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कहते हैं इंसान का जीवन की उसका सबसे बड़ा गुरु होता है।ज़िंदगी के हर मोड़ पर हमें कोई न कोई ऐसा जरूर मिलता है जो हमें उम्रभर का पाठ पढ़ा जाता है। कभी कभी तो हम उन घटनाओं की अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं पर कुछ घटनाएं हमनें ताउम्र याद रह जाती है। जरूरी नहीं यह सीख हमें केवल अपनों से मिले, कभी-कभी एक अजनबी भी हमें वह सीख दे जाते हैं जो हमारे लिए एक प्रेरणा बन जाती है।

कुछ ऐसी ही सिख मिली बॉलीवुड के जाने-मानें अभिनेता और ट्रैजिडी किंग के नाम से मशहूर दलीप कुमार को। उनको जीवन भर की सीख दे जाने वाले भी कोई आम शख्स नहीं थे। वह थे भारत का जाना-माना बिजनेस मैन और टाटा समूह का मालिक जेआरडी टाटा।
यह किस्सा है एक्टर दिलीप कुमार और जेआरडी टाटा के बीच फ्लाइट में हुई पहली मुलाकात का। ये वो दौर था जब दिलीप कुमार अपने करियर के पीक पर थे और टाटा भारत के सबसे जानेमाने और सफल बिजनेसमैन। इस किस्से का जिक्र उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द सबस्टांस एंड द शैडो' में भी किया है।

पाकिस्तान के पेशावर में जन्म लेने वाले मोहम्मद यूसुफ खान अब बॉलीवुड के लिए दिलीप कुमार बन गए थे। यह उस वक्त की बात है, जब दलीप कुमार अपने करियर के शीर्ष पर थे। एक बार वे प्लेन में यात्रा कर रहे थे, और अपनी गाड़ी से उतरते ही एयरपोर्ट पर उनको सैकड़ों फैंस की भीड़ मिलती है। कोई उनसे ऑटोग्राफ चाह रहा था, कोई उन्हें चुना चाहता था तो कोई बस एक नज़र देखना चाहता है। उन दिलों दिलीप कुमार का क्रेज़ था, वे उस दौर में बॉलीवुड पर एकतरफा राज़ किया करते थे। जैसे तैसे वे भीड़ से निकलकर अपने फ्लाइट में पहुँचे पर वहां भी आलम कुछ जुदा नहीं थी। सारे यात्री उनकी तरफ देखे जा रहे थे, हर कोई उनसे मिलने, उनका ऑटोग्राफ लेने को बेकरार था। दिलीप के लिए भी एक सब रोज की बात थी पर उन्हें असहज तो तब महसूस हुआ जब उनके ठीक बगल में बैठा शख्स उन्हें देख तक नहीं रहा था।

दरअसर ये शख्स था भारत का सबसे बड़ा बिजनेसमैन और टाटा समूह का मालिक जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा यानी जेआरडी टाटा। हिन्दुस्तान के उद्योग जगत का एक ऐसा नाम जिनके बिना भारत के उद्योग जगत का इतिहास लिखा जाना असंभव है। जेआरडी टाटा ने ऐसे समय में अपनी कंपनी का कारोबार बढ़ाया जब भारतीय अर्थव्यवस्था सही नहीं चल रही थी। 1904 में फ्रांस के पेरिस में जन्में जेआरडी भारत के पहले लाइसेंसधारी पायलट भी थे। उन्होंने अपने उड़ने के साथ-साथ सबकी उड़ान का इंतजाम भी किया। इसी लिए जेआरडी टाटा को इंडियन सिविल एविएशन का पिता भी कहा जाता है। शायद ही आपको पता हो कि एयर इंडिया की शुरुआत उन्होंने ही की थी।

दरअसल उस सफर के दौरान दिलीप कुमार को भी नहीं पता था कि वह शख्स कौन है। अब इसमें उनका भी दोष कहाँ था, उस दौर में उन्हें किसी को पहचाननें की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। क्योंकि लोग पहले ही उन्हें पहचान लिया करते थे। दलीप कुमार पर जहाँ सबकी नजरें थी वहीं दिलीप कुमार की नज़र अपने बगल वाली सीट पर बैठे आदमी को ताड़े जा रही थी। सादे शर्ट-पैंट पहनें बैठा वह शख्स चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था। कभी वह अखबार को देखता तो कभी विंडो के बाहर। बस देख नही रहा था तो इतने बड़े सुपरस्टार को जो ठीक उसके बगल में बैठा था।


दिलीप कुमार खुद को रोक नहीं सके और उस शख्स के करीब जाकर पूछा-

‘क्या आप फिल्में देखतें हैं?’
सामनें से जवाब मिला, -‘कभी-कभी’।

दिलीप कुमार ने कहा, ‘मैं भी फिल्मों में काम करता हूं।'
फिर जवाब आया - ‘वंडरफुल’, आप फिल्मों में क्या काम करते है ?

दिलीप नें जवाब दिया – मैं एक्टर हूँ|

जेआरडी नें कहा – बहुत अच्छा |

इस बातचीत के बाद वो शख्स फिर अपनी चाय की चुस्कियों और अखबार के पन्नों में खो गया। दिलीप के साथ पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी कि उन्हें किसी नें पहचाना ना हो।

जब प्लेन लैंड हुआ तो दिलीप कुमार नें उस शख्स से हाथ मिलाया और कहा –

“आपके साथ यात्रा करके अच्छा लगा| वैसे मेरा नाम दिलीप कुमार है।”

दिलीप कुमार ने फिर जोर देकर कहा, ‘मेरा नाम दिलीप कुमार है। सामने वाले शख्स ने कहा, ‘आई ऐम जेआरडी टाटा’ और एक बड़े गुड बाई के साथ बातचीत यहीं खत्म हो गई।

दिलीप कुमार, टाटा का नाम सुनते ही चौंक गए| उन्हें इस बात की सिख मिली कि आप चाहे कितने भी बड़े हो जाओ लेकिन आपसे भी बड़ा हमेशा कोई न कोई होता ही है| घमंड न करें, विनम्र रहें क्योंकि विनम्रता से अच्छी कोई चीज नहीं। दिलीप कुमार नें इस घटना को एक सीख में तौर पर हमेशा याद रखा। यहां तक कि उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द सबस्टांस एंड द शैडो' में भी इस घटना का ज़िक्र किया है।