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बहुत कम ही लोग होते हैं जो ऐसे असाधारण काम करते हैं जिनका प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ता है और जो लोगों के जीवन पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। आज की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने बहुतों को प्रेरित किया है। ई श्रीधरन या कहें मेट्रो मैन ऑफ़ इंडिया, का जन्म और बचपन केरल के करूकापुथुर में बीता। श्रीधरन ने अपने कठिन परिश्रम और लगन से ऐसा काम कर दिखाया जिसने भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अवधारणा को बदल कर रख दिया।

श्रीधरन ने सिविल इंजीनियरिंग में पालघाट के विक्टोरिया कॉलेज से अपनी शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के उपरांत उन्होंने कोझीकोड के सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज में एक लेक्चरर के रूप में काम किया। उन्होंने 1953 में यूपीएससी के द्वारा संचालित इंजीनियरिंग सर्विस एग्जामिनेशन (आईईएस) में सफलता प्राप्त की। आईईएस ज्वाइन करने के बाद उनकी पोस्टिंग 1954 में दक्षिण रेलवे में प्रोबेशनरी असिस्टेंट इंजीनियर के रूप में हुई।

बहुत सारी बाधाएं उनके रास्ते में आई। दिसंबर 1954 में साइक्लोन की वजह से पम्बन ब्रिज क्षतिग्रस्त हो गया था। यह रामेश्वरम और तमिलनाडु को जोड़ता था। रेलवे ने छह महीने के भीतर इसे ठीक करने का बीड़ा उठाया परन्तु उनके बॉस ने इसे तीन महीने कर दिया। उन्हें इस काम का इन-चार्ज बनाया गया। यह एक बड़ी चुनौती थी श्रीधरन के लिए। परन्तु अपनी कड़ी मेहनत और निष्ठा के कारण इन्होंने इसे 45 दिनों में संभव कर दिखाया। उनके काम की तारीफ हुई और रेल मंत्री के द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।

1970 में  श्रीधरन को डिप्टी चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया और उन्हें कोलकाता मेट्रो की जिम्मेदारी सौंपी गई। श्रीधरन के नेतृत्व में यह काम सफलता पूर्वक संपन्न हुआ और भारत में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का श्रीगणेश हुआ।

1979 में श्रीधरन ने कोचीन शिपयार्ड में  चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर का पद संभाला। तब पहली  शिप  रानी पद्मिनी को लांच होने में किसी वजह से देरी हो रही थी। श्रीधरन के काम सँभालते ही रानी पद्मावती शिप सफलता पूर्वक लॉन्च कर ली  गयी।

1987 में पश्चिमी रेलवे के जनरल मैनेजर के रूप में श्रीधरन की पदोन्नति हुई। 1990 में उनकी सेवा निवृति के बाद सरकार ने कहा कि उनके काम की अभी और जरूरत है और इसलिए उन्हें कोंकण रेलवे के सीएमडी के तौर पर नियुक्त किया गया। इस प्रोजेक्ट में 90 सुंरँगे थी और इसकी लम्बाई 82 किलोमीटर की थी। यह 760 किलोमीटर का एरिया कवर करता और उसमें 150 ब्रिज थे। श्रीधरन के निरीक्षण में यह काम भी सफलता पूर्वक सात साल में संपन्न हुआ।

श्रीधरन ने अपनी जिंदगी में बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया। उनकी बायोग्राफी ‘इंडियन रेलवे मैन : ए बायोग्राफी ऑफ़ इ श्रीधरन’ में बारीकी से उनके जीवन की झलकियां बताई गई हैं। इस पुस्तक में बताया गया है कि श्रीधरन कोंकण रेलवे में केवल 1080 रूपये की तनख्वाह पर काम करते थे।

श्रीधरन को दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। उनके निरीक्षण में यह काम बजट के भीतर और समय से पहले पूरा हो पाया। उन्हें मेट्रो मैन का नाम दे दिया गया। दिल्ली मेट्रो के काम को काफ़ी सराहना मिली और उन्हें पूरे विश्व में पहचान मिली। उन्हें भारत सरकार के द्वारा पद्म श्री और पद्म विभूषण सम्मान से भी सम्मानित किया गया। फ़्रांस की सरकार ने उन्हें “नाइट ऑफ़ द लीजन ऑफ़ ऑनर” सम्मान से सम्मानित किया। अभी वे लखनऊ मेट्रो प्रोजेक्ट के चीफ एडवाइजर और कोच्ची मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के एडवाइजर हैं।

आज श्रीधरन 85 वर्ष के हो गए हैं परन्तु अभी भी वे काम कर रहे हैं। उन्हें घर पर बैठना पसंद नहीं है। श्रीधर के दिनचर्या में ध्यान, भगवत गीता का अध्ययन शामिल है। वे कहते हैं “जो कुछ भी किया जाना है मैं करूँगा। परन्तु हकीकत में, मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।”