्पोरेट भी उनके आयोजनो को स्पांसर करते है और अपनी पत्रिकाओं की बिक्री से भी इन्हे पैसा मिल जाता है इसलिये उन्हें अपने वर्ल्ड होप फाउंडेशन के लिये सरकार से किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता नहीं पड़ती है”। मंजू बताती है कि इन सभी कामों के लिये उन्हें अपने पिता से प्रेरणा मिलती है। भगवान में अटूट श्रद्धा रखने वाली मंजू का विश्वास है की एक दिन स्लम के लोग अपनी मूलभूत जरूरतो को पूरा करते हुए सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करेंगे और एक ऐसा समाज होगा जिसमे महिलाये पूर्णतः सुरक्षित होगी। जिस निस्वार्थ भाव के साथ मंजू झा समाज के विकास के लिए अग्रसर है अगर प्रत्येक नागरिक उनसे प्रेरणा लेकर इस ओर एक छोटा सा भी कदम बढ़ाये तो अपने समाज में बड़े बड़े सकारात्मक बदलाव संभव है।