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खुशी और संतुष्टि की परिभाषा प्रत्येक मनुष्य के जीवन में उम्र के हर पडाव पर अलग हो सकती है। मसलन बचपन में खेलना कूदना, युवावस्‍था में दोस्‍तों के साथ मौज मस्‍ती, रिटायरमेंट के बाद घर पर आराम करने में किसी को खुशी मिल सकती है कई ऐसे भी है जो स्वेच्छा से चैरिटेबल संस्थाओं में निशुल्क सेवा देकर खुशी महसूस करते हैं, लेकिन आज हम जिनके बारे में आपको बताने जा रहे हैं वह हैं हैदराबाद के गंगाधर तिलक जो रेलवे में इंजीनियर के पद पर 35 वर्षों तक कार्य करते रहे। 2008 में उनका रिटायरमेंट होने के बाद उन्होंने एक ऐसा मिशन शुरू किया कि आज वह देश भर में ‘सड़कों के डॉक्टर’ के नाम से जाने जाते हैं समाज सेवा के अनोखे कार्य से वह सड़क पर दिखने वाले किसी भी गड्ढे की मरम्मत करते हैं ताकि सड़क पर एक्सीडेंट ना हो। 

गंगाधर तिलक का बेटा अमेरिका में है। रिटायरमेंट के बाद कुछ समय वह अपने बेटे के पास रहने गए। वहां से वापस आकर एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सलाहकार के रूप में काम करने लगे। एक दिन कार से गुजरते हुए रास्ते में एक गड़ढे के आ जाने के कारण कीचड़ उछल कर वहां से गुजर रहे स्कूली बच्चों की ड्रेस पर जा गिरा जिससे वह गंदे हो गए। इस घटना के बाद गंगाधर तिलक को सड़क के गड्ढों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के बारे में पता चला। शहर में उन्होंने एक एक्सीडेंट देखा जिसमें एक सरकारी बस ने ऑटो को टक्कर मार दी और ड्राइवर की मौके पर मौत हो गई। तिलक ने पुलिस को इसकी जानकारी दी की सड़कों के गड्ढों को भरकर कितनी ही जानें बचाई जा सकती है। लेकिन शायद पुलिस की कार्यवाही उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाई। बस फिर क्या था उन्होंने अपनी कार में टाट के बोरे रखने शुरू कर दिए और बन गए सड़कों के डॉक्टर। जहां गड्ढा देखते उसे भरने की कोशिश करते। 2011 में उन्होंने सॉफ्टवेयर कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ दी और पेंशन के पैसों से सड़कों की मरम्मत करने की जिम्मेदारी संभाली। 

सोशल मीडिया पर तिलक की अनोखी समाज सेवा आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। तिलक की पत्नी को सड़कों के गड्ढे भरने का उनका यह काम अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने चुपचाप अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे को पिता के इस काम की जानकारी शिकायती स्‍वर में की। लेकिन बेटा तो पिता से भी दो कदम आगे निकला उसने अपने पिता के इस अद्भुत कार्य की जानकारी सोशल मीडिया पर फेसबुक पेज और वेबसाइट के माध्यम से लोगों और सरकार तक पहुंचानी शुरू कर दी। इस पहल के कारण कॉलेज के युवा और बच्चे तिलक की मदद के लिए आगे आए तो दूसरी ओर लोगों ने अपने इलाकों के गड्ढों की रिपेयर के लिए तिलक को फोन करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं तिलक के बेटे ने इलाके के कमिश्नर को अपने पिता की इस मुहिम के बारे में जानकारी दी तो कमिश्नर ने आश्वासन दिया कि अब सरकार की ओर से यह काम किया जाएगा। लेकिन तिलक ने सरकारी मदद का इंतजार ना करते हुए अपनी समाज सेवा को जारी रखा। जून 2012 से कमिश्नर की ओर से उन्हें गड्ढे भरने की सामग्री भी दी जाने लगी। 

एक परिवर्तन की आहट तिलक को अपने आसपास महसूस होने लगी। सड़कों के इस डॉक्टर ने अपनी अनोखी मुहिम से सोशल मीडिया की सहायता से सरकारी तंत्र और आम जनता को जागरुक कर ही दिया। 

आज अनेकों इस प्रकार की समस्याएं हम अपने देश में देखते, सुनते और उनका सामना करते हैं इन समस्याओं का निराकरण करने के लिए एक छोटी सी पहल कर दी जाए तो देश व समाज की तस्वीर हम स्वयं बदलने में सक्षम हो सकते हैं।