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मुंबई स्लम में रहने वाला “गुदड़ी का लाल” बना इसरो का साइंटिस्ट

भारत की सर्वोच्‍च प्रतिष्ठित संस्‍था ‘इसरो’ (भारतीय स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन) में जाने का सपना भला कौन नहीं देखना चाहेगा लेकिन इसे देखना तो दूर सोचना भी आसान नहीं है। खासकर स्लम में 10’ by 10’ के एक कमरे में रहकर जीवन की बुनियादी जरूरतों के अभाव में ऐसा सोचना तो नामुमकिन ही है। लेकिन मेहनत और लगन का जुनून हो तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई के 25 साल के प्रथमेश हिरवे ने जो मुंबई के स्‍लम पोवई इलाके में फिल्टरपाड़ा के 10’ by 10’ के एक कमरे में अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। 

मुंबई के चर्चित रेड एफएम शो में प्रथमेश अपने 10’ by 10’ के इस घर को माता-पिता की नजदीकी का मुख्य कारण बताते हुए कहते हैं कि इतने छोटे से कमरे में हमेशा मां बाप के सामने रहने से ध्यान कभी पढ़ाई से भटका नहीं और उनके मीठे बोल हमेशा मन में कुछ बनने की प्रेरणा भर देते थे। 

प्रथमेश को 10 वीं कक्षा में कैरियर काउंसलर ने इंजीनियरिंग की बजाए आर्ट्स लेने की सलाह दी। हिरवे का मन तो बहुत टूटा लेकिन हौसला नहीं, इसलिए उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में भग्गूभाई मफतलाल पॉलिटेक्निक कॉलेज से डिप्लोमा किया। दसवीं तक मराठी मीडियम से पढ़ने के बाद अंग्रेजी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना प्रथमेश के लिए बहुत बड़ी चुनौती था, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। लार्सन एंड टर्बो, टाटा पावर में इंटर्नशिप करने के बाद इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग नवी मुंबई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की डिग्री 2014 में प्रथमेश को मिली। इसके बाद उन्होंने UPSC के एंट्रेंस एग्जाम दिए लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। कभी कभी असफलता भी किसी बड़ी सफलता का रास्ता खोल देती है। मन में कुछ बड़ा करने की चाह रखने वाले प्रथमेश ने देश के प्रतिष्ठित इसरो 2016 के एंट्रेंस के पेपर्स की तरफ रुख कर लिया। कुल 16000 विद्यार्थियों में से मात्र 9 विद्यार्थी चुने गए जिनमें एक नाम प्रथमेश हिरवे का भी है। 

प्रथमेश की सफलता सामान्य विद्यार्थियों से कहीं ज्यादा महत्व रखती है क्‍योंकि जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में स्लम में रहकर भी, उन्होंने इस नामुमकिन सफलता को अर्जित किया है। 

हिरवे की मां मात्र आठवीं कक्षा तक पढ़ी हैं। अपनी खुशी के आंसू नहीं रोक पाती चाहे वह नहीं जानती कि उनके बेटे ने देश की जिस संस्था में पद पाया है वह भारत की एक सर्वोच्च संस्था है। हिरवे के पिता उनकी मां को इस संस्था का महत्व समझाते हैं। ऐसे होनहार बेटे पर पर माता पिता को गौरवान्वित होना ही चाहिए, जिसने जीवन की कठिनाइयों को अपनी सफलता की सीढ़ी बना लिया, और एक एक कर पार करने में इतना मगन हुआ कि एक दिन स्वयं को आकाश की ऊंचाइयों पर पाया। 

इसरो चंडीगढ़ में हिरवे इलेक्ट्रिकल वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत होंगे। मुंबई से चुना जाने वाला यह पहला वैज्ञानिक देश के युवाओं का संदेश वाहक है कि कड़ी मेहनत, दृढ़ निश्चय, कठिनाइयों के आगे न झुकना और माता पिता का सानिन्‍ध्‍य यह लक्ष्य प्राप्त करने का अचूक नुस्खा है।